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बीएचयू: ऐतिहासिक ‘छात्रा-आंदोलन’ के एक साल और परिसर में हावी पितृसत्ता का भेड़िया!

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अंजली

 

अँधेरा घिर आया था। करीब 8 बजे होंगें जब मैं अपनी स्कूटी से त्रिवेणी हॉस्टल की तरफ जा रही थी। देखा कि हमेशा अँधेरे से घिरा वो क्षेत्र रोड लाइट की रोशनी से जगमगा रहा था और रोशनी में चमक रहा था बैरिकेड।  ये सब मेरे लिए नया था, क्योंकि पाँच साल तक बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने के दौरान मैंने त्रिवेणी हॉस्टल के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं देखी थी। इस व्यवस्था ने एक बार फिर ये सोचने को मजबूर कर दिया कि अगर विश्वविद्यालय प्रशासन शुरू से ही इतना सजग होता तो एक साल पहले की उस शाम वो घटना कभी न होता और न शुरू होता वो ऐतिहासिक छात्र आन्दोलन।

मैं बात कर रही हूँ आज से ठीक एक साल पहले यानी 21 सितंबर 2017 से बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में शुरू हुए छात्राओं के आन्दोलन की। याद रहे कि आंदोलन की शुरुआत का अहम मुद्दा छात्राओं के साथ आये दिन होने वाली छेड़छाड़ और यौन-उत्पीड़न की घटनाएँ थी। , 21 सितंबर की शाम विजुअल आर्ट फैकल्टी की एक छात्रा का, शाम के करीब छह-सात बजे, भारत कला भवन के पास बाइक सवार कुछ लड़कों ने यौन-उत्पीड़न किया| विरोध में छात्रा चिल्लाई लेकिन उसकी मदद के लिए कोई भी नहीं आया। जबकि घटनास्थल से करीब सौ मीटर की दूरी पर प्रोक्टोरियल बोर्ड का ऑफिस है|

अगली सुबह 6 बजे सौ से अधिक छात्राएं बीएचयू गेट पर पहुंचीं और प्रदर्शन शुरू कर दिया। छात्राओं के समर्थन में बड़ी संख्या में छात्र भी पहुंच गए और मेन गेट पर चक्का जाम कर दिया गया। छात्राएं ‘वी.सी गो बैक’ और प्राक्टोरियल बोर्ड के खिलाफ लगातार नारेबाजी कर रही थी। उनकी माँग थी कि लड़कियों पर जो प्रतिबंध लगाया जाता है, उन्हें हॉस्टल में कैद किया जाता है, वह बंद हो और इस बार वे किसी झूठे आश्वासन के पीछे जाने वाली नहीं। उन्होंने माँग की कि खुद वी.सी आकर माँगों को पूरा करने की बात कहें। पर ऐसा नहीं हुआ और छात्राओं का प्रदर्शन जारी रहा|

जब छात्राओं को प्रशासन की तरफ से कोई सक्रियता नहीं दिखी तो उन्होंने इसके खिलाफ आवाज़ उठाने का निर्णय लिया। इसके बाद वी.सी गिरीशचंद्र त्रिपाठी लड़कियों के डेलिगेशन से मिलने के लिए त्रिवेणी हॉस्टल पहुंच गए। वहां लड़कियों ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया और कहा कि बात सबके सामने होगी। इस पर वी.सी भड़क गए, जिसके बाद लड़कियों ने हंगामा कर दिया और उन्हें वहां से हटने पर मजबूर होना पड़ा। छात्राओं के त्रिवेणी हॉस्टल से निकलने के बाद रात के करीब दस बजे लड़कियों ने वी.सी आवास का घेराव किया। लड़कियों ने अपनी पुरानी ही माँग दोहराई कि वी.सी घर से निकलें और लंका गेट पर आकर छात्राओं से मुलाकात करें। इस पर लड़कियों का कहना है कि इस छोटी सी बात पर प्रॉक्टोरियल बोर्ड के सुरक्षाकर्मी भड़क गए।  इन लोगों ने तुरंत ही लाठियाँ निकाल लीं और छात्राओं पर चलाना शुरू कर दिया। इस लाठीचार्ज में कई लड़कियों को गंभीर चोटें आयी और कुछ महिला टीचर भी गंभीर रूप से घायल हुईं।|

ये आन्दोलन अपने आप में बेहद ऐतिहासिक था क्योंकि इसने न केवल बीएचयू प्रशासन बल्कि पूरे शहर को हिला दिया। करीब तीन दिन तक चले इस आन्दोलन ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में आये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूट को डाइवर्ट करने के लिए मजबूर कर दिया था। ये पहली बार था जब बीएचयू की छात्राएँ अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर थी और बिना किसी नेतृत्व के उन्होंने संगठित रूप से अपनी मांगों को न केवल प्रशासन बल्कि देश की मीडिया तक में दर्ज करवा दिया था। इस आन्दोलन के बाद विश्वविद्यालय की तरफ से कई सुधार किये गये, जिनके बारे में जब मैंने टीचर और छात्राओं से बात की तो उन्होंने बताया कि –

महिला चीफ़ प्रॉक्टर माने पितृसत्ता की संरक्षिका

इस आन्दोलन के बाद विश्वविद्यालय की तरफ से बतौर महिला चीफ प्रॉक्टर प्रो. रोयना सिंह की नियुक्ति की गयी| प्रशासन की ये पहल भी ऐतिहासिक रही क्योंकि पहली बार विश्वविद्यालय में महिला चीफ प्रॉक्टर की नियुक्ति की गयी| देश की मीडिया ने इस पहल की खूब वाह-वाही की और इस पहल की प्रस्तुति इस तरह की गयी कि अब से विश्वविद्यालय में महिला संबंधित कोई भी समस्या सामने नहीं आएगी। लेकिन अगर छात्राओं की मानें तो उनका कहना है कि प्रशासन का ये फ़ैसला शायद सही होता अगर पितृसत्ता के खिलाफ छात्राओं के संघर्ष में चीफ प्रॉक्टर भी हिस्सा लेतीं। इसके ठीक विपरीत वे हमारे समाने पितृसत्ता की एक संरक्षक के तौर पर पहुँचीं। एक छात्रा ने बताया कि अगर वे अपने किसी पुरुष मित्र के साथ हों तो प्रोक्टोरियल बोर्ड की तरफ से उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है| कई बार चीफ प्रॉक्टर खुद उनके चरित्र पर सवाल खड़े करती हैं। तथाकथित मर्यादा के नामपर सड़ी पितृसत्तात्मक सोच को उन पर थोपना एक आम बात हो चुकी है|

 

सुरक्षा के नाम पर लड़कियों पर बेड़ियाँ

इस आन्दोलन के बाद सुरक्षा के नामपर कई बदलाव किये गये और हमेशा की तरह पितृसत्तात्मक समाज के मूल की तरह पूरा जोर छात्राओं को कैद करने में लगाया गया। लड़कियों के हॉस्टल में एंट्री के समय को 8 बजे से बढ़ाकर दस बजे कर दिया गया, वहीं दूसरी तरफ बैरिकेड भी उन्हीं के हास्टल में लगाये गये। अब हम विश्वविद्यालय के ढाँचे में रोडलाइट के लगने, सीसीटीवी कैमरे लगने और प्रोक्टोरियल बोर्ड के बदले ड्रेस जैसे बदलाव देख सकते हैं, लेकिन मूल में कोई भी बदलाव देखने को नहीं मिलता, क्योंकि अभी भी पूरा सिस्टम लड़की के चरित्र पर सवाल उठाने पर चल रहा है!

छात्राओं में चेतना का विकास हुआ है – डॉ प्रतिमा गौड़

डॉ प्रतिमा गौड़ एकमात्र ऐसी शिक्षिका थी, जिन्होंने इस आन्दोलन में छात्राओं को खुलकर समर्थन दिया। इतना ही नहीं लाठीचार्ज के दौरान लड़कियों के बचाव में खुद भी लाठी का शिकार हुईं। इस आन्दोलन के प्रभाव के सवाल पर उन्होंने कहा कि ‘छात्राओं में गजब की चेतना का विकास हुआ है| अब वे अपने अधिकारों के खिलाफ न केवल सजग है बल्कि उसके लिए संगठित होकर आवाज़ उठाने में भी सक्षम हैं|’

कहते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। इसी तर्ज पर साल भर पहले हुए इस आन्दोलन का प्रभाव किसी वृहत रूप में तो नहीं लेकिन सूक्ष्म बदलावों में ज़रूर देखा जा सकता है। भले ही लड़कियों में चेतना का विकास हुआ हो पर उनके सामने बढ़ती चुनौतियाँ भी कम नहीं है| ऐसे में आन्दोलन के बाद हुए बदलाव कितने सफल रहे और उसके मायने क्या हैं, ये अपने आपमें एक बड़ी चर्चा का विषय है। अगर हम इस पूरे आन्दोलन का विश्लेषण करें तो यही पायेंगें कि इसका आगाज़ सड़ी पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ था, जिसका अंत पितृसत्ता के क्रूर रूप के साथ और सुधार पितृसत्तात्मक सोच की तर्ज पर किया गया। पितृसत्ता का और भी वीभत्स रूप, छात्राओं के खिलाफ़ हमला करने की फ़िराक में मुँह बाये घूम रहा है।


अंजली, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं|

 



 

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