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AU में छात्रसंघ चुनाव पर रोक, छात्र परिषद का गठन, छात्र संगठन कर रहे हैं विरोध

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से छात्रसंघ चुनाव को खत्म कर छात्र परिषद का गठन किया गया है. यूनिवर्सिटी में अब छात्रसंघ चुनाव नहीं होंगे. विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से एकेडिमिक काउंसिल की बैठक में लिए गये इस निर्णय से छात्रों और पूर्व पदाधिकारियों में नाराजगी है. हालांकि यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि छात्रसंघ चुनाव प्रतिबंधित नहीं किया जा रहा है. केवल मोड ऑफ इलेक्शन में बदलाव किया गया है. नई व्यवस्था में अब छात्र सीधे पदाधिकारी नहीं चुन सकेंगे, बल्कि छात्र कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव करेंगे और कक्षा प्रतिनिधि छात्र परिषद के पदाधिकारियों को चुनेंगे. छात्र और छात्र संगठन छात्रसंघ खत्म करने का विरोध कर रहे हैं.

24 जून को एकेडमिक काउंसिल की बैठक में इस पर सहमति बनी और शनिवार, 29 जून को यूनिवर्सिटी में हुई कार्य परिषद की बैठक में निर्णय किया गया. बैठक के दौरान छात्रसंघ भवन पर विरोध में प्रदर्शन हुआ, जिस पर पुलिस को लाठियां चलानी पड़ी. छात्रसंघ अध्यक्ष उदय प्रकाश यादव और महामंत्री शिवम सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. देर शाम इन्हें रिहा कर दिया गया.

यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि लिंगदोह कमेटी ने अपनी संस्तुति 6.1.2 और 6.2.1 में साफ निर्देश दिया है कि सिर्फ जेएनयू और हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे छोटे कैंपस तथा कम छात्र संख्या वाले परिसर में ही प्रत्यक्ष मतदान द्वारा छात्रसंघ का गठन होगा. जबकि ज्यादा छात्र संख्या और कई परिसर वाले विश्वविद्यालय में अनिवार्य रूप से छात्र परिषद का ही गठन होगा. लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत हैं और देशभर के विश्वविद्यालयों के लिए बाध्यकारी हैं.

वहीं छात्रनेताओं का कहना है कि ये यूनिवर्सिटी प्रशासन की मनमानी है. छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष व सपा नेता ऋचा सिंह का कहना है कि लिंगदोह कमेटी की कितनी सिफारिशें आजतक यूनिवर्सिटी ने मानी? यूनिवर्सिटी के वीसी पर तमाम आरोप हैं उनकी खुद जांच चल रही है. छात्रसंघ मुखर रहकर इस पर आवाज उठाता था. इसी आवाज को दबाने के लिए यूनिवर्सिटी प्रशासन ने ये फैसला लिया. छात्र परिषद में तो वही स्टूडेंट्स रहेंगे जिन्हें यूनिवर्सिटी प्रशासन चाहेगा. यहां के छात्रसंघ ने देश को तमाम विजनरी नेता दिए लेकिन प्रशासन छात्रों की आवाज दबाने में जुटा है. उन्होंने कहा कि छात्रसंघ बहाल कराने के लिए राष्ट्रपति, पीएमओ को पत्र लिखेंगे. इसके लिए कोर्ट भी जाएंगे. इस मुद्दे पर उन्होंने अपने फेसबुक पर भी एक पोस्ट लिखा है –

बहुमत की सरकार बनने के बाद सरकार का सबसे बड़ा हमला 97 सालों का इतिहास समेटे हुए इलाहाबाद वविश्वविद्यालय पर…पूरब का…

Posted by Richa Singh on Saturday, June 29, 2019

समाजवादी पार्टी के छात्र संघ के नेता अवनीश कुमार यादव ने इस निर्णय को विश्वविद्यालय प्रशासन, बीजेपी और आरएसएस का साजिश करार दिया है. 26 जून को फेसबुक लाइव कर उन्होंने कहा कि देश का ऐसा कोई भी संवैधानिक पद नहीं है जिसे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ से निकले लोगों ने सुशोभित न किया हो.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ प्रतिबंध पर हमारी मुखर आवाज़ और विरोध

Posted by Awanish Kumar Yadav on Wednesday, June 26, 2019

इलाहबाद यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ का इतिहास 96 साल पुराना है. यहां पहले छात्रसंघ का गठन साल 1923 में हुआ था. पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह 1949 में इस छात्र संघ के उपाध्यक्ष रहे. आजाद भारत के पहले छात्रसंघ अध्यक्ष यूपी-उत्तराखंड के पूर्व सीएम एनडी तिवारी बने. 1948 में यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप बने. मौजूदा राजनीति में मुरली मनोहर जोशी, रीता बहुगुणा जोशी, मुख्तार अब्बास नकवी, अनुग्रह नारायण सिंह भी इसी यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं.

छात्रसंघ का इतिहास यहां 96 बरस का है और इसमें 87 बार मतदान हुआ. किसी दौर में पूरब का आक्सफोर्ड कहलाने वाले इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में वर्ष 1923 में छात्रसंघ चुनाव की परंपरा शुरू हुई थी. उस समय प्रवेश के समय ही शिक्षण शुल्क के साथ यूनियन का सदस्यता शुल्क जमा करा लिया जाता था। प्रत्येक छात्र को अनिवार्य रूप से सदस्य बनाया जाता था.

वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन हुआ था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय स्टूडेंट यूनियन के तत्वावधान में भी ब्रिटिश हुकूमत का विरोध हुआ। इसलिए तत्कालीन शासकों के निर्देश पर यूनियन भंग कर दी गई. इसके बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी  के नेतृत्व में छात्रसंघ के लिए आंदोलन शुरू हुआ. 1945-46 में चुनाव प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई.

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