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मीडिया के निशाने पर संविधान तो हमारे निशाने पर है मीडिया-मीडिया विजिल

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दोस्तो,

21वीं सदी के 17वें वर्ष के गणतंत्र दिवस पर ‘मीडिया विजिल’ एक नई धज के साथ आपके सामने है। वैसे तो मीडिया विजिल जनवरी 2016 से ही सक्रिय है, लेकिन लोगों के समर्थन और उम्मीदों को देखते हुए इसे ज़्यादा प्रभावी और गतिशील बनाने की ज़रूरत महसूस की जा रही थी।

जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, मीडिया विजिल का उद्देश्य मुख्यधारा की मीडिया में जारी फ़र्ज़ीवाड़े को उजागर करना है। हम मानते हैं कि मौजूदा मुख्यधारा मीडिया पूरी तरह कॉरपोरेट हितों के साथ नत्थी हो चुका है और जल, जंगल, ज़मीन की बेशर्म लूट के लिए सहमति विनिर्माण (Manufacturing Consent) के खेल में शामिल है। साथ ही, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों या किसी भी अन्य मेहनतकश तबके के ख़िलाफ़ उसमें घोर हिक़ारत का भाव है।

हम मानते हैं कि कॉरपोरेट मीडिया को ऐसा करने का हक़ है, बशर्ते वह इस सच्चाई को स्वीकार करे और निष्पक्षता का ढोंग करना बंद कर दे।

वैसे भी निष्पक्षता एक ढोंग ही है। सच यह है कि पत्रकारिता के इतिहास में जो कुछ भी याद करने लायक़ है, वह पक्षधरता के साथ है। स्वतंत्रता आंदोलन का दौर रहा हो या फिर इमरजेंसी, जिन पत्रकारों या संस्थानों की मिसाल दी जाती है, उन्होंने शासकों के विरोध में जनता को जागृत किया था। यानी अपना पक्ष चुना था। हम भी बेहद विनम्रता के साथ कहना चाहते हैं कि मीडिया विजिल भी निष्पक्ष नहीं है। नि:संदेह हमारी पक्षधरता किसी नेता या पार्टी के साथ नहीं है। हमारी पक्षधरता स्वतंत्रता आंदोलन के संकल्पों और संविधान के साथ है। यानी, समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, लोकतंत्र, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता आदि मूल्यों की कसौटी पर कस कर किसी को सही या ग़लत कहना हम अपना अधिकार समझते हैं।

Comment is free but facts are sacred–यह मीडिया विजिल का सूत्र वाक्य है। ब्रिटेन के मशहूर अख़बार ‘दि गार्जियन’ की स्थापना के जब 50 वर्ष पूरे हुए तो 1921 में संपादक सी.पी.स्कॉट ने “A Hundred Years” शीर्षक से एक लेख लिखा था। यह सूत्रवाक्य उसी लेख की मशहूर पंक्ति है और हमें लगता है कि इस उत्तरसत्य (Post Truth) के दौर में भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। यानी, व्याख्या जो भी हो, जैसी भी हो, तथ्यों के साथ किसी क़ीमत पर खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। यही पत्रकारिता का बुनियादी उसूल है।

आशय यह है कि मीडिया विजिल के लिए तथ्य बेहद पवित्र हैं। तथ्यों के साथ किसी भी क़िस्म का समझौता हम कभी नहीं करेंगे। अगर कभी कोई चूक हुई भी तो तुरंत कान पकड़कर माफ़ी माँग लेंगे। साल भर के अनुभवों ने हमें यह भी सिखाया है कि केवल मीडिया की ग़लतियों को उजागर करने से काम नहीं बनेगा । हमें उन ख़बरों का भी मंच बनना होगा जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया ग़ायब करने पर तुला रहता है। देश के किसी भी कोने में होने वाले अत्याचार या प्रतिवाद की ख़बरों को हम जगह देंगे।

मीडिया विजिल बदले रंग-रूप के साथ अब आपके सामने है, लेकिन हम जानते हैं कि सिर्फ़ बदले कलेवर से कुछ हासिल न होगा। अभी तक मीडिया विजिल को तदर्थ ढंग से चलाया गया है। कुछ मित्र वास्तविक या छद्म नाम से लिखकर मीडिया विजिल सहयोग देते रहे हैं। इस फ़ेहरिस्त में बेरोज़गार और छोटे-बड़े संस्थानों में काम करने वाले तमाम पत्रकार शामिल हैं। लेकिन ज़रूरत पत्रकारों की एक प्रतिबद्ध टीम की है जो 24 घंटे पेशेवर तरीक़े से मीडिया विजिल का संचालन करें।

ज़ाहिर है, मीडिया विजिल को नई तकनीक से लैस एक ऐसे पत्रकारिता संस्थान के रूप में विकसित करने का लक्ष्य है जो मुख्यधारा की मीडिया को कड़ी टक्कर दे सके। इसके लिए काफ़ी पैसे की ज़रूरत है जो ना है और ना इसके इंतज़ाम का कोई मॉडल ही हमारे पास है। अब तक जो भी हो पाया, निजी सहयोग से हुआ ।

कुछ दिन पहले, जब हमने सौ रुपये की मुहर बनवाकर फ़ेसबुक पर coming soon लिखना शुरू किया, तो कुछ पत्रकार मित्रों ने नौकरी आदि की संभावनाओं के बारे में पूछा। शायद उन्हें भ्रम हुआ कि कोई उद्यमी इस उपक्रम में पैसा लगाने को तैयार हो गया है। ऐसा बिलकुल भी नहीं है। वैसे भी, मीडिया विजिल के अंदाज़ में ही तमाम नावों को जला देना शामिल है…आज के दौर में इसे ‘दीवाना’पन कहा जाएगा…और फ़ुर्सत किसको है जो थामे दीवानों का हाथ..!

एक रास्ता विज्ञापन जुटाने का है, लेकिन इसे लेकर बहुत उत्साह नहीं बन पाता। विज्ञापन पाने की कोशिशें अक्सर ऐसी लत में तब्दील हो जाती हैं जो तमाम संकल्पों पर भारी पड़ती हैं। ऐसा नहीं है कि हम विज्ञापन बिलकुल नहीं छापेंगे, लेकिन किसी शर्त के साथ बँधना हमें मंज़ूर न होगा।

दरअस्ल, हम संसाधन के लिए जनता पर निर्भर रहना चाहते हैं। यह कैसे होगा…कब होगा, हम नहीं जानते ! आप लोग इस सिलसिले में सुझाव दें। फ़िलहाल तो हम कुछ दिनों तक मीडिया विजिल को यूँ ही चलाकर अपने पर तोलेंगे । बाक़ी सब कुछ तो परवाज़ तय करेगी ।

आपसे दरख़्वास्त है कि मीडिया विजिल के अभियान को अपने दिल में जगह दें। मरहूम शायर ख़ुमार बाराबंकवी को याद करते हुए विदा लेता हूँ

न हारा है इश्क़ न दुनिया थकी है

दिया जल रहा है, हवा चल रही है…

 

 

 

 

डॉ. पंकज श्रीवास्तव

अध्यक्ष

मीडिया विजिल ट्रस्ट

संपर्क—कृपया अपने सुझाव हमें mediavigilindia@gmail.com पर भेजें। तमाम छोटे-बड़े सभी पत्रकार बंधुओं से ख़ासतौर पर आग्रह है कि जो ज़रूरी ख़बरें उनके संपादक रद्दी की टोकरी में फेंक दें, उन्हें हम तक ज़रूर पहुँचाएँ। अगर किसी के पास ख़बर से जुड़ी कोई वीडियो क्लिप हो तो उसे भी भेज सकता है। आभारी रहेंगे।

13 COMMENTS

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