Home मोर्चा शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ‘लौंडा’ था तो तुम ‘च्युतिया’ हो पीयूष मिश्र!

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ‘लौंडा’ था तो तुम ‘च्युतिया’ हो पीयूष मिश्र!

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नोट– पहली नज़र में पाठकों को हेडिंग में आया ‘च्युतिया’ शब्द चौंका सकता है। हाँ, यह  प्रसिद्ध ‘चूतिया’ ही है जिसके उसके मूल  में  संस्कृत  का ‘च्युत ‘ है। उत्तर भारत के ज़्यादातर इलाक़ों में इस सर्वव्यापी शब्द का इस्तेमाल किसी को मूर्ख, बेवक़ूफ़,अहमक़ आदि-आदि  बताने के लिए किया जाता है। आशय अपने स्थान से गिरना यानी मर्यादा त्यागना है। ‘ छत से पानी चूता है’, ‘नल बंद करो,चू रहा है’, जैसे प्रयोग सहज रूप से  किए जाते हैं । आशय यही बताना होता है कि पानी के लिए निर्धारित बंधन उसे रोक नहीं पा रहा है।

इधर कुछ ‘अति-संवेदनशील’ लोग ‘चूतिया’ को अंगविशेष से जोड़कर गाली बताने लगे हैं। ख़ैर यह उनका हक़ है, लेकिन चार कोस में बानी बदलने वाले देश में एक शब्द के अखिल भारतीय  अर्थ की स्वीकार्यता ज़रा मुश्किल है। इच चुनावी मौसम में ‘विकास गांडो थायो छे’ सुनकर किसी गुजराती के मन में पागल की छवि उभरती है, लेकिन उत्तर भारतीयों के कान लाल हो जाते हैं।  बहरहाल, नीचे पढ़िए,आप को शायद ही इस शब्द के प्रयोग पर ऐतराज़ रहे।

तो क़िस्सा ये है कि 18 नवंबर को नवभारत टाइम्स के लखनऊ संस्करण से गायक और अभिनेता पीयूष मिश्र के विचार पढ़ने को मिले। पीयूष ने कभी भगत सिंह पर ‘गगन दमाम बाज्यो’ जैसा नाटक लिखा था और भगत सिंह पर बनी फ़िल्म में भी योगदान दिया था, लेकिन अख़बार के मुताबिक उन्होंने कहा कि ‘भगत वो लौंडा था, जिसने अपनी मौत ख़ुद डिज़ायन की थी।’ साथ में ये भी कि ‘लेफ्ट के चक्कर में लोग बर्बाद होते हैं’ और ये कि ‘वे आजकल मोदी को प्रमोट करने के लिए मजबूर हैं।’

पीयूष की पहचान एक प्रतिबद्ध रंगकर्मी की रही है। फ़िल्मों में जाने के बाद भी वे तमाम साहित्यिक समारोहों में इसीलिए बुलाए जाते हैं कि उनके पास परिवर्तन को आवाज़ देने वाले तमाम शानदार गीत हैं जो वे अपनी युवावस्था से ही दाँत पीसते और नाक फुलाते हुए गा रहे हैं। ज़ाहिर है,भगत सिंह और उनके विचारों पर उनकी ओर से हुए इस हमले से लोग हैरान रह गए।

प्रख्यात नाटकरकार राजेश कुमार, जिन्होंने नुक्कड़ और मंच के लिए तमाम विचारोत्तेजक नाटक लिखे हैं, ने अपनी फ़ेसबुक दीवार पर पीयूष मिश्र को ‘सत्ता का भाँड’ बताते हुए ये लिखा —

पीयूष मिश्रा की भाषा पर जरा गौर फरमाइए

” आज दिनांक 18 नवंबर के नव भारत टाइम्स , लखनऊ पर नजर गयी तो सोचा उससे आपलोगों को भी बता दिया जाए।उन्होंने कहा है कि ‘ मुझे भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने बहुत प्रेरित किया। लोग उन्हें सीरियस समझते हैं लेकिन मेरी नजर में भगत सिंह वह लौंडा था, जिसने अपनी मौत खुद डिज़ाइन की थी।’

इस भाषा पर गौर फरमाइए जिसने भगत सिंह पर ‘गगन दमामा बाजयों ‘नाटक लिखा है और राजकुमार संतोषी की फ़िल्म में भी लेखन कार्य किया है। भगत सिंह ने एक गंभीर राजनीतिक आंदोलन चलाया था जिसका मकसद देश में गोरे की जगह पर काले शख्स को बिठाना भर नही था। वे देश में मजदूरों -किसानों का राज स्थापित करना चाहते थे। उनका सपना इस मुल्क में साम्प्रदायिक ताकतों को बिठाना नहीं था, जिसको पीयूष मिश्र आजकल प्रोमोट कर रहे हैं। निर्लज्ज हो कर कह रहे हैं कि ‘ यूपी में योगी जी की सरकार से ज्यादा खुश नहीं हूं। अपना गड्डामुक्त वाला वादा पूरा कर देते तो वो ही बहुत था। झक कर मुझे मिस्टर मोदी को ही प्रोमोट करना पड़ता है।’ 

इस पीयूष मिश्रा को कोई ये तो बताये की योगी और मोदी अलग नहीं हैं। समान विचारधारा वाले हैं। एक तरफ पीयूष मिश्रा अखिलेश यादव को कमाल का लीडर, डायनामिक और दूरगामी सोच का बताता है और व्यवहार में साम्प्रदयिक लोगों की ब्रांडिंग कर रहा है। भगत सिंह जैसे कोई क्रांतिकारी नेता नहीं, उसके एनएसडी के कोई चरसी यार हो जिन्हें सम्मान देने के बजाय लौंडा कहने में ज्यादा फक्र होता है। क्या एनएसडी की यही भाषा है? 

सालों तक जिसने act one के साथ वाम का राग अलापा ,अब नसीहत दे रहा है कि लेफ्टिस्ट के चक्कर में लोग बर्बाद हैं। जो राष्ट्र का न हुआ वह अपनी गर्लफ्रैंड का क्या होगा?

पीयूष मिश्रा की बानगी आपने देख लिया। लेकिन दुर्भाग्य है कि आजकल साहित्य फेस्टिवल में ये बुलाये जाते है और नेता, साधु की तरह ये जरखरीद अभिनेता हमें राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाने की कोशिश करते हैं।

ये सियार से भी ज्यादा तेज हैं रंग बदलने में। वाम से भगवा रंग बदलते तो देर लगी नहीं। कब ये और रंग रंग ले, कहना मुश्किल है। ये सत्ता के भांड है, सावधान रहिये। “

हिंदी पट्टी में लौंडा शब्द बेहद आपत्तिजनक अर्थों में भी प्रयोग होता है। भगत सिंह के लिए ‘लौंडा’ शब्द इस्तेमाल करना वाक़ई अखरने वाली बात है, लेकिन उससे भी बड़ी बात ये है कि वे भगत सिंह को उनके विचारों से काटने का षड़यंत्र कर रहे हैं। पीयूष मिश्र रोमांचित हैं कि भगत सिंह ने अपनी मौत डिज़ाइन की थी, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि उन्होंने हिंदुस्तान में इन्क़लाब का डिज़ायन तैयार किया था। ज़रा ये अंतिम पत्र पढ़िए जो भगत सिंह ने 22 मार्च 1931 यानी फाँसी लगने के एक दिन पहले लिखा था-

शहादत से पहले साथियों को अन्तिम पत्र

22 मार्च, 1931

साथियो,

स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ,कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता।

मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है- इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज नहीं हो सकता।

आज मेरी कमजोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया तो वे जाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए। लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका। अगर स्वतन्त्र, जिंदा रह सकता तब शायद उन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता। इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक भाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इन्तजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।

आपका साथी – भगतसिंह

यानी भगत सिंह का सपना मौत नहीं जिंदगी थी। वे हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन गए थे और उन्हें भरोसा था कि उनका नाम लाखों लोगों को क्रांति की प्रेरणा देगा। कोई बेवक़ूफ़ ही कह सकता है कि भगत सिंह अपनी मौत डिज़ायन कर रहे थे। अपने वक़ील प्राण नाथ मेहता को फाँसी के कुछ घंटे पहले उन्होंने देश को दो संदेश देने को कहा था- इन्क़लाब ज़िंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।

पीयूष मिश्र आज कह रहे हैं कि लोग ‘लेफ़्ट के चक्कर में  बर्बाद हो जाते हैं’ तो दरअसल, वे भगत सिंह से दूर रहने की ही वक़ालत कर रहे हैं। दिक़्क़त ये है कि अपनी शहादत के 76 साल बाद भी भगत सिंह देश के लाखों ‘लौंडों’ के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। पीयूष मिश्र मोदी का सपना पूरा करने के लिए उन्हें प्रमोट कर रहे हैं जिसकी राह में भगत सिंह सबसे बड़ी बाधा हैं। नौजवानों को पता है कि भगत सिंह का सपना इस देश को सच्चे मायने में आज़ाद करना है और इसके लिए मोदी के सपने से टकरना पड़ेगा।

काश पीयूष मिश्र को अपने ही गाए उन गीतों का मर्म याद रहता जिसे वे ऐक्ट वन (दिल्ली की एक नाट्य संस्था जिसकी 90 के दशक में काफ़ी धूम थी। मनोज वाजपेयी और आशीष विद्यार्थी जैसे कलाकार भी इससे जुड़े थे। निर्देशक थे एन.के.शर्मा।) के दोस्तों के साथ गाते थे। जिनमें भाईचारा बढ़ाने की बात होती थी, सांप्रदायिक ताक़तों से सावधान रहने की बात  होती थी, एक नई दुनिया का सपना होता था।

पता नहीं, पीयूष को मोदी को प्रमोट करते समय सांप्रदायिक दंगों पर लिखा आपना नाटक ‘जब शहर हमारा सोता है’, याद है कि नहीं। वैसे वे जब मंच पर होते हैं तो वे पाकिस्तान की हुस्ना के लिए विरह गीत ज़रूर गाते हैं जो विभाजन की वजह से अपने प्रेमी से जुदा हो गई थी। लेकिन देश के दिलों में विभाजन का ज़हर भरने वालों को प्रमोट कर रहे हैं।

यक़ीन हो गया कि पीयूष ये सब सिर्फ़ पैसों के लिए करते हैं। सत्ता के सामने खीस निकाल देने वाले का दाँत पीस कर गाना गाना, महज़ एक नाटक ही हो सकता है।

भगत सिंह जैसा क्रांतिकारी विचारक, जिसमें भारत का लेनिन बनने की पूरी संभावना थी, अगर उनकी नज़र में लौंडा है तो पीयूष भी भगत सिंह के चाहने वालों की नज़र में अव्वल दर्जे का चूतिया हैं।

क्या आपको अब भी हेडलाइन में ‘च्यूतिया‘ लिखे जाने पर ऐतराज़ है। अगर है तो हमें खेद है।

 

बर्बरीक

 



 

2 COMMENTS

  1. in uttar pradesh, bahraich district hospital every day 3 to 4 child death from birth asphyxia. but health and administration were silent.

  2. मुझे बिलकुल ही ऐतराज नहीं है इस शख्स को चूतिया जैसे अलंकरण से नवाज़े जाने पर।

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