Home मोर्चा मोदी का गुप्त एजेंडा था नोटबंदी, चौराहा बताएँ -AAP

मोदी का गुप्त एजेंडा था नोटबंदी, चौराहा बताएँ -AAP

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नोटबंदी के दो साल पूरे होने पर इसके विभिन्न पहलुओं पर देश और दुनिया में चर्चा हो रही है। इस बीच आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता एवं दक्षिण दिल्ली लोकसभा प्रभारी राघव चड्ढा ने आज मोदी और अमित शाह पर किसी गुप्त एजेंडे का आरोप लगाया। यहाँ प्रस्तुत है नोटबंदी पर आप का दावा-

नोटबंदी के दो साल पर आम आदमी पार्टी  एक बार फिर इसे देश के लिए एक ‘आर्थिक तबाही‘ की संज्ञा देती है। अरविंद केजरीवाल ने उसी वक्त इसे आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला कहा था।

नोटबंदी के वक्त प्रधानमंत्री ने पचास दिन का समय मांगा था। कहा था कि नोटबंदी विफल हुई तो देश जिस चौराहे पर जो सजा देगा, भुगतने को तैयार हूं। आज हम मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि वह चौराहा कौन-सा है? अगर चौराहे का नाम नहीं बताते तो इतनी बड़ी ‘आर्थिक तबाही‘ के लिए देश से माफी मांगें।

9-11 का दिन अमेरिका के लिए ‘त्रासदी का दिन‘ था। उसी तरह हम भारतवासी 8-11 को दुखद त्रासदी के दिन के तौर पर देखते हैं। अमेरिका में आतंकवादियों ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को ध्वस्त कर दिया था। हमारे देश में आठ नवंबर को हमारी ही सरकार ने हमारी वित्तीय व्यवस्था को धराशायी कर दिया।

मोदी जी ने अपने कुछ मित्र उद्योगपतियों को इतना फायदा कराया। लेकिन उन 115 लोगों को कोई मुआवजा नहीं दिया, जिनकी दुखद मृत्यु कतारों में हो गई। मोदी जी बताएं कि कितना काला धन अर्थव्यस्वस्था से बाहर हुआ।

नोटबंदी के वक्त इसका मकसद काला धन खत्म करना बताया गया था। कहा गया था कि 15.44 लाख करोड़ रुपये पुरानी करेंसी प्रचलन में है। इसमें लगभग 25 फीसदी काला धन होने की बात कही गई थी। दावा था कि लगभग तीन से पांच लाख करोड़ रुपये वापस सिस्टम में नहीं लौटेंगे। इस राशि के दायित्व से आरबीआइ मुक्त हो जाएगा तथा भारत सरकार इसका कल्याणकारी कार्यों में उपयोग कर लेगी। जबकि पिछले दिनों आरबीआइ की रिपोर्ट में बताया गया है कि 15.44 लाख करोड़ रुपयों में से 15.31 लाख करोड़ रुपये बैंकों में वापस आ चुके हैं। यानी मात्र तेरह हजार करोड़ रुपये वापस नहीं आए। अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह बची हुई रकम भी वैसी है, जो भूटान और नेपाल में है, या फिर अप्रवासियों भारतीयों के घरों में पड़ी है। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि तीन से पांच लाख करोड़ रुपयों का फायदा होगा। यह पूरी तरह विफल हुआ।

नोटबंदी से नकली नोट अर्थव्यवस्था से बाहर होने का दावा किया गया था। लेकिन मात्र 7.60 लाख रुपये की फेक करेंसी पकड़ी गई। उल्टे, नए दो हजार के नोटों में फेक करेंसी किस प्रकार बाजार में उपलब्ध है, यह मीडिया में आ चुका है। इस तरह फेक करेंसी में बहुत बड़ा उछाल आ गया है।

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के उद्देश्य को लेकर बार-बार गोलपोस्ट बदला। जब काला धन की बात नहीं चली, तो फेक करेंसी की बात करने लगे। फेक करेंसी की बात नहीं चली तो कहा कि नोटबंदी के जरिए आतंकवाद को फंडिंग पर नकेल कसना मुख्य उद्देश्य है। लेकिन हमने देखा कि आठ नवंबर 2016 के बाद आतंकवाद की घटनाएं भी बढ़ीं। एक रिपोर्ट के अनुसार सीमा पर सीजफायर छह प्रसेंट से भी अधिक बढ़ गया। आतंकवाद को फंडिंग पर नकेल कसने की बात भी झूठ निकली। नोटबंदी से काला धन, फर्जी नोट, फिर आतंकवाद, इसके बाद नक्सलवाद, फिर डिजिटल इकोनोमी, तब कैशलेस, कैशलेस से लेसकैश जैसे मकसद बार-बार बदले गए। लेकिन कोई मकसद पूरा नहीं हुआ।

नोटबंदी के बाद हमारी जीडीपी में डेढ़ परसेंट की गिरावट आई। छोटे और मध्यम उद्योग तबाह हो गए, 115 से अधिक लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा, किसानों को रोटी के लाले पड़ गए। 8000 करोड़ से ज्यादा राशि नए नोट छापने में खर्च हो गई। लगभग 15 लाख लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। जबकि भाजपा की सालाना आय 80 फीसदी बढ़ गई।

नोटबंदी के दो साल बाद भी प्रधानमंत्री ने यह नहीं बताया है कि इससे देश को क्या मिला। नोटबंदी लागू करते समय उन्होंने जितने कारण बताए थे, वे सब विफल रहे। बाद में कई महीनों तक नोटबंदी का कई अलग-अलग मकसद बताया गया। लेकिन उनमें से एक भी मकसद पूरा नहीं हुआ। अगर कोई घोषित एजेंडा पूरा हुआ हो, तो आज भी अवसर है, प्रधानमंत्री जी बता दें।

नोटबंदी का एक गुप्त एजेंडा भी था। वह पूरी तरह सफल रहा। असली एजेंडा मोदी और अमित शाह के करीबी दोस्तों और भाजपा को लाभ पहुंचाना था। इसमें पूरी सफलता मिली है।

अगर नोटबंदी का घोषित एजेंडा सफल हुआ होता, तो आज रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से उसके रिजर्व फंड का एक तिहाई हिस्सा वापस लेने के लिए केंद्र सरकार को ऐसे तीखे विवाद में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। आज आरबीआई की स्वायत्तता और वित्तीय अनुशासन पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। यह नोटबंदी की विफलता का ही परिणाम है।

नोटबंदी सफल हुई होती, तो देश में खुशहाली आती। देश के लोग धनतेरस को ‘धनतरस‘ और दिवाली को ‘दीवाला‘ नहीं कहते। मोदी सरकार को ‘मंदी सरकार‘ का नाम नहीं देते। ऐसा प्रहसन क्यों? लोग ऐसा प्रहसन अपनी किसी निराशा से उबरने के लिए करते हैं।

आज रिलीज होने वाली फिल्म ‘ठग्स ऑफ हिन्दुस्तान‘ को आठ नवंबर की तारीख से जोड़कर कई प्रकार के जोक्स सुनने को मिल रहे हैं। यह देश के लिए दुख की बात है कि किसी बड़े आर्थिक कदम को ऐसे जोक्स का शिकार होना पड़े। अगर नोटबंदी सफल होती, तो उसे ऐसे प्रहसन से जोड़ने के बदले देश के नागरिक खुद ही किसी अच्छे प्रतीक से जोड़ते।

नोटबंदी के वक्त कहा गया कि 500 और 1000 के बड़े नोट से भ्रष्टाचार बढ़ता है, इसलिए बड़े नोट बंद करने के लिए नोटबंदी लाई गई है। लेकिन 1000 के बदले 2000 की ज्यादा बड़ी करेंसी चला दी। बड़ी करेंसी वाले तर्क को मान लें तो इससे भ्रष्टाचार की गुंजाइश दोगुना बढ़ गई।

नोटबंदी का गुप्त एजेंडा क्या था, यह बात गुजरात के भाई महेश शाह बेहतर बता सकेंगे। नोटबंदी के कुछ ही दिनों पहले उन्होंने आयकर विभाग को 13860 करोड़ रुपये काला धन की स्वैच्छिक घोषणा की थी। यह काला धन किसी बड़े राजनेता का बताया गया था। कहा था कि उनका नाम सामने आया तो देश की राजनीति बदल जाएगी। श्री चड्ढा ने कहा कि नोटबंदी का गुप्त एजेंडा क्या था, यह बात भाजपा और उससे जुड़े संगठनों द्वारा देश भर में खरीदी या बनाई गई प्रोपर्टीज में देखिए। बिहार, ओडिशा, झारखंड जैसे राज्यों में भी काफी प्रोपर्टी खरीदे जाने की सूचना है। नोटबंदी के कुछ माह पहले और उसके बाद अचानक देश के विभिन्न शहरों में भाजपा कार्यालयों के लिए जमीनें खरीदी गईं, दिल्ली में आलीशान कार्यालय बना। सब जानते हैं कि रियल इस्टेट में सबसे ज्यादा काला धन है।

नोटबंदी का गुप्त एजेंडा क्या था, यह बात गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सहकारिता बैंकों के संचालक बेहतर जानते हैं। इनमें किन बैंकों के साथ अमित शाह तथा अन्य राजनेताओं का क्या संबंध है, इसकी जानकारी देश को मिलनी चाहिए। उन बैंकों को काला धन बदलने की एजेंसी के रूप में उपयोग किया गया। उन बैंकों में कितनी पुरानी करेंसी वापस आई, और किस अवधि तक उसे वापस लेने की अनुमति मिली, यह जानकारी मिलने से पता चलेगा कि गुप्त एजेंडा कितना सफल रहा।

नोटबंदी कितनी सफल रही, यह बात उन 115 लोगों के परिजन से पूछिए, जिनकी असमय मौत हो गई। उन बेरोजगारों से पूछिए, जिनका रोजगार छिन गया। उन व्यवसायियों से पूछिए, जिनका व्यवसाय चौपट हो गया।

नोटबंदी का गुप्त एजेंडा क्या था, यह बात भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी और विधायक विजेंद गुप्ता बेहतर बताएंगे। जिस वक्त पूरे देश को अपने ही पैसों के लिए तरसना पड़ रहा था, उस वक्त मनोज तिवारी हमारी देशभक्ति का मजाक उड़ा रहे थे। गीत सुनाकर कह रहे थे- ‘लगे रहे भाई कतार में।‘ इस पर ठहाके लगाए जा रहे थे। अगर नोटबंदी का कोई गुप्त एजेंडा नहीं होता, तो कतार में लगे देशवासियों के प्रति संवेदना होती, ऐसी क्रूरता नहीं दिखती।

नोटबंदी का गुप्त एजेंडा नहीं रहा होता, तो इसे लागू करने से पहले रिजर्व बैंक को अंधेरे में नहीं रखा गया होता। आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया पूरी किए बगैर इसे लागू किया। इस संबंध में संसदीय समिति के समक्ष पर्याप्त तथ्य सामने आ चुके हैं। रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के उच्च अधिकारियों को इस प्रक्रिया से अलग रखकर जिस ‘गुप्त‘ टीम के माध्यम से इतना बड़ा फैसला लागू कराये गया, वह किसी गुप्त एजेंडे से ही संभव था। आर्थिक सलाहकार से भी सलाह नहीं ली गई। नोटबंदी के जरिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्वायत्तता खत्म करके उसे मजाक का विषय बना दिया गया हो।

नोटबंदी का असल एजेंडा क्या था, यह मोदी और अमित शाह के करीबी उद्योगपति बेहतर बताएंगे, जिन्हें इसका लाभ मिला। देश को क्या मिला, इस पर कभी ‘मन की बात‘ नहीं सुनाते प्रधानमंत्री।