Home मोर्चा नोटबंदी से प्यार : ग़ुलाम से मवेशी बनने की ओर !

नोटबंदी से प्यार : ग़ुलाम से मवेशी बनने की ओर !

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जी.सम्पत

 

(यह मत पूछो कि नोटबंदी ने तुम्हारे लिए क्या किया; इसके बजाय, अपनी अंतरात्मा की गाय से से पूछो कि तुम्हारी बायोमेट्रिक्स राष्ट्र के लिए क्या कर सकती है.)

काफी पुराने समय की बात है, इतना पुराना कि लगता है जैसे एक दूसरा जीवन-काल गुजरा हो, मेरी एक महिला-मित्र थी जिसे मैं पूरी तरह प्यार करता था. वह दुसरे लड़कों से भी मिलने जाया करती थी, लेकिन मैं इसकी परवाह नहीं करता था. वह हर बार मेरा फोन नहीं उठाती थी. वह हफ़्तों ऐसा व्यवहार करती थी जैसे मेरा कोई अस्तित्व ही न हो. लेकिन वह मेरे सभी उपहार, परीक्षा के लिए तैयार सभी नोट्स सहर्ष स्वीकार करती थी, और जब हम बाहर घूमने जाते तो सभी खर्चों का भुगतान करने की अनुमति भी दे देती थी. इस तरह वह बेहद उदार थी.

 

भक्ति गीत

मेरे जीवन का एकमात्र पवित्र उद्देश्य उसका समर्पित गुलाम, उसका सबसे पसंदीदा नौकर बनना था. मैं उससे इतना प्यार करता था कि अगर वह मुझसे कहती तो मैं बरेली तक गोमांस ढोकर ले जाता. अगर वह मुझसे कहती तो मैं भारतीय रेल द्वारा परोसा जानेवाला तेलचट्टा-युक्त खाना भी खा लेता और गोरखपुर के बाबा राघवदास अस्पताल में भरती हो जाता. या अगर वो नहीं भी कहती तो मैं बिना दाना-पानी-दारू के 72 घंटे लाइन में खड़ा रह लेता.

अब, मुझे तो पता ही है कि मैं कोई दीपिका पदुकोने या कोई सोनाक्षी सिन्हा नहीं हूँ कि आपकी दिलचस्पी मेरी प्रेम कहानी पढने में होगी. लेकिन पिछले हफ्ते के रहस्योद्घाटन के लिए मैं अपने इस अतीत के अधोपतन का बेहद अहसानमंद हूँ.

हाँ, मेरा मतलब नोटबंदी से ही है. हर किसी ने मुझसे वही दो सवाल किये— कोई गुस्सा क्यों नहीं कर रहा है? और यह सब क्यों किया गया? अब यह साफ़ हो गया है कि इसका कोई भी कथित उद्देश्य पूरा नहीं हुआ. फिर गुस्सा कहाँ चला गया? कोई जनआन्दोलन क्यों नहीं हो रहा है?

क्या यह संभव है, जैसा कि मेरे पिता मुझे बार-बार याद दिलाते रहते थे कि हम ‘विशुद्ध’ बज्र मूर्खों का राष्ट्र हैं? क्या हम दुनिया के एकमात्र देश हैं जहाँ सभी लोगों को हमेशा-हमेशा के लिए मुर्ख बनाया जा सकता है? क्या हम दर्द का मजा लेने वाले मर्द हैं जो बिना किसी कारण मिलनेवाली सजा को भी पसंद करते हैं? या जैसा कि मेरा एक सहकर्मी कहता है, हम दर्द और अपमान में मजा लेने और देने वाले जन्तु हैं?

हाँ, मेरे दोस्तों ने भी उन वर्षों के दौरान मुझसे ऐसे ही सवाल पूछे थे जब मैंने उस महिला-मित्र को अपनी बाइक, अपना हेलमेट, अपना रेनकोट अपने पैसे से खरीदे हुए सिनेमा के दो टिकट दे दिए थे. मैंने यह कम बेहिचक किया था जब आखिरी वक्त उस लड़की ने मुझे बताया कि उसका विचार बदल गया है और अब वह इस रोमांटिक हिट फिल्म को मेरे साथ नहीं, बल्कि अपने ‘मौसेरे भाई’ के साथ देखना चाहती है जो किसी दुसरे शहर से आया है.

तब मैंने अपने बेढब दोस्तों को पलटकर जवाब दिया था कि वे सच्चे प्यार की प्रकृति को नहीं समझते. आज मैं वही बात उन लोगों से कहूँगा जो इस बात पर अचरज कर रहे हैं कि भारत के लोग अपने ऊपर सवारी गांठनेवाले लोगों पर गुस्सा क्यों नहीं कर रहे हैं.

भारत की जनता अपने प्रधान मन्त्री को प्यार करती है. वह उनसे उसी तरह प्यार करती है जैसे मैं उस लड़की से प्यार करता था. यह लागत-मुनाफा का हिसाब रखने वाला कोई साधारण प्यार नहीं है. यह एक अध्यात्मिक, बिना शर्त, आदि-वैदिक प्रेम है. यह भक्ति है. यही कारण है कि इस प्रकार के प्रेम में खुद को समर्पित करनेवाले लोगों को ‘भक्त’ कहते हैं.

अगर कल 8 बजे शाम को प्रधान मन्त्री टीवी पर आते हैं और घोषणा करते हैं कि 1 अक्टूबर से हर व्यक्ति के लिए अपनी एक ऊँगली सरकार को दान करना जरूरी होगा ताकि डिजिटल इन्डिया को सच्चाई में बदला जा सके, तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि अपनी ऊँगली दान करने पर आमादा लोगों की लम्बी कतार लग जाएगी.

इसलिए हम इस बात को सीधे-सीधे समझें. नोटबंदी का सम्बन्ध अर्थतन्त्र से नहीं है. यह कभी था भी नहीं, न ही यह कोई ‘गहरी राजनीतिक चाल’ है जैसा कुछ अति-उत्साही भक्त दावा करते हैं. अपने मूल में नोटबंदी का अभ्यास और कुछ नहीं था, महज एक अभ्यास ही था. यह एक तरह की कवायद थी जो सैनिक स्कूल में या शाखाओं में सुबह-सुबह हुआ करती है. इसका उद्देश्य भी वही था- उत्तम कोटि की आज्ञाकारिता.

महानता का सार

कोई भी राष्ट्र जो महान बनना चाहता है उसे दो चीजों की जरूरत होती है- एक महान नेता और एक जनसँख्या जिस पर भरोसा किया जा सके कि वह महान नेता का आँख मूँद कर आज्ञापालन करेगी. हमारे पास एक महान नेता तो पहले से ही है. लेकिन आज्ञाकारी जनसँख्या के निर्माण का काम अभी प्रगति पर है, क्योंकि सब लोगों में भक्त बनने की अभिरुचि अभी नहीं है. इसीलिए नोटबंदी जैसी कवायद की जरूरत होती है. आदर्श रूप में, हमें हर छठे महीने नोटबंदी जैसा कोई काम करना होगा, ताकि लोग 10,000 सवाल पूछने के बजाय चुपचाप आज्ञा पालन करने के आदी हो जाएँ.

कुछ लोग यह कह सकते हैं कि यह तो गुलामी के समान है, और वे सही भी हो सकते हैं. दुनिया की महानतम सभ्यताएँ— चाहे वह प्राचीन ग्रीक हो, प्राचीन रोम हो, या वेस्टेरोस के सात रजवाड़े— सब का निर्माण गुलामी के दम पर ही हुआ था. इसीलिए आधार नम्बर बिलकुल जरूरी है, क्योंकि इसमें निगरानी रखने के जो उपाय किये गए हैं वे ही जनसँख्या में मौजूद विद्रोही तत्वों को विश्वासपात्र गुलाम में बदलने का एकमात्र रास्ता है. वास्तव में, हमारे देश में गुलामी की जो अनोखी किस्म है उसको ‘गुलाम’ शब्द अभिव्यक्त नहीं कर पाता. इसके लिए सही शब्द ‘मवेशी’ है.

क्या कभी आपने गाय को विरोध प्रदर्शन करते देखा है? या गुस्सा करते? या अपने मालिक के रहस्यमय तौर-तरीकों पर सवाल उठाते? जैसा कि आपको पहले से पता है, दुनिया को बदलने के लिए खुद को बदलना होता है. और भारत को एक महान राष्ट्र बनाने के लिए, सभी भारतियों को मवेशी के रूप में अपनी नयी अनोखी पहचान को आधार नम्बर के रूप में गले लगाना जरूरी है.

इसलिए यहाँ अपने सभी भारतीय देशवासियों से मेरा विनम्र आग्रह है- यह मत पूछो कि नोटबंदी ने तुम्हारे साथ क्या ; इसके बजाय, अपनी अंतरात्मा की गाय से पूछो कि तुम्हारा बायोमेट्रिक राष्ट्र के लिए क्या कर सकता है.

 

जी.सम्पत ‘दि हिंदू ‘ के सोशल अफ़ेयर्स एडिटर हैं। पिछले दिनों हिंदू में छपे उनके इस लेख (Love, demonetised ) का अनुवाद श्री दिगम्बर ने किया है।   

 



 

 

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