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मैला साफ़ करना पचीस साल से प्रतिबंधित है, लेकिन TOI उसका प्रशिक्षण संस्‍थान खोज रहा है!

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Courtesy: Down To Earth
दीपांकर पटेल

मीडिया अपना काम कर देता है और आपको पता भी नहीं चलता.

9 सितम्बर को दिल्ली के मोती नगर इलाके में मैनुअल तरीके से सीवर की सफाई करने के लिए उतरे सरफराज, पंकज, राजा, विशाल और उमेश की मौत हो गई। डीएलएफ़ कैपिटल ग्रीन के आवासीय पॉश कॉलोनी में यह घटना हुई है।

टॉइम्स ऑफ इंडिया अखबार की ये 10 September की हेडलाइन है। हेडलाइन में दावा किया गया है कि मजदूर सीवर लाइन की सफाई करने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे.

नई दिल्ली की डिप्टी कमिश्नर मोनिका भारद्वाज ने बताया कि कांट्रैक्टर ने रविवार को शाम तीन बजे सफ़ाई कर्मचारियों को भेजा था। हकीकत यह है कि सबसे पहले सरफ़राज़ और पंकज उतरे। कोई सुरक्षा उपकरण नहीं लगाया था, सिवाय मुंह पर रुमाल के। कुछ समय बाद जब वे नहीं निकले तो राजा और उमेश नाम के कर्मचारी सीवर में उतरे। जब कोई भी नहीं निकला तो अंत में विशाल को भेजा गया।

फिर टाइम्‍स ऑफ इंडिया कैसे प्रशिक्षण की बात कर रहा है? क्‍या सीवर लाइन साफ़ करने की ट्रेनिंग देने का कोई इंटिट्यूट भी देश में है? जबकि इस देश में 25 साल से मैला ढोना प्रतिबंधित है? क्या टॉइम्स ऑफ इंडिया ऐसे किसी सीवर लाइन सफाई ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के बारे में गूगल करके बताएगा? मैला साफ़ करने का प्रशिक्षण?

भारत में मैला ढोना (मैनुअल स्‍कैवेंजिंग) 1993 से प्रतिबंधित है, तो उसकी ट्रेनिंग कौन दे रहा है फिर? वो कौन लोग हैं जो 25 साल से इस काम को ठेके पर करवा रहे हैं? 25 साल बाद भी दिल्ली के पॉश इलाको में जब टट्टी की सीवर लाइन में कोई मजदूर डुबकी लगाता है तो किसी को नहीं लगता कि यहां गैरकानूनी काम हो रहा है. जब वो मर जाता है तो बोलते हैं ट्रेनिंग नहीं ली थी इसलिए मर गया!

Courtesy: Workers Unity

अभिजात्य वर्ग मैनुअल स्‍कैवेंजिंग करने वालों को कीड़ा-मकोड़ा समझता है. ऐसे ही अभिजात्य वर्ग के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया ने ये हेडलाइन दी है. सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं, संस्थानों की कोई जिम्मेदारी नहीं.

वर्कर्स युनिटी डॉट कॉम के मुताबिक अरबों डॉलर की टर्नओवर वाली जेएलएल कंपनी ने जिस ठेकेदार को इस काम का जिम्मा दिया था, उसे गिरफ़्तार कर लिया गया है लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या कंपनी पर मुकदमा दर्ज होगा कि नहीं!

हालांकि घटना का संज्ञान लेते हुए दिल्ली सरकार ने जांच के आदेश और मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये के मुआवजा की घोषणा की है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस भेजा है।

जहां ये घटना हुई उसकी गहराई 35 फ़ुट जमीन के नीचे थी। यहां जाने का रास्ता बेसमेंट से होकर जाता है।

देश का सबसे बड़ा अखबार कह रहा है कि मरने वाला ही जिम्मेदार था क्योंकि उसे ठीक से टट्टी के कुएं में उतरना नहीं आता था। वाह रे टॉइम्स ऑफ इंडिया.