Home मीडिया ख़बरों को ‘साज़िश’ में तब्दील करने की साज़िश!

ख़बरों को ‘साज़िश’ में तब्दील करने की साज़िश!

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पिछले कुछ दिनों में देश के पूर्वी उत्तर प्रदेश के दो जिलों बलिया और मिर्जापुर में दो घटनाएं करीब-करीब एक साथ घटित हुईं, जिसने सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में जारी घोर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को उजागर करने के साथ प्रदेश की प्रशासनिक कार्यशैली की निरंकुशता और उसके अमानवीय चेहरे को सामने लाने का काम किया है।

सोशल मीडिया के जरिये जब बलिया जिले के एक स्कूल में दलित जाति के बच्चों के साथ जातिगत भेदभाव का मामला वायरल हुआ तो जांच के नाम पर स्कूल पहुंचे जिलाधिकारी ने जांच की अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के बजाय उसी जातिगत पूर्वाग्रह का परिचय दिया, जिसकी जांच वह करने गए थे।दरअसल, स्कूल में दलित बच्चों को अलग से बैठाकर पत्तल में खाना खिलाया जा रहा था, जबकि बाकी बच्चे थाली में खाना खा रहे थे; इसकी जांच करने के बजाय जिलाधिकारी जांच के लिए दबाव बना रहे स्थानीय नेताओं की जाति और उनके हाई स्टैंडर्ड रहन-सहन की तुलना करते हुए मामले को राजनीतिक तूल देने का आरोप लगाने लगे, हालांकि जिलाधिकारी को सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ़ चलाये गये अभियान के दबाव में सोशल मीडिया पर ही सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी।

दूसरी तरफ मिर्जापुर के एक स्थानीय पत्रकार के खिलाफ़ कई धाराओं में इसलिए मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है क्योंकि उसने एक प्राथमिक विद्यालय में दोपहर के भोजन के दौरान परोसे जा रहे नमक और रोटी की घटना को सोशल मीडिया पर डालकर देशभर का ध्यान उत्तर प्रदेश में मिड-डे मिल के नाम पर चल रहे गोरखधंधे की ओर आकर्षित किया। मिर्जापुर के जिलाधिकारी ने पत्रकार की रिपोर्ट को साजिश बताते हुए गाँव के प्रधान के प्रतिनिधि के खिलाफ़ भी मुकदमा दर्ज किया। हास्यापद यह है कि जिला प्रशासन के अधिकारी से लेकर सरकार के प्रवक्ता तक मिड-डे मिल के नाम पर चल रहे गोरखधंधे की जांच और उस पर कार्रवाई करने की बजाय इस बात पर बहस कर रहे थे कि प्रिंट मीडिया के पत्रकार को वीडियो बनाने का अधिकार है या नहीं?

सवाल यहाँ बहुत बड़ा है कि उत्तर प्रदेश के लोकसेवा आयोग से कैसे अधिकारी चुने जा रहे हैं, जिन्हें पत्रकारिता और पत्रकारों के अधिकारों की ज़रा भी समझ नहीं है और संवैधानिक प्रावधानों के बारे में उनका विवेक शून्य है? आखिर कोई प्रशासनिक अधिकारी ऐसी मूर्खतापूर्ण बात कैसे कर सकता है कि एक प्रिंट मीडिया का पत्रकार किसी घटना का वीडियो नहीं बना सकता है? ऐसी किसी भी घटना का वीडियो बनाने और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने का अधिकार तो किसी भी आम नागरिक तक के पास है। इसी तरह से एक जिले का आला अधिकारी संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 की खुलेआम कैसे धज्जियां उड़ा सकता है और दलित अत्याचार निरोधक कानून के प्रावधानों को अपने पैरो तले रौंद सकता है। एक जिलाधिकारी जब नेताओं पर जातिगत टिप्पणी करते हुए उनकी हैसियत नाप सकता है तो आम जनता और बच्चों के साथ उनका प्रशासन कैसे बर्ताव करता होगा, उसकी तो बस कल्पना भर की जा सकती है!

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में भी एक पत्रकार को केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया जाता है क्योंकि उसने प्राथमिक विद्यालय में बच्चों द्वारा झाड़ू लगवाये जाने की फोटो खींच ली थी। पत्रकार के ऊपर सरकारी काम में बाधा डालने और रंगदारी का आरोप लगाकर कार्रवाई की गई। हाल ही में नोयडा के 5 पत्रकारों के ऊपर कई संगीन आरोप लगाकर पुलिस ने गिरफ्तार किया था। यह कैसी पुलिस है और उस पर किस तरह का दबाव है कि वह सरकारी योजनाओं में जारी भ्रष्टाचार की पोल खोलने वाले पत्रकारों के ऊपर ही कार्रवाई करने में लगी हुई है। इस तरह की कोई भी कार्रवाई तो यही इशारा करती है कि बच्चों के शिक्षा के संवैधानिक अधिकारों के लिए लागू की जा रही सरकारी योजनाओं की लूट वही लोग करने में लगे हैं जिनके ऊपर इन योजनाओं को लागू करने की ज़िम्मेदारी है।

यही नहीं, जिन शिक्षकों के ऊपर देश के भविष्य के नागरिकों को तैयार करने की ज़िम्मेदारी है वहीं उन बच्चों के बीच के बीच जाति और धर्म के नफ़रत का व्यवहार करते हैं। घर से लेकर स्कूल तक जब बच्चे इस तरह के भेदभाव से दो चार होंगे तो उनका विकास किस तरह का होगा और वे किस तरह से समाज के विकास का हिस्सा बनेंगे? आज देश के सामने यह सबसे बड़ा मुद्दा है कि अमीरों के स्कूल अलग क्यों हैं और गरीबों  के बच्चों के स्कूल अलग क्यों है। देश में सारे बच्चों के लिए एक तरह के और एक जैसी पढ़ाई के स्कूल क्यों नहीं हो सकते हैं, जहां जाति और वर्ग के नाम पर भेदभाव न होता हो।

हाल ही में “आर्टिकल 15” फिल्म काफी चर्चा में रही और इस दौरान बहुत से परिचितों से इस फिल्म के मुद्दों पर बात हुई लेकिन शहरों में रहने वाला एक बड़ा तबका इसके बावजूद मानने को तैयार नहीं दिखता कि देश में जातिगत भेदभाव है और देश की एक बड़ी जातिगत आबादी शोषण का शिकार है। कई बार मुझे अफसोस होता है कि मैं कैसे इन आँख वाले अंधों के बीच रह रहा हूँ जिन्हें देश और समाज में जो कुछ गलत हो रहा है, वह केवल और केवल सरकार को बदनाम करने की साजिश लगती है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के इन दोनों प्रकरणों में भी प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत ख़बर को रिपोर्ट करने वाले नागरिक या पत्रकार को साजिशकर्ता साबित करने में लगा दी और यह दिखाने में जुट गए कि सरकार को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है लेकिन प्रशासन सोशल मीडिया के इस्तेमाल के तमाम इफ और बट के बावजूद भूल बैठा कि आज के दौर में खबरें रोकने का मतलब है अंजुरी (दोनों हथेलियों को जोड़कर बना आकार) में पानी भरना, जो कि संभव नहीं है और जो ऐसा करने की कोशिश करेगा उन्हें उसी तरह से कीमत चुकानी पड़ेगी, जैसी बलिया और मिर्जापुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने चुकाई है।


विनय जायसवाल स्वतंत्र लेखक हैं 

1 COMMENT

  1. बढिया बात। अगर देश भर के आंचलिक पत्रकार एक हो जाएं तो एक बड़ी ताकत बना सकते हैं ।और नहीं तो हिंदी भाषी पत्रकारों का ही एक बहुत बड़ा समूह शुरुआत के लिए बन सकता है जो पाक्षिक अखबार निकाले और स्वयं वितरण का कार्य करें । लेकिन इस तरह की पत्रकारिता के लिए आर्थिक स्रोत के रूप में स्वयं कोई अन्य व्यवसाय या नौकरी करनी पड़ेगी । फोटो और वीडियो तथा विवरणों के लिए कहीं जाने की बजाय एक साधारण मोबाइल फोन से काम चल सकता है । संसाधनों के अभाव में प्रिंट एडिशन को फिलहाल डाला जा सकता है ।क्या अ संशोधनवादी क्रांतिकारी अपने मैनपावर को दे सकते हैं ? एक मोर्चा रुप।

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