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नेट नहीं तो काम नहींः तालाबंदी के कगार पर कश्मीर का ऑनलाइन मीडिया

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4 अगस्त की शाम, जुनैद भट्ट अपने नियोक्ता को सन्देश भेजते हैं कि अगर वह उनसे संपर्क नहीं कर पायें तो कश्मीर के हालात की ताज़ा जानकारी के लिए कश्मीर के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले अखबार ग्रेटर कश्मीर की वेबसाइट देखे लें. भट्ट एक वेब डेवेलपर हैं और पुराने श्रीनगर के लाल बाज़ार इलाके में स्थित अपने घर से ही एक अमेरिकी कंपनी के लिए काम करते हैं. लगभग आधी रात को भारत सरकार ने समूचे जम्मू एवं कश्मीर प्रदेश पर इन्टरनेट ब्लैकआउट लागू कर दिया और भट्ट का अपने नियोक्ता समेत बाहरी दुनिया से संपर्क टूट गया.

ग्रेटर कश्मीर ने आखिरी बार अपनी वेबसाइट 5 अगस्त को रात एक बज कर बीस मिनट के करीब अपडेट की. वेबसाइट ने हेडलाइन दी: “ओमर महबूबा लोन नज़रबंद, श्रीनगर में पाबंदियां लागू, मोबाइल इन्टरनेट निलंबित”. उसके बाद वेबसाइट अपडेट नहीं की जा सकी क्योंकि मोबाइल, ब्रॉडबैंड और स्पेशल लाइन इन्टरनेट सेवाओं समेत सभी स्वरूपों में दूरसंचार सेवाएं अनिश्चित काल के लिए निलंबित कर दी गयीं थीं.

5 अगस्त को नरेन्द्र मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 समाप्त कर कश्मीर की स्वायत्तता हटा दी. इस ऐतिहासिक फैसले के बाद प्रशासन ने आवागमन, जनसभाओं और विरोध प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगा दीं, और फैसले को लेकर किसी प्रकार के विरोध को दबाने के लिए कश्मीर घाटी के सभी शहरों, नगरों में अर्धसैनिक बालों की उपस्थिति बढ़ा दी.

जहाँ प्रमुख अख़बारों के प्रिंट संस्करण, हालांकि कम पृष्ठों और ज़मीनी रिपोर्टों के बिना, लॉकडाउन के बावजूद निकलते रहे, उनकी वेबसाइट और केवल वेब पर चलने वाले पोर्टल ठप हो गए. कश्मीर में मीडिया परिदृश्य जीवंत है और अंग्रेजी व उर्दू में लगभग 300 दैनिक हैं. लगभग सभी की वेबसाइट है और अपनी सामग्री ऑनलाइन देते हैं. अख़बारों के अलावा भी कई स्वतंत्र समाचार वेब पोर्टल हैं और सोशल मीडिया पर इनमें से कुछ के पाठकों की संख्या लाखों में है; उदाहरण के लिए ग्रेटर कश्मीर के फेसबुक पेज पर 20 लाख से अधिक ‘लाइक’ हैं.

श्रीनगर में पत्रकारों द्वारा संचार-बंदी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, क्रेडिट -कामरान यूसुफ़

इन्टरनेट सेवाओं पर बैन ने समाचार पोर्टलों से जुड़े पत्रकारों को बेकार बना दिया है. “इन्टरनेट नहीं, तो काम नहीं”

2018 से ‘द कश्मीर प्रेस’ वेबसाइट चलाने वाले मुख्तार बाबा यूं अपनी दास्ताँ बयाँ करते हैं. उनके घाटी में फैले संवाददाता और स्ट्रिंगर, जो नियमित ख़बरें और मल्टीमीडिया सामग्री भेजते थे, खामोश हैं. चूंकि इन्टरनेट बंद है, कश्मीरी समाचार वेबसाइट 4 अगस्त की अपडेट पर अटकी हुए हैं. सम्पादकीय विभाग के कर्मचारियों के लिए कोई काम नहीं है और रिपोर्टर अपने कार्यालयों से संपर्क नहीं कर पा रहे.

एक साप्ताहिक का ऑनलाइन सेक्शन सँभालने वाले संपादक ताहिर भट्ट ने मुझे बताया कि उन्होंने करीब एक महीना ऑफिस से कटकर घर में ही बिताया. उन्होंने बताया, “हमारा ख़बरों का खूब काम होता था और मुझे सप्ताह में एक छुट्टी मुश्किल से मिलती थी, पर अब मेरी ऑफिस में कोई भूमिका ही नहीं है”. अधिकांश संस्थानों का ग्रामीण इलाकों में अपने संवाददाताओं से संपर्क टूट चुका है और संवाददाताओं के पास ख़बरें फाइल करने के लिए साधन नहीं हैं.

दो दैनिकों को अनंतनाग से ख़बरें देने वाले एक पत्रकार ने बताया, “मैंने इस दौरान एक शब्द नहीं लिखा है”. एक और समाचार पोर्टल के संपादक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “स्थिति तनावपूर्ण है, आप ग्रामीण इलाकों में जाकर अपने संवाददाताओं की तलाश करने का जोखिम नहीं उठा सकते”. उन्होंने मुझे बताया कि वह दिन का बड़ा हिस्सा शहर के प्रेस क्लब में बिताते है जहाँ से उन्हें ख़बरें और अफवाहें मिलती रहती हैं.

ग्रामीण इलाकों के मुकाबले श्रीनगर के पत्रकारों, जिनमें से कुछ गैर-स्थानीय प्रेस के लिए काम करते हैं, को सरकार-संचालित मीडिया केंद्र में आंशिक रूप से इन्टरनेट सुविधा मिली हुई है.

श्रीनगर में पत्रकारों द्वारा संचार-बंदी के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, क्रेडिट – द हिन्दू

स्थानीय पत्रकार ऐसी अभूतपूर्व स्थिति पर रिपोर्ट न कर पाने के कारण स्तब्ध हैं. “वास्तविक जनसेवा का यही समय है, पर हमें अपने योगदान से रोका जा रहा है

एक संपादक का यह कहना था. इन्टरनेट पर सम्पूर्ण बंदी होने के कारण इन वेबसाइट के कुछ कर्मचारी लेखकों ने गैर-स्थानीय संस्थानों के लिए फ्रीलांसिंग शुरू की है. उदाहरण के लिए, लोकप्रिय वेबसाइट ‘कश्मीर वाला’ के लिए लिखने वाले कैसर अंद्राबी ने कुछ लेख ‘द वायर’ और ‘फर्स्ट पोस्ट’ के लिए लिखे हैं. कैसर कहते हैं, “जानकारी होने के बावजूद लिख न पाना हताश करने वाला था. मेरे संपादक ने कश्मीर से बाहर की कुछ वेबसाइट के संपादकों के ई-मेल दिए, मैंने कुछ आईडिया प्रस्तुत किये और काम बन गया.”

पत्रकारों ने सरकार से श्रीनगर के प्रेस क्लब और प्रेस कॉलोनी में इन्टरनेट बहाल करने की मांग की. 2 सितम्बर को कश्मीर प्रेस क्लब ने एक बयान जारी कर “पत्रकारों, अख़बारों समेत मीडिया संस्थानों और प्रेस क्लब के मोबाइल फोन, इन्टरनेट और टेलीफोन लैंडलाइन बहाल किये जाने” की अपील की, पर सरकार पर कोई असर नहीं हुआ. इन्टरनेट शटडाउन से केवल अखबार और वेब पोर्टल ही प्रभावित नहीं हुए हैं, समाचार एजेंसियां भी सामान्य रूप से काम नहीं कर पा रही हैं, और इसका भी असर अख़बारों पर हो रहा है क्योंकि वह अपनी समाचार सामग्री के लिए इन पर बहुत निर्भर करते हैं.

संपादक अब फ़्लैश ड्राइव लेकर एजेंसियों के दफ्तरों में जाकर दिन भर के समाचार बुलेटिन लेते हैं, जो सरकारी विज्ञप्तियों से भरे होते हैं. एक पत्रकार के अनुसार: “हम अपने स्टाफ के संपर्क में नहीं हैं और इसलिए ज़मीनी रिपोर्ट हम तक आ नहीं रही है, और सरकारी अधिकारियों के बयान हमारे बुलेटिन में छाये रहते हैं”. कश्मीर की ऑनलाइन मीडिया पर थोपी गयी ख़ामोशी के कारण लोगों को जानकारी से वंचित किया जा रहा है.

इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़, हेग में कश्मीरी पीएचडी कैंडिडेट हारिस ज़रगर ने मुझे बताया, “हमें नहीं पता कश्मीर में ज़मीन पर क्या हो रहा है.” ब्लैकआउट उन पत्रकारों को भी प्रभावित कर रहा है जो कश्मीर से गैर-स्थानीय मीडिया के लिए काम करते हैं. नई दिल्ली स्थित एक संस्थान के लिए श्रीनगर से काम करने वाले आकाश हस्सन के लिए किसी दूर-दराज़ के इलाके से अपडेट एक समाचार की टिप हो सकती है. वह कहते हैं, “स्थानीय मीडिया मुझे कश्मीर से सम्बंधित हर जानकारी देता था. अब इसके अभाव में ऐसा लगता है जैसे दिल को रक्त पहुँचाने वाली धमनियों को ब्लॉक कर दिया गया हो।”

इन दिनों कश्मीर में जब कोई खबर विकसित होती है तो रिपोर्ट किये जाने से पहले मर जाती है

एक विदेशी समाचार एजेंसी के साथ जुड़े वरिष्ठ कश्मीरी पत्रकार परवेज़ बुखारी कहते हैं, “पत्रकारों से अपराधियों जैसा बर्ताव किया जा रहा है, ऐसा लगता है मानो सरकार जो स्थापित करना चाहती हो उसके रास्ते में पत्रकार ही रोड़ा हों”. उन्होंने अफ़सोस जताया कि पत्रकार इन्टरनेट शटडाउन के कारण सरकार के दुष्प्रचार का विरोध नहीं कर पा रहे हैं. वह कहते हैं, “जब हमारे पास जानकारी आती भी है, तो साधनों के अभाव में उसकी पुष्टि करना संभव नहीं होता और अधिकारी भी अपना पक्ष रखने के लिए उपलब्ध नहीं होते.”

मध्य अगस्त में प्रदेश के सबसे पुराने अखबार ‘कश्मीर टाइम्स’ की संपादक अनुराधा भसीन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि “कश्मीर में पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की गतिविधि की आज़ादी पर कड़ी पाबंदियां हैं”. सरकार ने उनके मामले के जवाब में कहा: “इनकी (अनुराधा भसीन की) याचिका तथ्यात्मक रूप से गलत है. श्रीनगर और जम्मू में अखबार छप रहे हैं. वे (कश्मीर टाइम्स संपादक) जान बूझ कर अखबार नहीं छाप रहे हैं”. भसीन ने संचार पर पाबंदियां हटाने के लिए अदालत से निर्देश जारी करने का अनुरोध किया था.

श्रीनगर के मीडिया सेंटर में मौजूद कंप्यूटर पर इंटरनेट इस्तेमाल करने अपनी बारी का इंतज़ार करते पत्रकार। क्रेडिट- सैयद शेहरियर/अल जज़ीरा

मीडिया पर्यवेक्षक कश्मीर में वर्तमान इन्टरनेट बंदी को आम तौर पर बढ़ रही सेंसरशिप के माहौल से जोड़कर देखते हैं

दिल्ली की जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के एक कश्मीरी पीएचडी स्कॉलर ने कहा, “वर्तमान पाबंदियों को अलग से नहीं देखा जाना चाहिए”. 2016 में अशांति के समय गृह मंत्रालय ने कश्मीर के स्थानीय मीडिया को नियंत्रण में रखने के सम्बन्ध में एक रिपोर्ट जारी की थी. द इंडियन एक्सप्रेस में एक समाचार के अनुसार: “घाटी में भारत विरोधी भावनाओं को उकसावा दे रहे समाचार संस्थानों को किसी तरह के ‘नकारात्मक प्रचार’ टेलीकास्ट करने से ‘हतोत्साहित’ किया जाना चाहिए”. तब से कश्मीर में पत्रकार लगातार दबाव की शिकायत कर रहे हैं.

फरवरी 2019 में भारत सरकार ने ‘ग्रेटर कश्मीर’और ‘कश्मीर रीडर’ जैसे प्रमुख अखबारों को विज्ञापन देना बंद कर दिया. नतीजतन अखबारों के राजस्व में भारी कटौती हुई और अखबार वेतन घटाने पर मजबूर हुए. कुछ महीने बाद इन दो अखबारों के संपादकों को केन्द्रीय जांच एजेंसी ने कश्मीर में संघर्ष से जुड़े मामलों में पूछताछ के लिए बुलाया. एक वेब संपादक ने बताया, “हम मिलिटेंट के जनाज़े की खबरें देने से बचने लगे हैं. हम सरकार को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकते”.

सरकार की तरफ से अपनाई जा रही “दबावपूर्ण हरकतें” अख़बारों को स्वयं पर सेंसरशिप लागू करने पर मजबूर कर रही हैं और संवाददाता शिकायत कर रहे हैं कि ज़मीनी स्थिति से जुड़ी उनकी ख़बरों को कूड़े में फेंका जा रहा है.

आम लोगों के लिए इन्टरनेट सुविधा से रोकने का कारण सुरक्षा और क़ानून व्यवस्था बताया जा रहा है, पर अखबार कार्यालयों को मना करते रहने का क्या औचित्य है? पर्यवेक्षकों के अनुसार बढ़ती पाबंदियां कश्मीर के हालात की सच्चाई को नियंत्रित करने के लिए हैं.

कश्मीर से प्रकाशित साप्ताहिक कश्मीरी लाइफ के एक पूर्व ऑनलाइन संपादक रियाज़ उल खलिक ने कहा, “मीडिया संस्थानों को इन्टरनेट से वंचित करने का मकसद कश्मीर से बाहरी दुनिया को जाने वाली जानकारी के प्रवाह को अवरुद्ध करना है”.

उन्होंने कहा, “भारत सरकार की मुख्य समस्या कश्मीर घाटी में मुखर मीडिया परिदृश्य की है और प्रमुखत: अंकुश इसी पर लगाया गया है”.

कश्मीर में मीडिया पर बंदिशों ने वैश्विक ध्यान खींचा है. 5 अगस्त को प्रेस स्वतंत्रता को बढ़ावा देने वाली वैश्विक संस्था ‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे)’ ने भारत सरकार से कश्मीर में इन्टरनेट और संचार सेवाओं की पहुँच सुनिश्चित करने को कहा. संस्था ने सीपीजे के एशिया प्रोग्राम की वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता आलिया इफ्तिखार के हवाले से बयान जारी किया: “हम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके प्रशासन से इस गारंटी की मांग करते हैं कि कश्मीर में सभी संचार अवरोध हटाए जाएँ और पत्रकारों को स्वतंत्रता से रिपोर्ट करने दिया जाए. लोकतंत्र में संचार अवरोधों के लिए कोई स्थान नहीं है”.

संस्था कश्मीर में मीडिया सेंसरशिप का मुद्दा लगातार उठा रही है. सीपीजे के अलावा न्यूयॉर्क टाइम्स, अल-जजीरा और टीआरटी वर्ल्ड जैसी मीडिया संस्थाओं ने ख़बरें देने में कश्मीरी पत्रकारों को पेश आने वाली चुनौतियों के बारे में लेख दिए हैं.

वित्तीय रूप से मीडिया क्षेत्र कश्मीर में बहुत संघर्ष कर रहा है. समुचित कॉर्पोरेट सेटअप के अभाव में राजस्व प्राप्ति एक बड़ी चुनौती है. भारत के दूसरे राज्यों के मुकाबले कश्मीर में पत्रकारों को बहुत कम वेतन मिलता है. कई अखबारों को सरकार से विज्ञापन मिलते हैं और उस आय से वह चल भी पाते हैं, पर ऑनलाइन क्षेत्र तो आय के मामले में लगभग कंगाल है.

मई 2019 में ही एक वेबसाइट शुरू करने वाले शेख उज़ैर ने मुझे एक साक्षात्कार में बताया, “हम तीसरे महीने में गूगल ऐड्स के ज़रिये दस डॉलर की आय प्राप्त कर सके”. उज़ैर के पत्रकार दोस्त मुफ्त में उनकी मदद करते हैं. वह बताते हैं, “मित्र समाचार और तस्वीरें निशुल्क भेजते हैं”. उन्होंने उम्मीद जताई कि एक दिन उनकी वेबसाइट रोज़गार उत्पादन की स्थिति में होगी. स्वतंत्र समाचार वेबसाइट ‘फ्री प्रेस कश्मीर’ के संपादक और मालिक काजी ज़ैद ने बताया, “राजस्व मॉडल तबाह हो चुका है, सभी विज्ञापनदाताओं ने पैर पीछे कर लिए हैं, जिसका अर्थ है हम स्टाफ का वेतन नहीं दे पा रहे. हमें हमेशा के लिए काम बंद करना पड़ सकता है”.

प्रमुख अखबारों को भी नियमित विज्ञापन नहीं मिल रहे और नतीजतन स्टाफ को समय से वेतन नहीं मिल पा रहा. वेतन कटौती की शिकायतें हैं. कुछ पत्रकारों ने बताया कि उन्हें अगस्त से वेतन नहीं मिले. एक अंग्रेजी दैनिक के पत्रकार ने बताया, “मैं प्रतिदिन कार्यालय जा रहा हूँ और इसके बावजूद पिछले दो महीनों से वेतन नहीं मिला.” वह पिछले काफी समय से वेतन वृद्धि की उम्मीद कर रहे थे, पर अब उनकी यह उम्मीदें ख़त्म हो चुकी हैं. वह कहते हैं, “प्रबंधन के पास अब बहाना है और मैंने ज़ोर दिया तो वह मुझे इस्तीफ़ा देने के लिए कह देंगे”.


कश्मीर के पत्रकारों से प्रत्यक्ष साक्षात्कार अगस्त 2019 के तीसरे सप्ताह में किये गए थे. कुछ पत्रकारों से दिल्ली में मध्य सितम्बर में बात की गयी. इस लेख में ज़िक्र किये दो पत्रकारों का साक्षात्कार व्हाट्सएप पर किया गया. श्रीनगर में रहने वाले कश्मीरी स्वतंत्र पत्रकार ज़फर आफ़ाक़ की यह रिपोर्ट ‘द पोलिस प्रोजेक्ट’ वेबसाइट पर 2 अक्टूबर 2019 को प्रकाशित हुई थी. वेबसाइट सम्पादक की अनुमति के साथ, इसका अनुवाद ‘कश्मीर ख़बर‘ ने किया है

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