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BBC हिंदी सेवा के 78 साल पूरे होने पर एक श्रोता की पाती: “अब अलगाव सा महसूस होता है”!

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आशुतोष कुमार पाण्डेय / आरा, बिहार से 

बीबीसी की हिंदी सेवा अपनी स्थापना की 78वीं वर्षगांठ मना रही है। इसकी शुरुआत 11 मई 1940 को हुई थी। बीबीसी हिंदी सेवा की स्थापना 11 मई 1940 को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अलग-अलग मोर्चों पर ब्रिटेन में लड़ रहे भारतीय सैनिकों के परिवारों तक खबर पहुंचाने के मकसद से हुई थी। बीबीसी हिंदी सेवा के पहले प्रसारण के साथ यह ब्रिटेन के लिए भी एक ऐतिहासिक दिन था। उसी दिन विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे।

द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के साथ ही बीबीसी हिंदी सेवा के समाचार के स्वरूप और लक्ष्य में भारी तब्दीली आई। उस दौर में यूरोप का एक हिस्सा और अमरीका, अफ्रीकी और एशियाई मुल्कों को अपने मायावी जाल में फांस कर अमानवीय ढंग से शोषण कर रहा था। हिटलर यहूदियों के लिए यमराज बना हुआ था। महात्मा गांधी ‘करो या मरो’ का नारा देकर अंग्रेजों को ललकार रहे थे तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस कांग्रेस से नाराज होकर सिंगापुर में कैप्टन मोहन सिंह के साथ आजाद हिंद फौज खड़ी कर रहे थे। कालांतर में भारत विभाजन में ‘बेवेल योजना’, ‘कैबिनेट मिशन’ और माउंटबेटन के भारत आगमन के साथ देशी राज्यों का विलय, 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिया भाषण, महात्मा गांधी की हत्या से लेकर देश में आपातकाल, सिख विरोधी दंगे, बाबरी मस्जिद ध्वंस आदि तमाम घटनाओं का गवाह बीबीसी हिंदी सेवा और उसके पत्रकार रहे। नब्बे के दशक में भारत में मंडल-कमंडल की राजनीति से लेकर सोवियत संघ के विघटन तक तमाम सूचनाओं को बीबी की हिंदी सेवा ने सशक्त ढंग से पेश किया।

मेरे 86 वर्षीय बाबा आले हसन, रत्नाकर भारतीय और कैलाश बुधवार की बड़ाई करते नहीं अघाते। मेरे पिताजी ओंकारनाथ श्रीवास्तव को हर पहलू से नायाब बताते हैं और हमारी पीढ़ी के श्रोताओं के बीच भी बीबीसी हिंदी के पत्रकार किसी सितारे से कम नहीं हैं। आज समय बदला है, समाज के आर्थिक संघर्ष के स्वरूप और लक्ष्य भी बदले हैं। सूचनाओं के नए-नए माध्यम कुकुरमुत्‍ते की तरह उग आए हैं। निष्‍पक्षता के नाम पर भारतीय मीडिया कायिक और मानसिक हिंसा को समाचार बता रहा है। आकाशवाणी वर्तमान सरकार के ‘मन की बात’ जैसा खोखला हो चुका है।

2 मई, 2015 के दैनिक जनसत्ता के संपादकीय पृष्‍ठ पर एक टिप्पणी प्रकाशित हुई जिसमें सार्वजनिक प्रसारण के प्रतिमान के तौर पर बीबीसी को लोकतांत्रिक दुनिया में आदर्श माना गया था, जो वित्तीय रूप से ब्रिटेन की सरकार पर निर्भर होते हुए भी सरकारी नियंत्रण से बचा रहा है। इस समय सरकारें जनता के खिलाफ तमाम मुद्दों पर मोर्चाबंदी कर रही हैं लेकिन यह भी नकारा नहीं जा सकता कि बीबीसी ने कई मुद्दों पर ब्रिटेन का पक्ष लिया, जैसे उक्रेन के मसले पर रूस का खलनायकीकरण, इत्‍यादि।

मणिकांत ठाकुर और रामदत्त त्रिपाठी के चले जाने के बाद बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में बीबीसी हिंदी सेवा ने अपने मजबूत स्तंभ खो दिए। इसके बावजूद जिस देश में भूकंप आने पर चांद पलट जाता हो, पानी विषाक्त हो जाता हो और हरियाणा के किसी गांव से मिथकीय सरस्वती नदी को बहाए जाने में सरकार जी-जान से लगी हो, ऐेसे में बीबीसी ही प्रामाणिक सूचना पहुंचाने का सशक्त माध्यम आज भी नजर आता है।

बीबीसी ने अपनी साठवें वर्षगांठ पर 2000 में एक किताब प्रकाशित की थी- ‘नए जनसंचार माध्यम और हिंदी’, जिसमें अपने सोलह सजग श्रोताओं के सत्रह पत्रों को भी उसने स्थान दिया था। यह अपने आप में एक अनूठा प्रयोग था। श्रोताओं से इस किस्‍म का जुड़ाव और उन्‍हें याद रखना ही बीबीसी की असल कमाई है। इस पाठक श्रोता केंद्रित अभ्‍यास का एक लाभ यह रहा कि बीबीसी हिंदी के श्रोताओं के बीच एक आपसी रिश्‍ता बना और इस माध्‍यम के जरिए अच्छे दोस्‍त मिले।

कुछ साल पहले जब बीबीसी हिंदी सेवा से कुछ पुरानी आवाज़ों के जाने की सूचना मिली, तब इसके श्रोता बहुत निराश हुए। गनीमत है कि सत्ता और पूंजी द्वारा प्रायोजित खबरों के घटाटोप के बीच अब भी बीबीसी की विश्वसनीयता काफी हद तक कायम है, हालांकि कई विश्‍वसनीय पत्रकारों का बीबीसी हिंदी से चला जाना श्रोताओं को आज भी कचोटता है क्‍योंकि बीबीसी के पत्रकारों और उद्घोषकों के साथ श्रोताओं का रिश्ता बहुत पारिवारिक-सा हुआ करता था। वे हमारी जिंदगी का मानो हिस्सा होते थे। लगता ही नहीं था कि दोनों अलग-अलग दुनिया में रहते हैं। आज यह रिश्‍ता कुछ कमज़ोर पड़ा है और बीबीसी हिंदी के साथ वैसा जुड़ाव महसूस नहीं होता।