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IFWJ का PM को पत्र, PIB, RNI और DAVP सहित प्रेस काउंसिल को खत्म करने की मांग की

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श्रमजीवी पत्रकार संघ (IFWJ) ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर सूचना और प्रसारण मंत्रालय के कुछ विभागों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआइबी), डीएवीपी, आरएनआई और  प्रेस काउंसिल की उपयोगिता अब निरर्थक हो चुकी है. यहां तक कि खुद सूचना और प्रसारण मंत्रालय खुद अप्रासंगिक हो गया है. इसलिए श्रमजीवी पत्रकार संघ (IFWJ) को लगता है कि सरकार को ऐसे सभी विभागों को रद्द करना चाहिए जो वर्तमान परिस्थितियों में न केवल निरर्थक और बेकार हो गए हैं, बल्कि वे स्वतंत्र और जिम्मेदार मीडिया के विकास में बाधा पैदा करते हैं.

श्रमजीवी पत्रकार संघ ने पत्र में कहा गया है कि स्वतंत्र भारत में मीडिया नीति तय करने के लिए इस मंत्रालय की कल्पना की गई थी, लेकिन अब जब मीडिया केवल प्रिंट माध्यम और टीवी चैनलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हमारी कल्पनाओं से बहुत आगे निकल चुका है. इन विभागों के अस्तित्व और रखरखाव के लिए सरकारी खजाने से साल-दर-साल बड़ी रकम खर्च की जाती है. इसलिए, इन शवों (मरी हुई संस्थाओं) को बनाए रखने का कोई मतलब नहीं है.इस पत्र में उल्लिखित एक-एक संस्था का जिक्र किया गया है.

प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के बारे में लिखा गया है कि -यह भारत सरकार की एक नोडल एजेंसी है, जिसमें एक बहुत बड़ा स्टाफ है, जो सरकार और इस तरह जनता पर एक बड़ा बोझ है। कोई भी यह समझ नहीं पाया है कि मीडिया के विस्फोट के बाद विशेष रूप से इसकी क्या भूमिका बची है ?

लोकसभा और राज्यसभा की इंटरनेट और लाइव स्ट्रीमिंग के आने और विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में काफी हद तक पारदर्शिता लाने के साथ, किसी को नहीं पता कि पीआईबी की भूमिका क्या है? जब आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी ने जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों को पीछे छोड़ दिया है, ऐसे में पीआईबी की शायद ही कोई भूमिका बची हो. आधुनिक युग में सूचना मंत्रालय की कोई प्रासंगिकता नहीं है.

यह दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उपयोगी था जब ब्रिटिश शासन सेंसरशिप का उपयोग प्रतिकूल प्रचार को रोकने के लिए एक औजार या उपकरण के तौर पर करता था. इसी तरह सूचना मंत्रालय को सरकार के सकारात्मक पक्ष को प्रोजेक्ट करने या उजागर करने और नकारात्मक पक्ष को छुपाने के लिए डिज़ाइन किया गया था. किन्तु आज वह अवधारणा पूरी तरह बदल गई है. आज सूचना तकनीक के आगे सभी को पारदर्शी होने के लिए मजबूर किया है.

इसी तरह इस श्रमजीवी पत्रकार संघ ने पत्र में ऑडियो-वीडियो प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) के बारे में भी लिखा है. जैसा कि इसके नाम से पता चलता है, यह विभिन्न माध्यमों या मीडिया के माध्यम से आम जनता के बीच सरकार की योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं के प्रचार के लिए बनाया गया था. किन्तु अब इसे विभिन्न मीडिया हाउसों के लिए विज्ञापन जारी करने का केंद्र बना दिया गया है.

आरएनआई का उल्लेख करते हुए श्रमजीवी पत्रकार संघ ने पत्र में लिखा  है कि आज अख़बार या सूचना देने के लिए आरएनआइ से कोई मंजूरी प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है. यदि सरकार को लगता है कि समाचार पत्रों / पत्रिका / समय-समय पर प्रकाशन के लिए किसी प्रकार का लाइसेंस दिया जाना आवश्यक है, तो इसे एक छोटे से कार्यालय से पांच-छह व्यक्तियों के एक छोटे समूह द्वारा प्रबंधित किया जा सकता है, जिसे पूरी तरह से आधुनिक तकनीक/इन्टरनेट से जोड़ा जाना चाहिए.

श्रमजीवी पत्रकार संघ ने प्रेस काउंसिल के बारे में भी पत्र में लिखा है. प्रेस काउंसिल एक वैधानिक निकाय है,वर्तमान समय में इसका व्यावहारिक रूप से कोई उपयोग नहीं है. आज मीडिया की दुनिया केवल प्रिंट माध्यम तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह ऑडियो-विजुअल और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से आगे बढ़ चुकी है.

आज जहां सोशल मीडिया ने सार्वजनिक जीवन में भारी अतिक्रमण किया है, वहीं इसने समाज में कहर भी ढाया है. यह अफवाह केंद्रित माध्यम अधिक है फिर भी समाज में इसका बहुत मजबूत प्रभाव है. इससे पहले कि समाज में और अधिक अराजकता फैले इसके लिए नियम-कानून बनाने की जरुरत है. प्रेस काउन्सिल को भी मीडिया काउन्सिल में बदल दिया जाना चाहिए.

पत्र के अंत में कहा गया है कि उक्त तथ्यों को मद्देनजर रखते हुए श्रमजीवी पत्रकार संघ (IFWJ) को लगता है कि सरकार को ऐसे सभी विभागों को रद्द करना चाहिए जो वर्तमान परिस्थितियों में न केवल निरर्थक और बेकार हो गए हैं, बल्कि वे स्वतंत्र और जिम्मेदार मीडिया के विकास में बाधा पैदा करते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी को संबोधित यह पत्र श्रमजीवी पत्रकार संघ के महासचिव परमानंद पांडेय द्वारा लिखा गया है.

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