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प्रतिभा हो तो बनारस में बिना फ़क्कड़ हुए रहा जा सकता है, मुझमें प्रतिभा की कमी थी!

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छात्र राजनीति सूंघने का दौर सेंट्रल हिंदू स्कूल में नौंवीं-दसवीं कक्षा में ही शुरू हो चुका था. मां-बाप कम्युनिस्ट थे, सो शुरू से ही तय था कि कम्युनिस्ट बनना है. इस लिहाज से यह कोई विद्रोह नहीं, पारिवारिक परंपरा निबाहना था. वैसे सबसे प्रिय शिक्षक थे भोला बाबु, और मैं उनका प्रिय छात्र. मैं बिना कुछ समझे-बूझे कम्युनिस्ट बनने को आमादा, और वे कट्टर संघी, आरएसएस के ज़िला सरसंघचालक. शायद यहां विद्रोही तेवर की गुंजाइश थी, और उसका जमकर फ़ायदा उठाया.

यह 67-68 का दौर था, बनारस के राजनीतिक माहौल पर कम्युनिस्ट नेता रुस्तम सैटिन छाये हुए थे, और सड़कों पर छात्र राजनीति का असर बढ़ता जा रहा था. अंग्रेज़ी साइनबोर्ड तोड़ने का मुहिम चला, जिसे उस वक्त हिंदी आंदोलन के नाम से सुशोभित किया गया था. हिंदी को कितना फ़ायदा हुआ था पता नहीं, लेकिन ख़ासकर बीएचयू के छात्रों के बीच राजनीतिक चेतना पैदा करने में इस आंदोलन की अहम भूमिका थी – और इस आंदोलन से उत्तर भारत के सबसे तेज़-तर्रार छात्र नेता उभरे थे – देवब्रत(देबु) मजुमदार. छात्र नेता के तौर पर देबुदा की शान की तुलना शायद सिर्फ़ इमरजेंसी और उसके बाद के दौर में जेएनयू के डीपीटी के साथ की जा सकती है. देबुदा अब नहीं रहे, पुलिस की पिटाई से सिर में लगी चोट दशकों बाद जानलेवा साबित हुई.

1965 में बीएचयू में फिर से छात्र संघ का चुनाव हुआ था, मुकाबला बिहार के दो भोजपुरी छात्रनेताओं – आरएसएस के लालमुणि चौबे और समाजवादी रामवचन पांडेय के बीच थी. पांडेय जी ने चौबेजी को पटखनी दी (और बाद में बिहार के विधानसभा चुनाव में पांड़ेजी को हराकर चौबेजी ने बदला लिया) और उसीके साथ बीएचयू में छात्र राजनीति की बिसात पर गोटियां बिठाने का क्रम शुरू हुआ. यहां कह देना ज़रूरी है कि बीएचयू के छात्र समुदाय को अगर देखा जाय, तो तीन वर्गों के छात्र मौजूद थे. बनारस के शहरी मध्यवर्ग के छात्र, सारे भारत से इस राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में आने वाले छात्र, और पूर्वांचल के कस्बों और गांवों से आनेवाले छात्र. पहले दो वर्गों के छात्र शहराती होते थे और उन्हें मकालू कहा जाता था. कस्बों और गांवों से आनेवाले देहाती छात्र बलियाटिक कहलाते थे. चौबेजी और पांड़ेजी – दोनों बलियाटिक थे. 66 में आरएसएस घनिष्ठ सुरजीत सिंह डंग अध्यक्ष बने, लेकिन उनकी जीत के पीछे एक उभरते हुए छात्रनेता का हाथ था, जो जल्द ही इतिहास बनाने वाला था – देबु मजुमदार. एक और दिलचस्प बात यह थी कि डंग के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में एक कम्युनिस्ट उम्मीदवार थे – दीपक मलिक, जो वर्षों तक छात्र राजनीति में सक्रिय रहे व बाद में प्रोफ़ेसर बने.

उन दिनों विद्यार्थी परिषद आरएसएस से जुड़े छात्रों और अध्यापकों का संयुक्त संगठन था व छात्र संगठन के रूप में उसकी कोई धार नहीं थी. एक छात्र संगठन के रूप में परिषद की रूपरेखा तैयार करने के पीछे सैद्धांतिक नेता के रूप में राम बहादुर राय का विशेष योगदान रहा है. कट्टर संघी व व्यक्तिगत संपर्कों में अत्यंत मृदु स्वभाव के रायसाहब बाद में जनसत्ता के यशस्वी पत्रकार बने.

1967 में कम्युनिस्ट संगठन एआईएसएफ के नरेंद्र सिन्हा को भारी मतों से हराकर मजुमदार अध्यक्ष बने. मज़े की बात यह है कि सिन्हा के समर्थन में आरएसएस के लालमुणि चौबे जी-जान से जुट गये थे. ज़ाहिर है कि यहां बिहारी समीकरण काम कर रहा था. सिन्हा बिहार के थे. बहरहाल, मजुमदार के चुनाव में मकालू ग्रुप की राजनीतिक चेतना पहली बार उभरकर सामने आई. बलियाटिक ग्रुप तो ठाकुर-भुमिहार व किसी हद तक यूपी-बिहार के मुद्दों पर काम किये जा रहा था.

पूरे उत्तर भारत में छात्रों के बीच समाजवादी आंदोलन की पकड़ मज़बूत हो चुकी थी. लोहिया के गैरकांग्रेसीवाद का बर्चस्व था. प्रदेश के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी समाजवादी युवजन सभा की पकड़ थी. बीएचयू में इस संगठन के नेताओं में शामिल थे मजुमदार के अलावा रामवचन पांडेय, जो हमेशा हर अभियान में साथ रहते थे, लेकिन उन्हें कोई पूछता नहीं था. मार्कंडेय सिंह की संगठन में अच्छी पकड़ थी. युवा कार्यकर्ताओं में आनंद थे, मोहन प्रकाश थे – भुमिहारों की पूरी एक जमात थी. मुझे ठीक-ठीक याद नहीं चंचल कब से पहली पांत में आए.

बहरहाल, 1968 में अप्रत्याशित रूप से राजनीतिक ध्रूवीकरण सामने आया. आरएसएस के उम्मीदवार थे दामोदर सिंह, जिनके पीछे बाहुबलियों की पूरी एक जमात खड़ी थी. समाजवादी युवजन सभा के आधिकारिक उम्मीदवार तो मार्कंडेय सिंह थे, लेकिन मजुमदार पिछले साल के अपने प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र सिन्हा का समर्थन कर रहे थे. चुनाव के दौरान ही आरएसएस की ओर से दहशत का ऐसा एक माहौल तैयार किया गया कि उनके विरोध में किसी एक उम्मीदवार को वोट देने का माहौल बन गया. मैं इसी साल पीयुसी के छात्र के तौर पर विश्वविद्यालय में आया था. कैंपस का राजनीतिक माहौल दंग करने वाला था, और साथ ही दहशत का भी अहसास पूरी तरह से था. अंततः नरेंद्र सिन्हा की अच्छे अंतर से जीत हुई. लेकिन आरएसएस इस जीत को मानने के लिए तैयार नहीं दिख रहा था. कुलपति ने भी आरएसएस का समर्थन करते हुए चुनाव के बाद कहा कि सिन्हा अगर ढाई हज़ार छात्रों के अध्यक्ष हैं, तो दामोदर सिंह भी उन्नीस सौ के अध्यक्ष हैं.

दरअसल, विश्वविद्यालय में आरएसएस, व साथ ही, जातिवाद के निहित स्वार्थों की एक संरचना अपनी पैठ जमा चुकी थी और मजुमदार का एजेंडा उसके ख़िलाफ़ था, कम्युनिस्ट भी इस एजेंडा के साथ थे. मेरा निजी अनुभव भी झकझोरने वाला था, यहां अध्यापक और छात्रों के बीच का रिश्ता नदारद था, दूसरे एजेंडों के तहत रिश्ते बन रहे थे. कुलपति जोशी के बंगले पर एक मामुली प्रदर्शन के बाद मजुमदार, सिन्हा, दीपक मलिक व अन्य कई नेताओं को विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया, पूरे साल तक छात्रों का विरोध चलता रहा, अनिश्चित काल के लिये विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया. कैंपस पीएसी और छात्रों के बीच युद्ध का मैदान बना रहा. अंततः गजेंद्रगडकर आयोग की स्थापना हुई. उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही शांति स्थापित की जा सकी.

1970 की शांति के पीछे कई प्रक्रियाएं काम कर रही थीं. दूसरे छात्र संगठनों की तर्ज़ पर विद्यार्थी परिषद को नया रूप देने का काम शुरू कर दिया गया था, जिसके चलते आने वाले सालों में आरएसएस की पकड़ मज़बूत होती गई. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ सीपीआई की निकटता बढ़ रही थी, जिसकी पराकाष्ठा इमरजेंसी के प्रति कम्युनिस्टों का समर्थन थी. समाजवादी आंदोलन टूट रहा था, लेकिन एसवाईएस की आत्मा जीवित थी. समाजवादी और आरएसएस – दोनों अब कांग्रेस के विरोध में थे, लेकिन जेपी आंदोलन से पहले तक कैंपस की राजनीति में उनके बीच कोई निकटता नहीं आई. जेपी आंदोलन में भी समाजवादी संगठन युवा जनता और आरएसएस का संगठन जनता युवा मोर्चा समानांतर ढंग से काम करते रहे.

कम्युनिस्टों की हालत पतली थी, क्योंकि उनके पास कद्दावर छात्र नेता नहीं रह गये थे. उनके उम्मीदवार डीपी मिश्रा को हराकर मार्कंडेय सिंह अध्यक्ष बने, आरएसएस के समर्थन से निर्दलीय छात्रनेता संतोष कपुरिया अध्यक्ष बने, बाद में आरएसएस के नज़दीकी एक बाहुबली ने उनकी हत्या कर दी. कम्युनिस्टों ने असंतुष्ट समाजवादियों के समर्थन का रास्ता अपनाया, लेकिन उन्हें इसमें कोई सफलता नहीं मिली. हां, उनके समर्थन से कांग्रेस के हरिकेश बहादुर एक बार ज़रूर जीते.

कैंपस के समाजवादी आंदोलन में धीरे-धीरे वरिष्ठ नेता राजनारायण की भूमिका बढ़ती जा रही थी, और उसी के साथ घट रही थी मजुमदार की पकड़. लेकिन बाद के वर्षों में जिन समाजवादी छात्र नेताओं को सफलता मिली, वे राजनारायण के नज़दीकी चक्र के नहीं थे – मिसाल के तौर पर चंचल या मोहन. जेपी आंदोलन के साथ कम्युनिस्ट और समाजवादी दो विपरीत छोर पर खड़े हो चुके थे. लेकिन यहां मैं कहना चाहूंगा कि कम्युनिस्टों की कैंपस राजनीति आरएसएस के खिलाफ़ लक्षित थी. समाजवादियों का भी यही रुख़ था. इसलिये ये दोनों धारायें अपने आपसी रिश्ते को तय नहीं कर पा रही थी. जेपी आंदोलन शुरू होने के बाद स्थिति बदल गई. अब उनके साथ होने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी.

जेपी आंदोलन, कुलपति श्रीमाली का दौर, छात्र नेता के रूप में आनंद कुमार का आगे बढ़ना, चंचल कुमार – मकालू या बलियाटिक? ये अलग जटिल विषय हैं. अलग से इनकी चर्चा करनी पड़ेगी.

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