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‘ओपेन पॉलिटिकल एक्टिविज्‍़म’ के आरोप में नौकरी से निकाले गए एक युवा पत्रकार की आपबीती

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मीडिया में नई तकनीक आने के बाद से कई ऐसी वेबसाइटें और एप्लिकेशन कुकुरमुत्‍ते की तरह उग आए हैं जिनका मूल काम पत्रकारिता नहीं, कुछ और है। ज़ाहिर है इन संस्‍थानों में पत्रकारिता संस्‍थानों से निकले जो नए पत्रकार भर्ती किए जा रहे हैं, उन्‍हें स्‍टाफ राइटर या कंटेंट राइटर नाम के पद और काम भर के वेतन का लालच पर कांच के चमकते दफ्तरों में कैद कर दिया जा रहा है। कुछ महीने बाद इन संस्‍थानों की कलई खुलती है जब कहा गया वेतन नहीं दिया जाता और तमाम किस्‍म की बंदिशें तारी हो जाती हैं। इसमें सबसे ज्‍यादा त्रासद बात यह होती है कि इन संस्‍थानों में संपादकीय प्रभारी कोई पेशेवर पत्रकार नहीं, मैनेजर होता है। ऐसे ही एक नए संस्‍थान रोर मीडिया से आइआइएमसी के पासआउट एक नवोदित पत्रकार मुरारी त्रिपाठी को नौकरी से हाल में निकाल दिया गया है। उन पर लिखित में आरोप लगाया गया है कि वे सोशल मीडिया पर अपनी लिखाई के माध्‍यम से ‘‘ओपेन पॉलिटिकल एक्टिविज्‍़म’’ फैला रहे थे। उक्‍त पत्रकार ने अपनी दास्‍तान मीडियाविजिल को लिख कर भेजी है। उसे हम थोड़े से संपादन के साथ पूरा छाप रहे हैं-
(संपादक)

मुरारी त्रिपाठी

अभी हाल ही में खबर आई कि भारत की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने 300 गैर-पत्रकारों को 29 सितंबर के दिन एक झटके में बर्खास्त कर दिया. इसे पढ़ने के बाद मैं और मेरे जैसे कई नौजवान पत्रकार सकते में आ गए. आखिर कोई संस्थान इतना क्रूर निर्णय कैसे ले सकता है! जब मैं यह खबर पढ़ रहा था, तो मुझे ध्यान आया कि पिछले दिन तो मैं भी नौकरी से बर्खास्त किया जा चुका हूँ और वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि मेरे संपादक को मेरा सोशल मीडिया पर लिखना पसंद नहीं था. साथ ही यह भी ध्यान आया कि पत्रकारिता करने का दावा करने वाले बड़े-बड़े संस्थानों में आए दिन ऐसा होता रहता है. पत्रकारों और कर्मचारियों को बिना किसी वाजिब कारण के नौकरी से निकाल दिया जाता है. वे दरबदर फिरते हैं और दूसरी जगहों पर नौकरी की तलाश करते हैं. इन जगहों पर भी नौकरी चले जाने का खतरा हर पल मंडराता रहता है. कुल-मिलाकर छोटे-मोटे पत्रकारों के लिए पत्रकारिता उद्योग अनिश्चितताओं से भरा हुआ है. कब किसकी, किस वजह से नौकरी चली जाए, उसे नहीं पता होता है.

खैर, मैं अब अपनी कहानी पर आता हूँ. मैंने 2017-18 में देश में पत्रकारिता के सबसे अच्छे माने जाने वाले संस्थान (भारतीय जनसंचार संस्थान) से हिंदी पत्रकारिता में परस्नातक डिप्लोमा किया. मैं जब दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक कर रहा था, तब मेरी राजनीतिक चेतना का विकास हुआ. स्नातक के अंतिम वर्ष में मैंने कई सारे ऐसे देशी-विदेशी क्रांतिकारियों के बारे में जाना, जिन्होंने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाकर सच के हक़ में लड़ाई लड़ी. उनमें से कई कामयाब हुए तो कई नाकामयाब. इनमें से ही एक थे- गणेश शंकर विद्यार्थी. उन्होंने अपने अखबार ‘प्रताप’ के संपादकीय में लिखा था कि सत्य का पक्ष लेना उनका आदर्श है और इस आदर्श की मृत्यु उनकी मृत्यु है. वहीं कार्ल मार्क्स का कहना था कि एक लेखक और पत्रकार को उतना ही कमाना चाहिए जितने में वह जीवित रहकर अपना काम करता रहे, उसे कभी भी कमाने के लिए लिखना और जीवित नहीं रहना चाहिए. इन सब चीजों ने मुझे पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया था. मैंने जाना कि सत्य, न्याय और समानता केवल कुछ शब्द नहीं हैं. ये नजरिए हैं और पत्रकारिता का काम इनका विस्तार करना है. कुल-मिलाकर मैं चाहता था कि जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी इस क्षेत्र में कदम रखा जाए और पूरी ईमानदारी से समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया जाए.

इस साल के मार्च के अंतिम सप्ताह में संस्थान में प्लेसमेंट्स का मेला लगा था. मुझे जो कंपनी ले गई, वो अप्रैल के पहले सप्ताह में आई थी. इस कंपनी का नाम रोर है. इसका मुख्यालय श्रीलंका में है. मुस्तफा कासिम इसके प्रमुख कार्यकारी अधिकारी हैं. इसने कई देशों में अपने छोटे-छोटे उपक्रम चला रखे हैं. उनमें से ही एक है- रोर हिंदी. रोर हिंदी को मैंने बतौर ‘स्टाफ राइटर’ 11 मई, 2018 में ज्वाइन किया. साक्षात्कार में जो बातें हुईं, उनसे यह साफ़ था कि रोर हिंदी अभी खुद को स्थापित करना चाहती है इसलिए नए प्रयोग करने और लेखन के लिए मनचाही तो नहीं लेकिन ठीक-ठाक छूट देने के लिए तैयार थी. मैं भी खुश था कि करियर के शुरूआती दौर में ऐसा मौका मिल रहा है, जोकि कई बड़े मीडिया संस्थानों में नहीं मिलता है. नौकरी लगने के बाद मैंने अपनी एक प्रोफ़ेसर से इस बारे में बात की थी, उन्होंने भी इस पर अपनी ख़ुशी जाहिर की थी.

बहरहाल, जब कार्यालय में मेरे दिन गुज़रे, तब मुझे पता चला कि रोर हिंदी के संपादक मिथिलेश कुमार सिंह एक राजनीतिक विचारधारा को मानने वाले हैं. मुझे यह बात बिल्कुल भी अटपटी नहीं लगी क्योंकि राजनीतिक रूप से मैं भी एक विचारधारा की तरफ झुका हुआ हूँ और एक लोकतंत्र में सबको ऐसा करने का पूरा हक़ है. खैर, समय आगे बढ़ा तो संपादक ने बार-बार मुझसे कहा कि रोर हिंदी एक पूर्णतया निष्पक्ष प्लेटफार्म है, इसलिए मुझे अपनी राजनीतिक विचारधारा को एक तरफ रखकर ही काम करना चाहिए. मैंने भी उनसे कहा कि मैं जो कुछ भी लिखता हूँ और लिखूंगा, उसमें तथ्यों और तर्कों की कोई कमी नहीं होगी.

समय आगे बढ़ा तो मेरे और संपादक के बीच कई विषयों पर घंटों लंबी बहसें होने लगीं. मुझे याद है कि इस बीच कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन के ऊपर संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट आई थी और इस मामले के ऊपर एक वैचारिक लेख लिखने का काम मुझे सौंपा गया था. इस लेख को हिन्दू राष्ट्रवादी नजरिये से लिखे जाने की हिदायत मुझे दी गई थी क्योंकि मेरे संपादक का मानना था कि कश्मीर में रहने वाले मुसलमानों के दिलों में पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति होती है. मैंने घंटों बहस करके उन्हें इस बात पर सहमत करवाया था कि मैं इस नजरिए से लेख नहीं लिख सकता हूँ क्योंकि कश्मीर का इतिहास और उससे जुड़े तथ्य अलग कहानी बयाँ करते हैं. इस घटना के बाद से संपादक ने मुझसे ऐसे लेख लिखने लगभग बंद करवा दिए. इसके बाद मेरे जिम्मे साहित्यकारों, राजनीतिज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं इत्यादि के जन्मदिन और स्मृति दिवसों पर विशेष आलेख तैयार करने का काम आया. मैं इसे पाकर भी खुश था.

वेबसाइट पर लिखने के साथ ही मैं सोशल मीडिया पर भी लिखता रहा. मैं फेसबुक पर अति सक्रिय उपयोगकर्ताओं की श्रेणी में आता हूँ और नौकरी लगने से पहले भी लिखता रहता था. मेरी जितनी समझ बनी है, उसके हिसाब से मैं विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय यहाँ रखता रहता हूँ. ज्यादातर मेरी कोशिश यही रहती है कि एक प्रगतिशील नज़रिए से मुद्दों का हल निकाला जाए.

नौकरी के दौरान कई बार मुझे मेरे संपादक ने फेसबुक पर लिखने से रोका. उनका मानना था कि रोर हिंदी से जुड़े रहते हुए मुझे सोशल मीडिया पर किसी खास विचारधारा को बढ़ावा नहीं देना चाहिए. जबकि वे खुद दक्षिणपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले अपने लेखों, विचारों और कार्यक्रमों  को अपनी वाल पर जगह देते थे. इस वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर वेबसाइट पर उन्होंने एक संपादकीय लेख शेयर किया था. यह पूरी तरह से ‘हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान’ के रंग में डूबा हुआ था. मैंने उनसे हमेशा कहा कि एक मनुष्य के रूप में सबके पास अपने विचार रखने का पूरा हक़ है. आप भी रखते हैं और मैं भी रखता हूँ. इस पर वे बोलते कि तुम ज्यादा खुलकर रखते हो, यह सही नहीं है.

इस पूरी जद्दोजहद के बीच समय कटता रहा. मैं एक तरफ वेबसाइट पर अपना काम पूरी ईमानदारी से करता रहा और दूसरी तरफ फेसबुक पर भी लिखता रहा. इस बीच 17 सितम्बर के दिन मेरे पास ऑफिस से मेल आया. उस दिन मैं छुट्टी पर था. यह मेरी अब तक की पहली छुट्टी थी. मेल में मुझे अर्जेंट नोटिस भेजा गया था. इस नोटिस में मेरे ऊपर ‘ओपेन पोलिटिकल एक्टिविज्म’ करने का आरोप लगाया गया और कहा गया कि सात दिनों के भीतर मुझे यह साफ़ करते हुए जवाब भेजना होगा कि आखिर मुझे नौकरी से क्यों न निकाला जाए!

मैंने ज्यादा देर न करते हुए अगले कुछ ही घंटों में जवाब भेज दिया. अपने जवाब में मैंने लिखा कि सोशल मीडिया मेरा व्यक्तिगत स्पेस है और जो मैं वहां लिखता हूँ उससे मेरे पेशेवर जीवन का कोई लेना-देना नहीं है. इसके अलावा कंपनी की कोई लिखित सोशल मीडिया नीतियां भी नहीं हैं. कॉन्ट्रैक्ट और कोड ऑफ़ कंडक्ट में भी ऐसा कहीं नहीं लिखा है. मैंने यह भी लिखा कि अगर कंपनी चाहे तो मैं अपने सोशल मीडिया अकाउंट से उसका नाम हटा सकता हूँ.

 

 

 

मेरे जवाब के बाद मुझे मेल आया कि 24 सितंबर को कंपनी कार्रवाई करेगी. फिर 24 सितंबर आया और संपादक ने मुझे अपने केबिन में बुलाया. उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैं माफ़ी मांग लूँ और सोशल मीडिया पर मौजूद अपनी सभी पुरानी पोस्ट डिलीट कर दूँ तो कंपनी मुझे नौकरी से नहीं निकालेगी. मैंने ऐसा करने से मना कर दिया, तो संपादक महोदय ने कहा कि वे मुझे 15 दिनों का नोटिस पीरियड देंगे, ताकि मैं कोई नई नौकरी खोज लूं. इस पर मैंने कहा कि मैं अभी परिवीक्षा अवधि में हूँ और कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार या तो कंपनी या फिर मैं एक दिन का नोटिस पीरियड देकर सेवाएँ रद्द कर सकते हैं.

आगे 28 सितंबर के दिन संपादक ने मुझे मेल किया. उसमें लिखा था कि काफी मनन करने के बाद कंपनी ने यह फैसला लिया है कि वह मेरी सेवाएं रद्द कर रही है और मुझे अब काम पर आने की जरूरत नहीं है. मैंने भी मेल करके कंपनी को उसके सुनहरे भविष्य के लिए शुभकामनाएं भेज दीं और अपना बैग लेकर घर चला आया. अभी तक इस महीने की तनख्वाह मुझे नहीं मिली है. संपादक ने जल्द ही तनख्वाह भेजने का वादा मुझसे किया है.


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