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बिना DG के डूब रहे हैं आकाशवाणी, DD और IIMC लेकिन I&B मंत्री को फुरसत नहीं!

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सूचना और प्रसारण मंत्रालय में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भले ही इन दिनों ज्यादा व्यस्त नजर आते हों, लेकिन उनके मातहत विभागों और मीडिया इकाइयों में चलताऊ रवैया अख्तियार कर रखा है, उससे लगता है कि जावड़ेकर को बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले सूचना और प्रसारण मंत्रालय को देखने की फुरसत नहीं है।

बेशक दूरदर्शन और आकाशवाणी पर प्रसार भारती का नियंत्रण है लेकिन हकीकत यही है कि यहां के लिए महानिदेशकों का चयन मंत्रालय ही करता है। दूरदर्शन और आकाशवाणी के साथ ही पत्रकारिता का मक्का-मदीना समझे जाने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान में महीनों से महानिदेशक का पद खाली है। भारतीय जनसंचार संस्थान के विवादास्पद महानिदेशक रहे वरिष्ठ पत्रकार केजी सुरेश का कार्यकाल मार्च 2019 में ही खत्म हो गया था, तब से इस महत्वपूर्ण संस्थान का महानिदेशक का पद खाली पड़ा है। कभी रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स ऑफ इंडिया के महानिदेशक के पास इस महत्वपूर्ण संस्थान के महानिदेशक का प्रभार रहा। इन दिनों प्रेस इन्फार्मेशन ब्यूरो के प्रधान महानिदेशक के पास इसका प्रभार है। इसकी वजह से यहां एक तरह से मनमानापन चल रहा है। बताया जा रहा है कि पूर्णकालिक महानिदेशक न होने की वजह से इस संस्थान में मंत्रालय के ही अधिकारियों की चल रही है। इससे यहां की शिक्षा की गुणवत्ता और सूचना सेवा के अधिकारियों की ट्रेनिंग प्रभावित हो रही है।

दूरदर्शन के महानिदेशक के पद पर अरसे से भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का कब्जा रहा है। प्रशासनिक सेवा की अधिकारी सुप्रिया साहू 31 अक्टूबर तक दूरदर्शन की महानिदेशक थीं। उनका कार्यकाल खत्म हो गया, लेकिन अब तक यहां नया महानिदेशक नियुक्त नहीं किया गया है। इसी तरह आकाशवाणी के महानिदेशक फैय्याज शहरयार 31 दिसंबर को रिटायर हो गए। दूरदर्शन और आकाशवाणी के कैडर नियंत्रण का अधिकार आकाशवाणी महानिदेशालय के पास है लेकिन पूर्णकालिक महानिदेशक न होने की वजह से यहां कामकाज में दिक्कतें आ रही है। यहां के एक अधिकारी कहते हैं कि इन दिनों ये दोनों ही महत्वपूर्ण संस्थान मुखियाविहीन हैं।

आकाशवाणी और दूरदर्शन के सूत्रों का कहना है कि प्रसार भारती बोर्ड या सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने दोनों ही महत्वपूर्ण संस्थानों के महानिदेशकों की नियुक्ति में दिलचस्पी नहीं दिखाई है। इसकी वजह से यहां डेपुटेशन पर आए अधिकारियों की बन आई है। दोनों ही संस्थान बुनियादी रूप से प्रोग्राम आधारित हैं लेकिन यहां कमान सचिवालय सेवा या इंजीनियरिंग सेवा के अधिकारियों के हाथ में है। इसे लेकर प्रोग्रामिंग कैडर में खासा रोष व्याप्त है।

आकाशवाणी स्टाफ एसोसिएशन के एक पदाधिकारी का कहना है कि अगर जल्द ही प्रोग्रामिंग जानने वाले अधिकारियों की यहां महानिदेशक के तौर पर नियुक्ति नहीं हुई तो भारत की आवाज कहे जाने वाले इन संस्थानों का डूबना तय है। उनका कहना है कि अंदरूनी रूप से पत्र लिखकर उन्होंने प्रधानमंत्री और सूचना एवं प्रसारण मंत्री से इस बारे में दखल देने की मांग की है। अन्यथा भारतीय इतिहास की इन गौरवपूर्ण संस्थाओं को डूबने से कोई रोक नहीं सकेगा।

वैसे प्रसार भारती बोर्ड में भी अंशकालिक छह सदस्य और पूर्णकालिक सदस्य कार्मिक का पद भी बरसों से खाली है। इस वजह से प्रसार भारती बोर्ड भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है। हाल ही मे एक याचिका की सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने बोर्ड को भर्ती नियम बनाने को कहा है लेकिन प्रसार भारती बोर्ड में कार्मिक सदस्य ना होने की वजह से इस काम को अभी तक कायदे से शुरू ही नहीं किया जा सका है।

दूसरी तरफ आकाशवाणी समाचार में धड़ाधड़ यू ट्यूब और एफएम चैनल पर कार्यक्रम शुरू किये जा रहे हैं लेकिन इसके लिए जरूरी तैयारी और स्टाफ की भारी कमी है। इस वजह से कार्यक्रमों में गुणवत्ता नहीं आ रही है। आकाशवाणी समाचार के एक सूत्र का कहना है कि आकाशवाणी की प्रधान महानिदेशक ईरा जोशी को मंत्रालय और प्रसार भारती से सुझाव भी मिलता है तो उसे तत्काल लागू करने की तैयारी में जुट जाती हैं। लेकिन ऐसा करते वक्त वे भूल जाती हैं कि प्रोग्राम बनाना और उसकी सही समय पर गुणवत्तायुक्त डिलीवरी रिसर्च और जरूरी तैयारियों के बाद आती है।

चूंकि आनन-फानन में प्रोग्राम लागू किए जा रहे हैं, इससे खासकर ठेके पर काम कर रहे लोगों को ज्यादा परेशानी हो रही है। पूर्णकालिक और नियमित कर्मचारी इन कामों को पूरा करने से कन्नी काट लेते हैं। इसे लेकर आकाशवाणी समाचार में भी खासा रोष बताया जा रहा है।

1 COMMENT

  1. डॉक्टर करुणा शंकर दुबे

    ठेकेदार को संगीत और ऊर्दू कार्यक्रम ही नहीं देश के अनेक भाषा बोली को लुप्त होने का खतरा आने का इंतजार है ।जिसके विशेषज्ञ उन्हीं आकाशवाणी केन्द्र पर कार्यक्रम बनाते है । अब सभी कुछ नष्ट हो रहा है । जनजातीय संस्कृति को कौन रखेगा ।आकाशवाणी के सिवा किसी ने कुछ नहीं किया ।वह प्रयास अब कठिन दौर से गुजर रहा है ।

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