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चुनाव आयोग ने राजस्व सचिव को सख्त पत्र लिखा है! आपके अखबार ने बताया?

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आचार संहिता लागू होने के दौरान इतवार को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबियों और पिछले दिनों कर्नाटक, तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश में आयकर छापों और उस पर मचे शोर के मद्देनजर चुनाव आयोग ने राजस्व सचिव को पत्र लिखकर कहा था कि चुनाव के दौरान सभी एजेंसियों की कार्रवाई निष्पक्ष होनी चाहिए। सलाह दी गई थी कि चुनाव के दौरान प्रवर्तन एजेंसियों की कोई भी कार्रवाई निष्पक्ष और भेदभाव रहित हो। आयोग ने यह भी कहा था कि ऐसी किसी भी कार्रवाई के बारे में चुनाव आयोग के अधिकारियों को सूचित किया जाए। इसपर राजस्व विभाग ने चुनाव आयोग को लिखा कि आयकर छापों के संबंध में पूर्व सूचना (चुनाव आयोग को) नहीं दी जा सकती है। पत्र में यह भी कहा गया था कि उसका मकसद आगामी चुनाव में गलत उपयोग किए जा सकने वाले अवैध धन का पता लगाना है। जाहिर है आयोग इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ था। इसके बाद राजस्व सचिव अजय भूषण पांडे और सीबीडीटी के चेयरमैन प्रमोद चंद मोदी (ये एमओडीवाई हैं एमवोडीआई नहीं, पर हिन्दी में फर्क नहीं पड़ता) की चुनाव आयुक्त के साथ मंगलवार को बैठक हुई। इस बीच ये आरोप चलते रहे कि आयकर के छापे राजनीति से प्रेरित हैं और भाजपा सरकार के इशारे पर मारे जा रहे हैं। इसके साथ यह आरोप भी चल रहा था कि चुनाव आयोग कमजोर है और कई मामलों में आवश्यक कार्रवाई नहीं की या औपचारिक कार्रवाई की। उसपर पूर्व नौकरशाहों के पत्र का दबाव है। अब राजस्व सचिव के नाम लिखे पत्र में चुनाव आयोग ने राजस्व विभाग के रुख पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है।

अंग्रेजी में लिखे इस पत्र में कहा गया है, “एक संवैधानिक संस्था को संबोधित करने के लिए जिस भाषा और लहजे का प्रयोग किया गया है वह पूरी तरह से स्थापित प्रोटोकॉल के खिलाफ है। आयोग बेहद नाखुशी के साथ इसे संज्ञान में ले रहा है। आयोग राजस्व विभाग की अनुचित प्रतिक्रिया की निंदा करता है और उम्मीद करता है कि सात अप्रैल को आयोग की ओर से जारी किए गए निर्देश को सही ढंग से सही भावना के साथ लागू किया जाएगा।” आयोग ने अपनी नाराजगी कड़े शब्दों में जताई है और लिखा है, “चुनाव आयोग की निष्पक्ष, बिना किसी भेदभाव के और पक्षपाती हुए बिना कार्रवाई की सलाह का विभाग ने जिस लापरवाही और हल्के अंदाज में जवाब दिया है उससे आयोग कतई खुश नहीं है। आयोग की तरफ से दिए गए निर्देशों का सही तरीके से पालन करने के उपायों का विवरण देने की बजाय विभाग ने दूसरी एडवाइजरी ही जारी कर दी है।” द टेलीग्राफ में छपी एक खबर के अनुसार राजस्व विभाग ने चुनाव आयोग को भेजे अपने जवाब में लिखा है, ‘‘ हम ‘तटस्थ, पक्षपातहीन और गैर – भेदभावपूर्ण’ शब्दों का अर्थ समझते हैं। इसका मतलब है कि हमें जब कभी किसी के खिलाफ सूचना मिले, हम उसके खिलाफ कार्रवाई करें, चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल से क्यों न संबंधित हो। विभाग इसी विचार पर काम करता रहा है और आगे भी करता रहेगा।” यही नहीं, पता चला है कि विभाग ने अपने पत्र में चुनाव आयोग को यह निर्देश दे डाला कि वह अपने क्षेत्रीय अधिकारियों से कहे कि जब भी उन्हें चुनावी प्रक्रिया में अवैध धन के उपयोग के बारे में सूचना मिले, वे तत्काल कार्रवाई करे।

पत्र में कहा गया है, ‘‘चुनाव आयोग के साथ राजस्व एजेंसियों की जवाबदेही है कि चुनाव में काले धन का उपयोग रुके। ऐसे में हम चुनाव आयोग से यह आग्रह करेंगे कि वह आचार संहिता लागू करने में लगे अपने क्षेत्र में कार्यरत अधिकारियों को यह सलाह दे कि जब भी उन्हें चुनावी प्रक्रिया में अवैध धन के उपयोग के बारे में कोई सूचना मिले, वे चुनाव और उपयुक्त कानून के तहत अपने स्तर से तत्काल कार्रवाई करें।” navbharattimes.indiatimes.com की एक खबर के अनुसार उन्होंने लिखा है, ‘‘अगर जरूरी लगे तो वे इसकी सूचना गोपनीय रूप से आयकर विभाग को आगे की कार्रवाई के लिये दे सकते हैं। आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और राजस्व खुफिया निदेशालय वित्तीय अपराधों से निपटने को लेकर राजस्व विभाग की कार्यकारी इकाइयां हैं। वित्त मंत्रालय के अधीन आने वाली एजेंसियों ने हाल के दिनों में 55 छापे मारे हैं। सूत्र बताते हैं कि यही बात आयोग को नागवार गुजर गई।” इस पूरे मामले को इस तथ्य के साथ देखिए कि 2014 के चुनाव के लिए दाखिल राहुल गांधी के शपथ पत्र की जानकारी के आधार पर केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 23 मार्च को राहुल गांधी से पूछा था कि उनकी आय 2004 में 55,38,123 रुपए से 2014 में नौ करोड़ रुपए कैसे हो गई। इस बारे में मैंने लिखा था, “कल अमित शाह ने 2019 के चुनाव के लिए पर्चा भरा। इसमें उनकी पत्नी की आय कितनी बढ़ी उसकी खबर आज आई है। आप शीर्षक और शुरुआती जानकारी देखिए, चाहें तो लिंक पर जाकर पूरी खबर पढ़ सकते हैं। लेकिन क्या आपको भाजपा और कांग्रेस में शोर मचाने के अलावा कुछ अंतर नजर आता है?

भाजपा नेता राहुल से पांच साल बाद सवाल पूछते हैं? वह खूब छपता है? पर अमित शाह से सवाल नहीं पूछे जाते। वैसी ही सूचना के ताजे मामले में हर ओर चुप्पी है। बाद में यही आरोप केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लगाए और फिर राहुल गांधी से सवाल पूछा। livehindustan.com के अनुसार वित्त मंत्री ने इस संबंध में अपने ब्लॉग में भी विस्तार से लिखा है। इससे पहले अरुण जेटली ने पार्टी मुख्यालय पर संवाददाताओं से कहा था कि पिछले कुछ दिनों में कुछ मीडिया संगठनों ने कांग्रेस अध्यक्ष के बारे में कुछ जानकारियां सार्वजनिक की हैं। ”मैंने खुद इनका अध्ययन किया है और यह जरूरी हो जाता है कि इस संबंध में विश्लेषण को सार्वजनिक किया जाये। इस व्यक्ति (राहुल गांधी) ने अपने जीवन में कभी कोई कामधंधा नहीं किया। लेकिन वह आलीशान जिंदगी जी रहा है और देश विदेश में छुट्टियां मनाता है।” यह दिलचस्प है कि वित्त मंत्री आर्थिक अपराध के मामलों का अध्ययन करने के लिए मीडिया के आरोपों का सहारा ले रहा है ना सरकार के पास (या सार्वजनिक रूप से) उपलब्ध सूचनाओं का सहारा ले रहा है ना किसी अधिकारी को लगा रहा है बल्कि मीडिया के आरोपों को दोहरा रहा है। कायदे से मंत्री को इनका खंडन करना चाहिए या पुष्टि। अखबारों को भी मंत्री से ऐसी ही करने के लिए कहना चाहिए। मंत्री आरोपों को दोहराएं इसका कोई मतलब नहीं है। इसके बावजूद जेटली ने कहा कि इस परिवार के पास दक्षिण दिल्ली में एक फार्म हाउस है और इसका स्वामित्व इस समय परिवार की मौजूदा पीढ़ी के भाई, बहन के पास है।

जेटली ने दोनों पर विभिन्न व्यावसायियों के साथ गुपचुप सौदे करने का आरोप लगाते हुये कहा, ”समय समय पर ऐसे लोगों को किरायेदार बनाया जाता रहा है जिन्हें उस समय केन्द्र की सत्ता में रही कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार की मदद की जरूरत थी। किरायेदार रहे ऐसे लोगों में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति एफटीआईएल के जिग्नेश शाह और यूनिटेक बिल्डर के संजय चंद्रा रहे हैं।” यह आरोप कोई और लगाता तो बात समझ में आती वित्तमंत्री लगाए , चुनाव से पहले तो बदनाम करने की कोशिश के अलावा क्या कहा जाए। आप जानते हैं कि भाजपा की रणनीति अपनी तारीफ करके छवि बनाने के साथ प्रमुख विपक्षी की छवि खराब करने की है। दूसरी ओर, चौकीदार चोर है के आरोप से घबराई भाजपा के पास राहुल गांधी के खिलाफ कोई आरोप नहीं है (पिछले बेकार थे यह साबित हो चुका है) और वे गंभीरता से आरोप लगाने में लगे हुए हैं और अभी तक मिली नाकामी से परेशान हैं जो नेताओं के भिन्न आचरण से प्रतीत हो रहा है। इसमें अजीत अंजुम से रविशंकर प्रसाद का बातचीत बीच में छोड़कर उठ जाना और अब चुनाव आयोग को ऐसा पत्र तथा प्रधानमंत्री द्वारा एबीपी की ओर इंटरव्यू करने वालों को इस बात के लिए हड़काना कि आपने वित्त मंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में लगाए आरोपों को नहीं दिखाया – साफ बताता है कि घबराहट ज्यादा है और यह सिर्फ हार की सूचना नहीं है। उससे ज्यादा है।

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