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EVM पर विपक्ष फिर सुप्रीम कोर्ट जाएगा, इस खबर से भाजपा क्‍यों घबरायी हुई है?

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आज के अखबारों में ईवीएम पर विपक्षी नेताओं की बैठक और सुप्रीम कोर्ट जाने के निर्णय की खबर आमतौर पर प्रमुखता से है। मेरा मानना है कि ईवीएम से छेड़छाड़ न हो यह सुनिश्चित करना सबका काम है। इसलिए सबको सतर्क रहने की जरूरत है और जो भी सवाल उठाए जाएं उसपर विचार होना चाहिए उसका संतोषजनक जवाब मिलना चाहिए। ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कुछ हो नहीं रहा है – वीवीपैट लगना, मतदाताओं को पर्ची दिखाई देना और प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के पांच बूथ की मत पर्चियों के मिलान के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश इस दिशा में हुई प्रगति है। इससे लगता है कि ईवीएम पर सवाल उठाते रहना चाहिए जब तक संतोषजनक सुधार हो न जाएं।

इस लिहाज से भाजपा का रवैया चौंकाने वाला है। यह संभव है कि उसे ईवीएम से कोई एतराज नहीं हो पर कोई खास लाभ नहीं है तो ईवीएम पर उठने वाले हर सवाल का जवाब देने की क्या जरूरत है। ईवीएम के हर विरोधी और हर विरोध की विरोध क्यों करना? जिसे शिकायत है वह संबंधित संवैधानिक संस्थान से अपनी बात कह रहा है और उस संस्थान (चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट) का काम है कि शिकायत में दम लगे तो उसपर कार्रवाई करे। कार्रवाई होने का मतलब है कि शिकायत में दम है पर भाजपा वाले हमेशा ऐसे मामलों में कूद पड़ते हैं और आज भी भाजपा की प्रतिक्रिया ऐसी ही है। पर अखबारों ने ली और छापी क्यों? प्रतिक्रिया तो ईवीएम बनाने वाली कंपनी की होनी चाहिए थी या किसी कानून के जानकार की – जो बताता कि सुप्रीम कोर्ट जाने का क्या मतलब है?

दैनिक हिन्दुस्तान के मुताबिक, भाजपा ने विपक्षी दलों की बैठक को लोकसभा चुनाव में भारी हार के बहाने खोजने की कवायद बताया। पार्टी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने दावा किया है कि विपक्षी गठबंधन मिथ्या है, क्योंकि वे अलग-अलग लड़ रहे हैं। यह बैठक हार की स्वीकारोक्ति है। लोग इस नकारात्मक विपक्ष को बड़ा झटका देने वाले हैं। इसके आगे, राजस्थान पत्रिका के मुताबिक, विपक्षी दलों को हार का डर सता रहा है इसलिए वे ईवीएम का मुद्दा उठा रहे हैं। दिल्ली में जो विपक्षी दलों की बैठक हुई है उससे साफ जाहिर होता है कि उनके पास कोई एजंडा नहीं है और न ही कोई लीडरशिप है। इसलिए अब वे ईवीएम पर सवाल उठा रहे हैं।

यह ईवीएम के विरोध का विरोध नहीं है। ईवीएम के मामले में इसमें कुछ कहा ही नहीं गया है। ईवीएम से छेड़छाड़ सत्ता में आने से पहले भाजपा का प्रमुख मुद्दा रहा है और ईवीएम विरोध का विरोध करने के लिए लगा दिए गए जीवीएल अगर ईवीएम के पक्ष में या विरोध करने वालों के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं तो शायद इसलिए भी कि वे एक किताब ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?’ के लेखक हैं। यह विडंबना ही है कि ईवीएम की खामियों पर जो किताब लिख चुका है वह आज ईवीएम के विरोध का विरोध कर रहा है।

भाजपा के विरोध में यह बात जरूर रहती है कि विपक्ष हार रहा है। इसलिए ईवीएम का मुद्दा उठा रहा है। यह बात आधिकारिक तौर पर कही जाती है छुटभैये समर्थक भी कहते हैं। दिल्ली, पंजाब और हाल में तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत पर कहा गया कि यह ईवीएम के बावजूद हुआ है। और कल की बैठक उस जीत के बाद ही है लेकिन उसे जोड़ दिया गया कि पहले दौर के मतदान के बाद हार की आशंका से ईवीएम का मुद्दा उठाया जा रहा है।

जागरण डाट काम की एक खबर के अनुसार, दिल्ली विधानसभा में हार के बाद आम आदमी पार्टी ने ईवीएम पर आरोप लगाया था तब जागरण ने इस बारे में जीवीएल नरसिम्हा राव से बात की थी। “जीवीएल ने बताया कि उनकी किताब उनका व्यक्तिगत अकादमिक काम है, इसका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है। इसके जरिए उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में सुधार के लिए कोशिश की। उन्होने कहा, ‘हमारी इस कोशिश का ही असर है कि आज ईवीएम की तकनीक में इतना इजाफा हुआ है। इसे और ज्यादा सुरक्षित करने के लिए कदम उठाए गए हैं। पेपर ट्रेल भी हमारी कोशिश का नतीजा है। जो लोग आज ईवीएम गड़बड़ी की बात उठाकर इसके पीछे अपनी हार को छिपाना चाहते हैं वे खुद को धोखा दे रहे हैं और कुछ नहीं।’

इससे जीवीएल पेपर ट्रेल का श्रेय लेते लग रहे हैं पर अभी वह मुद्दा नहीं है। पेपर ट्रेल का मतलब तभी है जब इसकी पूरी गिनती हो चुनाव घोषणा के बाद पेपर ट्रेल तो रद्दी ही हो जाने हैं और जीत घोषित होने के बाद पेपर ट्रेल का क्या मतलब? और भाजपा इसका बचाव क्यों कर रही है? एक ही बहाना है – समय लगेगा। पर जब चुनाव सात चरण में हो सकते हैं तो गिनती क्यों नहीं? जहां मतदान हो गए उनकी गिनती करते रहने में क्या दिक्कत है। नतीजे हमेशा गोपनीय रखे जा सकते हैं। इस मामले में चंद्रबाबू नायडू का कहना सही है कि हम प्रौद्योगिकी के मास्टर हो सकते हैं ना कि इसके गुलाम।

इस मामले का एक पहलू यह भी है कि चंद्रबाबू नायडू के साथ चुनाव आयोग गए लोगों में एक हरि प्रसाद भी हैं। हरि प्रसाद तकनीकी जानकार हैं और ईवीएम हैक करके दिखाने की चुनौती स्वीकार कर चुके हैं। उन्होंने जिस मशीन पर काम किया था वह उन्हें अधिकृत रूप से नहीं दी गई थी इसलिए उनपर ईवीएम चोरी का आरोप लगा और उन्हें काफी परेशान होना पड़ा था। आयोग ने उन्हें साथ ले जाने पर एतराज किया है और उन्हें आपराधिक पृष्ठभूमि का बताया है।

इस संबंध में एक छोटी खबर अमर उजाला में मूल खबर के साथ है। उन्हें ईवीएम चोर लिखा गया है। दैनिक जागरण के संपाकीय में भी इसकी चर्चा है। पर हरिप्रसाद कौन हैं और उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि क्या है इसकी कोई चर्चा नहीं है। तथ्य यह है कि अपराधी ठहराकर परेशान किए जाने के कारण ही कुछ साल पहले चुनाव आयोग ने ईवीएम हैक करके दिखाने की चुनौती दी थी तो हरि प्रसाद ने उसमें हिस्सा नहीं लिया था (तब इस बारे में खबरें छपी थीं)। आम आदमी पार्टी ने एक ईवीएम जैसी मशीन से छेड़छाड़ का प्रदर्शन विधानसभा में किया था।

इसके बावजूद भाजपा और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पूरा तथ्य बताने की बजाय यह साबित करने में लगा है कि मशीन हैक नहीं की जा सकती है। हरिप्रसाद को ‘ईवीएम चोर’ कहा जा रहा है। कायदे से उनकी जानकारी और सुविज्ञता का लाभ उठाना चाहिए। जो हैक कर सकता है वही बता सकता है कि हैक न किया जा सके उसके लिए क्या करना होगा। हरिप्रसाद चंद्र बाबू नायडू के साथ आए – यह बड़ी बात थी पर चुनाव आयोग ने मौका हाथ से निकल जाने दिया और मीडिया ने सही खबर दी ही नहीं।

दैनिक जागरण में आज यह खबर लीड है। शीर्षक है, “ईवीएम को लेकर विपक्षी दलों के नेताओं की फिर मोर्चाबंदी”। उपशीर्षक है, “50 फीसद पर्चियों के मिलान की मांग को लेकर दोबारा जाएंगे सुप्रीम कोर्ट”। अखबार ने भी इसके साथ भाजपा की प्रतिक्रिया छापी है, विपक्ष को हार का डर है। इसके साथ एक और छोटी खबर है जिसका शीर्षक है, ‘अनदेखी’ पर चुप नहीं बैठेगा विपक्ष। इसके मुताबिक कांग्रेसी नेता और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पहले चरण के मतदान के बाद सवाल उठे हैं और हम नहीं मानते कि चुनाव आयोग पर्याप्त ध्यान दे रहा है। जागरण में आज इसपर संपादकीय है, ईवीएम विरोधी विलाप।

इसमें कहा गया है, आधे-अधूरे तथ्यों और अफवाहों के आधार पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को संदिग्ध बताने का अभियान फिर से छिड़ जाने पर आश्चर्य नहीं। कुछ राजनीतिक दलों और ईवीएम के बैरी बन बैठे लोगों का यह पुराना शगल है। कभी-कभी लगता है कि कुछ लोगों ने ईवीएम को बदनाम करने का ठेका ले रखा है और शायद यही कारण है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से भी संतुष्ट नहीं होते। ईवीएम के खिलाफ ताजा पहल आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने की है। आंध्र प्रदेश में विधानसभा और लोकसभा के पहले चरण के लिए मतदान होते ही वह जिस तरह ईवीएम में गड़बड़ी का रोना रोते हुए दिल्ली दौड़े आए उससे तो यही लगता है कि उन्हें यह आभास हो गया है कि चुनाव नतीजे उनके मनमाफिक नहीं रहने वाले।

(मैं नहीं जानता ऐसा कैसे कहा जा सकता है। यह शिकायत मशीन में गड़बड़ी मिलने के कारण भी हो सकती है। इसके अलावा, तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव भी साथ-साथ हो रहे हैं। इसलिए उनकी चिन्ता दूनी होगी)। …. दुनिया की कोई भी मशीन खराब हो सकती और मतदान के दौरान ईवीएम में खराबी आने की समस्या का समाधान खोजने की जरूरत है, लेकिन इस जरूरत पर बल देने के बहाने मतपत्र से चुनाव कराने की मांग वैसी ही है जैसे ट्रेन दुर्घटना के बाद कोई बैलगाड़ी से यात्रा को आवश्यक बताए। (मेरे ख्याल से ऐसी मांग किसी ने नहीं की है। यह स्थापित करने की कोशिश चल रही है कि ईवीएम विरोध का यही मतलब है)।

यह समझ से परे है कि 21 राजनीतिक दल किस आधार पर 50 प्रतिशत मतदान पर्चियों का मिलान ईवीएम से करने की अपनी पुरानी मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाना चाह रहे हैं? क्या चंद दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश नहीं दिया कि हर विधानसभा के एक के बजाय पांच बूथ की मतदान पर्चियों का मिलान ईवीएम से किया जाए? राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए स्वतंत्र हैं, (इसीलिए जा रहे हैं, आप विलाप क्यों कह रहे हैं) लेकिन आखिर कुछ माह पहले ही तीन राज्यों में ईवीएम के सहारे जीत हासिल करने वाली कांग्रेस किस मुंह से उसके खिलाफ दलीलें दे रही है? (मेरे ख्याल से इसका कारण यह है कि कांग्रेस चुनाव की निष्पक्षता के प्रति ज्यादा गंभीर है)।

ईवीएम से छेडछाड़ हो सकती है इसका मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा किसी के पक्ष में हो या किसी के खिलाफ हो तभी गलत है। और तभी विरोध किया जाए। ईवीएम से सही नतीजे ही आने चाहिए।

2 COMMENTS

  1. ईवीएम पर भाजपा का आर्तनाद—चोर की दाढ़ी मे तिनका ।

  2. bevkoof tujhe kisne kah diya bjp ghabrayi hai..
    kangresi dalle peticoat patrakar. aisi khabare deta rah bjp all world me aa jayegi bhandwo…

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