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राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव में भी प्रधानमंत्री ने संसद में दिया चुनावी भाषण

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आज के अखबारों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के जवाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण मुख्य खबर है। भाषण में जो कहा गया वही शीर्षक और खबर है। उसपर आता हूं। उससे पहले, आपको याद दिलाऊं कि नए सांसदों के शपथग्रहण के दिन जय श्रीराम और दूसरे नारों की खबर किसी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं छापने का जो संयम संपादकों ने दिखाया था वैसा आज नहीं दिख रहा है। हालांकि, हिन्दुस्तान और राजस्थान पत्रिका ने उसमें से भी काम की खबर निकाल ली है। बाकी अखबारों में मोदी ने कांग्रेस को घेरा, मोदी ने किया पलटवार, राहुल पर कसा तंज आदि ही हैं। खास बात यही है कि जो नहीं कहा उसकी चर्चा ही नहीं है। होनी भी नहीं थी या कहिए कि इसकी उम्मीद भी नहीं थी।

धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा में कांग्रेस नेता अधीर चौधरी ने कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई हुई तो जो भ्रष्ट थे वे जेल में क्यों नहीं हैं, यहां क्यों हैं? जाहिर तौर पर इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यह इमरजेंसी नहीं है कि किसी को भी जेल में डाल दिया जाए यह लोकतंत्र है। यह काम न्यायपालिका का है। कल 25 जून को प्रधानमंत्री का यह कहना और अपने बचाव में यह तर्क देना चाहे उचित हो पर जो मुद्दा है उसे निश्चित रूप से घुमा दिया गया। दैनिक भास्कर के अनुसार, उन्होंने कहा, “हमें ताना दिया जा रहा है कि फलां को जेल में क्यों नहीं डाल दिया”। कहने की जरूरत नहीं है कि नाम चाहे नहीं लिया गया हो – पर बात किसी और की हो रही है और प्रधानमंत्री ने राहुल गांधी के जमानत पर होने पर जिक्र किया जो बिल्कुल अलग मामला है। 2014 से पहले प्रकाश में नहीं था। यही नहीं, सरकार लोगों को परेशान करती है, राजद्रोह के मामले बनाती है जो अदालत में नहीं टिकते हैं – ये सब किसी से छिपा नहीं है पर अखबार में ये सब कहां होना था।

यह संयोग ही है कि आज ही के टेलीग्राफ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक, जम्मू और कश्मीर पुलिस ने सोमवार को श्रीनगर के एक उर्दू अखबार, ‘डेली आफ़ाक़’ के प्रकाशक और संपादक, गुलाम जीलानी क़ादरी को आतंकवाद के 30 साल पुराने मामले में गिरफ्तार कर लिया। 62 साल के इस संपादक के खिलाफ कार्रवाई आधी रात में की गई। कश्मीर यूनियन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट समेत विभिन्न पत्रकार संगठनों ने संपादक की गिरफ्तारी को स्थानीय प्रेस की आवाज़ दबाने की कार्रवाई बताया है। क़ादरी कश्मीर एडिटर्स गिल्ड के सदस्य हैं। श्रीनगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने संपादक को मंगलवार को जमानत दे दी। इस मामले में अगली सुनवाई की तारीख़ 31 जुलाई तय की गई है। ठीक है कि इस मामले में जमानत मिल गई पर गिरफ्तार तो जम्मू कश्मीर पुलिस ने किया था औऱ जम्मू कश्मीर में इन दिनों राष्ट्रपति शासन है। आपको यह खबर कहीं दिखी?

द टेलीग्राफ में ही संजय के झा की एक अन्य खबर के अनुसार आम चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी और इसके लिए उसकी निन्दा भी हुई। कांग्रेस की प्रतिक्रिया संसद में प्रधानमंत्री के पहले भाषण के बाद आई। मंगलवार को पार्टी ने अपने आधिकारिक वेबसाइट पर एक संदेश पोस्ट किया (अंग्रेजी से अनुवाद मेरा), “भाजपा के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद एक महीने में घृणा से जुड़े 14 अपराध हुए हैं। सरकार को स्वीकार करना चाहिए कि घृणा से जुड़े अपराध काफी बढ़ गए हैं और उसे ऐसी बर्बरता से निपटने के लिए योजना पेश करनी चाहिए”। यही नहीं, आज के अखबारों में यह खबर भी है कि बच्चों की मौत के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। एक तो प्रधानमंत्री ने इन मौतों के बारे में कुछ कहा नहीं और संयोग ऐसा कि यह खबर आज ही है। जो जमीन दिखने और जड़ से जुड़े रहने के दावे से अलग है।

कांग्रेस नेता अधीर चौधरी ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने देश को यह संदेश नहीं दिया कि सांप्रदायिक हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी और महात्मागांधी के हत्यारे नाथू राम गोडसे की प्रशंसा करके किसी को भी राष्ट्रपिता का अपमान नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा, शांति के बिना कोई विकास नहीं हो पाएगा। प्रधानमंत्री को सामाजिक तनाव के इस मुद्दे से गंभीरता से निपटना चाहिए था और अपने समर्थकों से कहना चाहिए था कि वे समस्याएं न खड़ी करें। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री कल भी चुनावी मोड में ही लगे। और इसके लिए लोगों को भ्रमित करने वाली बातें की। अधीर चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री लोगों को भ्रमित करना जानते हैं पर वह चुनावी भाषणों में ही ठीक लगता है।

प्रधानमंत्री के भाषण का फोकस गंभीर मुद्दों पर होना चाहिए था। देश का आधा हिस्सा सूखे से जूझ रहा है। (पानी पर उन्होंने कहा भी पर वह शीर्षक में नहीं दिखा।) बिहार में डेढ़ सौ बच्चे मर गए पर कोई जिक्र नहीं है। नए वादे किए जा रहे हैं। यह नहीं बता रहे हैं कि नौकरियां कैसे मिलेंगी, किसानों की समस्याएं कैसे दूर होंगी। वे यह नहीं बताते कि ईरान से तेल खरीदने के बदले अमेरिका के दबावों के आगे क्यों झुकते जा रहे हैं। वैसे तो मोदी ने अपने भाषण में कहा कि कांग्रेस किसी और की तारीफ नहीं करती है और यह शीर्षक भी बना है पर अधीर चौधरी ने कहा कि उनके भाषण के कारण ही प्रधानमंत्री ने दूसरे नेताओं और अन्य पार्टियों की चर्चा की। उन्होंने कहा, कल मैंने हर चीज का श्रेय लेने की (उनकी) प्रवृत्ति और यह भ्रम फैलाने की निन्दा की थी कि 60 साल में कुछ नहीं हुआ। उन्होंने उस आरोप को नहीं दोहराया और उनकी शैली अलग थी।

कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री का भाषण चुनावी रैली के भाषण जैसा था और ज्यादातर अखबारों ने उसे वैसे ही छाप दिया है। कल 25 जून होने के कारण उन्होंने 39 साल पुराने आपातकाल और उसके कारणों की चर्चा की यह तो ठीक है पर ऐसा नहीं है कि अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं किया और चुनाव जीतने के लिए क्या नहीं किया यह सबको पता है। ऐसे में मेरा मानना है कि यह खबरों में होना चाहिए था। अब वे प्रधानमंत्री है और भाषण में शासन – प्रशासन के बारे में लगभग कुछ नहीं और निन्दा आलोचना की भरमार। कम से कम अपने काम ही गिनाए होते तो एक बात थी।

1. द टेलीग्राफ ने अपने मुख्य शीर्षक के साथ तीन खबरें छापी हैं जो तीन हिस्सों – हम क्या कहते हैं, करते हैं और देखते भी नहीं है – में बंटा हुआ है। क्या कहते हैं के विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह दूसरे अखबारों के शीर्षक से पता चल जाएगा। पर दूसरे में यह बताया गया है कि देश में मुसलमानों की स्थिति क्या है और कैसे वे डरे हुए हैं। इसके लिए हाफिज मोहम्मद शाहरुख नाम के 23 साल के युवक से बातचीत है जिसे जय श्री राम बोलने के लिए मजबूर किया गया था और कहा गया कि वह टोपी कुर्ता नहीं पहन सकता है और दाढ़ी नहीं रख सकता है। यह 20 जून की घटना है। उसे ट्रेन से बाहर कर दिया गया था। तीसरे कॉलम में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर पहली बार चुनी गई महुआ मोइत्रा का बयान है। उन्होंने देश में मौजूद सात खतरनाक संकेतों का जिक्र किया। अखबार ने इसे हम जो नहीं देखेंगे के तीसरे शीर्षक के तहत छापा है।

2. हिन्दुस्तान टाइम्स
मोदी ने कांग्रेस की निन्दा की, लोकसभा में सरकार का एजंडा प्रस्तुत किया। उपशीर्षक है, चुनाव जीतने के बाद का भाषण – प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों पर आम आदमी की उपक्षा का आरोप लगाया, इमरजेंसी उठा ले आए।
3. टाइम्स ऑफ इंडिया
जमानत का आनंद लीजिए, यह इमरजेंसी नहीं है मोदी ने गांधी परिवार से कहा। इंट्रो है, 1975 से अलग अदालतें तय करेंगी कि कौन जेल जाएगा (यह दावा भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने के दावों और ईडी, सीबीआईके दुरुपयोग के आरोपों के बाद किया गया है फिर भी इतनी प्रमुखता पा गया है)।
4. इंडियन एक्सप्रेस
कांग्रेस इतनी ऊंची चली गई कि जमीन नहीं देख पा रही है, जड़ें छूट गईं : प्रधानमंत्री सदन में
(कहने को प्रधानमंत्री ने कहा और एक्सप्रेस ने छाप भी दिया पर कोई बच्चा इसका मतलब पूछे तो क्या समझाया जाए। हवाई जहाज आसमान में होता है तो जमीन नहीं दिखती क्या उसे आसमान में नहीं जाना चाहिए। जड़ लेकर जाना चाहिए। यही नहीं, मां-पिता, परिवार, घर – सब छोड़कर नौकरी या राजनीति के लिए दिल्ली में रहना जड़ छोड़ना नहीं है? और ये जड़ से जुड़े रहना ही है तो किस काम का?)

5. दैनिक भास्कर
कांग्रेस खानदान के बाहर देखती नहीं, गांधी परिवार से बाहर तारीफ नहीं करती : मोदी
6. दैनिक जागरण
परिवार से बाहर नहीं गई कांग्रेस की सोच, उपशीर्षक, खरी-खरी : राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने किया पलटवार
7. अमर उजाला
कांग्रेस में एक परिवार को ही श्रेय, राव-मनमोहन तक को ही नहीं : मोदी, उपशीर्षक – राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान पीएम का नेहरू – गांधी परिवार पर हमला।
8. नवभारत टाइम्स
‘सत्ता के लिए कांग्रेस ने देश को बना दिया था जेलखाना’ उपशीर्षक – मोदी ने इमरजेंसी का जिक्र कर गांधी परिवार को लिया निशाने पर।
9. दैनिक हिन्दुस्तान
भ्रष्टाचार पर लड़ते रहेंगे : मोदी फ्लैग शीर्षक है, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री बोले, बदले की भावना से काम नहीं
10. नवोदय टाइम्स
आप इतने ऊपर चले गए कि जड़ों से उखड़ गए : मोदी
11. राजस्थान पत्रिका
चुनाव से आगे बढ़ें और समावेशी भारत के लिए हाथ मिलाएं : मोदी

अगर माना जाए कि प्रधानमंत्री ने जो कहा उसके सबसे खास अंश को ही शीर्षक बनाया गया होगा तो उपरोक्त शीर्षक देख लीजिए। ऊपर 11 अखबारों के शीर्षक से आप अनुमान लगा सकते हैं कि भाषण में क्या खास बातें थीं। ध्यान रखिए, यह चुनावी भाषण नहीं था कि पलटवार, धो दिया, तंज कसा जैसी प्रशंसा या विशेषणों का कोई मतलब नहीं है। आप देखेंगे कि प्रशासन और राजकाज चलाने से संबंधित शीर्षक दैनिक हिन्दुस्तान और राजस्थान पत्रिका ने ही लगाया है और अंग्रेजी अखबारों ने भी उनकी निन्दा और आलोचना वाली राजनीति को महत्व दिया है। हमेशा की तरह, द टेलीग्राफ आज भी अलग है। अखबार का मुख्य शीर्षक और मूल खबर इसी बात पर केंद्रित है कि प्रधानमंत्री ने जवाहर लाल नेहरू की तारीफ की उन्हें महापुरुष के रूप में पेश किया और क्यों। निश्चित रूप से यह प्रधानमंत्री के भाषण का एक खास अंश था और अटपटा लग रहा था। टेलीग्राफ ने इसे ढंग से प्रस्तुत किया है। नवभारत टाइम्स ने लिखा है, 65 मिनट के भाषण का अंत मोदी ने नेहरू के जिक्र से किया …. चुनाव में मोदी और बीजेपी ने नेहरू की तीखी आलोचना की थी कांग्रेस ने नेहरू के जिक्र को बड़ी जीत बताया है।

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