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कर्नाटक में सरकार क्यों नहीं बन रही, अखबार क्यों नहीं बता रहे?

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लगभग तीन हफ्ते से अखबारों में प्रमुखता से छप रहा कर्नाटक सरकार का मामला अखबारों के पहले पन्ने से लगभग गायब है। कांग्रेस जेडीएस की सरकार गिरने के बाद जो खबरें छपी हैं उससे तय है कि राज्य में भाजपा की ही सरकार बननी है फिर भी देरी हो रही है तो कोई खास कारण ही होगा। आइए, आज इसे समझने की कोशिश करते हैं और देखते हैं कि पहले पन्ने पर क्या है।

आप जानते हैं कि कुछ विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था और वे जल्दबाजी में थे कि इस्तीफे पर फैसला हो। इसके लिए वे सुप्रीम कोर्ट भी आए। फिर राज्य सरकार विधानसभा में विश्वासमत हासिल करने के लिए तैयार हो गई और राज्यपाल डेडलाइन देते रहे मामला नहीं निपटा। छह जुलाई को संकट में आई कर्नाटक की जनतादल एस और कांग्रेस की गठबंधन सरकार विधानसभा में विश्वासमत हासिल नहीं कर पाई और गिर गई। 23 जुलाई को सरकार गिरने के बाद 24 को दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के अनुसार, (सरकार गिरने से) प्रदेश भाजपा कार्यालय में जश्न का माहौल है।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बीएस येद्दयुरप्पा ने इसे लोकतंत्र की जीत करार दिया और कहा कि राज्य की जनता कुमारस्वामी सरकार से त्रस्त हो चुकी थी। वहीं, मुंबई में ठहरे गठबंधन के बागी विधायकों ने एलान किया है कि येद्दयुरप्पा के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद ही वे कर्नाटक लौटेंगे। यह सब इस तथ्य के बावजूद कि केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में 8 जुलाई को कहा था – “कर्नाटक में इस्तीफों से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।” यही नहीं, राहुल गांधी पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा था कि इस्तीफे देने की प्रवृत्ति कांग्रेस में राहुल गांधी द्वारा शुरू की गई थी, यह हमारे द्वारा शुरू नहीं किया गया था। उन्होंने खुद लोगों से इस्तीफे जमा करने के लिए कहा, यहां तक कि वरिष्ठ नेता भी इस्तीफे सौंप रहे हैं। द टेलीग्राफ में कल सरकार गिरने पर केक काटकर खुशी मनाते भाजपा नेताओं की तस्वीर छपी थी। कर्नाटक विधानसभा में सदस्यों की संख्या से भी साफ है कि राज्य में अगली सरकार भाजपा की ही बननी है। फिर देर क्यों? और खबर क्यों नहीं?

दलबदल कर राज्यों की सरकारें गिराने का मामला बहत पुराना है। राजनीति में शुचिता और ईमानदारी का दावा कर सत्ता में आई भाजपा से कुछ अलग की उम्मीद थी और वह गोवा में होता रहा है। बगैर किसी शोर-शराबे के बिल्कुल सफाई से। मनोहर पर्रिकर जैसे साफ-सुथरे और ईमानदार नेता के बावजूद। वे अब नहीं रहे फिर भी सरकार आराम से बदल गई और इसलिए खबर नहीं बनी। कर्नाटक में संकट रहा और मामला पहले पन्ने पर रहा इसमें कुछ किरकिरी भी हुई लेकिन अब यह गायब हो गया है जबकि मैं जानना चाह रहा हूं कि इस्तीफा देने वाले विधायकों का क्या हुआ। इस पर फैसला करने में विधान सभा अध्यक्ष समय लगा रहे हैं। आज के कुछ अखबारों में खबर है कि कांग्रेस के बागी विधायक और एक निर्दलीय को अयोग्य घोषित कर दिया गया है।

खबर के मुताबिक, कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार गिरने के दो दिन बाद गुरुवार को स्पीकर केआर रमेश कुमार ने कांग्रेस के दो बागी और एक निर्दलीय विधायक को अयोग्य घोषित कर दिया। है और ये 2023 में मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने या फिर विधानसभा भंग होने तक चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। यह मामला उल्टा पड़ता लगता है और अखबारों में सन्नाटा शायद इसीलिए है। इसपर लिखने के लिए अनुभव, सूचना और ज्ञान तो चाहिए ही। बहरहाल, स्पीकर ने कहा है कि बाकी 14 विधायकों पर आने वाले दिनों में फैसला लिया जाएगा। उन्होंने कहा, “मुझे पक्का यकीन है कि इन तीनों सदस्यों का इस्तीफा स्वैच्छिक और स्वाभाविक नहीं था। इसलिए इनके इस्तीफे नामंजूर कर दल बदल विरोधी कानून के तहत इन्हें अयोग्य घोषित किया गया है।’ उन्होंने कहा कि इन तीनों सदस्यों ने दल बदल विरोधी कानून का उल्लंघन किया है इसलिए इन्हें अयोग्य घोषित किया है।

इस संबंध में इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, मंगलवार को विश्वासमत जीतने वाली भाजपा नई सरकार बनाने का दावा करने के लिए विधायकों के इस्तीफे पर स्पष्टता के इंतजार में है। अखबार ने भाजपा के एक विधायक के हवाले से लिखा है, विधान सभा सदस्यों की संख्या को लेकर अभी भी कोई स्पष्टता नहीं है। अयोग्यता कार्यवाही के वावजूद कांग्रेस के 15 और जेडीएस तीन विधायक अभी भी सदन के सदस्य हैं। इन्हें जब तक अयोग्य नहीं ठहराया जाता है या विधानसभा अध्यक्ष द्वारा उनके इस्तीफे स्वीकार नहीं किए जाते हैं आलाकमान दावा करना नहीं चाहेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि स्थिति भाजपा के अनुकूल नहीं हुई तो राज्य विधानसभा भंग करने या राष्ट्रपति शासन का प्रावधान है और अभी यह तय करना मुश्किल है कि बल्लेबाजी किसके लिए करनी है। इसलिए पूरा मामला बल्लेबाजी वाली घटना की तरह शांत है।

आप जानते हैं कि सत्तारूढ़ गठबंधन के 16 विधायकों के सदन की सदस्यता से इस्तीफे और दो निर्दलीय विधायकों के सरकार से समर्थन वापस ले लेने के बाद कुमारस्वामी ने गुरुवार को विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश किया था, जबकि बुधवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने 15 बागी विधायकों को कार्यवाही में शामिल होने या न होने की छूट प्रदान कर दी थी। जदएस-कांग्रेस के 17, बसपा के एक और दो निर्दलीय विधायकों ने कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया। इससे पहले चर्चा के जवाब में मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने विश्वास प्रस्ताव को लंबा खींचने के आरोप पर कहा, ‘मैं खुशी-खुशी अपने पद का बलिदान करने के लिए तैयार हूं।’ विश्वास प्रस्ताव पर मतदान कराने में देरी का उनका कोई इरादा नहीं था और इसके लिए वह विधानसभा स्पीकर और राज्य के लोगों से माफी चाहते हैं।

भाजपा ने विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में हिस्सा नहीं लिया और सत्तापक्ष की ओर से कई आरोप लगाए जाने के बावजूद उसके सदस्य शांत बैठे रहे। चर्चा के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस विधायक दल के नेता सिद्दरमैया ने भाजपा पर रिश्वत और विधायकों के थोक कारोबार के जरिये पिछले दरवाजे से सत्ता हासिल करने में लिप्त होने का आरोप लगाया। बता दें कि बागी विधायकों में से एक रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया था। सिद्दरमैया ने यह भी कहा कि अगर येद्दयुरप्पा सरकार बनाते हैं तो छह महीने या फिर सालभर सत्ता में रह पाएंगे। कर्नाटक विधानसभा के पिछले चुनाव 224 में से 222 विधानसभा क्षेत्रों के लिए हुए थे। जयनगर तथा राजराजेश्वरी नगर में क्रमशः निवर्तमान विधायक की मृत्यु तथा मतदाता पहचान पत्र घपले के कारण मतदान बाद में हुए। भारतीय जनता पार्टी 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को सबसे अधिक मत प्रतिशत मिला परन्तु वह 78 सीट जीत पाने में ही सफल रही। जनता दल (सेक्युलर) को 37 सीटें प्राप्त हुईं। एक सीट केपीजेपी, एक बसपा और एक सीट निर्दलीय को को मिली थी। तीन विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के बाद अब विधानसभा की सदस्य संख्या 221 है और बहुमत का निशान 112 होगा। विश्वास मत 205 सदस्यों के लिहाज से हुआ है। अभी इस्तीफों पर फैसला भी होना है। ऐसे में स्थिति अस्पष्ट है और इसीलिए सन्नाटा है। हालांकि, आज एक और खबर है, भाजपा नेता चर्चा के लिए शाह से मिले। मुमकिन है इसका असर आगे दिखे। रेडियो पर खबर आ रही है कि कर्नाटक प्रदेश भाजपा अध्यक्ष आज शाम मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। जाहिर है, अखबार यह खबर देने से चूक गए या पीछे रह गए। अमूमन अटकल को खबर बनाने वालों ने इस बार ऐसा कोई जोखिम नहीं लिया।

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