Home मीडिया “17 पुलिस वाले कैम्पस के अंदर, 116 गेट पर; गिरफ्तारी : शून्य”

“17 पुलिस वाले कैम्पस के अंदर, 116 गेट पर; गिरफ्तारी : शून्य”

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हिन्दी अखबारों ने आज निर्भया के हत्यारों को फांसी का मुद्दा लपक लिया है। ऐसे मामलों को प्रमुखता देने से खबर लिखने के लिए ना योग्य लोगों की जरूरत होती है ना उसपर खर्च करना होता है। हालांकि वह अलग मुद्दा है। आइए देखें आज जेएनयू के मामले में हिन्दी अखबारों का रुख कैसा है। आप मानेंगे कि बीच दिल्ली शहर में दिन दहाड़े निजी सुरक्षा गार्ड, क्लोज सर्किट कैमरे और गेट वाले किसी परिसर में घुसकर तोड़फोड़ करना और कइयों को घायल कर निकल जाना साधारण मामला नहीं है। भाजपा राज में यह कानून व्यवस्था की स्थिति भी उजागर करता है पर इसे ऐसे नहीं देखा जा रहा है। ऐसे मामले में अगर कोई पकड़ा नहीं जाए तो आश्चर्य होना चाहिए पर वह सभी अखबारों में नजर नहीं आ रहा है।

निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है। सच यही है कि (आज के अखबारों के अनुसार) इस मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है और मुकदमा पुराने मामले में भी दर्ज हुआ है तथा सबसे ज्यादा घायल हुई (या की गई) छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष के खिलाफ भी मामला बनाया गया है।

जेएनयू की स्थिति का वर्णन अंग्रेजी अखबार हिन्दुस्तान टाइम्स ने अच्छे शीर्षक से किया है। पहले पन्ने पर जेएनयू की दो खबरें हैं। किसी में भी दीपिका पाडुकोण की फोटो नहीं है और ना शीर्षक में नाम। पहली खबर का शीर्षक है, “जेएनएसयू प्रेसिडेंट पर भीड़ का हमला, दो एफआईआर में नाम”।

खबर के साथ आइशी की फोटो है जिसमें सिर पर पट्टी बंधी हुई है। दो कॉलम, तीन लाइन के शीर्षक वाली इस खबर के ठीक नीचे तीन कॉलम की खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “17 पुलिस वाले कैम्पस के अंदर, 116 गेट पर; गिरफ्तारी : शून्य”। इसके बाद मुझे खबर पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ी। शीर्षक से समझ में आ गया कि खबर क्या है। इसके साथ वीसी साब का बयान सिंगल कॉलम में पूरा मामला समझा देता है। आइए, अब देखें हिन्दी अखबारों ने इसे कैसे प्रस्तुत किया है।

दैनिक जागरण का शीर्षक है, पुलिस की लापरवाही से जेएनयू में बढ़ा विवाद। खबर में कहा गया है, रविवार को जेएनयू में हुई हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस की घोर लापरवाही उजागर हुई है। 5 जनवरी को हुए बवाल से पहले वामपंथी छात्र संगठनों के सैकड़ों छात्र-छात्रओं ने तीन और चार जनवरी को लगातार दो दिनों तक प्रशासनिक ब्लॉक स्थित सर्वर रूम में जबरन घुसकर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाया था। कर्मचारियों से मारपीट की थी। यहां तक कर्मचारियों के अंदर होते हुए भी सर्वर रूम में बाहर से ताला जड़ दिया गया था। दोनों ही दिन जेएनयू के मुख्य सुरक्षा अधिकारी श्याम सिंह ने थाने में लिखित शिकायत दी थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। नतीजन हंगामा करने वाले छात्र संगठनों को बल मिलता गया और अंतत: 5 जनवरी को लाठी-डंडे और रॉड से लैस नकाबपोश लोगों ने पूरे परिसर में जमकर उत्पात किया। दूसरे अखबारों से पता चलता है कि एफआईआर 5 जनवरी को हुई जब आइशी अपना इलाज करा रही थी तो उसके खिलाफ एफआईआर लिखाई जा रही थी।

दैनिक भास्कर की खबर का शीर्षक है, कोई नकाबपोश पकड़ा नहीं गया।
उपशीर्षक है, (छात्र संघ की) अध्यक्ष आइशी सहित 21 छात्रों पर एफआईआर। अखबार ने लिखा है, इस बीच हिन्दू रक्षा दल के मुखिया पिंकी चौधरी के उस दावे की भी पुलिस पड़ताल कर रही है, जिसमें उसने जेएनयू में हुई हिंसा की जिम्मेदारी ली है। अखबार ने बताया है कि एफएसएल की टीमें जेएनयू में हिंसा की जांच करेंगी। जेएनयू में रविवार को हुई हिंसा में दिल्ली पुलिस की दो एफआईआर में छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष, उपाध्यक्ष साकेत मून सहित 21 छात्रों के नाम हैं।

इन पर रविवार को हुई हिंसा से एक दिन पहले शनिवार को विश्वविद्यालय के सर्वर रूम में तोड़फोड़, स्टाफ और महिला गार्ड से मारपीट, गाली-ग्लौज करने और धमकाने का आरोप लगाया गया है। जेएनयू सिक्युरिटी डिपार्टमेंट ने यह एफआईआर 5 जनवरी को रात 8:39 बजे और 8:43 बजे दर्ज कराई है। लगभग इसी समय नकाबपोश गुंडे आईशी और छात्रों-शिक्षकों पर हमला कर रहे थे। इसमें 34 लोग घायल हो गए थे। अब आप इसे दैनिक जागरण की खबर से जोड़कर पढ़िए।

अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, “जेएनयू हिंसा : नकाबपोशों का पता नहीं सचिव को छोड़ पूरे छात्रसंघ पर मुकदमा।” खबर में कहा गया है, जेएनयू कैंपस में 5 जनवरी को नकाबपोश भीड़ की हिंसा के मामले में तो अब तक पुलिस ने कोई मामला दर्ज नहीं किया है, लेकिन विवि का सर्वर बंद करने, तोड़फोड़ मामले में दर्ज दो एफआईआर में पूरे छात्रसंघ को ही आरोपी बना दिया है। इसके साथ और भी खबरें हैं। पर यह नहीं बताया गया है कि सचिव का नाम एफआईआर में क्यों नहीं है। हो सकता है वे दूसरी पार्टी के हों या सक्रिय नहीं हों और आम लोगों को पता हो। पर मुझ जैसे पाठक की उत्सुकता बनी हुई है कि ऐसा क्यों हुआ। नवभारत टाइम्स का शीर्षक है, जेएनयू हिन्सा में घायल आइशी समेत 20 के खिलाफ एफआईआर। इसके साथ दीपिका की भी खबर है, जेएनयू पहुंच दीपिका ने किया सपोर्ट।

हिन्दुस्तान की खबर का शीर्षक है, दीपिका ने जेएनयू आंदोलनकारियों के बीच पहुंच चौंकाया। राजस्थान पत्रिका की खबर का शीर्षक है, हमलावरों की पहचान नहीं, जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष व 19 पर केस। नवोदय टाइम्स की खबर का शीर्षक है, जेएनयू हिन्सा तीन एफआईआर, दो में आइशी का नाम। इसके साथ सिंगल कॉलम की एक खबर है, जेएनयू पहुंची दीपिका पर खामोश रहीं। इस तरह आप समझ सकते हैं कि यह मामला कैसे महत्व खोता जा रहा है। और मूल मुद्दा गौण हो गया है। हालांकि बहुत से अखबारों में यह जिन्दा है।

दिल्ली में कानून व्यवस्था के मामले पर दिल्ली के अखबारों का रुख हिन्दुस्तान टाइम्स जैसा ही होना चाहिए और इस मामले में कार्रवाई होने तथा जवाब मिलने तक उठाते रहना चाहिए।

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