Home मीडिया दिल्‍ली की सर्द रात के बहाने टीवी समाचार पर कुछ और बातें

दिल्‍ली की सर्द रात के बहाने टीवी समाचार पर कुछ और बातें

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प्रकाश के रे

जाने-माने टीवी/मीडिया क्रिटिक जेम्स पोनिवोज़िक का कहना है कि व्यावहारिक हिसाब से देखा जाए तो संकट की अनुभूति टेलीविज़न न्यूज़ के लिए अच्छा कारोबार है. यह बात इस माध्यम को पहली बार क़ायदे से न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हमले के मामले में समझ में आयी थी. उस घटना ने टीवी को हमेशा के लिए बदल दिया. बिल्डिंग के दोनों टावरों से जहाजों के टकराने, आग लगने तथा टावर गिरने के साथ अमेरिका के अन्य हिस्सों से भी हमलों की ख़बरें आये जा रही थीं. कुछ भी साफ़ न था, सरकार भी बदहवास थी, टीवी दफ़्तरों के लिए भी बहुत मुश्किल था, ख़बर और अफ़वाह का अंतर भी देखना था. ऐसे में एक युक्ति बड़े काम की सिद्ध हुई. कभी-कभार इस्तेमाल होने वाला टिकर ख़बरें और सूचनाएं देने के लिए स्क्रीन पर चस्पा किया गया. तब से वह वहीं चिपका हुआ है. पोनिवोज़िक कहते हैं कि उसके बाद से वह ख़ास चेतावनी या सूचना का ज़रिया नहीं रहा, बल्कि लगातार धीमी बेचैनी की मौजूदगी बन गया. अब उसे वापस भी नहीं लिया जा सकता है क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि अब सबकुछ सामान्य है. हमारे टेलीविज़न ने भी इस युक्ति को अपनाया और अमेरिकी चैनलों से कहीं अधिक उत्साह से अपनाया. टिकर के साथ हमने दो तीन और चार स्टीकर चिपकाना शुरू कर दिया. यह इतना सामान्य हो चुका है कि टीवी पर स्टीकर न दिखें, तो माहौल बड़ा सूना लगता है हालांकि इस बाबत अमेरिका में कुछ बदलाव हुआ है. फ़ॉक्स चैनल दिन में टिकर नहीं चलाता और ख़बरों का टिकर स्क्रीन पर सात बजे शाम के बाद आता है. एमएसएनबीसी ने पूरी तरह से इसे हटा दिया है. बाक़ी अभी चला रहे हैं.  

साल 2001 के 11 सितंबर ने टीवी को एक और युक्ति के असरदार इस्तेमाल का रास्ता दिखाया. सुबह कुछ वक़्त तक तो हमलों के रॉ फ़ूटेज चलाये गये, पर जल्दी ही उन्हें बढ़िया एडिटिंग/स्मार्ट कट्स और ऑपेरैटिक साउंड इफ़ेक्ट्स के साथ परोसा जाने लगा. अब यह आतंकी हमला एक ऑडियो-विजुअल उत्तेजना था. अब यह इतना सामान्य हो चला है कि ऐसा न किया जाये, तो कोई भी रिपोर्ट बहुत उदास लगेगी और दर्शक को मज़ा नहीं आयेगा. दिल्ली की ठंड को भी ऐसे इंतज़ामों के साथ दिखाया गया. यहां यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि 9/11 हमलों के दृश्य इतनी बार घटना के कई हफ़्तों बाद भी चैनलों पर दिखाए कि मनोवैज्ञानिकों ने इस पर चिंता जतानी शुरू कर दी और बच्चों को टीवी नहीं देखने की सलाह दी जाने लगी. एबीसी न्यूज़ के तत्कालीन अध्यक्ष डेविड वेस्टिन ने कुछ दिनों बाद जहाज़ों के टावरों से टकराने के दृश्य लगातार चलाने की अपने यहाँ मनाही कर दी.          

चूँकि हमारा टेलीविज़न अमेरिकी टेलीविज़न के मॉड्यूल पर बना है, इसलिए इसे देखने के लिए पॉपुलर कल्चर के सिद्धांतों का सहारा ज़्यादा-से-ज़्यादा लिया जाना चाहिए. टेलीविज़न की तरह हमारा पॉपुलर सिनेमा भी हॉलीवुड से प्रभावित/प्रेरित रहा है तथा अमेरिकी टेलीविज़न पर भी हॉलीवुड और अमेरिकी पॉपुलर कल्चर के रूझानों का असर रहा है. इस चर्चा में उन पारंपरिक तत्वों पर विस्तार से जाने की ज़रूरत नहीं है, जो ज़माने से बातचीत, बहस, चर्चा जैसे पब्लिक स्फीयर की गतिविधियों के अंग रहे हैं- उदाहरण के लिए, रेटॉरिक, पॉलेमिक और परफ़ॉर्मेंस आदि. हम जानते हैं कि हम एक ऐसे युग में हैं, जहां सिलेब्रिटीहुड बहुत महत्वपूर्ण है. हाइड ने तो यहां तक कह दिया है कि हम सिलेबोक्रेसी में ही रह रहे हैं. पीडी मार्शल का कहना है कि लोकतांत्रिक और पूंजीवादी आधारों पर संस्कृति की संरचना करने की एक अभिव्यक्ति सिलेब्रिटी हैं. दुनियाभर में टीवी का एक अनुभव यह है कि ख़बरिया चैनलों के एंकर और रिपोर्टर भी सिलेब्रिटी होते हैं. यह स्वाभाविक ही है क्योंकि टीवी भी उसी कल्चरल स्पेस का हिस्सा है, जो लोकतंत्र और पूंजीवाद की छांव में आकार लेता है. जब हम सिनेमा के सिद्धांतों से टीवी पत्रकारिता को देखते हैं, तो इस कोशिश में हमें दर्शकों के बारे में भी कुछ समझ हासिल होती है. 

सिनेमा का स्टार अपनी आभा अपनी भव्य लोकप्रियता से हासिल करता है, लेकिन टीवी के नायक के पास पत्रकारिकता का एक नैतिक आयाम भी होता है. वह लोकतंत्र का पहरुआ है. उसे सवाल करने का हक़ है. उसे जवाब पाने का भी हक़ है. वह सत्ता की छवि की अपने तीसरी आंख से खंडित कर सकता है. वह सत्ता के साथ खड़ा होकर देश और जनता के प्रति उसकी निष्ठा की गवाही दे सकता है. ऐसा करते हुए वह लोकतंत्र का स्तंभ ही नहीं, पूरा लोकतंत्र हो जाता है. इसी कारण वह सत्ता के पक्ष और विरोध में खड़े होने को अपनी सुविधा से चुन सकता है. अगर हम मानते हैं कि हमारा लोकतंत्र संकटग्रस्त है और वह उत्तरोत्तर जर्जर होता जा रहा है, अगर हम मानते हैं कि हमारा लोकतंत्र आज अपहृत हो चुका है और उसके अंतर्निहित विरोधाभास सतह पर नासूर बनकर उभर आए हैं तथा अगर हम मानते हैं कि दुनिया की बेहतरी की पहली कोशिश लोकतंत्र को ठीक करने से होगी, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि उसके घटकों को भी बीमारी लगी है और बीमारी को ठीक से पहचानना होगा.

टीवी की सबसे बड़ी बीमारी उसका एंकर/रिपोर्टर केंद्रित होना है. ठीक उसी तरह जैसे सिनेमा को स्टारडम ने और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को व्यक्ति-केंद्रित राजनीति ने तबाह किया, टीवी को उसके सिलेब्रिटीहुड ने मारा. एंकर और रिपोर्टर के स्क्रीन पर केंद्रीय भूमिका को समझने का एक तरीक़ा हमारे पॉपुलर सिनेमा के एक सिद्धांत ‘दर्शन’ का हो सकता है. वह अपने फ़्रेम में किसी दैवी उपस्थिति में होता है. उसके पास सामाजिक और राजनीतिक अथॉरिटी होती है. उसमें अधिनायकत्व के लक्षण होते हैं. सिनेमा के नायक की ही तरह वह किसी रूमानी या सामाजिक उद्देश्य के लिए व्यक्तिगत आकांक्षा से प्रेरित नहीं होता, न ही वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रशासनिक घटकों में सुधार का आग्रही होता है. वह भले ही एक आधुनिक उपस्थिति होता है क्योंकि वह आधुनिक माध्यम से घटित होता है, पर वह समाज और व्यवस्था के पुरातन मानकों का पुंज होता है. हमारे टेलीविज़न में वह एक सामंती अवतार है. दर्शक इस अवतार के अनुरूप गढ़ा जाता है. जैसे देवता का दर्शन उसमें प्राप्ति का भाव पैदा करता है, वैसे ही एंकर उसमें सशक्तीकरण की अनुभूति का संचार करता है. जैसे दैवी दर्शन का ऐसा अनुभव प्रिंटेड कैलेंडर में वैसा नहीं है, जितना प्रभावी वह मूर्ति में है, उसी तरह अख़बार वह प्रभाव पैदा नहीं कर पाता, जो टेलीविज़न कर पाता है. यही कारण है कि अख़बार का संपादक या बड़ा रिपोर्टर चाहे कुछ और हो, सिलेब्रिटी नहीं होता. टेलीविज़न में कोई अदना भी आभामंडल से युक्त होता है. ’दर्शन’ का यह तामझाम ही कैमरा, ऐक्टर/एंकर, बैकग्राउंड, फ़्रेमिंग, मेक-अप आदि का समीकरण पैदा करता है. मुझे लगता है कि देखने-दिखाने का यह पहलू मीडिया विमर्श में गंभीरता से लाया जाना चाहिए. माधव प्रसाद और रवि वासुदेवन समेत अनेक विद्वानों ने सिनेमा में ‘दर्शन’ के तत्व पर लिखा है. वे मददगार हो सकते हैं. इस संबंध में दर्शकों का यानी स्पेक्टेटरशिप पर भी विचार किया जाना चाहिए. सिनेमा के संदर्भ में तो इस पर बहुत काम हुआ है, पर टेलीविज़न दर्शक के बारे में अध्ययन हमारे देश में, ख़ासकर हिंदी टीवी के बारे में, न के बराबर हैं. सीरियलों को लेकर कुछ काम हुआ है, पर समाचारों का मैदान ख़ाली है. एंकर बनने और वेबसाइट खोलने के लिए बेचैन इस क्षेत्र में कुछ शोध-अध्ययन करें, तो यह बहुत महत्वपूर्ण योगदान होगा.           

इसी संदर्भ में टेलीविज़न में सौंदर्य के स्थापित प्रतिमान, जैसे- सुंदरता, भाषा, संपादन, प्रस्तुति आदि, महत्वपूर्ण हो जाते हैं. इसीलिए कैमरा-फ़्रेंडली और फोटोजेनिक चेहरे ज़रूरी हो जाते हैं, कार्यक्रम से पहले चेहरे पर रंग-रोगन ज़रूरी हो जाता है और बढ़िया कपड़ा भी. चूंकि यह माध्यम अपनी प्रकृति में क्षेत्रीय है, तो त्योहार और राष्ट्रीय दिवसों पर एंकर कुर्ता धारण कर लेता है. ख़ैर, इन बातों पर अधिक न कहते हुए टेलीविज़न में मेलोड्रामा और पारसी थिएटर की संवाद अदायगी के असर को रेखांकित किया जाना ज़रूरी है.

आधुनिक विज़ुअल मीडिया ने रेटॉरिक, पॉलेमिक और परफ़ॉर्मेंस जैसे पारंपरिक तत्वों का भरपूर इस्तेमाल किया है. रेटॉरिक जहां व्यापक सामाजिक संबंधों से कही जा रही बात या चर्चा के केंद्र के विषय को जोड़ता है, पर, जैसा कि जेम्स नारेमोर ने लिखा है, वह अपनी ख़ूबियों से वह सच के दावों पर हमारे भरोसे और दिखायी जा रही छवि (रिप्रेज़ेंटेशन) में हमारे आनंद को भी हासिल करता है. वह एक सिडक्टिव यानी ललचाने वाली/मोहित करने वाली युक्ति भी है. पॉलेमिक धारदार और धाराप्रवाह एकालाप से निशाने को क्षत-विक्षत करने के लिए ख़ूब प्रयोग किया जा रहा है. यह सब करते हुए अदायगी यानी परफ़ॉर्मेंस तो होगा ही, होता ही है. एंकरों/रिपोर्टरों के आंख नचाने, पैंतरा दिखाने, हाथ चमकाने आदि की प्रतिभा के सामने बड़े-बड़े अभिनेता पानी भरने लगेंगे. वे निहायत सपाट या हल्की बात करते हुए इतने गुरु-गम्भीर हो सकते हैं कि नाट्य-शास्त्र भी भौंचक रहा जाए. मेलोड्रामा पारंपरिक थिएटर और पॉपुलर सिनेमा का बहुत अहम आयाम है. पीटर ब्रुक्स ने रेखांकित किया है कि ‘उत्तर-पवित्र युग’ में ‘नैतिक ब्रह्मांड’ को उजागर करने, दिखाने और सक्रिय करने के लिए मेलोड्रामा ज़रूरी तरीक़ा है. इसमें अच्छे और बुरे के बीच सतत संघर्ष चलता रहता है और फिर बुराई पर अच्छाई की जीत हो जाती है. हमारे टेलीविज़न ने इस तरीक़े का ख़ूब इस्तेमाल किया है. लेकिन जैसा कि पहले कहा गया है, टेलीविज़न समाचार का अस्तित्व निरंतर संकट की अवस्था में बचा और बना रहा सकता है, इसलिए उसके सामने बुराई खोजते रहने की चुनौती रहती है. चूंकि वह सत्ता, लोकतंत्र और आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा है, इसलिए वह असली बुराई को चिन्हित करने से बचता है. पर बुराई तो खोजनी है, बाइनरी तो बनानी है, डाइलेक्टिक्स तो एस्टेबलिश करना है, तो वह बुराई क्रिएट करता है, किसी को भी बुरा बना देता है. वह दाढ़ी, पगड़ी, बुरक़ा, अर्बन नक्सल, टुकड़े-टुकड़े गैंग, आतंक का गढ़, रेड कोरिडोर, एंटी-इंडिया, झोला छाप, मंदिर-विरोधी, पाकिस्तान-परस्त आदि आदि असंख्य संज्ञाएं और निशाने खोज लेता है. कुछ नहीं मिले, तो इंडिया गेट पर आइसक्रीम खाते लोग भी उसकी अदरिंग की चपेट में आ जाते हैं. वह सेक्स करते दो वयस्कों की वीडियो भी दिखा सकता है, वह किसी भी हद तक जा सकता है, कुछ न मिले तो वह फूटेज में हेर-फेर कर सकता है. वह सिडक्शन और स्टीमुलेशन के वायरस से ग्रस्त साइको है, उसमें और जो हो सिंसियरिटी नहीं है. संगीतकार जेम्स टेलर की बात भले ही अमेरिकी संदर्भ में है, पर यह हमारे यहां भी लागू होती है- टेलीविज़न न्यूज़ अब मनोरंजन है, और इसमें स्टोरी वे लोग लिख रहे हैं जिनका कोई अपना विशेष स्वार्थ है.  

शायर सय्यद अमीन अशरफ़ ने सही ही फ़रमाया है-

क़रीन-ए-अक़्ल है क्या कोई सोचता ही नहीं
ख़बर उड़ाने से पहले ख़बर बनाते हैं

दिल्‍ली की सर्द रात: रिपोर्टर और आलोचक दोनों हवा में फुग्‍गे उड़ा रहे हैं

टीवी के चार्टर में संवेदना का क्‍वार्टर: दिल्‍ली की सर्द रात की सर्द कहानी

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