Home लोकसभा चुनाव 2019 अमित शाह की रैली से पहले आरा में खूनी हिंसा, भाकपा(माले) के...

अमित शाह की रैली से पहले आरा में खूनी हिंसा, भाकपा(माले) के कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमला

SHARE

लोकसभा चुनाव के लिए मतदान से पहले आरा में खूनी संघर्ष आरंभ हो गया है. शुक्रवार शाम महागठबंधन के प्रत्‍याशी राजू यादव का प्रचार करने निकले भाकपा (माले) के कार्यकर्ताओं और उनके प्रचार वाहन पर उदवंतनगर के नवादाबेन गांव में जानलेवा हमला हुआ है. यह घटना भोजपुर जिला मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर दूर की है.

घटना शाम को लगभग छह बजे की है जब विशाल,  उमेश और योगी पासवान रास्ते में मैजिक गाड़ी को रोककर दलित बस्ती में राजू यादव का चुनावी परचा बांटने गये हुए थे. घायल योगी पासवान ने मीडियाविज़िल को बताया कि जब वे वापस लौटे तो देखा कि गाड़ी पर लगे बैनर फाड़ दिए गये थे और गाड़ी को क्षति पंहुचा दी गयी थी. गाड़ी को नुकसान पहुचाने वाले लाठी-डंडे और खंति के साथ वहीं मौजूद थे.

योगी ने बताया, ‘’जब हमने इसके बारे में पूछा तो उन लोगों ने अपने हथियार से हमला कर दिया और बचाव का कोई मौका नहीं दिया’’. उसके बाद वहां के ग्रामीणों ने आरा के सदर अस्पताल में उन्हें पहुंचाया. घायलों को अस्पताल पहुंचाने वाले विक्की ने बताया, ‘’जब हम बाजार से घर जाकर गाड़ी लगाये तभी एक छोटे से बच्चे ने आकर कहा कि देखिये मारपीट हो गया है’’. विक्की का कपड़ा खून से सना हुआ था और वे बोलने की स्थिति में नज़र नहीं आ रहे थे.

विशाल पासवान पर धारदार हथियार से इतना जोरदार हमला हुआ है कि पेट की अंतड़ी बाहर आ गयी है. उन्‍हें आरा के सदर अस्पताल ले जाया गया जहां के डॉ. सतीश कुमार ने बताया कि नाजुक हालत होने के चलते उन्‍हें वहां से तुरंत पटना पीएमसीएच रेफर कर दिया गया.

अस्पताल में मौजूद भाकपा (माले) के समर्थक राकेश कुमार ने बताया कि 7 मई को वे शाहपुर जा रहे थे कि उनकी गाड़ी गलत रास्ते पर चलते हुए छोटकी सासाराम पहुंच गयी. राकेश की गाड़ी में राजू यादव के समर्थन में गीत बज़ रहा था. तभी उनकी गाड़ी को रोकने की कोशिश हुई लेकिन तब तक भाकपा माले के कुछ समर्थक वहां पहुंच गए थे.

हाल ही में आरके सिंह का एक वीडियो खूब वायरल हुआ है जिसमें वे अपने समर्थकों से यह कह रहे है कि यदि कोई राजद, कांग्रेस और गठबंधन से जुड़ा व्‍यक्ति वोट मांगने आये तो उसे जूता से मारिये और कहिये कि तुम सब चोर हो. इसके बाद से ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं, जिसने कल खूनी संघर्ष का रूप ले लिया.

शुक्रवार देर रात घायलो को देखने के लिए अस्पताल में काफी भीड़ जुट चुकी थी. उधर कथित तौर पर हमला करने वाले तीन लोग भी आरा के सदर अस्पताल में काउंटर इन्जरी के इलाज़ के लिए पहुंचे थे जिन्‍हें मौके पर मौजूद पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उन्‍हें छुड़ाने के लिए थोड़ी देर बाद संदेश के पूर्व भाजपा विधायक संजय टाइगर पहुंचे लेकिन पुलिस ने हिरासत में लिए हुए लोगों को छोड़ने से इंकार कर दिया. इसके बाद भाजपा के पूर्व विधायक चलते बने. इस बीच भाकपा (माले) से जुड़े अमित कुमार बंटी ने संजय टाइगर के हस्तक्षेप पर प्रतिवाद किया.

सदर अस्पताल में जिले के तमाम प्रशासनिक अधिकारी और भारी संख्‍या में पुलिस बल रात में ही पहुंच गया था.

आरा में 19 मई को मतदान है. आज यहां के रमना मैदान में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपने प्रत्‍याशी व केंद्रीय ऊर्जा मंन्त्री आरके सिंह के प्रचार में आ रहे हैं. आरा के इप्टा से जुड़े अंजनी शर्मा का कहना है कि बीजेपी अपनी आसन्न हार को देख रही है जिसके कारण वह बौखला गयी है.

3 COMMENTS

  1. संशोधनवादी नेताओं ने अपने मासूम कार्यकर्ताओ को राजनैतिक शिक्षा से वंचित किया है वे बेचारे फालतू मे अवसरवादी नेत्तृत्व की सत्ता मे भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अपना खून बहा रहे हैं। 60 के करीब संशोधनवादी कम्युनिस्ट सांसद संसद में थे लेकिन उनके ही कर्मों के कारण आज उनकी संख्या सिमटकर 2009 में दो दर्जन और 2014 में मात्र एक दर्जन रह गई है। ये वही लोग हैं जो ख्रुश्चेव के चेले हैं जो कन्हैया की तरह खुले आम स्टालिन को गाली देने का साहस रखते हैं । वहीं स्टालिन जिन्होंने लेनिन की मौत के बाद दूसरे विश्व युद्ध में सोवियत संघ को फासीवाद पर विजय दिलाई और पूरी दुनिया को फासीवादी खतरे से दूर रखा । सोवियत संघ ने अभूतपूर्व औद्योगिक ,कृषि , साइस, संस्कृति संबंधी प्रगति करी और पूरी दुनिया को मार्ग दिखाया । और उसी के फलस्वरूप पूरी दुनिया में एक तिहाई क्षेत्रफल में समाजवाद का प्रचार हो पाया ,104 देश आजाद हो पाए ।कम्युनिस्टो हेतु ऐसे समय माओ ने द्रढता से मार्क्सवाद लेनिनवाद की रक्षा की। संशोधनवाद की धज्जियां उड़ाने वाले ये दस्तावेज महान बहस(The Great debate: The Polemics on the general line of the international COMMUNIST movement ) कहलाते हैं।
    गार्गी प्रकाशन (न्यू मॉडर्न शाहदरा ,दिल्ली , 120 रुपये मूल्य )के द्वारा वितरित गई इस पुस्तक की आठवीं टिप्पणी —सर्वहारा क्रांति और ख्रुश्चेव का संशोधनवाद —का एक अश देखें। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा” रनमिन रपाओ” दैनिक मे प्रकाशित इस टिप्पणी मे गद्दार सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी नेत्तृत्व का पर्दाफाश किया गया है । इसमें बताया गया है कि आधुनिक संशोधनवादी भी पुराने संशोधनवादियों की तरह ही हैं और लेनिन के इस वर्णन में खरे उतरते हैं —– ” वस्तुगत रूप से वे पूंजीपति वर्ग का एक राजनीतिक दस्ता हैं, उसके प्रभाव के प्रचारक हैं, श्रमिक आंदोलन में उसके एजेंट हैं । इसी टिप्पणी में आगे दर्ज है लेनिन अपनी रचना ” सर्वहारा क्रांति और गद्दार कात्सकी ” में लिखते हैं कि जब कात्सकी गद्दार बन गया तो जर्मन मार्क्सवादी नेता लिब्कनेख्त ने मजदूर वर्ग के सामने इन शब्दों में अपील की थी कि उसे ” ऐसे नेताओं को पीछे धकेल देना चाहिए , उनके मूर्खतापूर्ण और निकृष्ट प्रचार से मुक्त हो जाना चाहिए ,उनके विरोध के बावजूद भी ,उनके बिना भी , विद्रोह का झंडा उठा लेना चाहिए तथा उन्हें लोंग ते हुए क्रांति की तरफ अभियान कर देना चाहिए । — ( लेनिन संकलित रचनाए) जब यूरोप की अनेक पार्टियों में दूसरे इंटरनेशनल के संशोधनवाद का बोलबाला था तो लेनिन ने फ्रांसीसी कम्युनिस्ट पाल गोले के विचारों को भारी महत्व दिया था ।।
    गोले ने कहा था—-” हमारे विरोधी जोर-शोर से समाजवाद के दिवालिएपन की बात करते हैं ।वे दरअसल जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ रहे हैं । फिर भी यह कहने की हिम्मत कौन कर सकता है कि वे बिल्कुल गलत हैं । जो कुछ भी समय मरणशील है वह समाजवाद कतई नहीं है । बल्कि समाजवाद की एक किस्म भर है । शक्कर में लिपटा हुआ एक ऐसा समाजवाद है , जिसमें आदर्श की भावना का अभाव है, जोश का अभाव है, जिस के तौर-तरीके किसी अफसर अथवा किसी परिवार के पितामह जैसे हैं, यह ऐसा समाजवाद जिसमें साहसिकता या उत्कट उछाह नहीं है ,जो आंकड़ों का भक्त है ,जो गले गले तक पूजीवाद के साथ मैत्रीपूर्ण समझौतों में डूबा हुआ है, एक ऐसा समाजवाद जो पूरी तरह सुधार के काम में उलझा हुआ है तथा जिसने मुट्ठी भर दानों के लिए अपने जन्मसिद्ध अधिकार को बेच खाया है, एक ऐसा समाजवाद जो पूंजीपति वर्ग की नजरों में जनव्यापी असंतोष के रास्ते की एक रुकावट है तथा सर्वहारा वर्ग की साहसिकता को रोकने के लिए एक स्वचालित ब्रेक है ।” क्या लाजवाब बयान है ! …..आज लोग पूछते हैं: क्या आधुनिक संशोधनवाद सूक्ष्मतः समाजवाद की वही किस्म नहीं है जो मरणशील है ? उन्हें जल्दी ही संशोधनवादियों के प्रभुत्व वाली पार्टियों के भीतर अनगिनत कम्युनिस्टो की सच्ची आवाज की गूंज सुनाई देगी । डूबे हुए जहाज के पास से हजारों जहाज गुजर जाते हैं ; सूखे हुए पेड़ के आसपास दसियों हजार पौधे उग आते हैं । बोगस समाजवाद मर गया है ,जबकि वैज्ञानिक समाजवाद के शरीर से यौवन फूट पड रहा है और वह पहले से कहीं ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहा है । क्रांतिकारी समाजवाद अपनी जीवन शक्ति से तमाम कठिनाइयों और विघ्न बाधाओं को पार कर लेगा तथा कदम ब कदम विजय की ओर तब तक अभियान करता रहेगा जब तक वह सारी दुनिया को जीत नहीं लेता । कम्युनिस्ट घोषणा पत्र के अंतिम शब्दों के साथ हम इस लेख को समाप्त करते ह—“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना घ्रणित समझते हैं। वे खुलेआम ऐलान करते हैं कि उनके उद्देश्यों की पूर्ति वर्तमान समाज व्यवस्था को बलपूर्वक खत्म करके ही हो सकती है । कम्युनिस्ट क्रांति के डर से शासक वर्गो को कांपने दो । मजदूरों के पास खोने के लिए अपनी बेडियों के सिवा और कुछ नहीं है । जीतने के लिए उनके पास सारी दुनिया है ।दुनिया के मजदूरों एक हो!(—–8वी टिप्पणी )
    यह पुस्तक ( महान बहस )आजकल के भारत के और दुनिया भर के संशोधनवादी कम्युनिस्टो की जानी दुश्मन है। इसका अध्ययन हर कम्युनिस्ट हेतु आवश्यक है।

  2. कम्युनिस्ट आंदोलन का पूरा इतिहास गवाह है कि दर्जनों बार क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने पर या उस की संभावना होने पर या सत्ता में भागीदारी होने पर या तो चुनाव कानून परिवर्तित कर दिए गए या हजारों लाखों कम्युनिस्टों का कत्लेआम किया गया । यानि पूंजीवादी संसद कभी भी समाजवाद में संक्रमण का विकल्प नहीं बन सकी है ।हमें यह परिघटना खुद भारत के केरल में मिली जब साम्राज्यवादियों के चाकर नेहरू ने भूमि सुधार करने वाली सीपीआई सरकार को बर्खास्त कर दिया। हां ,एक संभावना के तौर पर कम्युनिस्ट हमेशा चाहेंगे कि शांतिपूर्ण साधनों से समाजवाद में संक्रमण हो सके परंतु जो पूंजीपति वर्ग श्रम कानूनों को लागू नहीं करता डबल ओवर टाइम नहीं देता , नियमित प्रकृति के कार्यों में ठेका मजदूरी जारी रखता है वह भला उत्पादन के निजी साधनों को समाज की संपत्ति कैसे बनने देगा जो कि समाजवाद की दिशा में पहला जरूरी कदम होगा इसीलिएसीपीआई ,सीपीएम, माले और पूरी दुनिया की संशोधन वाली पार्टियां आज पूजीवादी संसद की अंधभक्ति में जुटी हैं ।यही दूसरी इंटरनेशनल के संशोधन वादियों कात्सकी ,ख्रुश्चेव के चेले हैं । आज इन्हीं की वजह से मलिहाना , 84 सिख दंगे ,गुजरात दंगों के अपराधी प्रधानमंत्री तक बन गए हैं।

  3. इस हमले का कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य एवं सब लोगों ने विरोध किया है और करना भी चाहिए । परंतु वास्तव में यह तो बाह्य रूप मात्र है इसकी अंतर्वस्तु क्या है ?दरअसल यह हमला भारत की एकाधिकारी पूंजी के जरखरीद पार्टी भाजपा कांग्रेस में से फिलहाल शासन करने वाली भाजपा द्वारा करवाया गया है । अगर भाजपा आर एस एस अपराधी हैं तो एकाधिकारी पूंजी तो इससे कहीं कम अपराधी नहीं है । कामरेड दीपांकर भट्टाचार्य इस बात को जानते नहीं हैं या उन्हें एकाधिकारी पूंजीपति के नाराज हो जाने का डर सताता है ? मुझे लगता नहीं वरन विश्वास है कि दूसरी बात ज्यादा सही है ।

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.