Home लोकसभा चुनाव 2019 बेगूसराय का रणक्षेत्र: प्रगतिशील विचारों के बोझ से निकला लोकप्रिय और ताज़ादम...

बेगूसराय का रणक्षेत्र: प्रगतिशील विचारों के बोझ से निकला लोकप्रिय और ताज़ादम ‘नेता नहीं, बेटा’!

SHARE
डॉ. प्रसेनजित बोस


इस आम चुनाव में बेगूसराय निर्वाचन क्षेत्र की अहमियत बढ़ गयी है क्योंकि यहाँ की लड़ाई द्विपक्षीय राजनीति के विपरीत जाती दिखाई पड़ रही है. पिछली बार नवादा से जीते केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भाजपा के उम्मीदवार हैं. टिकट मिलने के बाद वे कुछ दिनों तक बेगूसराय से लड़ने में आनाकानी कर रहे थे. अब उन्हें स्थानीय भाजपा समर्थकों में उत्साह पैदा करने में परेशानी हो रही है. यह तब साफ दिख गया, जब 6 अप्रैल को नामांकन पत्र जमा करने से पहले होने वाला उनका रोड शो रद्द करना पड़ गया.

ऐसी संभावना जतायी जा रही थी कि लोकप्रिय युवा नेता कन्हैया कुमार इस सीट पर महागठबंधन के प्रत्याशी होंगे. लेकिन जब राजद ने विधान पार्षद तनवीर हसन को अपना उम्मीदवार बना दिया, तो बहुत लोगों को निराशा हुई. हसन पिछले चुनाव में इस सीट पर भाजपा से हार गए थे. सीपीआई द्वारा कन्हैया कुमार को खड़ा करने की घोषणा के बाद से बेगूसराय के मतदाताओं के हर वर्ग से उन्हें बड़ा समर्थन मिल रहा है. उनकी सभाओं और बैठकों में उमड़ती भीड़ से यही इंगित होता है. लोगों ने जिस तरह से एक सप्ताह के भीतर 70 लाख रुपए का चन्दा कन्हैया कुमार के निवेदन पर दिया है, वह भी उनकी लोकप्रियता को सूचित करता है. माना जा रहा है कि आज नामांकन पत्र जमा करने के बाद होने वाली उनकी रैली बहुत ज़ोरदार होगी.

कन्हैया कुमार के चुनावी अभियान को मज़बूत बनाने में अनेक कारकों का योगदान है. पहली बात यह है कि वे पिछले कुछ साल में हुए अत्याचारों के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरे हैं. इन अत्याचारों में गौरी लंकेश की हत्या, रोहित वेमुला पर सांस्थानिक प्रताड़ना, नजीब का लापता होना जैसी घटनाएं शामिल हैं. जो लोग नफ़रत पर आधारित अपराधों और उन्मादी भीड़ के हाथों हो रही हत्याओं में चिंताजनक बढ़ोतरी पर रोष और क्षोभ में हैं, वे मोदी सरकार के ख़िलाफ़ कन्हैया के लगातार संघर्ष से अपने को जुड़ा पाते है. धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा तथा बेईमान पूँजीवाद और इसके ख़तरनाक नतीजों की आलोचना की आवाज़ ना सिर्फ़ बेगूसराय में, बल्कि समूचे देश में भी गूँज रही है.

दूसरा आयाम यह है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर मोदी के रवैए को चुनौती देने के साथ कन्हैया का अभियान बेगूसराय की ज़मीन से पूरी तरह जुड़ा हुआ है. बीहट गाँव में पैदा हुआ इस धरती का लाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पीएचडी की डिग्री लेकर वापस लौटा है और पढ़ाई के दौरान छात्र संघ अध्यक्ष के रूप में उसका कार्यकाल घटनाओं से भरा था. इन बातों को लेकर बेगूसराय के लोगों में गौरव का भाव है. आंगनबाड़ी सेविकाओं और किसानों के स्थानीय संघर्षों में भागीदारी से भी कन्हैया ने कामकाजी लोगों का भरोसा जीता है. बेगूसराय का यह ‘नेता नहीं बेटा’ अब भाजपा के उम्मीदवार से सवाल पूछ रहा है कि उन्होंने छोटे और मझोले उद्योगों के मंत्री के रूप में इस इलाक़े के छोटे कारोबारों के लिए क्या किया है.

यह स्पष्ट है कि बेगूसराय में कोशिशों के बावजूद सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में काम नहीं कर रहा है. इसके विपरीत अलग-अलग जातियों, समुदायों और राजनीति के समर्थक लोग रोज़गार, उपज के दाम, पानी की उपलब्धता, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी सुविधाओं की स्थिति जैसे मुद्दों पर बहस करने और कहने-सुनने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. खेती और छोटे कारोबार पर नोटबंदी और जीएसटी का असर एक बड़ा मुद्दा है. बेगूसराय में सुप्रसिद्ध साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर के नाम पर विश्वविद्यालय स्थापित करने तथा एम्स की तरह चिकित्सा संस्थान बनाने की कन्हैया कुमार की माँग को भी लोगों का समर्थन मिल रहा है.

एक समय बेगूसराय सीपीआई का गढ़ हुआ करता था, जहाँ से चंद्रशेखर सिंह जैसे क़द्दावर नेता निकले थे. पूर्व वामपंथी नेता स्वर्गीय भोला सिंह के भाजपा में चले जाने के बाद भले उसे पिछली बार यहाँ से जीत हासिल हुई थी, पर आज भी सीपीआई का अच्छा-ख़ासा असर इस क्षेत्र में बना हुआ है. कन्हैया की उम्मीदवारी ने न सिर्फ़ सीपीआई समर्थकों में उत्साह भरा है, बल्कि पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं, युवाओं और महिलाओं में से नए तबक़ों को भी आकर्षित किया है. इस समीकरण में पारंपरिक चुनावी गणित को बदल देने की क्षमता है.

वामपंथ के प्रगतिशील विचारों को पुरानी बोझिलता से मुक्त कर ताज़गी और लोकप्रिय अन्दाज़ में व्यक्त करने की क्षमता कन्हैया कुमार की मुख्य ताक़त है, जैसे- वे कहते हैं कि ‘नोटतंत्र नहीं, लोकतंत्र’. अपने संघर्ष को वे ‘लूट और झूठ के ख़िलाफ़ हक़ और सच्चाई की लड़ाई’ बताते हैं. इन बातों ने क्षेत्र में बड़ी संख्या में मतदाताओं का दिल जीता है. अब इस समर्थन को 29 अप्रैल को वोटों में बदलने की चुनौती है.



लेखक अर्थशास्‍त्री हैं और आजकल बेगूसराय के चुनाव क्षेत्र में हैं

LEAVE A REPLY

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.