Home पाती अब जन्नत का स्वाद चखेगा कश्मीर!

अब जन्नत का स्वाद चखेगा कश्मीर!

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इसे कहते हैं 56 इंच के सीने वाली मर्दाना सरकार। जो करना है सो करना है। हर मुश्किल, हर रुकावट को लाँघ कर करना है। नियम, कानून, संविधान, लोकतंत्र वगैरह कुछ भी रास्ते में नहीं आ सकते। मुट्ठी भर आलोचकों की बिसात ही क्या! न्यू इंडिया में उनकी साख वैसे भी कुछ खास नहीं बची है।

और इस बार नहीं कह सकते कि मोदी सरकार ने जुमला फेंका। सरकार ने कहा कि कश्मीर में बड़ा आतंकी हमला होने वाला है। सो हुआ। किसने किया यह दीगर सवाल है। भारतवर्ष की सरकार ने जो किया है राष्ट्र की शाश्वत अखण्डता के लिए किया है। कश्मीर अखण्ड भारत का हिस्सा बनेगा और इसके लिए कश्मीरियों के सिर पर बंदूक रखनी पड़े तो रखी जाएगी। और कौन सा यह पहली बार है?

वैसे चाहे बंदूक की नोक पर ही सही लेकिन सरकार की मंशा नेक है। गृहमंत्री जी ने संसद में बताया कि अनुच्छेद 370 कश्मीर का दुश्मन है। उसके कारण वहाँ बाहरी लोग ज़मीन खरीद कर निजी अस्पताल नहीं बना पा रहे हैं। मंत्री महोदय ने सही फरमाया। अगर वहाँ निजी अस्पताल होते तो पैलेट गनों से घायल नौजवानों व बच्चों को वैसा ही विश्व-स्तरीय इलाज मिलता जैसा भारतवर्ष में लोगों को मिलता है।

बाद में खुद प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को सम्बोधित करके सरकार की इस बोल्ड कार्यवाही से कश्मीर को होने वाले फायदों की झड़ी लगा दी है। कुछ आलोचकों ने मोदी सरकार की तुलना अंग्रेज़ हुक्मरानों से की है। यह सही तुलना नहीं है। अंग्रेज़ बहादुरों ने हमें ‘सभ्य’ बनाने के लिए, हमें स्व-शासन के गुर सिखाने के लिए हम पर हुकूमत की थी। हमारी सरकार बहादुर ऐसा कोई बहाना नहीं बना रही। सभ्यता या स्व-शासन जैसी चीज़ें भारतीय मनीषा के सामने तुच्छ हैं।

हमें तो विकास पसन्द है। इसलिए हम कश्मीर के विकास के लिए उस पर हुकूमत करेंगे। इतना विकास देंगे कि कश्मीर अपनी समस्याओं से वैसे ही मुक्त हो जाएगा जैसे आत्मा सांसारिक बन्धनों से आज़ाद हो जाती है। एक ज़माने में भारतवर्ष बर्तानी साम्राज्य के ताज का हीरा हुआ करता था। आज कश्मीर भारतवर्ष का स्वर्णमुकुट है। हम उस पर विकास की पॉलिश लगाएँगे।

जो आतंकवाद नोटबन्दी से भी नहीं खत्म हुआ वह अब अनुच्छेद 370 के खात्मे से खत्म होगा। यहाँ तक कि आफस्पा  (AFSPA) जैसा कानून भी कश्मीर में इसी 370 की वजह से कारगर नहीं हो पा रहा था।

आतंकवाद खत्म होगा तो विकास की गंगा अब भारतवर्ष से निकलकर कश्मीर का रुख करेगी। जिस तरह भारतवर्ष में विकास के कारण रोज़ी-रोटी, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी समस्याएँ खत्म हो गई हैं उसी तरह वे कश्मीर से भी खत्म होंगी।

आज भारतवर्ष में भुखमरी जैसी कोई चीज़ नहीं है। एक समय में लोग बात-बात पर भुखमरी से मरने लगते थे। मोदी राज में पिछले पाँच साल में मुल्क ने इतना खाना खाया है कि अब लोग अपनी मर्ज़ी से खाना-पीना छोड़ रहे हैं। जो थोड़ी बहुत जनता स्वेच्छा से गरीब बनी हुई है वह तो महज़ पुराने दिनों के नॉस्टैल्जिया में भूखा रहती है।

देश में धन-धान्य की ऐसी बहार है कि लोगों को काम-धन्धा करने की भी ज़रूरत नहीं। नौजवानों को नौकरी चाहिए ही नहीं। वे वाट्सएप से खुश हैं। इस समय वाट्सएप ही सबसे बड़ा काम है, देश सेवा है, भारतवर्ष के लिए सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

भारतवर्ष में लोग बीमार भी नहीं होते। इसीलिए सरकारें आजकल अस्पताल वगैरह बनावाने के बजाय दुनिया की सबसे बड़ी मूर्तियाँ खड़ा करने के रेकार्ड बनाने में लगी है। कश्मीरियों को भी उन नायकों व देवी-देवताओं की लिस्ट बना कर मोदी जी को दे देनी चाहिए जिनकी मूर्तियाँ वे अपने यहाँ लगाना चाहेंगे। वे चाहें तो प्रधानमंत्री जी के बारे में भी विचार कर सकते हैं।

भारतवर्ष में सभी लोग शिक्षित हो चुके हैं। इसी लिए सरकार स्कूलों-कॉलेजों में ज्ञान-विज्ञान की खोज की बजाय अखण्ड भारत और उसकी सनातन उपलब्धियों का कीर्तन करवा रही है। अब कश्मीर की बारी है।

भारतवर्ष की ही तरह कश्मीर में भी दलितों पर कोई अत्याचार नहीं होगा, कोई भेदभाव नहीं होगा। औरतों को समाज में बराबरी का दर्जा मिलेगा। मज़दूरों के हक सुरक्षित होंगे। सच कहें तो जन्नत क्या चीज़ होती है इसका स्वाद तो कश्मीर अब चखेगा।

अखण्ड भारत का हिस्सा बन कर कश्मीर को जितने फायदे होने वाले हैं उनको देख कर मुझे लगता है कि पाकिस्तान, चीन, नेपाल, श्रीलंका आदि पड़ोसी मुल्कों की जनता भी अखण्ड भारत में शामिल होने के लिए सड़कों पर न उतर आए!

अफसोस की बात तो यह है कि कश्मीरियों को मिलने वाले इतने सारे फायदों पर ध्यान न देकर कुछ सिरफिरे लोग कश्मीरियों की मर्ज़ी, उनकी सहमति-असहमति का बेबुनियाद सवाल उठा रहे हैं। यह सवाल नहीं राष्ट्र की सनातन परम्पराओं पर हमला है।

किसी का भला करने से पहले उससे पूछना हमारी संस्कृति नहीं है। हम तो लोगों का गला पकड़ कर उनका भला करने वालों में से हैं। और जब कश्मीर हमारा है तो किसी और से क्या पूछना? हमारी अंतरात्मा ने कह दिया इतना काफी है।

इतना विशाल देश सबकी सहमति-असहमति का ध्यान रख कर नहीं चलाया जाता। विकास लोगों की सहमति-असहमति की राह नहीं देखता रह सकता। मुकेश अम्बानी को देखिए। समझदार हैं। कश्मीरियों की सहमति-असहमति के फालतू सवालों की परवाह किए बिना बोल दिया है कि कश्मीर के विकास के लिए वे कई घोषणाएँ करने वाले हैं। मोदी ने तो सिर्फ ट्रेलर दिखाया है। फिल्म मुकेश भाई दिखाएँगे।

और फिर भारतवर्ष में ही विकास की गंगा भला किससे पूछ कर बह रही है। अखण्ड भारत की नियति मुट्ठी भर लोगों की सहमति की मोहताज नहीं हो सकती।

भारतवर्ष की भक्त जनता ने वैसे भी यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र और सहमति-असहमति जैसी अवधारणाएँ हमारे लिए कोई मायने नहीं रखती हैं। हम भक्त हैं। विकास के भक्त। मोदी के भक्त। अखण्ड राष्ट्र के भक्त। यह किसी गणतंत्र का नागरिक होने से कहीं ज़्यादा बड़ी उपलब्धि है। और फिलहाल फालतू सवाल उठा कर उसकी भक्ति में खलल न डाला जाए।


लेखक और अनुवादक लोकेश मालती प्रकाश भोपाल में रहते हैं

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