Home कर्नाटक चुनाव 2018 चुनाव चर्चा: ‘मठ-मग्न’ कर्नाटक चुनाव,नग्न राजनीति और भग्न संवैधानिक व्यवस्था!

चुनाव चर्चा: ‘मठ-मग्न’ कर्नाटक चुनाव,नग्न राजनीति और भग्न संवैधानिक व्यवस्था!

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चन्द्र प्रकाश झा

 

कर्नाटक विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से ही मीडिया और राजनितिक हल्कों में विवाद छिड़ गया। संभव है कि विवाद की लपटें चुनाव प्रचार ही नहीं सभी  224 विधानसभा सीटों पर एक ही चरण में 12 मई को होने वाले मतदान, 15 मई को निर्धारित मतगणना और उसके बाद राज्य में नई सरकार के गठन तक उठती रहें। क्योंकि , इस चुनावी प्रक्रिया में शामिल लगभग सभी दलों और मीडिया की कथित मुख्यधारा में भी अधैर्य है। उनके बीच  किसी से भी पहले ” ब्रेकिंग न्यूज ”  देने की अघोषित अलोकतांत्रिक, बाज़ारू प्रतिस्पर्धा है। वरना कोई कारण नहीं था कि चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करने के लिए सांविधिक रूप से अधिकृत एकमेव संस्था , निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र का दिनदहाड़े अतिक्रमण होने के बावजूद विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, सबके सब तमाशबीन बने रह जाएँ।

संसद के चालू बजट सत्र के बीच निर्वाचन आयोग द्वारा  27 मार्च को पूर्वाह्न बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले ही लगभग एक ही वक़्त  केंद्र में सत्तारूढ़ मोर्चा का नेतृत्व कर रही भारतीय जनता पार्टी ही नहीं कर्नाटक में पिछले पांच बरस से अपनी सरकार चला रही कांग्रेस के भी महिमामंडित ‘आईटी’ सेल के कर्ता -धर्ता, मतदान और मतगणना की तारीख ट्वीट कर गए और उनके समर्थक इस तमाशा पर बस थिरकते रहे। भाजपा के आईटी सेल ने ट्वीट की वैधानिकता और  नैतिकता को लेकर नागरिक समाज द्वारा उठाये सवाल पर जिस तरह से सारा दोष ‘टाइम्स नाउ’ और कुछेक क्षेत्रीय खबरिया टेलीविजन चैनलों के मत्थे जड़ अपना पाप धो लेने की कोशिश की वह और भी संगीन कृत्य है। भारत में पहली बार निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार चुनाव कार्यक्रम ‘लीक’ हुआ और संसद , सरकार, न्यायपालिका ने चूं  नहीं बोला।  निर्वाचन आयोग ने भाजपा आईटी सेल के प्रमुख, अमित मालवीय और कर्नाटक कांग्रेस के सोशल मीडिया प्रभारी द्वारा चुनाव कार्यक्रम की तारीख अवैध रूप से ट्वीट करने की जांच करने की घोषणा की औपचारिकता ही निभाई।

उसने भाजपा खेमा की सफाई से संतुष्ट होकर उसे जांच शुरू होने से पहले ही बख़्श  दिया। विवाद छिड़ने पर मालवीय जी ने बस अपना ट्वीट डिलीट करके औपचारिक शिष्टाचार का स्वांग रचा।  उन्होंने निर्वाचन आयोग को पत्र भेज कर जो सफाई दी उसके जायज-नाजायज होने का निर्णय  नागरिकों को वाया मीडिया हज़म  करा दिया गया। भाजपा की और से सफाई देने के लिए बिन बुलाये ही केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नक़वी को भी आयोग के समक्ष भेज मामला ठंढा कर दिया गया। निर्वाचन आयोग की जांच के तय सन्दर्भों में जवाबदेही, कांग्रेस की कर्नाटक इकाई के मीडिया प्रभारी पर डाल दी गई ।

अमित मालवीय  ने अपने ट्वीट में मतदान की तारीख तो सही, 12 मई ही बताई। लेकिन उन्होंने मतगणना की तारीख, जान-बूझ कर या फिर गलती से 18 मई बताई। बहरहाल , इस विवाद से निर्वाचन आयोग की साख को निश्चय ही बट्टा लगा है। यह भी स्पष्ट हो गया कि ट्वीट के पीछे भाजपा और उसकी सरकार के नेतृत्व की मंशा यही थी कि लोग मानें लें कि लोकतांत्रिक चुनाव के मामले में भी वे जो भी चाहते हैं वही होगा , सब उनकी मुट्ठी में हैं। मालवीय ने बड़ी मासूमियत से दावा किया कि उन्हें तो चुनाव कार्यक्रम की जानकारी, ‘टाइम्स नाऊ’ जैसे चैनेल से मिली। मोदी सरकार समर्थक माने जाने वाले टाइम्स नाउ ने टीआरपी जिंदाबाद के स्वर में प्रेस की स्वतंत्रता का राग द्रुत ताल में अलाप कर कह दिया कि उसे लोगों को जानकारी देने का पूरा अधिकार है और उसे इस जानकारी का स्रोत बताने के लिए कानूनन बाध्य नहीं किया जा सकता। अहमदाबाद के सोशल मीडिया एक्टिविस्ट, प्रतीक सिन्हा द्वारा संचालित ‘ऑल्ट न्यूज’ की त्वरित जांच-परख में उक्त खबरिया चैनलों की खबर के प्रसारण के समय के साथ -साथ भाजपा और कांग्रेस के ट्वीट और उनके फॉलोअर (समर्थकों ) के री -ट्वीट के प्रामाणिक स्क्रीन शॉट से निष्कर्ष निकला कि मालवीय जी ने ट्वीट बीती रात ही कर दिया था।  फिर उसे छुपा दिया। और फिर उन्होंने अगले दिन टाइम्स नाउ जैसे  चैनलों की खबर के प्रसारण की आड़ लेकर पलक झफकते  ही और निश्चित रूप से चुनाव कार्यक्रम की अधिकृत घोषणा के पहले ही फिर से उजागर कर दिया। निर्वाचन आयोग की अपनी जांच में प्रगति , उसके निष्कर्ष और उस निष्कर्ष के आधार पर किसी तरह की कोई कार्रवाई की अधिकृत खबर अभी तक नहीं आई है।  ट्वीट के हमाम में सब नंगे नज़र आये।

इस बीच, चुनाव की घोषणा के बाद से कर्नाटक के विभिन्न स्थानों पर चुनावी प्रयोजन के लिए भेजी नगदी, सोना, शराब, रेशमी साड़ियां की बरामदगी
-जब्ती की खबरें लगातार मिल रही हैं। इन ख़बरों का एकमुश्त संकलन फिलहाल संभव नहीं लगता है। पुलिस ने बगलकोट में एक कार से 14 लाख रुपए नगदी की जब्ती की खबर तो तपाक से दे दी।  लेकिन यह नगदी किसने , किसको भेजी थी इसका पुलिस ने खुलासा तत्काल नहीं किया।

कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी संजीव कुमार के अनुसार निर्वाचन आयोग के उड़नदस्ते ने भी 9.9 लाख रुपये नकदी, 18.9 लीटर शराब , 2.4 किलोग्राम सोना, आठ महँगी रेशमी साड़ियां जब्त की हैं। कुल 1,156 उड़नदस्ते और 1,255 निगरानी दल, चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद लागू आदर्श आचार संहिता के कार्यान्वयन के लिए तैनात हैं।आबकारी विभाग ने अलग से 1,217 लीटर अवैध शराब बरामद कर 148 मामले दर्ज किए हैं। चुनाव प्रचार में सरकारी वाहनों का दुरुपयोग करने, लाउडस्पीकर का रात 10 बजे से सुबह छह बजे तक प्रयोग नहीं करने के नियम का उल्लंघन करने , मतदाताओं को धन आदि का लोभ देने के अनेक मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने और 8,633 लाइसेंसी हथियारों की  जमाबंदी की भी पुष्ट खबरें हैं.

राज्य में 1985 के बाद से किसी भी दल को सत्ता बरकरार रखने का मौक़ा नहीं मिला है। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में जीती कांग्रेस को इस बार के चुनाव के पहले तुरुप के पत्ते की मानिंद निकाले अपने  ‘लिंगायत कार्ड’ से  पूरा आत्मविश्वास है कि वह फिर सत्ता में लौट आएगी। मुख्यमंत्री  सिद्धारमैया की सरकार ने चुनाव की घोषणा के ऐन पहले लिंगायत समुदाय को हिन्दू से अलग धर्म की मान्यता और इस हिन्दू-बहुल  राज्य में अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने के लिए केंद्र सरकार से मांग कर अपनी पार्टी को नया राजनीतिक पिटारा दे दिया। इस चुनावी पैंतरे की गेंद अब केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की साझा सरकार का नेतृत्व कर रही भाजपा के पाले में है। भाजपा को  यह पैंतरा न उगलते बनता है, न निगलते बनता है। लिंगायतों का छोटा, वीरशैव समूह सिद्दारमैय़ा सरकार के इस कदम के विरोध में है लेकिन अधिसंख्य लिंगायत समुदाय कुल मिलाकर हिन्दुओं में प्रचलित जाति व्यवस्था के खिलाफ रहा है।

सिद्धरमैया ने दावा किया है कि राज्य में जितने भी मठ हैं उन सब का समर्थन कांग्रेस को है। सिद्धारमैया स्वयं  कुरबा समुदाय के हैं। वही अगली सरकार के मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस के घोषित दावेदार हैं। राज्य में कुरबा समुदाय के करीब 80 मठ हैं। इनमें  मुख्य, दावणगेरे में
श्रीगैरे मठ है। राज्य की आबादी में कुरबा समुदाय के मतदाता  करीब आठ प्रतिशत माने जाते हैं। कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की बेंगलुरु में 8 अप्रैल को घोषित रैली के बाद जारी किये जाने की संभावना है।  मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने खुद चामुंडेश्वरी सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा कर कहा है कि यह उनका अंतिम चुनाव होगा।  वह जनता दल (सेक्युलर) का गढ़ माने जाने वाले इसी सीट से पांच बार, विभिन्न दलों के प्रत्याशी के रूप में जीते  हैं और दो बार हारे भी हैं। सिद्दारमैया सरकार पर भाजपा ने भ्रष्टाचार के अनेक आरोप लगाये हैं पर किसी भी मामले में मुख्यमंत्री की संलिप्तता साबित नहीं हुई।

वैसे , भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री एवं लिंगायत समुदाय के ही नेता 75-वर्षीय बी एस येद्दयुरप्पा को अगली सरकार के मुख्यमंत्री पद के लिए अपना दावेदार घोषित कर कांग्रेस के लिंगायत कार्ड की तोड़ पेश कर दी है। येदियुरप्पा को राज्य में वर्ष 2009 के चुनाव में पहली बार जीती भाजपा की सरकार के मुख्यमंत्री पद से भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के कारण हटना पड़ा था। उन्होंने मुख्यमंत्री पद से अपदस्थ होने के बाद अपनी नई पार्टी भी बना ली थी। लेकिन बाद में उनकी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से सुलह हो गई।  उनकी नई  पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया गया। भाजपा ने कांग्रेस के लिंगायत कार्ड की  तोड़ के रूप में येद्दयुरप्पा को आगे करने के लिए अपने उस घोषित राजनितिक ‘ सिद्धांत’ की तिलांजलि दे दी जिसके तहत उसके 75 साल से अधिक आयु के नेता, सरकार और संगठन में किसी पद पर नहीं रह सकते।

भाजपा को चुनाव में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने में भी  परेशानी हो रही है क्योंकि येद्दयुरप्पा को इन आरोपों  के कारण  न सिर्फ ही मुख्यमंत्री  पद से हटना पड़ा था बल्कि अरबों रूपये के भूमि-घोटाले में जेल भी जाना पड़ा था. यह दीगर बात है कि उन्हें बाद में अदालत से  राहत मिल गई, वह जेल से बाहर आ गए  और उनका वानप्रस्थ अवस्था में भी भाजपा में ही सहजता से राजनीतिक पुनर्वास भी हो गया।  वह अभी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं।  भाजपा के 140 प्रत्याशियों की पहली सूची 10 अप्रैल तक जारी किये जाने की संभावना है।

पूर्व प्रधानमन्त्री एच डी देवेगौड़ा द्वारा गठित जनता दल (सेक्युलर), कर्नाटक में तीसरी बड़ी राजनितिक ताकत है। उनके पुत्र एवं पूर्व मुख्यमंत्री  एच.डी कुमारस्वामी को इस दल की ओर से अगली सरकार के मुख्यमंत्री  पद का दावेदार घोषित किया गया हैं।  जनता दल(एस)  ने उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी और कुछ अन्य छोटे दलों के साथ चुनावी  गठबंधन करने की घोषणा की है जो जमीन पर ज्यादा उतरता नज़र नहीं आता है।  देवेगौड़ा स्वयं वोकालिगा समुदाय के हैं। उनकी पार्टी का चुनचुनगिरी मठ पर काफी प्रभाव माना जाता है. जनता दल (सेक्युलर) ने अपने 126 प्रत्याशियों की प्रथम सूची जारी की है जिनमें एच.डी कुमारस्वामी और उनके बड़े भाई एच डी रेवन्ना शामिल हैं। गौरतलब है कि यह सूची चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के पहले ही जारी की गई।  चर्चा है कि एच.डी कुमारस्वामी की पत्नी भी चुनाव लड़ेंगी।  जनता दल (सेक्युलर) ने बसपा को 20 सीटें आवंटित की हैं जो सब आरक्षित हैं।  जनता दल (सेक्युलर ) के गठबंधन में पूर्व रक्षा मंत्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी शामिल है जिसको सीट आवंटन शेष है ,

एक गौरतलब बात यह है कि कर्नाटक ही नहीं किसी भी राज्य के चुनाव में यह सम्भवतः पहला मौक़ा है जब तीनों प्रमुख दलों ने मुख्यमंत्री पद के लिए
अपने दावेदार चुनाव के पहले ही घोषित कर दिए है,  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल  के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी भी कर्नाटक चुनावों
में उतरने की तैयारी में है। कम्यूनिस्ट पार्टियां भी कुछेक सीट पर चुनाव लड़ रही हैं।  मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी ने मार्च
माह के उत्तरार्ध में नई दिल्ली में हुई बैठक में कर्नाटक में चुनाव -पूर्व किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनने का निर्णय  कर अपने 26
प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी जो पिछले 15 बरस में सर्वाधिक है। उसने  1994 और 2004 में बागेपल्ली की एक सीट जीती थी. उसे  मतदाताऒं का औसतन एक प्रतिशत समर्थन हासिल रहा है।  उसने प्रारम्भ में जद  ( सेकूलर ) के साथ गठबंधन में शामिल होने के संकेत दिए थे।  चुनावी  रूप से बेहद कमजोर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने  कांग्रेस से तालमेल कर चार सीटों पर प्रत्याशी खड़े करने के संकेत दिए हैं।

राज्य की कुल आबादी में से करीब 20 प्रतिशत हिस्सा लिंगायत समुदाय का है।  इस समुदाय का अनुमानित 100 सीटों पर प्रभाव माना जाता है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने खुद दो अप्रैल को मैसूर में कुछ मठों में जाकर आशीर्वाद लेने  के बाद चुनाव प्रचार शुरू किया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी मठों की चुनावी परिक्रमा  कर रहे हैं।  भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह भी मठों के चक्कर लगा रहे हैं।  राज्य के 30 जिलों में 600 से अधिक मठ हैं।  उन सबका सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव भी है. लिंगायत समुदाय के करीब 400 , वोकालिगा समुदाय के  करीब 150 और कुरबा समुदाय के लगभग 80  मठ हैं। ये मठ शिक्षा , स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में भी सेवारत हैं। इस कारण भी उन्हें समाज में श्रद्धा प्राप्त है।

भाजपा इस बार वोकालिगा समुदाय में पैठ के लिए  प्रयासरत है. उसकी तरफ से अमित शाह , केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार और सदानंद गौड़ा  चुनचुनगिरी मठ का दौरा कर चुके हैं ।  राज्य की आबादी में 12 प्रतिशत वोकालिगा समुदाय की है।  वोकालिगा समुदाय के 150 मठ हैं. इनमें अधिकतर दक्षिण कर्नाटक में हैं। भाजपा  ने राज्य में ‘नाथ सम्प्रदाय’  का समर्थन हासिल करने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं गोरख पीठ के मुख्य महंत  योगी आदित्यनाथ को भी चुनाव प्रचार में उतारा है। अमित शाह ने चित्रदुर्ग में प्रभावशाली दलित मठ , शरना मधरा गुरु पीठ के महंत मधरा चेन्नैया स्‍वामीजी से भी मुलाकात की। वैसे चुनाव प्रचार में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जबान लगातार फिसलने से उनकी जबरदस्त किरकिरी  हुई है । उन्होंने एक चुनाव रैली में  कहा कि ‘सबसे बड़ी भ्रष्ट सरकार  येदुरप्पा की है।’ येदुरप्पा  उस रैली में मंच पर विराजमान थे।  यह दीगर बात है कि भाजपा अध्यक्ष ने तुरंत अपनी भयानक भूल समझ  कह दिया कि वह दरअसल सिद्दारमैया सरकार के बारे में कहना चाहते थे।

अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट की  ‘छेड़छाड़’ से आक्रोशित दलितों -आदिवासियों की आबादी राज्य में बहुत ज्यादा नहीं है पर
उनके वोट कांग्रेस और भाजपा के बीच  बराबर की टक्कर होने की संभावना में निर्णयकारी हो सकते हैं। दलित समुदाय के बीच, भारत के संविधान और दलितों के खिलाफ  बयान देने वाले केन्द्रीय मंत्री अंनत कुमार हेगड़े और उनके कारण भाजपा का  भी जबरदस्त विरोध हो रहा  है। इसकी बानगी अभिनेता प्रकाश राज की प्रतिरोधक प्रतिक्रया  और फिर मैसूर के राजेंद्र कलामंदिरमें अमित शाह की सभा में दिखी। सुरक्षाकर्मियों को वहाँ से भाजपा अध्यक्ष को वापस ले जाना पड़ा।  गौरतलब है कि गत दिसंबर में केंद्रीय कौशल विकासएवं उद्यमिता मंत्री हेगड़े ने कर्नाटक में एक सभा में कहा था  कि मौजूदा संविधान  बदलना पड़ेगा।

कन्नड़ के मशहूर बुद्धिजीवी प्रो. कलबुर्गी और विख्यात पत्रकार गौरी लंकेश के ह्त्या  में  शक की सुई   हिन्दुत्ववादी  संगठनों पर होने से भी भाजपा के खिलाफ  पढ़े-लिखे, बौद्धिक लोगों और  लिंगायत समुदाय के संजीदा लोगों में भी नाराजगी  है। उधर , अरब सागर तटवर्ती मंगलुरू नगर और उसके पास के उडुपी  में बरसों से श्रीराम सेने , हिंदू युवा सेने , हिंदू जागरण वेदिके , बजरंग दल , विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठनों द्वारा उत्पन्न सांप्रदायिक हिंसा और उन्माद के दौर चलते रहे हैं।

मंगलुरु में मुसलमानों की ही नहीं कैथोलिक ईसाइयों की  भी खासी आबादी है। विभिन्न समुदायों के सम्पदा संपन्न धर्मस्थलों पर प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा आम हो चुकी है। बीबीसी की एक खबर के अनुसार पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद से वहाँ माहौल और भी खराब है। मंगलुरु के एक पब में हुई हिंसा के मामले में गिरफ़्तार अभियुक्त, श्रीराम सेने के प्रमुख प्रमोद मुथालिक को रिहा किया जा चुका है। दक्षिण कन्नड़ के कासरगोडा में  खाड़ी देशों में काम
करने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों के भेजे  पैसे से इस्लामिक संगठन भी चलते हैं। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया के महासचिव मोहम्मद इलियास थुम्बे ने दावा किया कि  “लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘बीफ़ जिहाद’ की आड़ में आरएसएस के संगठन  युवाओं को भड़का कर तनाव का माहौल पैदा करते हैं, मगर समाज का बड़ा तबका मिल-जुल कर रहना चाहता है.

मौजूदा विधानसभा में कांग्रेस को अपने विधायकों और अन्य को मिलाकर कुल 122 सदस्यों का बहुमत समर्थन हैं। भाजपा के 43 और जद (सेकूलर ) के 30 सदस्य हैं. किसी भी पक्ष को नई सरकार बनाने के लिए आवश्यक साधारण बहुमत के वास्ते 113 सीटें जीतने की दरकार है। बाज़ार -प्रायोजित पोल्स्टरों के चुनावी सर्वेक्षण हमेशा की तरह भ्रमित ही कर रहे हैं। इनमें से किसी के अनुसार इस बार किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा और जनादेश विखंडित निकलेगा। किसी और पोल्स्टर के अनुसार भाजपा की जीत की अच्छी संभावना है। पोल्स्टर फर्म सी -फोर ने तो चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के पहले ही भविष्यवाणी कर चुका है कि कांग्रेस को पिछली बार से अधिक सीटें मिल सकती हैं और भाजपा की भी सीटें बढ़ेंगी लेकिन जद  (सेकूलर )  को नुकसान  होगा। आरएसएस के मुखपत्र , ऑर्गेनाइज़र के पूर्व सम्पादक शेषाद्रि चारी ने ‘प्रिंट’  डिजिटल समाचार माध्यम में प्रमुखता से प्रसारित अपने आलेख में दावा किया कि कांग्रेस के लिंगायत कार्ड खेलने के बावजूद भाजपा ही जीतेगी। देखना है कि शेषाद्रि चारी की आशा ईवीएम  के जरिये कराये जाने वाले चुनाव में कितना कमल खिलाती है।

 

(चंद्र प्रकाश झा  वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें मीडिया हल्कों में सिर्फ ‘सी.पी’ कहते हैं। सीपी को 12 राज्यों से चुनावी खबरें, रिपोर्ट, विश्लेषण, फोटो आदि देने का 40 बरस का लम्बा अनुभव है।)