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‘जनता की ज़िम्मेदारी बताई, लेकिन सरकार की नहीं!’ मन की बात में काम की बात अब भी गायब..

पीएम ने कहा कि “यह लड़ाई जनता लड़ रही है” वो ये भी बताते तो शायद बेहतर होता कि जनता की इस लड़ाई में सरकार उसके किसी तरह साथ है?

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रविवार को प्रधानमंत्री एक बार फिर हम सब से मुख़ातिब थे। इस बार वीडियो पर नहीं, ऑडियो के ज़रिए। रविवार को मन की बात का प्रसारण हुआ, 30  मिनट के इस संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले से ज़्यादा संवादपूर्ण सुनाई दिए। उन्होंने इस कार्यक्रम में ख़ास तौर से अल्पसंख्यक समुदाय, मज़दूर, ग़रीब, किसान, डॉक्टर, सफ़ाई कर्मी, लगभग सभी को शामिल किया। ये भी बताया कि हमको अधिक संवेदनशील होना होगा। लेकिन जो सबसे ज़रूरी था उसे इस बार भी छोड़ दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “मन की बात” का ये 64वां संस्करण था। अपने पहले कार्यकाल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार मन की बात कार्यक्रम कर करे हैं। महीने के हर आख़िरी रविवार रेडियो पर प्रस्तुत होने वाला प्रधानमंत्री का कर्यक्रम “मन की बात” किस प्रकार जनता के हित में है!! और इसके क्या फ़ायदे देश की जनता को मिले? ये आगे जाकर किसी शोध का विषय हो सकता है लेकिन किसी देश के मुखिया का जनता के साथ इस प्रकार लगातार जुड़े रहना आकर्षक और काफ़ी दिलचस्प तो है ही, इसमें कोई दो राय नहीं। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कर्यक्रम में इस बार वो बातें भी शामिल थीं, जो कई बार नदारद रहती हैं। इस प्रसारण में प्रधानमंत्री ने देश के अल्पसंख्यक समुदाय को खुल कर जगह दी और उसे लेकर खुल कर बोले। 

प्रधानमंत्री ने अपने 64वें मन की बात कार्यक्रम में कहा, “सारी दुनिया एक बड़े संकट का सामना कर रही है। पिछले रमज़ान में किसने सोचा होगा कि अगले रमज़ान इस तरह से मनाने पड़ेंगे, पर अब ऐसा है तो है..इसे स्वीकारना होगा.” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे कहा कि इस बार रमज़ान में दोगुनी इबादत का मौक़ा है, और इस रमज़ान को संवेदनशीलता, सद्भाव, धैर्य और सेवा का प्रतीक बनाने का मौक़ा है।”  

प्रधानमंत्री ने एक बार फिर उन सभी का शुक्रिया अदा किया जो इस महामारी के समय फ्रंटलाइन पर हैं और लगातार लड़ रहे हैं। अपने संवाद की ख़ास शैली के लिए पहचाने जाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे कहा, “एक समय की बात है जब फल केवल बीमार व्यक्ति के लिए ही खरीदे जाते थे. फिर धीरे धीरे स्वस्थ लोग भी इसका इस्तेमाल करने लगे ओर्ये साधारण हो गया. इसी प्रकार मास्क स्वस्थ लोगो के लिए भी लाभकारी है. और जल्दी आप देखेंगें कि यह एक सभ्य समाज का प्रतीक बन जाएगा.” हालांकि इसका अर्थ पीएम ने साफ नहीं किया कि क्या वो ये कहना चाहते थे कि कोरोना का संकट अभी कम नहीं होने वाला, बल्कि और गहराने वाला है और इसलिए जनता को मास्क पहनने को आदत बना लेना चाहिए?

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “COVID-19 ने हमारी जीवन शैली पर जबरदस्त प्रभाव डाला और जिसके चलते हमारे जीवन में कई बेहतर बदलाव देखने को मिले. सार्वजनिक स्थल पर हमने थूकने की बुरी आदत से छुटकारा पाया. और इसके नुक्सान देखे, अब समय है कि इस बुरी आदत को सदा के लिए हमें छोड़ देना चाहिए।” ये बात बेहद अहम है पर दरअसल उनके स्वच्छ बारत अभियान का एक्सटेंशन जैसा ही प्रतीत हुआ। 

हालांकि बीच प्रधानमंत्री थाली और ताली को एक ज़बरदस्त क़दम बताने से नहीं चूके। उन्होंने कहा, “थाली, ताली, मोमबती और दिये ने कुछ कर गुज़रने की भावनाओं को जन्म दिया है. और इस कारण देश वासियों ने कुछ कर गुज़रने की ठान ली. और हर किसी को इन बातों ने प्रेरित किया” PM ने इस बारे में भी साफ नहीं किया कि इस कदम ने लोगों को एक-दूसरे की मदद करने के लिए या कोरोना से बचने के लिए कैसे प्रेरित किया? किस तरह प्रेरित किया और इसके अब तक देश वासियों को क्या-क्या फ़ायदे पहुँचे? क्योंकि इसी के ठीक अगले दिन से, तमाम शहरों में लगातार भेदभाव, अल्पसंख्यकों पर हमले और मेडिकलकर्मियों को घर खाली करने के फ़रमान जैसी ख़बरें आती रही हैं।  

प्रधानमंत्री ने हमेशा की तरह इस बार भी किसानों को भरपूर श्रेय दिया। उन्होंने कहा, “हमारे पास अनाज के भंडार है यह किसान की कड़ी मेहनत का नतीजा है।” उन्होंने कहा किसान ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि कोई भूखा न सोये लेकिन संकट के इस भयावह दौर में किसानों के लिए सरकार ने क्या सुनिश्चित किया है – ये भी यह मन की बात में कहीं सुनाई नहीं दे सका।  

लगभग तीस मिनट का यह प्रसारण एक प्रकार कॉम्बो पैक था, जिसमें सभी कुछ था। उन्होंने जनता से योगदान की भी अपील की, ‘एक ही प्लेटफॉर्म पर..’ प्रधानमंत्री ने कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ इस लड़ाई को जनता की लड़ाई बताया। उन्होंने कहा कि “यह लड़ाई जनता लड़ रही है” वो ये भी बताते तो शायद बेहतर होता कि जनता की इस लड़ाई में सरकार उसके किसी तरह साथ है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीस मिनट के इस कार्यक्रम में बहुत प्यारे अंदाज़ में बेहद ज़मीनी बाते की और छोटे से छोटे बिंदु को इसमें शामिल किया। मगर टेस्टिंग किट? इस महामारी से निपटने के लिए हमारे पास क्या तैयारी है? और हम इसमें कहाँ तक पहुँचे हैं? अभी मौजूदा समय में सरकार  क्या क़दम उठा रही है? और क्या उठाना बाक़ी है? अप्रवासी मज़दूरो का मुद्दा? जाती हुई नौकरीयाँ? लॉकडाउन के कारण कमज़ोर वर्ग की बढ़ती समस्या!! लॉकडाउन से जनता को कब तक राहत मिलने की उम्मीद है? या सरकार इस पर क्या कर रही है? यह सभी कुछ नदारद रहा? 

प्रधानमंत्री का इस तरह जनता से जुड़ना बात करना आकर्षक लगता है पर इसका हासिल क्या उतना है, जितना हो सकता है? या फिर इसके ज़रिए हमेशा की तरह प्रधानमंत्री अपनी बातचीत की कुशल शैली से चलते मुख्य बातो को फिर से छुपा ले गए?  

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