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योगी सरकार ने चंद्रशेखर ‘रावण’ पर रासुका की अवधि तीन महीने और बढ़ाई !

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फ़िल्म पद्मावत को लेकर यूपी समेत कई राज्यों में करोड़ों की संपत्ति का नुकसान करने वाले करणी सेना के उत्पातियों के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) के तहत कार्रवाई की बात तो छोड़िए नेताओं के मुँह से बोल भी नहीं फूट रहे हैं। ‘क्षत्रिय कुल भूषण’  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हों या गृहमंत्री राजनाथ सिंह, किसी ने करणी सेना की कार्रवाइयों की निंदा नहीं की, लेकिन मई में सहारनपुर एक गाँव में हुई हिंसा भड़काने के आरोप में भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद “रावण” पर लगी रासुका को तीन महीने के लिए फिर बढ़ा दिया गया है।

न्याय का यह अद्भुत दृश्य हम यूपी में देख रहे हैं जहाँ सदियों से चुप्पी साधकर अन्याय करने वालों का छोटा सा प्रतिवाद भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा मान लिया जाता है।  नेता जी सुभाषचंद्र बोस जयंती यानी 23 जनवरी को यूपी के उपसचिव (गृह) विजय शंकर पांडेय की ओर से इस सिलसिले में जारी आदेश में कहा गया है कि मुज़्ज़फ़रनगर के ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की, 1980 की धारा 12 (1) को छह महीने के लिए लागू कर दिया गया है। (2 नवंबर 2017 से लागू)

ग़ौरतलब है कि सहानरपुर के शब्बीरपुर गाँव में मई 2017 में दलितों और क्षत्रिय समुदाय के लोगों के बीच हिंसक टकराव हुआ था। भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण को इस सिलसिले में दोषी क़रार देते हुए प्रशासन ने जेल भेज दिया था। 2 नवंबर 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी थी, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने रासुका लगाकर यह सुनिश्चित किया कि चंद्रशेखर जेल से बाहर न आने पाएँ।

नियमों के मुताबिक रासुका एक बार में तीन महीने की अवधि तक ही लगाई जा सकती है। बाद में इसे तीन-तीन महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है। इसलिए चंद्रशेखर को जेल में ही बनाए रखने की योजना के तहत यूपी सरकार ने यह क़दम उठाया है।

भीम आर्मी के नेताओं ने यूपी सरकार के इस रुख की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि दलित उत्पीड़न के सवालों को मुखर तरीके से उठाने के कारण ही चंद्रशेखर आज़ाद को जेल से बाहर आने नहीं दिया जा रहा है।

ग़ौरतलब है कि गुजरात के हालिया चुनाव में विधायक चुने गए जिग्नेश मेवानी चंद्रशेखर की रिहाई के मसले पर संसद मार्ग पर प्रदर्शन कर चुके हैं, लेकिन यूपी के दलित नेताओं ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। हद तो यह है कि बीएसपी प्रमुख मायावती भी चंद्रशेखर और जिग्नेश के ख़िलाफ़ बोल चुकी हैं।

दलितों के स्थापित नेतृत्व के इस रुख को लेकर लोगों में काफ़ी ग़ुस्सा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रनेता और सक्रिय राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता रामायाण राम ने फ़ेसबुक पर लिखा है  —

Ramayan Ram

“करणी सेना के आवरण में राजपूतों ने कई राज्यों में जितना बवाल और सार्वजनिक संपत्ति की क्षति की है उसका दस प्रतिशत भी सहारनपुर में दलितों ने नहीं की थी।सहारनपुर की हिंसा पुलिस के अनावश्यक हस्तक्षेप से फैली थी।जिसमे किसी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं हुआ था।इसके पहले शब्बीरपुर गांव के दलितों पर संगठित हमला हुआ था उसके बाद मायावती की सभा से लौटते हुए लोगों पर हमला करके दो लोगों की हत्या कर दी गई थी,बावजूद इसके आजतक चन्द्रशेखर रावण जेल में है उनपर रासुका तामील की गई है।…और करणी सेना का प्रमुख चैनलों में इंटरव्यू दे रहा है।अब कोई एंकर उसकी ओर देख कर चीख नहीं रहा है।उल्टे राजपूती शान के कसीदे काढ़े जा रहे हैं।इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा देश का लोकतंत्र मनुवाद की जंजीरों में जकड़ा है।”

 



 

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