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अमित शाह के एजेंडे पर ‘आज तक’ ! टीआरपी मिले तो दाग़ अच्छे हैं !

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बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह और हिंदी के एक नंबरी चैनल ‘आज तक’ में क्या समानता है ?

आप कहेंगे कि यह कैसा बेतुका सवाल है। लेकिन है जनाब, बड़ी समानता है। अमित शाह को हर हाल में क़ामयाबी चाहिए। दाग़ की कोई परवाह नहीं है। येदियुरप्पा हों या सुखराम। वोट दिलाते हों तो स्वागत है। भावनाएँ भड़कें या दंगा हो, वोट बरसे तो स्वागत है।

और एस.पी. (सुरेंद्र प्रताप सिंह) द्वारा स्थापित ‘आज तक’ के लिए भी अब ‘दाग़’ अच्छे हैं। उसका भी एक ही मंत्र है- टीआरपी आए, चाहे जैसे आए।

आरोप के शिल्प में बड़बड़ाने से का क्या फ़ायदा। तथ्य है ?

अच्छा, तो पहले इस वाक़ये से गुज़रिए जिसका ग़ुबार अभी हवा में है।

आमतौर पर ऐसा नहीं होता। लेकिन हुआ। एबीपी न्यूज़ ने 14 नवंबर को खुलकर लिखा कि उसने तीन साल पहले अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम की जिस ख़बर को दिखाया था उसे ही अब टीवी चैनल नया कहकर बेच रहे हैं..

आख़िर कौन था वह चैनल जिसने एबीपी की तीन साल पुरानी ख़बर को चुराकर बेच दी.? एबीपी ने नाम नहीं लिखा। लेकिन उस चैनल का लोगो काटकर एक स्क्रीन शॉट लगाया।

अब जानना मुश्किल न था। वह था हमारे देश का नंबर एक चैनल ‘आज तक’। जिसे फ़ख्र है कि न्यूज़ चैनल इंडस्ट्री के जन्म से ही वह सरताज है। एबीपी ने जिस फ्रेम से लोगो काटा, वह यहाँ पूरा है..आज तक

बहरहाल, ‘आज तक’ को फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कौन क्या कह रहा है। चैनल की संपादकीय टीम के आला लोग इस ख़बर को फ़ैलाने में जुटे हैं। टीआरपी मिलती है भाई.. साथ में मोदी का तड़का भी है। तीन साल पुरानी ख़बर को ताज़ा बनाकर बेचता ‘आज तक’ यह भी बता रहा था कि मोदी के पीएम बनने दाऊद डर गया। डेस्क पर बनी इस पूरी ख़बर के लिए रिपोर्टर अरविंद ओझा, दफ़्तर से ही पीटीसी कर रहे थे और टॉप बैंड पर लिखा हुआ था-टीवी पर पहली बार दाऊद की आवाज़ सुनिए।

दरअसल, टीआरपी चार्ट बताता है कि दाऊद की ख़बरें बिकती हैं। आप बिना प्रमाण कोई भी क़िस्सा कभी भी पेश कर दीजिए, लोग आँख फाड़कर देखेंगे। जनता आतंकित होती है और अंडरवर्ल्ड भी कुछ नहीं कहता। उसे अपने बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कही बातें धंधे के लिए बेहतर लगती हैं। इससे उसकी उगाही का रेट बढ़ता है..( सेठ.. दो नहीं तीन खोखा भेज..नहीं भेजा उड़ा दूँगा..भाई का आदमी बोल रहा हूँ.. क्या..!)

ऐसा नहीं कि किसी ग़फ़लत में ऐसा किया जाता है। ‘आज तक’ के असिस्टेंट एडिटर मुकेश के गजेंद्र ने 13 नवंबर को फे़सबुक (जहाँ उनके परिचय में पत्रकार के साथ लेखक और वक्ता भी लिखा है) दाऊद के ख़ुलासे से जुड़ी ख़बरों के लिंक शेयर किए। एक में बताया गया था कि कौन सा फ़िल्मी गाना दाऊद के मोबाइल फोन का कॉलर ट्यून है..’.दिल्ली आज तक’ के ऐंकर पुनीत शर्मा का दिल धड़का और उन्होंने लिख दिया कि चार साल पहले उन्होंने यह कॉलर ट्यून वाली स्टोरी आज तक पर ही की थी। लेकिन शर्मिंदा हो तो नंबर वन कैसा’…रिपोर्टर अरविंद ओझा ने तुरंत जवाब लिखा–‘पर कुतर दिया जाएगा..कम उड़ो !’

वैसे, क्या इस पुरानी कहानी को ताज़ा बनाकर महान मोदी से (दाऊद डर गया) जोड़ने का कोई रिश्ता गुजरात चुनाव से भी है। आजकल  ‘आज तक’ के तमाम कार्यक्रमों को देखिए तो लगता है कि मोदी और अमित शाह के मन की बात चल रही है। ‘आज तक’ की नज़र में गुजरात चुनाव में बीजेपी ‘राष्ट्रवाद’ का प्रतीक है जबकि उसके विरोधी जातियुद्ध चाहते हैं..! ऐसे कार्यक्रमों को पेश करते हुए ‘राष्ट्रवादी ऐंकर’ अंजना ओम कश्यप की भाव भंगिमा देखने लायक़ होती है।

‘आज तक’ बताता है कि आरक्षण का मुद्दा उठाने वाले हार्दिक पटेल जैसे लोग ‘जातिवादी’ हैं। अल्पेश और जिग्नेश विकास का पहिया रोकना चाहते हैं। ‘राष्ट्रवाद’ के विरुद्ध है उनका अभियान।

ख़ैर चैनल को हक़ है कि राजा का बाजा बजाए, लेकिन अंजना ओम कश्यप जैसे ऐंकर ऐसा करते हुए जैसे आरक्षित वर्ग की जनता के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ देती हैं। चेहरे से वर्ग और वर्णघृणा टपकती है और भाषा से अज्ञान।

आइये कुछ उदाहरण देखें। पिछले दिनों जिग्नेश और हार्दिक के साथ चर्चा कर रहीं अंजना ने कहा —

‘पटेल होकर सोचते हैं, भारतीय होकर आप नहीं सोचते हार्दिक ‘

‘जाट आरक्षण वैसे ही मांग रहा है, अगर सब आरक्षण मांग रहे हैं तो फिर काबिलियत तो सौ गज जमीन के नीचे दफ्न हो जाएगी हमेशा के लिए..’

‘आर्थिक आधार पर आरक्षण क्यों नही…?’

‘क्या सवर्ण किसान परेशान नहीं है, सवर्ण क्या बेरोजगार नहीं है..आप बांट रहे हैं..!’

हद तो तब होती है जब अंजना झोंक में यह भी कह जाती हैं कि डॉ.अंबेडकर ने आरक्षण हटाने की बात कही थी। शायद उन्होंने वह अफ़वाह सुनी होगी जो विधायिका में दस साल बाद आरक्षण की समीक्षा को शिक्षा और नौकरी में आरक्षण ख़त्म करने से जोड़ती है।

अब अंजना को कौन बताए कि आरक्षण ग़रीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं प्रतिनिधित्व के लिए लाया गया था और सत्तर साल बाद भी बड़े पैमाने पर आरक्षित पद खाली पड़े हैं। लेकिन अंजना या ‘आज तक’ के कई दूसरे ऐंकर भी पूरी तरह शहरी सवर्ण मध्यवर्ग की आरक्षण विरोधी भावनाओं से उपजे तर्क ही उगलते हैं। इसके लिहाज़ से देश में हिंदू के नाम पर राजनीतिक गोलबंदी ‘राष्ट्रवाद’ है जबकि आरक्षण जैसी बातें ‘जातिवाद’… हालाँकि जाति के उन्मूलन से उसे कोई लेना-देना नहीं है। उसे लगता है आरक्षण उनके अधिकार पर डाका है पर भीषण बेरोज़गारी को जन्म देने वाले वाले अर्थतंत्र से उसे कोई शिकायत नहीं है। यह शहरी सवर्ण मध्यवर्ग ही बड़े पैमाने पर टीआरपी को प्रभावित करता है।

वैसे, डॉ.अंबेडकर ने कहा था कि जब तक जाति मौजूद है भारत राष्ट्र बन ही नहीं सकता। पर यहाँ ‘राष्ट्र’ किसी पार्टी या नेता का पर्याय है। ‘सवर्ण न्यूज़ रूम’ और ‘आरक्षण विरोध’, इस राष्ट्रवाद के लिए मणि कांचन संयोग रचता है।

‘आज तक’ के संस्थापक संपादक एस.पी.सिंह वह पत्रकार थे, जिन्होंने मंडल कमीशन और सामाजिक न्याय के अन्य सवालों का भरपूर स्वागत किया था। होते तो शायद अंजना जैसे ऐंकरो को कान पकड़कर निकाल बाहर करते।

यह सिर्फ़ एक या दूसरे ऐंकर या रिपोर्टर का मसला नहीं है। यह तो संपादकीय नीति है। वरना अंजना ओम कश्यप को ऑफ़स्क्रीन होना पड़ता, अगर सुधरती नहीं। पर संपादकों को तो टीआरपी रेस में सिर्फ़ जीत चाहिए। बिलकुल अमित शाह की तरह।

अमित शाह जहाँ जीत नहीं पाते, वहाँ तोड़ लेते हैं। अपनी ताक़त बढ़े न बढ़े, विरोधी कमज़ोर हो जाता है। यही  ‘आज तक’ की भी नीति हो गई है। कुछ समय पहले, ज़ी न्यूज़ में सुधीर चौधरी का ‘डीएनए’ बनाने वाली टीम के दो प्रोड्यूसर तोड़े गए थे, क्योंकि रात नौ बजे ज़ी न्यूज़, आज तक को टीआरपी रेस में परेशान करता था। वहीं कुछ दिन पहले जब ज़ी न्यूज़ में ‘ताल ठोंक के’ को टीआरपी मिलने लगी तो इसे पेश करने वाले रोहित सरदाना को तोड़ लिया गया। अब रोहित आज तक पर ‘दंगल’ कर रहे हैं। पता नहीं कितना लाभ होगा लेकिन दुश्मन तो कमज़ोर हो ही गया। वैसे भी, रोहित “हिंदू-मुस्लिम” के नाम पर रोज़ ताल ठोंकते थे, वही ‘उन्माद’ आज तक को अपने पर्दे पर चाहिए। टीआरपी मिले, देशा का अमन-चैन जाए भाड़ में। (वैसे, यह मामला टीआरपी के साथ-साथ संपादकों, ऐंकरों, रिपोर्टरों और प्रोड्यूसरों की कमाई से भी जुड़ा है।)

तो यही सब करते हुए ‘आज तक’ नंबर वन है। इधर तो रंग कुछ ज़्यादा ही बदरंग हो गया है। ऐसा लगता है कि जब से टीवी टुडे की कमान अरुण पुरी की बेटी, कली पुरी के हाथ आई है, पत्रकारीय मर्यादा की तमाम लक़ीरों पर डस्टर फेर दिया गया है। बाप से मिला खिलौना बेटी खेल रही है। टूटे चाहे बचे। एस.पी.सिंह के नाम होने वाले कार्यक्रमों में ख़ुद को उनका शिष्य बताते नहीं अघाते ‘आज तक’ के संपादक सुप्रिय प्रसाद को फ़र्क़ नहीं पड़ता। उनकी तो जैसे लॉटरी लगी हुई है। उन्हें दिमाग़ पर ज़ोर नहीं देना पड़ता।

दिमाग़ लगाने की ज़रूरत भी क्या है। ‘गाँधीवादी समाजवाद’ की बात करने वाली बीजेपी  संसद की दो सीटों पर सिमट गई थी। फिर मंदिर-मंदिर करते उसने देश की सत्ता संभाल ली। अमित शाह ने मुज़फ्फ़रनगर में ‘बदला लेने’ का आह्वान किया और बीजेपी को लखनऊ की गद्दी मिल गई। जब विलेन पर तालियाँ बज रही हों तो हीरो कौन बने। सुप्रिय प्रसाद ने यह ‘गुरुमंत्र’ पा लिया है।

वैसे, ‘गहरा विश्लेषण’ और ‘भरोसा’ जैसे जुमले अभी भी उछाले जा रहे हैं। जुमलों के मामले में भी ‘आज तक’ की राय वही, जो अमित शाह की।

ख़ैर इतिहास का चक्र रुकता कहाँ है। यह समय भी बदलेगा। कभी अमित शाह तड़ीपार थे, जेल में थे। आज देश के नंबर दो हैं। ‘तड़ीपार’ सुप्रिय प्रसाद भी किए गए थे ‘आज तक’ से, आज नंबर वन हैं। उन्हें हर हाल में एक नंबरी बने भी रहना है वरना जो ‘लिफ़्ट’ कराता है, वह नीचे भी उतार सकता है।

वैसे , देश में क़ानून का राज तो है नहीं कि कोई डरे…इस पत्रकारिता को तड़ीपार होना पड़े। देखिए कब तक चलता है ये सब।

.बर्बरीक



 

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