Home पड़ताल आठ सौ शिक्षा-मित्रों की लाश पर अयोध्‍या में बनेगा राम मंदिर?

आठ सौ शिक्षा-मित्रों की लाश पर अयोध्‍या में बनेगा राम मंदिर?

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सत्‍येन्‍द्र सार्थक

उत्तर प्रदेश सरकार ने 6 नवंबर को अयोध्‍या में 3,01,152 दीये जलाकर विश्व रिकार्ड बनाया। 2017 में 1,75,000 हजार दीये एक साथ जलाकर रिकार्ड बनाने की कोशिश तकनीकी खामियों के कारण सफल नहीं हो सकी थी। सबक लेते हुए इस बार पहले ही गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकार्ड की टीम को 9 लाख रुपए खर्च कर बुला लिया गया था। 2017 के दीपोत्सव कार्यक्रम पर 126 करोड़ खर्च कर सरकार ने 133 करोड़ की परियोजनाओं की घोषणा की थी। योजनाओं की जमीनी हकीकत से अयोध्यावासी रूबरू हो सकें, इसके पहले ही 176 करोड़ की परियोजनाओं की और घोषणा कर दी गई जिसमें भगवान राम के नाम पर एयरपोर्ट और उनके पिता राजा दशरथ के नाम पर मेडिकल कालेज खोला जाना शामिल है। छोटीदीवाली को समाप्त हुए तीन दिवसीय भव्य दीपोत्सव कार्यक्रम की तैयारी में शासन-प्रशासन महीनों से व्यस्त था। पांच देशों के कलाकारों ने इसमें हिस्सा लिया, दीयों में 14 हजार लीटर तेल डाले गए, 6 हजार से अधिक वालंटियर्स ने व्यवस्था और 35 हजार पुलिसकर्मियों ने सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली थी। जाहिर है खर्च पिछली बार से अधिक हुआ होगा। लगे हाथ मुगलसराय, इलाहाबाद की तर्ज पर फैजाबाद का नाम भी बदल दिया गया। अब यह अयोध्या के नाम से जाना जाएगा।

दीयों की रोशनी, लेजर लाइटों की चकाचौंध, देशी-विदेशी कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुति, सुरक्षाकर्मियों की भारी संख्या और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच आम अयोध्यावासी की उपस्थिति कहीं गुम हो गई। दो वर्ष  से अयोध्‍या दीपोत्सव के नाम पर हो रहा यह आयोजन भले ही अयोध्या की ऐतिहासिक परंपरा के नाम पर किया गया हो लेकिन आयोजन पर पूरी तरह से पार्टी विशेष का कब्जा था, गोया कोई राजनीतिक आयोजन हो। अयोध्या आयोजन का आभामंडल सराबोर ही था कि 5 नवंबर को अखिल भारतीय संत समिति ने कहा कि जिन लोगों की आस्था गाय, गंगा, गीता, गायत्री और गोविंद में उन्हें एक बार फिर नरेन्द्र मोदी सरकार को वोट देकर सत्ता में लाना चाहिए। बताया गया कि समिति इस उद्देश्य के साथ देश में 500 से अधिक बैठकें करेगी। संतों के खुलकर भाजपा के पक्ष में आने के कारण कई सवालों ने सिर उठा लिया।

क्या 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर मंदिर निर्माण के मुद्दे को एक बार फिर उभारने की कोशिश हो रही है? क्या राजनीतिक उद्देश्य के तहत आयोजन किया गया था? क्या अयोध्या में फिर से 1992 जैसे हालात हो सकते हैं? इन सवालों को दरकिनार कर समझना मुश्किल हो जाएगा कि मितव्ययिता के नाम पर सरकारी नौकरियों पर रोक लगाने वाली सरकार अरबों रुपए किस प्राथमिकता के आधार पर बहा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी सरकार ने व्यय प्रबंधन एवं प्रशासनिक व्यय में मितव्ययिता बरतने का तर्क देकर 18 सितंबर से दिशानिर्देश के जरिए वर्तमान वित्तीय वर्ष में चिकित्सा एवं पुलिस के अलावा अन्य विभागों में नई नियुक्तियों पर रोक लगा दी है। दिशानिर्देश में प्रशासनिक फिजूलखर्ची को भी नियंत्रित करने को भी कहा गया है, जो जाहिर करते हैं कि सरकार जनहित के अतिरिक्त खर्च करने को लेकर बेहद संवेदनशील है। 6 नवंबर को अयोध्या में आयोजित दीपोत्सव कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने भगवान राम की 151 मीटर ऊंची मूर्ति बनवाने की घोषणा की। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में यह राम की सबसे ऊंची मूर्ति होगी जिसे स्थापित करने में 2500 करोड़ रुपए खर्च होंगे। सरकार की प्राथमिकता और भगवान राम को लेकर सक्रियता सहज सवाल खड़े करती है कि आखिर जब राम मंदिर से जुड़ा मसला सुप्रीम कोर्ट मे है तो, बिना फैसले का इंतजार किए जनसामान्य को प्रभावित करने को माहौल क्यों बनाया जा रहा है?

देश में राम और राम मंदिर को लेकर कुछ दिनों में ऐसा माहौल बना दिया गया है कि इसके शोर में जनहित के मुद्दे दबते जा रहे हैं। अयोध्या में मंदिर बनवाने के समर्थन में नेताओं के बेतुके बयानों ने हालत और मुश्किल कर दिए हैं। राजनीतिक गोटियां सेट करने के लिए नेता संवैधानिक संस्थाओं तक की भी परवाह नहीं कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट को हिंदुओं की भावनाओं का ख्याल रखने की सलाह दी जा रही है। उक्त संदर्भ में ही संवैधानिक पद पर विराजमान मुख्यमंत्री स्वयं कह चुके हैं कि “न्याय में देरी अन्याय के समान होती है”। यहाँ तक कि दक्षिणपंथी संगठन के नेता राम मंदिर के लिए 1992 जैसा आंदोलन करने की बात कह रहे हैं, हालांकि उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि आंदोलन किसके खिलाफ होगा केन्द्र सरकार, राज्य सरकार या सुप्रीम कोर्ट?

2017 में विधानसभा चुनावों में जारी लोक कल्याण संकल्प पत्र में भाजपा ने वादा किया था कि संविधान के दायरे में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सभी संभावनाओं को तलाशा जाएगा“। कई अन्य लोक लुभावन वादों के अलावा अगले 5 वर्षों में 70 लाख युवाओं को रोजगार व स्वरोजगार के अवसर देने, प्रदेश की 90 प्रतिशत नौकरियों को प्रदेश के युवाओं के लिए आरक्षित करने, 90 दिनों के अंदर सभी रिक्त पदों पर भर्ती और प्रत्येक घर के एक सदस्य को मुफ्त कौशल विकास प्रशिक्षण की व्यवस्था करने की बात कही थी। इन्हीं मुद्दों पर प्रदेश के युवाओं ने वोट किए थे। सरकार यदि इन वादों को पूरा करने के रास्तों की तलाश करती तो लाखों युवाओं के सपने पूरे होते पर यह सरकार की प्राथमिकताओं से कोसों दूर है।

उत्तर प्रदेश में रोजगार के लिए युवाओं का पलायन आज भी बड़ी समस्या है। कुछ दिनों पहले ही यहां से रोजगार के लिए गुजरात गए युवाओं को जबरन वहां से भगाया जा रहा था, यदि उत्तर प्रदेश में उनके पास विकल्प होते तो निश्चित तौर पर वह अमल जरूर करते। समायोजन रद्द होने से शिक्षामित्रों की आत्महत्या का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा, 32022 अंशकालिक शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद अनुदेशकों व सहायक उर्दू शिक्षकों की भर्ती सरकार निरस्त कर चुकी है। 68500 शिक्षकों की भर्ती मे जमकर भ्रष्टाचार हुआ, जिसे छुपाने के लिए अभ्यर्थियों की कापियों को जला दिया गया। हालांकि लगातार प्रदर्शनों के दबाव में सीबीआई जांच करवाई जा रही है। नौकरी की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे टीईटी अभ्यर्थियों, बीटीसी शिक्षकों पर कई बार लाठी चार्ज हो चुका है। सोशल मीडिया पर वायरल लहुलुहान उनकी तस्वीरें रोजगार के लिए उनके संघर्ष और सरकार की मंशा दोनों स्पष्ट कर रही हैं।

प्रदेश में इन हालात के बाद भी सरकार बेरोजगारी के मुद्दे को प्राथमिकता में क्यों नहीं रख रही है? अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ओर से प्रकाशित एक सर्वेक्षण स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 के अनुसार बीते 20 वर्षों में देश में बेरोजगारों की संख्या सर्वाधिक रही है। देश में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई, रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश की स्थिति और भी ज्यादा खराब है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी के मार्च की रिपोर्ट बताती है कि अकेले नोटबंदी के कारण 35 लाख नौकरियां चली गईं जिसका प्रदेश लघु एवं कुटीर उद्योगों पर बुरा प्रभाव पड़ा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में बेरोजगारी की दर 6.5 प्रतिशत है जबकि पूरे देश का औसत 5.8 प्रतिशत है। श्रम मंत्रालय के 2015-16 आंकड़ों पर गौर करें तो देश में प्रत्येक 1000 पर 37 बेरोजगार थे जबकि प्रदेश में यह संख्या 58 थी। 18 से 29 वर्ष उम्र के लोगों में यह आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर पर 102 था तो प्रदेश में 148। विशेषज्ञों की राय में वर्तमान आंकड़े और भी भयावह हो सकते हैं और चूंकि 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं, इसी वजह से सरकार ने रोजगार के आंकड़ों को जारी करने पर रोक लगा दी है।

बीपीएड संघर्ष मोर्चा के जिलाध्यक्ष देवेन्द्र पांडेय बताते हैं कि 32022 बीपीएड शिक्षकों की भर्ती में किसी तरह का विवाद नहीं था। सारी प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी 4 अप्रैल 2017 को पहली काउंसलिंग के बाद मेरिट के आधार पर केवल नियुक्ति दी जानी थी। इसके बावजूद सरकार ने 23 मार्च को सरकार ने नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी। मोर्चे की अपील पर 3 नवम्बर 2017 को हाईकोर्ट ने रोक हटाकर 4 महीने के अंदर प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया। कोर्ट का आदेश मानने के बजाए सरकार डबल बेंच में चली गई। डबल बेंच ने भी पीड़ितों के पक्ष में फैसला दिया, इसके बाद भी सरकार ने भर्ती को ही निरस्त कर दिया। सरकार के फैसले से निराश देवेन्द्र कहते हैं कि हम लोग 7 हजार प्रतिमाह के सैलरी के लिए 8 साल से संघर्ष कर रहे हैं, इस दौरान उन्नाव के जिलाध्यक्ष पवन सहित आधा दर्जन अभ्यर्थियों की मौत हो चुकी है। मुख्यमंत्री से 33 मुलाकातें हो चुकी हैं, जिनका नतीजा शून्य है।

आगरा जिले के अछनेरा ब्लाक में तैनात शिक्षामित्र राजेन्द्र ने 9 नवंबर को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। समायोजन रद्द होने से आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहे राजेन्द्र महीनों से गुमसुम रहते थे। उनके बाद परिवार में अब तीन बेटियां, बेटा, पत्नी और बूढ़े मां-बाप रह गए हैं। आगरा में बीते 7 महीने में यह छठवें शिक्षामित्र की मौत है। उत्तर प्रदेश शिक्षामित्र संघ के प्रदेश अध्यक्ष गाजी इमाम आला बताते हैं कि शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द होने के बाद से 800 से अधिक शिक्षामित्रों ने आत्महत्या कर ली या अवसाद में जाने से उनकी मौत हो गई। हालांकि अभी भी गाजी इमाम व उनके साथियों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है, वह कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार साथ दे तो हमारे समायोजन की उम्मीद बढ़ जाएगी।

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