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लोया प्रकरण में शक की सुई सिर्फ अमित शाह तक नहीं घूमती !

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विकास नारायण राय

क्या जज लोया को इसलिए मरना पड़ा कि उन्हें बदला नहीं जा सकता था? उनसे पूर्व सोहराबुद्दीन फर्जी पुलिस मुठभेड़ की सुनवाई करने वाले सीबीआई जज को, जो अमित शाह की अदालत के सामने उपस्थिति पर जोर दे रहा था, बदल दिया गया था. ऐसे में लोया को भी बदलने का मतलब बेवजह सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान इस न्यायिक फर्जीवाड़े की ओर खींचना होता.

हालाँकि अब, जज की अकाल मृत्यु के तीन वर्ष बाद, उस प्रकरण का सबसे विवादास्पद हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के मंच पर ही खेला जा रहा है. एक तरह से यह उसी जाने-माने अपराध बोध का प्रतिबिम्ब है कि गुनाह करने वाला अपने पद चिन्ह न भी छोड़े लेकिन उस पर पर्दा डालने के प्रयास में वह प्रायः बेपर्दा होता जाता है. इसीलिए लोया के बेटे के ‘कोई शक नहीं’ वाले बयानों से भी संदेह के उमड़ते बादल छंट नहीं पा रहे.  

सोहराबुद्दीन झूठी पुलिस मुठभेड़ में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि पूरे मामले की सुनवाई पूरी होने तक सीबीआई जज को बदला न जाये. लिहाजा कुछ समय पहले सीबीआई कोर्ट के जज लगे लोया को बदलने के बजाय उन्हें खरीदने की कोशिश हुयी. और, अंततः, उनकी अकाल मृत्यु ने मुंह माँगा अवसर दिया और एक लचीले जज को लगा कर अमित शाह को ‘डिस्चार्ज’ करा लिया गया.

लोया और उनके पूर्ववर्ती सीबीआई जज उत्पट, दोनों अमित शाह की सीबीआई कोर्ट में उपस्थिति पर जोर क्यों दे रहे थे? और क्यों अमित शाह उनके समक्ष अदालत में आने से बच रहे थे? क्योंकि मामला ‘चार्ज’ लगाने के लिए लंबित था. न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार ‘चार्ज’ लगाने के समय अभियुक्त को अदालत में होना चाहिए. यदि उत्पट और लोया अमित शाह की उपस्थिति पर जोर दे रहे थे तो इसका मतलब यही हो सकता था कि वे शाह पर ‘चार्ज’ तय करने जा रहे थे.

लोया की मृत्यु के बाद आये लचीले जज का इरादा पहले से तय लगता है. उन्होंने लोया को ‘डिस्चार्ज’ करते हुए यहाँ तक टिप्पणी की कि अमित शाह को राजनीतिक कारणों से मामले में फंसाया गया है. कमाल की टिप्पणी हुयी यह. न सीबीआई की चार्जशीट में किसी राजनीतिक आयाम का जिक्र आया था और न अदालती कार्यवाही अभी उस स्टेज पर पहुँची थी कि गवाही या दस्तावेज के आधार पर इस तरह की टिप्पणी का कोई औचित्य बनता.

इस लचीले जज का व्यवहार ही संदेहास्पद नहीं था, स्वयं सीबीआई का रवैय्या भी घोर आश्चर्यजनक रहा. उस समय तक सीबीआई सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निगरानी वाली एजेंसी बन चुकी थी. उन्होंने अमित शाह के ‘डिस्चार्ज’ के विरुद्ध अपील न करने का निर्णय लिया. इतने बड़े मामले में, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप हो चुका हो, सीबीआई का अपील न करने का निर्णय अभूतपूर्व रूप से एकतरफा और पक्षपातपूर्ण ही कहा जाएगा.

सीबीआई ने अपील न करने के पीछे जो दलील दी, वह हास्यास्पद ही कही जा सकती है. उनका कहना था कि वे सब कुछ चार्जशीट में कह ही चुके हैं, अब और कुछ नया कहने को उनके पास है नहीं. लिहाजा, अपील की जरूरत नहीं है. यदि यह दलील मान ली जाए तो सीबीआई को किसी भी मामले में किसी भी हालत में अपील करनी ही नहीं चाहिए, जबकि वे रोजाना ही तमाम मामलों में अपील करते देखे जा सकते हैं.

तर्क को आगे बढ़ाएं तो सीबीआई की उपरोक्त दलील के हिसाब से तो न्यायिक प्रक्रिया से अपील का प्रावधान ही समाप्त कर देना चाहिए और तमाम अपील सुनने वाले न्यायालय बंद कर देने चाहिए. ऐसे में रोज हाई कोर्टों और सुप्रीम कोर्ट में होने वाली अपीलों का क्या होगा?

अहम सवाल है, स्वयं सुप्रीम कोर्ट उस समय कर क्या रही थी? एक पूर्णतया गलत न्यायिक आदेश से अमित शाह को ‘डिस्चार्ज’ किया गया और जांच एजेंसी सीबीआई अपील करने से भी मना कर रही थी, वह भी उस मामले में जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सीबीआई को दिया गया था- सुप्रीम कोर्ट क्यों सोती रही?

जज लोया की अकस्मात् मौत की जांच को लेकर हुयी पेटीशन ने आज सुप्रीम कोर्ट को भी दो फाड़ कर दिया है. यह चमत्कार कर पाना अकेले अमित शाह के बस का नहीं. न सीबीआई को इस कदर उल्टा नाच नचाना ही!

दरअसल, सोहराबुद्दीन की हत्या के समय जो राजनीतिक सत्ता समीकरण गुजरात राज्य में सत्ता पर काबिज था, वही आज केंद्र में एकछत्र सत्ता-केंद्र बना हुआ है. इस समीकरण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण छोर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. यह अकेला तथ्य लोया प्रकरण में गहन जांच कराने को अनिवार्य बना देता है.  

 

 



अवकाश प्राप्त आईपीएस, विकास नारायण राय हरियाणा के डीजीपी और नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के निदेशक रह चुके हैं।

 



 

7 COMMENTS

  1. U mesh chandola

    VEDIKI HINSAA, HINSAA NA BHAVATI!!! ( Vilolence by Hindu fascist is no violence!!). Inspite of such unprecedented press conference Corporate media is all out in support of “Let us not talk on caravan report on brutal murder of justice Loya” . Corporate media is fast loosing credibility. People will never believe in media. And what about approx hundreds of high court and supreme court judges? And different high court bars? ALL ARE CONSPICUOUS BY THEIR SILENCE ON MURDER OF LOYA ON ONE HAND BUT SPEAKING MUCH AGAINST PRESS CONFERENCE. I KNOW THEY ARE NOT ONLY DISHONEST ON THIS BUT THEY ARE EVEN NOT COMPETENT TO BE A LLB.

  2. U mesh chandola

    Why not reopen GUjrat 2002 and minister Haven pandya murder also,?

  3. U mesh chandola

    Murder was in interest of nation. So that present government lasts it’s term. So that FDI comes. Make in India succeeds.

  4. Who gave administrative order of transferring first judge. Reason? Apparently as desired by modi sah duo?

  5. U mesh chandola

    Unlike Bangarulaxman, Amit SAH IS a bania. So, no permission to sacrifice him could be granted by rss HQ. And why not?

  6. U mesh chandola

    In 2012 CBI convicted Bangarulaxman when upa was there.

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