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बम्पर उत्पादन के बावजूद विदेश से गेहूं का आयात किसानों के लिए लेकर आया है तबाही

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हरे राम मिश्र

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2022 तक देश के किसानों की आय दोगुनी करने, उनके फसल लागत का पचास प्रतिशत लाभ सुनिश्चित करने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के सरकारी दावों के बीच, इस खबर को कतई सामान्य नहीं कहा जा सकता कि एक कृषि प्रधान देश में गेहूं का आयात ठीक ऐसे समय पर हो रहा है जबकि बंपर पैदावार हुई है।

दरअसल केन्द्र सरकार ने गेहूं के आयात पर मात्र दस फीसद का सांकेतिक शुल्क लगा कर उसके आयात को मंजूरी दे रखी है। वर्तमान समय में वैश्विक बाजार में गेहूं की पर्याप्त उपलब्धता है। लेकिन मांग में कमी होने की वजह से गेहूं की कीमतें एकदम सतह पर हैं। ऐसे समय में यह आयातित गेहूं देश में उपलब्ध घरेलू गेहूं से न केवल सस्ता है, बल्कि आयात शुल्क चुकाने के बावजूद स्थानीय बाजार में किसानों के गेहूं के मुकाबले काफी सस्ता बिक रहा है। ऐसी स्थिति में अनाज कारोबारियों द्वारा गैर गेहूं उत्पादित राज्यों में इस आयातित गेहूं की भरपूर सप्लाई की जा रही है। इसका असर यह है कि गेहूं उत्पादक राज्यों की स्थानीय गल्ला मंडियों में गेहूं के दाम बहुत गिर गए हैं और वर्तमान समय में यह सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे चला गया है।

उदाहरण के लिए गेहूं की एक बड़ी मंडी उत्तर प्रदेश है। यहां आज-कल 1400 से 1500 रुपए प्रति कुंतल से ज्यादा गेहूं के खुदरा दाम नहीं है। जबकि पिछले साल के लिए गेहूं का एमएसपी दर 1625 रुपए प्रति कुंतल था। इस सीजन में गेहूं के दाम न बढ़ पाने के पीछे इसी आयातित गेहूं को जिम्मेदार माना जा रहा है। वास्तविकता यह है कि सरकारी खरीद कुल पैदावार के मुकाबले महज 20 फीसद के आस पास ही हो पाती है। बाकी गेहूं खुले बाजार में किसान अपनी सुविधा और जरुरत के हिसाब से बेचते हैं। यह सीजन इन किसानों के लिए उपयुक्त होता है, लेकिन आयातित गेहूं बाजार में डंप होने के किसानों को घरेलू स्तर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है।

यही नहीं, हालात अभी और खराब होंगे। मीडिया में आयी खबरों के मुताबिक इस समय 15 लाख टन गेहूं देश के बंदरगाहों तक आ चुका है और इससे बहुत ज्यादा गेहूं के आयात का आर्डर दिया जा चुका है जो किसी भी वक्त बंदरगाहों तक पहुंच सकता है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय गल्ला व्यवसायी घरेलू गेहूं की खरीद में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं और गेहूं उत्पादक किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी हाथ धोना पड़ रहा है। सरकारी स्तर पर भी गेहूं की खरीद बंद होने के बाद किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के मामले में चुप्पी साध ली गई है। ऐसी स्थिति में बाजार के रहमोकरम पर निर्भर होने के सिवाए किसानों के समक्ष कोई विकल्प ही नहीं है।

आयातित गेहूं के कारण सिर्फ किसान ही मुसीबत में नहीं हैं, बल्कि सरकार के सामने भी आसन्न संकट मुंह फैलाए खड़ा हुआ है। दरअसल मौसम की अनुकूलता के चलते पिछले रबी सीजन में गेहूं की पैदावार सर्वाधिक लगभग दस करोड़ टन थी। उसी के अनुरुप सरकारी एजेंसियों ने गेहूं की खरीद भी की थी। पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश की तर्ज पर उत्तर प्रदेश ने भी जमकर सरकारी खरीद की गई। इसके चलते सरकारी गोदाम भर गये। अभी संकट यह है कि भारतीय खाद्य निगम अपने गोदाम में भरे गेहूं को खुले बाजार में बेचने का कई प्रयास कर चुका है लेकिन जिस कीमत पर वह इसकी इसकी बिक्री चाहता है उसके लिए खरीददार ही उपलब्ध नहीं हैं। अब जब निगम के गोदाम खाली नहीं होंगे तब यह साफ है कि नई फसल को सरकार खरीद कर कहां रखेगी? जाहिर है नयी फसल के लिए सरकार ईमानदारी से गेहूं की खरीद नहीं करेगी।

यही नहीं, चालू रबी सीजन के लिए सरकार ने गेहूं का एमएसपी(न्यूनतम समर्थन मूल्य) 1735 रुपये प्रति कुंतल तय किया है। इसे देखते हुए विदेशी गेहूं का आयात और तेज हो जाएगा। जाहिर है यह सब घरेलू जिंस बाजार को ही नुकसान पहुंचाएगा और इसके अंतिम शिकार इस देश के किसान ही होंगे।

दरअसल, गेहूं उत्पादक किसानों का यह वर्तमान संकट उस दर्शन को सिरे से अप्रासंगिक साबित कर देता है जो इस बात पर जोर देता है कि उत्पादन बढ़ाकर देश के किसानों को खुशहाल बनाया जा सकता है। दरअसल ऐसी बातें करने वाले लोगों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता कि आखिर मंहगे हो रहे उत्पादन लागत के बाद, बंपर उत्पादन की सारी मलाई बिचैलियों के जेब में क्यों चली जाती है? सरकार के स्तर से ज्यादा उत्पादन की स्थिति में किसानों के लिए लाभकारी मूल्य की गारंटी क्यों नहीं की जाती? चाहे टमाटर हो या फिर प्याज- बंपर उत्पादन करने का नुकसान सदैव किसानों के जिम्मे क्यों आता है? आखिर असल संकट कहां है और उसपर बात करने से राजनीति कतराती क्यों है?

दरअसल, इस देश में खेती और अन्नदाता के संकट पर हमारी राजनीति ने कभी भी ईमानदारी नहीं दिखायी। उदारीकरण के बाद खेती साल दर साल खस्ता होती चली गई। सरकारों ने विकास के नाम पर जितने भी सपने इस देश को दिखाए उन सबके केन्द्र में खेती और किसान कभी नहीं रहे। चाहे वह कांग्रेस की सरकार हो या फिर मोदी सरकार, किसी ने भी ईमानदारी से खेती की तबाही को रोकने की पहल नहीं की। कर्ज के दुष्चक्र में फंसे किसानों को निर्मम बाजार में धकेल दिया गया जिसने इनका खून तक चूस लिया। यह उदारीकरण की ही त्रासदी है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वैश्विक लाॅबिंग ने खेती को तबाह करने के अभियान स्वरूप भारतीय बाजार में सस्ते गेहूं को डंप करवा दिया है। इससे यह तय है कि इस साल फिर किसान तबाह हो जाएंगे और गेहूं उत्पादन से उनका मोह भंग हो जाएगा। यह तबाही किसानों के क्रय शक्ति को भी बुरी तरह से प्रभावित करेगी जिसका नुकसान देश की अर्थव्यवस्था को उठाना होगा।

वास्तव में यह सब एक प्रायोजित तरीके से देश का खाद्य सुरक्षा चक्र को खत्म करने के लिए किया जा रहा है। किसानों की तबाही के बाद, वह दिन दूर नहीं जब हम अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आश्रित होंगे। ऐसी स्थिति में देश की सवा अरब जनता भूख से बिलाबिला जाएगी और इसके लिए हमारी जनविरोधी राजनीति जिम्मेदार है।

सवाल और भी हैं। आखिर यह कैसा राष्ट्रवाद है जो इस देश के किसानों को रौंदकर आगे बढ़ना चाहता है? आखिर काॅरपोरेट लाॅबिंग के आगे मोदी सरकार घुटने क्यों टेक दे रही है? क्या उसकी प्राथमिकता में इस देश के कर्जदार किसानों की जगह मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियां नहीं हैं? आखिर कर्ज के बोझ तले दबकर मौत को लगे लगा रहे किसानों को जब यह सरकार उनकी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तक दिलवाना सुनिश्चित नहीं कर पा रही है फिर किसानों की आय दोगुना करने जैसी बातें क्या केवल हास्यास्पद और दिवास्प्न नहीं हैं?

दरअसल आज हम जिस माहौल में जी रहे हैं वहां संकटग्रस्त खेती और तबाह होते किसानों पर सोचना देशद्रोह की श्रेणी में रख दिया गया है। जब राष्ट्रवाद का आक्रामक दौर चल रहा हो और सरकार को ही देश मान लेने की खतरनाक प्रवृत्ति को पोषित पल्लवित किया जा रहा हो- ऐसे मुश्किल दौर में दम तोड़ती खेती और घुटते मरते किसानों पर कोई बहस संभव नहीं है। जब ठेले पर रखकर देशद्रोही होने का सर्टिफिकेट बांटा जा रहा हो- गाय, गोबर की टुच्ची बहस में देश को उलझाए रखा गया हो तब किसानों की र्दुगति तय है। किसान तबाही के मुहाने पर खड़े हैं लेकिन मोदी सरकार का राष्ट्रवाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आकाओं की चरण वंदना में पलकें बिछाए लेटा हुआ है।


लेखक राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं 

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