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चार जजों का फ़ैसला और सत्ता के तार पर झूलते पाँच मामले !

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सुप्रीम कोर्ट के चार जजों का यूँ मुख्य न्यायाधीश पर खुलकर सवाल उठाना अभूतपूर्व घटना है। लेकिन यह दिन अचानक नहीं आया। वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह बता रहे हैं न्यायपालिका से जुड़ी ऐसी पाँच घटनाओं के बारे में जिन्हें ध्यान में रखकर ही आज की स्थिति को समझा जा सकता है- संपादक

 

1. पूर्व मुख्य न्यायाधीश का राज्यपाल बनना 

सितंबर 2014 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश पलानीस्वामी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाया गया था। आजतक ने तभी लिखा था, 65 साल के सदाशिवम प्रधान न्यायाधीश रह चुके पहले व्यक्ति हैं, जिन्हें ऐसे पद पर नियुक्त किया गया है जो वरीयता में सीजेआई से नीचे है। यह नई परिपाटी शुरू हुई थी और यूं ही नहीं थी। सदाशिवम उसी साल अप्रैल में रिटायर हुए थे और राज्यपाल बनना स्वीकार किया था तो पूछा गया था कि क्या सरकार अमित शाह मामले में उनके फैसले से ‘खुश’ है? कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा था, उन्हें राज्यपाल बनाया जाना यह सवाल पैदा करता है कि क्या उन्होंने कोई काम किया है, जिससे वे (बनाने वाले) प्रसन्न हैं। सदाशिवम सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ में थे जिसने फर्जी मुठभेड़ मामले में शाह के खिलाफ दूसरी एफआईआर को रद्द कर दिया था। पीठ ने कहा था कि यह सोहराबुद्दीन शेख हत्या के बड़े मामले से जुड़ा हुआ है और इसे अलग किए जाने की आवश्यकता नहीं है।

2. पूर्व मुख्यमंत्री की खुदकुशी और रिश्वत मांगने का आरोप

दि वायर की खबर के अनुसार 9 अगस्त, 2016 को ईटानगर में अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल ने फांसी लगा ली थी। पुल एक कांग्रेसी नेता थे, जो 2015 में कांग्रेस के ही नबाम तुकी की सरकार के खिलाफ बगावत करके मुख्यमंत्री बने थे। करीब साढ़े चार महीने बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा तुकी की सरकार की बर्खास्तगी को असंवैधानिक करार दे दिया गया था। पुल ने 13 जुलाई 2016 को कोर्ट का फैसला आने के बाद इस्तीफा दे दिया और महीने भर के भीतर आत्महत्या कर ली। एक दिन पहले उन्होंने 60 पेज का सुसाइड नोट लिखा था जिसमें संवैधानिक पदों पर बैठे विभिन्न लोगों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इन गंभीर आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए पर न तो राज्य सरकार और न केंद्र सरकार ने इस इन आरोपों की जांच के कोई आदेश दिए हैं। इस नोट में यह आरोप भी है कि 2016 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके (पुल के) पक्ष में मोड़ने के लिए कुछ दलालों ने उनसे एक बड़ी राशि की मांग की थी। पुल ने लिखा है, “मुझसे और मेरे करीबियों से कई बार संपर्क किया गया कि मैं 86 करोड़ रुपये देता हूं तो फैसला मेरे हक में दिया जाएगा। मैं एक आम आदमी हूं, मेरे पास न उस तरह पैसा है न ही मैं ऐसा करना चाहता हूं…।” क्या इस मामले की जांच नहीं होनी चाहिए थी? किसे कराना था? क्यों नहीं हुआ? क्या आपको लगता है कि मामला सिर्फ न्यायपालिका का है।

3. प्रधानमंत्री को रिश्वत दिए जाने के “सबूत” और जांच 

कारोबारी घरानों – सहारा और बिड़ला में छापेमारी के दौरान जब्त कुछ दस्तावेजों के आधार पर यह शक हुआ था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नकद पैसे दिए गए हैं। इस बारे में राहुल गांधी ने कहा था कि सहारा के लोगों ने अपनी डायरी में लिखा है कि हमनें छह महीने में नौ बार पीएम मोदी को पैसा दिया है। उन्होंने कहा कि आयकर विभाग ने 22 नवम्बर 2014 को सहारा कंपनी पर छापेमारी की थी। इस दौरान बरामद दस्तावेजों के आधार पर राहुल ने तारीखवार बताया था कि बरामद दस्तावेज में कब कितने पैसे नरेन्द्र मोदी को देना लिखा है। इसपर खबरें छपती रहीं। आरोप लगते रहे और सफाई आती रही। दस्तावेज पर गुजरात सीएम या जीसीएम को पैसे देना दर्ज था। जवाब में पार्टी के लोगों ने कहा कि यह गुजरात सीएम नहीं गुजरात केमिकल्स है। यहां गौर तलब है कि गुजरात केमिकल्स गुजरात सरकार की कंपनी है और अगर सहारा ने गुजरात सरकार की कंपनी को पैसे दिए थे और वही लिखा था तो इसकी आराम से पुष्टि हो सकती थी और यह कोई बड़ा काम नहीं था। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। निश्चित रूप से इस मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए थी। वैसे भी, ये दस्तावेज गंभीर नहीं हैं तो जब्त क्यों किए गए, रिकार्ड में क्यों लिए गए औऱ लीक क्यों हुए। या कैसे हुए। यह सब कोई छोटा मोटा और साधारण मामला नहीं है। सब देश के प्रधानमंत्री से संबंधित और इसकी जांच वैसे ही होनी चाहिए थी। नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने भी इन सबूतों को पर्याप्त नहीं माना। यानी सुप्रीम कोर्ट ने वही किया जो भाजपा या सरकार चाहती थी।

4. मडिकल कॉलेज खोलने का मामला

2015 में प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट ने केंद्र सरकार के पास एक नया मेडिकल कॉलेज खोलने की अर्ज़ी दी। सरकार ने मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को अर्जी थमा दी। काउंसिल ने मना कर दिया। मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट की ओवरसाइट कमेटी ने काउंसिल से अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिए कहा। केंद्र सरकार ने इस आधार पर मंजूरी दे दी। इस साल में काउंसिल ने कॉलेज का जायज़ा लिया और देखा कि कॉलेज सुनसान है और अस्पताल में ताले बंद हैं। काउंसिल ने केंद्र सरकार को रिपोर्ट दी। सरकार ने कॉलेज की मान्यता रद्द कर दी। केंद्र सरकार ने काउंसिल से कहा कि वो कॉलेज की तरफ़ से जमा बैंक गारंटी को एइनकैश कर सकता है। ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में फिर से अपील की। कोर्ट की पीठ ने कहा कि ट्रस्ट के साथ अन्याय हुआ है। मामला सुप्रीम कोर्ट से वापस लिया गया और इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील हुई। 25 अगस्त को हाई कोर्ट ने बैंक गारंटी भुनाने पर रोक लगा दी और आदेश सुनाया कि मेडिकल कॉलेज में दाख़िले होंगे। चार दिन बाद मेडिकल काउंसिल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रहा। 18 सितंबर को ट्रस्ट फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। फैसला फिर ट्रस्ट को पक्ष में गया। अगले दिन सीबीआई ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की। पांच लोग गिरफ़्तार हुए। न्यायपालिका में इसी भ्रष्टाचार को लेकर प्रशांत भूषण केस लड़ रहे थे। आनन-फानन में चेलमेश्वर की पीठ ख़त्म कर दीपक मिश्रा ने अपनी पीठ में इसकी सुनवाई शुरू कर दी। प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि पूरे मामले में आप भी पार्टी हैं। दीपक मिश्रा ने कहा कि अदालत की अवमानना का केस लागू कर दूंगा। प्रशांत भूषण ने कहा- लगाओ। दीपक मिश्रा ने नहीं लगाया। (दिलीप खान की पोस्ट के आधार पर)

5. न्यायमूर्ति लोया की मौत की जांच का मामला

सीबीआई के विशेष जज बीजी लोया मर गए। उनकी मौत के बाद एक मामले में अमित शाह को बरी कर दिया गया। सीबीआई ने अपील नहीं की। मामला दबा रहा। कई साल बाद जज लोया के परिवार वालों ने हिम्मत की, कारवां ने खबर छापी। सरकार और सीबीआई ने कुछ नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की जांच के लिए दाखिल पीआईएल (जनहित याचिका) को कोर्ट नंबर 10 के लिए निश्चित कर दिया गया था। दि टेलीग्राफ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इसमें सीबीआई के विशेष जज बीएच लोया की मौत की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है। कोर्ट नंबर 10 के प्रमुख न्यायमूर्ति अरुण मिश्र हैं जो शीर्ष अदालत के 25 जजों में वरिष्ठता के लिहाज से 10वें हैं। अपनी मौत के समय न्यायमूर्ति लोया शोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ का मामला सुन रहे थे जिसमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह एक अभियुक्त थे। शाह को उसी महीने बरी कर दिया गया जिस महीने न्यायमूर्ति लोया की मौत हुई।

 



 

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