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खुला ख़त: योगी जी, होली और ईद दोनों गले मिलने के त्योहार हैं !

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आदरणीय योगी आदित्यनाथ जी, 

 

मुझे मालूम है कि मैं आगे जो कुछ लिखने जा रहा हूं, उसे आप अन्यथा ले सकते हैं, पर हमारे यहां होली पर किसी की कही किसी भी बात को लेकर बुरा मानने का रिवाज नहीं है, कुछ सयाने यह कहकर बुरा मानने वालों की खिल्ली तक उड़ाते हैं कि वे बुरा मान भी लेंगे, तो क्या कर लेंगे? रानी रूठेंगी तो अपना सुहाग ही तो ले जायेंगी!!

मेरी शिकायत यह है कि उस दिन मथुरा के पत्रकारों ने पूछा कि अयोध्या में दीपावली और बरसाना में होली मना चुकने के बाद ईद कहां मनायेंगे तो आपको कोई तर्कसंगत या लोकतांत्रिक जवाब क्यों नहीं सूझा? तमक कर यह कहने पर क्यों उतर आये कि आप हिन्दू हैं। क्यों भूल गये कि पत्रकार यह सवाल आमतौर पर अपनी अहमन्यताओं के लिए जाने जाने वाले योगी आदित्यनाथ नामक शख्स या गोरक्षपीठाधीश्वर से नहीं, देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री से पूछ रहे थे। उन करोड़ों प्रदेशवासियों का भी मुख्यमंत्री है, जो ‘दूसरी आस्थाओं के कारण’ हिन्दू नहीं हैं। और जिस संविधान के तहत आपने पद और गोपनीयता की शपथ ले रखी है, वह हिन्दुओं और गैरहिन्दुओं में भेदभाव की इजाजत नहीं देता।

विश्वास कीजिए मेरा, उस शपथ का मान रखकर पत्रकारों के सवाल पर मुस्कुराते हुए आप उन्हें अपने ईद मनाने की जगह बताते या हँसकर कहते कि- होली और ईद दोनों ही गले मिलने के ही त्यौहार हैं, और उनमें फर्क करके आपको गले काटने वालों के साथ खड़े नहीं होना – तो आप उतने ही बड़े हो जाते, जितने उस रोज छोटे हो गये थे, जब आपने धर्मनिरपेक्षता को स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा झूठ बता डाला था।

बहरहाल ईद का जिक्र आया और किसी कारण आपको मालूम नहीं था तो जरा इतिहास में जाने का अपने लोगों वाला शगल दोहरा लेते। होली की बहारों के मस्तमौला शायर नजीर अकबराबादी से पूछ लेते या फिर नजीर बनारसी से !  ईद और होली पर कुछ नाशुक्रों को छोड़ किसी को भी अपना हिन्दू या मुसलमान होना याद नहीं रह जाता। ताज्जुब कि आपको यह तो याद रह गया लेकिन यह याद नहीं आया कि ईद मनाने वालों में समय-समय पर ऐसे ‘तुरुक’ भी होते आये हैं, जिन पर ‘कोटिक हिन्दू वारिये’ की परम्परा रही है? तिस पर गजब यह कि अल्लामा इकबाल ने जिन राम को ‘इमाम-ए-हिन्द’ बताया था, उन्हीं की अंधभक्ति के जुनून में ईद से सायास परहेज बरतकर आप खुद को ही नहीं, भगवान राम को भी सीमित किये डाल रहे हैं !!

आपकी इसी संकीर्ण हिन्दू दृष्टि या राजनीति के चोले में बरती जा रही गैरराजनीतिक टुच्चई के चलते भगवान राम की अयोध्या के संत-महंत तक भाजपाई, सपाई, बसपाई, कांग्रेसी और कम्युनिस्ट हो चले हैं और आपस में लड़ते-भिड़ते व ‘कटक्जुज्झ’ करते रहते है। गोकि सबके सब आपकी तरह हिन्दू होने का दावा करते हैं। विडम्बना यह कि फिर भी, आपको अपने उस अपराध का भान तक नहीं जिसके कारण घट-घटव्यापी राम सिर्फ हिन्दुओं के होकर रह जा रहे हैं और आपका हिन्दू होना देश तो क्या हिन्दुओं की एकता की भी गारंटी नहीं दे पा रहा। याद कीजिए, गोविन्द पानसरे, एमएम कलबुर्गी और नरेन्द्र दाभोलकर के साथ गौरी लंकेश भी हिन्दू ही थीं, जिनसे हिन्दू हत्यारों ने ही जीने का अधिकार छीन लिया!

क्षमा कीजिएगा, ऐसे कठिन समय में, आप चाहें तो इसे हिन्दू होने के अधिकार से ही मान लें, आपको एक बिना मांगी सलाह देने की धृष्टता कर रहा हूं। इस बार ईद आये और, चूंकि आपके मुंह से निकली गंदी बात दूर तक जा चुकी है, कहीं और जाते किंचित शरमाइये तो कहा-सुना माफ की तर्ज पर अपने वसीम रिजवी व मुख्तार अब्बास नकवी जैसे भाइयों, और नहीं तो उस मुस्लिम मंच के युवा सदस्यों के साथ ही गले मिलकर सेवइयां खा डालिये, जो अयोध्या में ‘वहीं’ राममन्दिर के निर्माण लिए मुसलमानों को राजी करने हेतु बड़ा पसीना बहा रहे हैं। वरना हसरत रह जायेगी कि मुख्यमंत्री बनकर भी न गंगा जमुनी संस्कृति का ताना बाना तोड़ पाये और न उसका लुत्फ ही उठा पाये। यानी न माया मिली और न राम।

मेरी इस तजवीज से किंचित भी हिच हो आपको तो मुझे बताइये-कैसे हिन्दू हैं आप और हिन्दू होना आपको ईद मनाने से, खासकर गले मिलने से, क्योंकर रोकता है?  कई लोग तो कहते हैं कि आपको हिन्दू शब्द भी उन्हीं ईद मनाने वालों ने ही दिया है। जहां तक मैं जानता हूं, महात्मा गांधी जैसा हिन्दू होना तो आपको कतई गवारा नहीं होगा। बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जैसा भी नहीं, जो पैदा भले ही हिन्दू के रूप में हुए, हिन्दू के रूप में दुनिया से जाना स्वीकार नहीं कर पाये। उसी लखनऊ में, जहां आजकल आपका राज है, 1857 में बिरजिस कदर की नवाबी के दौरान ईद, दशहरा और दीवाली सब साथ-साथ मनाने वाले हिन्दू भी आपके आदर्श नहीं ही हो सकते। लेकिन…यहां एक पल रुककर मेरा आपसे यह पूछने का मन हो रहा है कि वे न सही, ‘हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन’ का उद्घोष करने वाले अटलबिहारी वाजपेयी हमारे बीच रहकर भी आपके आदर्श क्यों नहीं रह गये हैं? क्या आपने उनके प्रधानमंत्री या लखनऊ के सांसद होने के दिनों में उन्हें एक बार भी लखनवी तहजीब में रंगे नहीं देखा?   लेकिन क्या बताऊं, याद आ रहा है कि जिन डॉ. केशव बलिराम  हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर के नामों का आप लोग प्रायः रट्टा मारते रहते हैं, उनकी तो इतनी-सी भी नसीहत नहीं मानते कि राम व कृष्ण को महापुरुष ही रहने दीजिए, ईश्वर मत बनाइये । फिर? दीनदयाल उपाध्याय या विनायक दामोदर सावरकर के नाम लें तो वे भी ईद मनाने की मनाही नहीं ही कर गये हैं। हां, सावरकर गाय की पूजा की मनाही अवश्य कर गये हैं। यह कहकर कि इस सृष्टि में ईश्वर के बाद सीधे मनुष्य का स्थान है और पशु की पूजा, वह गाय की ही क्यों न हो, मनुष्य का अपमान है।

अलबत्ता, नाथूराम गोडसे की बाबत मुझे नहीं पता । सच बताइये, कहीं मोहन भागवत की तरह किसी असुरक्षा ग्रंथि से तो नहीं पीड़ित हैं आप? वरना क्यों लगता है आपको कि अन्यथा लोग न आपको हिन्दू मानेंगे और न जानेंगे? दूसरे करोड़ों हिन्दुओं के साथ तो ऐसा नहीं है। आपके साथ ही क्यों है?

खुदा न खास्ता, आपके पितृसंगठन का इस लोकतंत्र के खात्मे यानी हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का मन्सूबा कभी पूरा हो गया, जो  आप जैसे उसके नादान दोस्तों की बिना पर ही हो सकता है, तो आपकी यह शक्ति पल भर में कपूर-सी या फिर भाप बनकर उड़ जायेगी। फिर एक दो तीन चार के क्रम में गंवारों की तरह आपकी नागरिकता का दर्जा तय किया जायेगा। ऊपर से नीचे। तब आपको सबसे ज्यादा वफादारी का सिला सबसे ज्यादा नुकसान के रूप में मिलेगा। क्या तब भी आप ऐसी ही निष्ठा के साथ अपने हिन्दू होने पर अकड़ सकेंगे? अगर नहीं तो हे योगी जी महाराज! इससे पहले कि आप अपने ही किये विस्फोट के शिकार हो जायें या आपकी कुल्हाड़ी आपके ही पैर काट डाले, बराये मेहरबानी बाबासाहब के संविधान और मनु महाराज की स्मृति का फर्क समझ लीजिए।

‘जितनी जटिल उसकी सौ गुनी कुटिल और जितनी कुटिल उसकी सौ गुनी जटिल’- यह स्मृति जिन्हें भी फंसा पाती है, पहले ऊंच-नीच में भरमाती और आपकी तरह ईद से ही नहीं, क्रिसमस और बहुत से नापसंद लोगों से घृणा करना सिखा देती है। उनकी देशभक्ति पर शक करना भी। फिर फांस गहरी होते ही बेहतर हिन्दू बन सकने की सारी संभावनाएं एकमुश्त समाप्त कर देती है।

कोढ़ में खाज यह कि आपके योगी होने पर किये जा रहे शक, आस्थाओं या धारणाओं के बजाय अंतः साक्ष्यों पर आधारित हैं। आप जिन बाबा गोरखनाथ की पीठ के अधीश्वर हैं, उन्होंने ‘खड़-खड़ काया और  निर्मल नेत’ को योगियों की पहचान बताया था। आप खुद से पूछिये कि आज की तारीख में ये दोनों आपके पास हैं क्या? नहीं है, तो आप योगी कैसे हो सकते हैं? योगी होने के लिए तन और कपड़े ही नहीं, मन को भी रंगाना पड़ता है।

शायद वह इसी की खीझ है, जिसे उतारने के चक्कर में आप औरों से तो लड़ते ही हैं, कई बार अपने आप से भी भिड़ जाते हैं और जो आप कतई नहीं हैं, खुद को वही सिद्ध करने में लग जाते हैं। लेकिन क्या कीजिएगा, इस काम में विफल होना आपकी नियति है। देखते नहीं आप कि चार साल से ज्यादा प्रधानमंत्री रहने के बावजूद आपके महानायक नरेन्द्र मोदी एक पल के लिए भी एतबार नहीं कर पाते कि वे सचमुच देश के प्रधानमंत्री हैं। ग्यारह महीने तक मुख्यमंत्री रह लेने के बावजूद आपको भी नहीं ही लगता कि आप सारे प्रदेशवासियों के मुख्यमंत्री हैं। नरेन्द्र मोदी अपने मन की ही सुनते, माफ कीजिएगा, सुनाते थके जा रहे हैं और आपने अपने भगवा रंग को ऐसी दीवार में बदल लिया है कि उसके पार कुछ देख ही नहीं पाते। यह भी नहीं कि आपकी कुर्सी पर आपसे पहले कई आपसे बड़े और बेहतर हिन्दू बैठ चुके हैं। डॉ.सम्पूर्णानंद और कमलापति त्रिपाठी जैसे हिन्दू। उनमें और आपमें बस एक ही फर्क है। वे जैसे ही अपनी कुर्सी पर बैठते थे, मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पंचपरमेश्वर’ के पात्रों समझू साहु और जुम्मन शेख की आत्माएं उनके अंतस्तल में प्रविष्ट हो जाती थीं, जो आपमें हो ही नहीं पा रहीं!

अंत में एक और जरूरी बात। हमारे लोकतंत्र में हजार खामियां हों लेकिन उसमें एक बड़ा गुण भी है। हमारी चेतनाओं के  प्रवाह को वह एकदम से नहीं रुकने देता। इस कारण ‘इमोशनल अत्याचार’ कितना भी विकट हो, एक न एक दिन लोग उसके पार चले ही जाते हैं। धर्मप्राण हिन्दू तो पांच हजार सालों से ऐसा करते आ रहे हैं, इसलिए उन्हें इसका कुछ ज्यादा ही अभ्यास है। सो आपके लिए बेहतर होगा कि उस दिन की सोच कर डरिये, जिस दिन आपके इमोशनल अत्याचार का सच उन पर खुलेगा। यों, वह खुलना शुरू भी हो गया है। फैजाबाद के ‘बेदार’ नाम के नामचीन शायर इसीलिए तो सीधे आपको इंगित करते हुए कहते हैं:

मैं भी हिन्दू हूं मगर हरदम ये रखता हूं खयाल,

मेरी करतूतों से मेरा धर्म शर्मिन्दा न हो।

मैं पूछना चाहता हूं कि वे आम आदमी के तौर पर यह खयाल रख सकते हैं तो आप मुख्यमंत्री के तौर पर क्यों नहीं रख सकते?

अभी भी बहुत देर नहीं हुई है। सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहते और सही शुरुआत देर से भी की जाये तो भी सही ही रहती है। सो, मैं तो कहता हूं, यह शुरुआत कीजिए और आइये किसी दिन, आपको अपने गांव ले चलूं। वहां क्या हिन्दू और क्या मुसलमान, सब आपका नाम लेकर बार-बार पूछ रहे हैं कि यह भी कोई बात हुई भला कि ‘हम मनाई ईद अऊर तू मनावा होली, न तू हमसे बोला, न हम तुहंसे बोली?‘ आप सहमत होंगे, अबोला से विषफल के अलावा कुछ नहीं पैदा होता। इसलिए बोलचाल तो बनी ही रहनी चाहिए। है न?

आदर, अभिवादन और आपका थोड़ा ज्यादा समय लेने के कुसूर के लिए माफी की अर्जी के साथ।

 

आपका

कृष्ण प्रताप सिंह  



वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह मीजिया विजिल के सलाहकार मंडल के सदस्य हैं और फ़ैज़ाबाद से प्रकाशित जनमोर्चा के संपादक हैं।