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राम से लेकर आंबेडकर तक की प्रतिमाओं में कैद इस लोकतंत्र का संविधान कौन बचाएगा?

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अरुण कुमार त्रिपाठी

अयोध्या में संविधान दिवस (26 नवंबर) के एक दिन पहले शिवसेना और विश्व हिंदू परिषद की प्रतिस्पर्धी सभाओं में दो समानधर्मा पार्टियों का अंतर्विरोध तो है लेकिन उनसे किसी सरकार और किसी राजनीतिक दल को चुनौती नहीं दी जा रही है। वह एक निश्चित समुदाय को तो चुनौती है लेकिन प्रकट रूप से अगर किसी को चुनौती है तो देश के संविधान, सुप्रीम कोर्ट और उसकी संस्थाओं को। इसका तात्कालिक लक्ष्य विधानसभा और लोकसभा चुनाव हैं तो दीर्घकालिक लक्ष्य राम मंदिर निर्माण और उस तरह के अन्य प्रतीकों के माध्यम से हिंदू राष्ट्र की स्थापना। इन सभाओं का उद्देश्य और प्रभाव बताने वालों के अपने विश्लेषण और तर्क हैं। अगर इसे संविधान को धकियाने की राजनीति बताने वाले हैं तो ऐसे भी विशेषज्ञ हैं जो मानते हैं कि यह भाजपा से अपना जनाधार छीनने में लगी शिवसेना और उसके नेता उध्दव ठाकरे का चुनावी पैंतरा है। उध्दव ठाकरे कह रहे हैं कि सरकार राममंदिर निर्माण की तारीख बताए। इंतजार करते हुए चार साल बीत चुके हैं। सरकार कानून लाए और शिव सेना उसका समर्थन करेगी। उनकी पार्टी के सांसद संजय राउत का बयान उससे चार हाथ आगे का है। वे कहते हैं जब 17 मिनट में बाबरी मस्जिद गिराई जा सकती है तो राम मंदिर बनाने का कानून लाने में इतनी देरी क्यों। हालांकि उध्दव ठाकरे से यह पूछने वाले भी हैं कि `पहले मंदिर तब सरकार’ का नारा देने वाली पार्टी क्या सत्ता से त्यागपत्र देकर आई है या उसने महाराष्ट्र में हिंदी भाषियों के उत्पीड़न के लिए क्या कोई क्षमायाचना की है।

इन दलीलों से लोकतंत्र के हितैषी और संविधान और उसकी संस्थाओं में आस्था रखने वाले लोगों को यह सोचकर संतोष मिल रहा है कि दरअसल यह महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा की होड़ है और उध्दव उसी लड़ाई को जीतने के लिए अयोध्या का इस्तेमाल कर रहे हैं। उसी दबाव में भाजपा ने विश्व हिंदू परिषद को सक्रिय किया और उसने धर्म संसद का आयोजन कर डाला। उसी प्रतिस्पर्धा को देखते हुए सर संघ चालक मोहन भागवत ने बयान दे डाला कि संघ संतों की भावनाओं के साथ है और चाहता है कि राम मंदिर बनाने के लिए कानून जल्द जल्द से आए। बीच में सरकारी संत बाबा रामदेव भी कूद पड़े और कहा कि लोगों का धैर्य जवाब दे गया है और अब राम मंदिर के निर्माण में देरी नहीं होनी चाहिए। यहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से यह घोषणा पर गौर करने लायक है कि भगवान राम की प्रतिमा सरदार पटेल की स्टेच्यू आफ लिबर्टी से भी ऊंची बनेगी और उसका प्रारूप तैयार हो गया है। वह कांस्य प्रतिमा होगी और उसकी ऊंचाई 221 मीटर होगी। हालांकि हकीकत में वे वैसा कुछ करने वाले नहीं हैं।
राज्य विधानसभा चुनावों के बीच और राम मंदिर का मुद्दा गरमाता देख कांग्रेस के भी कुछ नेताओं ने अपने-अपने ढंग से बयान दिए हैं और उनमें निराशा और बूमरैंग करने वाले दांव देखे जा सकते हैं। सबसे पहले राजस्थान कांग्रेस के नेता सीपी जोशी का वह बयान देखने लायक है जिसके लिए पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के कहने पर उन्हें माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने कहा था कि राममंदिर के बारे में तो कुछ कहने और करने का हक ब्राह्मणों को है। लोध जाति की उमा भारती और गैर- ब्राह्मण जाति की साध्वा ऋतंभरा उसे क्या समझें। दूसरा बयान स्वयं राहुल गांधी का है कि राम मंदिर तो हम ही बनाएंगे भाजपा वाले नहीं बना सकते। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश के अपने वचन- पत्र में रामवनगमन पथ के निर्माण का वादा भी किया है और गोरक्षा और अध्यात्म से संबंधित कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए हैं।

इस बीच तीसरा बयान समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव का है जिन्होंने अयोध्या में सेना तैनात करने की मांग की है। जबकि मायावती का कहना है कि वे जब भी चुनाव आता है तो राम मंदिर का मुद्दा उठाते हैं। अगर उनकी भावनाएं अच्छी होतीं तो पांच साल इंतजार नहीं करना होता।
अयोध्या के माध्यम से निर्मित हो रहा राजनीतिक आख्यान और सुप्रीम कोर्ट और संसद पर बनाया जा रहा दबाव इस बात का सुबूत है कि इस देश से लोकतंत्र का इकबाल निरंतर उठ रहा है। लोकतंत्र इस चुनाव से उस चुनाव तक चलने वाली एक दौड़ बनकर रह गई है जहां चुनाव साधन नहीं साध्य हो गया है। जो लोग लोकतंत्र, संविधान और उसकी संस्थाओं को कमजोर कर रहे हैं वे शक्तिशाली हैं और जो उसकी रक्षा की गाहे बगाहे बात करते हैं और उसे ताकतवर मानते हैं वे कमजोर हैं। राम मंदिर बनाने वालों के पास पूरी योजना है, लोकतांत्रिक राजनीति के मर्म को भेदने वाला धार्मिक भावना का तीर है। जबकि उस राजनीति को चुनौती देने वालों के पास महज चुनाव का तुक्का लगने की उम्मीद। वह उम्मीद भी कभी रुपए की गिरावट और तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी से हरी हो जाती हैं तो कभी उनके सामान्य होने से सूखने लगती हैं। उन्हें हिंदू समाज की जातियों की वर्गीय गोलबंदी और उनके सवर्ण अवर्ण विभाजन से उम्मीद बनती है तो उनकी धार्मिक एकजुटता से बिखरती नजर आती है।

राम मंदिर के बहाने लगातार शक्तिशाली होती जा रही हिंदुत्व की राजनीति के विश्लेषण में यह विवेचना बहुत पुरानी है कि यह सब चुनाव की राजनीति का उत्पाद है। यह बात तो अलग तरीके से हिंदुत्ववादी भी पेश करते हैं कि वोट बैंक की राजनीति से देश का बंटाधार हो गया। हालांकि वे स्वयं सबसे बड़े वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। वे यह भी कहते हैं कि बार बार होने वाले चुनाव से कटुता पैदा होती है, क्योंकि अपने विपक्षी के बारे में कड़वी बातें करनी होती हैं। बदले में विपक्षी भी कड़वी बातें करते हैं और उसके बिना चुनाव नहीं जीता जा सकता। इसलिए वे लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात करते हैं। लेकिन यह नहीं कहते कि चुनावों से कड़वी बातों को बाहर कैसे निकाला जाए। लोग यह जरूर कहते फिरते हैं कि चुनाव में कालेधन का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। अपराधी उम्मीदवार नहीं खड़े होने चाहिए लेकिन यह कोई स्वीकार नहीं करता कि भारत का चुनाव अब धर्म निरपेक्ष मुद्दों के आधार पर जीता ही नहीं जा सकता। वहां कम कट्टर और ज्यादा कट्टर की होड़ है। आखिर में सभी कट्टरता की ओर ही जा रहे हैं।

राम मंदिर आंदोलन ने संघ परिवार को वैधता और सत्ता ही नहीं दी है बल्कि भारतीय समाज से संविधानवाद और विवेक का प्रभाव छीन लिया है। कभी जयप्रकाश नारायण और डा लोहिया का नाम लेने वाले यह नहीं बताते कि उनकी संपूर्ण क्रांति और सप्तक्रांति की अवधारणा क्या थी। क्या उसमें इसी तरह का कुतर्क और अवैज्ञानिक विमर्श था? आज चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों पर ही नहीं सारे समाज में यह दलील चल रही है कि आप राम के साथ हो बाबर के साथ। कहीं इस बात पर भी बहस चल रही है रामायण बड़ा या संविधान। अपने एक वामपंथी साथी जिन्हें कुछ लोग अरबन नक्सली भी कह सकते हैं पूरी शिद्दत से मानते हैं कि संसदीय मार्ग की फिलसन यहीं पहुंचनी थी जहां हम पहुंचे हैं। आखिर में इस देश को हिंदू राष्ट्र ही बनना था। उनका विश्वास है कि रास्ता तो मार्क्सवादियों के पास ही है लेकिन लोगों में हिम्मत ही नहीं है उनके रास्ते पर चलने की। दूसरी ओर भाजपा के वे विधायक हैं जो कहते हैं कि राम मंदिर के लिए संविधान को कुर्बान किया जा सकता है।

भारतीय संविधान हमारे लोकतंत्र का सबसे पवित्र ग्रंथ है। उसमें लोकतंत्र की आत्म बसती है। वह भले समय समय पर विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया के भवनों में विचरण करती हो लेकिन उसका स्थायी निवास संविधान ही है। संविधान में लोकतंत्र की अंधआस्था नहीं उसकी विवेकवान आस्था निवास करती है। हालांकि यहां सवाल उठता है कि जब उसमें विवेक निवास करता है तो उसी की शपथ लेकर और उसी की देख रेख में क्यों उसे कमजोर करने वाले ताकतवर हो रहे हैं। यह सब उसी की देखरेख में क्यो हो रहा है?

जब डा भीमराव आंबेडकर ने भारत को संविधान दिया था तो यही कहा था कि इस देश में सैकड़ों भाषाएं हैं, हजारों जातियां हैं और दर्जनों धर्म हैं। इसे एक संविधान के माध्यम से एकजुट रखा जा सकता है। इसीलिए उन्होंने इसमें मजबूत केंद्रीय संस्थाएं दीं तो साथ ही आम आदमी की स्वतंत्रता का बंदोबस्त किया। धार्मिक आस्था और विश्वास, उद्यम, व्यवसाय और कारोबार की स्वतंत्रता दी तो समाज सुधार और बराबरी लाने का दर्शन भी दिया। लेकिन यह चेतावनी भी दी कि अगर उसे चलाने वाले कुपात्र होंगे तो अच्छे से अच्छा संविधान विफल हो जाएगा। अगर उसे चलाने वाले सुयोग्य होंगे तो कमजोर से कमजोर संविधान भी सफल होगा। लगता है सुपात्रों व्दारा बनाया गया संविधान कुपात्रों के हाथों में पड़कर रो रहा है। एक तरफ उसमें अविश्वास करने वालों की वामपंथी सोच है तो दूसरी ओर दक्षिणपंथी उग्रवाद। वामपंथी उग्रवाद तो लंबे समय से संघर्ष के बाद भी हाशिए पर ही है लेकिन दक्षिणपंथी उग्रवाद आज देश की मुख्यधारा बन चुका है। इसलिए संविधान और लोकतंत्र को बड़ा खतरा वामपंथ से नहीं दक्षिणपंथ से है। हालांकि दोनों की उग्र धाराओं का न तो संविधान में यकीन है और न ही लोकतंत्र में।

राम मंदिर के आख्यान और उसकी राजनीति का उद्देश्य संविधान, उसके मूल्यों और लोकतंत्र की भावना को कमजोर करना है यह तो स्पष्ट है लेकिन उसका उत्स कहां है इस बारे में मतभेद हैं। उसका उत्स भारत-पाक विभाजन की त्रासदी और व्दिराष्ट्र के सिध्दांत में है या दलित और पिछड़ी जातियों के उभार और समतावादी समाज के सैध्दांतिक विरोध में। वामपंथी विचारक इसे फासीवादी राजनीति का नया संस्करण मानते हैं तो दलित विचारकों का मानना है कि यह एक तरह का ब्राह्मणवाद है जो मुस्लिम विरोध और बाबर की आलोचना के बहाने खड़ा हुआ है। हकीकत में उसका उद्देश्य दलितों और पिछड़ों के उस आख्यान को चुनौती देना है जहां पर ब्राह्मणवाद की श्रेष्ठता समाप्त होती है। लेकिन मंदिर के इस आदोंलन ने बड़ी होशियारी से अपने भीतर मंडल को समाहित कर लिया है। यह महज संयोग नहीं है कि आज भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति की मिलती हैं, यह मंदिर और मंडल की ताकतों को एकसाथ लेकर चलने की रणनीति भी है। उसमें डा भीमराव आंबेडकर को अपनाने की रणनीति भी है और हिंदुत्व का आख्यान भी है। लेकिन वहां फुले और आंबेडकर के सपनों का समाज बनाने का संकल्प नहीं है।

विडंबना देखिए कि सवर्णों के वर्चस्व को चुनौती देने वाले पिछड़े और दलित बौध्दिक, सैध्दांतिक रूप से चाहे जितने मुखर हों लेकिन उनका राजनीतिक नेतृत्व सत्ता के लिए हिंदुत्व के ही पाले में गिरता है। वह यह तो चाहता है कि संविधान बचा रहे, लोकतंत्र कायम रहे क्योंकि इसी ने उसे गुलामी से मुक्त होने का मौका दिया है, मानवाधिकार दिए हैं, लेकिन वह संविधान के धर्मनिरपेक्ष और बंधुत्व के मूल्यों को लेकर संघर्ष नहीं करना चाहता। इसकी झलक अखिलेश यादव और मायावती में देखी जा सकती है। उन्हें सीटें चाहिए, सम्मान चाहिए लेकिन किसलिए चाहिए यह स्पष्ट नहीं है। राष्ट्र को लेकर उनके पास आख्यान नहीं है और न ही भारतीय इतिहास को लेकर उनके पास कोई विमर्श।

भारतीय संविधान बाहरी आक्रमण, आंतरिक विद्रोह और आपातकाल जैसे दबावों को झेलते हुए 68 साल तक तो चलता रहा लेकिन हिंदू राष्ट्र की चुनौती उसे डरा रही है। लोकतंत्र की आत्मा को संविधान और उसकी संस्थाओं से निकालकर पार्टी दफ्तरों और सांस्कृतिक-सह-राजनीतिक संगठनों के दफ्तरों में कैद किया जा रहा है। ग्रैनविल आस्टिन ने `इंडियन कांस्टीट्यूशनः कार्नरस्टोन आफ ए नेशन’ और `वर्किंग ए डेमोक्रेटिक कांस्टीट्यूशनः ए हिस्ट्री आफ इंडियन एक्सपीरियंस’ जैसी पुस्तकें लिखकर यह साबित करने की कोशिश की है कि भारत में संविधान अच्छी तरह से चल रहा है। वे संवैधानिक संस्थाओं की बेहतरीन कार्य की सराहना करते हैं। हालांकि पद्मश्री आस्टिन दूसरी पुस्तक लिखते समय पाते हैं कि हमारी सरकारें अब बहुत कुछ छुपाती हैं। आरक्षण यानी जाति की लड़ाई का समाधान देने वाले कार्यक्रम की तारीफ करते हुए `मार्क गैलेंटर कम्पीटिंग इक्वीलिटीज’ में लिखते हैं कि भारत की आरक्षण व्यवस्था दुनिया में सबसे व्यवस्थित और बेहतर है। इसी तरह रोहित डे ने `ए पीपुल्स कांस्टीट्यूशन’ में यह बताया है कि किस तरह से शराबी, तस्करों, छोटे व्यापारियों, कसाइयों, वेश्याओं और कमजोर आदिवासी समुदायों ने संविधान के दायरे में अपनी लड़ाई लड़कर सम्मान और अधिकार हासिल किए हैं।

इन आशाजनक वर्णनों के बावजूद आज जो चुनौती हमारे संविधान के समक्ष उपस्थित है उससे निपटने में सुप्रीम कोर्ट और मीडिया जैसे संस्थान लाचार हैं और विधायिका व कार्यपालिका चुनौती प्रस्तुत करने वालों की मुट्ठी में हैं। यह वही चुनौती है जिसके बारे में न्यायमूर्ति खेहर ने एनजेएसी पर फैसला देते समय राममंदिर आंदोलन के पुरोधा लालकृष्ण आडवाणी के हवाले से चेताया था। उन्हें चुनौती देने वाले राजनीतिक और सामाजिक संगठन अपनी योजनाओं में कमजोर और पीछे हैं। आज भले ही कांग्रेसी संत कहे जाने वाले स्वामी स्वरूपानंद ने अयोध्या की धर्म संसद के समांतर काशी में परम धर्म संसद 1008 की शुरुआत कर दी है और प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की मृत्यु के हवाले से आरोप लगाया है कि गंगा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धोखा दिया है और काशी की विरासत को तहस नहस किया है। उन्होंने मंदिर निर्माण को रामजन्मभूमि तक सीमित करने का तर्क उपस्थित किया है। यह हिंदू बनाम हिंदू की स्पर्श राजनीति है। यह हिंदुत्व का कोई समांतर आख्यान प्रस्तुत कर पाएगी इसमें संदेह है। इससे कांग्रेस भाजपा की कार्बन कापी बनते हुए अपने को मूल प्रति बताने की कोशिश करेगी, ज्यादा से ज्यादा इतना ही हो सकता है।

प्रतीकों में जीने वाले इस देश में पिछली सदी के दो ही व्यक्तित्व पूरे देश के लिए पात्रता रखते हैं। एक हैं महात्मा गांधी और दूसरे हैं डा बाबा साहेब आंबेडकर। महात्मा गांधी कहा करते थे कि वे समस्त हिंदू धर्म ग्रथों में विश्वास करते हैं लेकिन अपने विवेक के अनुसार उसमें बदलाव की छूट लेते हैं। डा आंबेडकर अपने समस्त बौध्दिक विमर्श में उसी विवेक को जगा रहे हैं। गांधी अगर सत्य के आधार पर इस देश की अंतरात्मा को जगाते हैं तो डा आंबेडकर देश के सद्असद विवेक को जागृत करते हैं। गांधी सत्य के लिए राजनीतिक आजादी का संघर्ष छेड़ने के साथ धार्मिक भेदभाव को मिटाते हुए जातिगत भेदभाव मिटाने पर आते हैं, तो आंबेडकर पहले जातिगत भेदभाव को मिटाते हैं फिर राजनीतिक और आर्थिक आजादी और धार्मिक एकता की बात करते हैं।

विडंबना है कि राम का नाम लेते हुए गांधी कोलकाता और नोवाखाली में सांप्रदायिक आग को ठंडा करते हैं और आज उन्हीं का नाम लेकर उस आग को भड़काया जा रहा है। वे अपनी बीमारी के लिए दवा न लेते हुए राम नाम का उपचार करते हैं तो आज सत्ता का अखंड सुख भोगने के लिए राम का नाम लिया जा रहा है। गांधी राम की विशाल मूर्ति नहीं राम के महान मूल्यों की स्थापना करना चाहते थे। आज राम की मूर्ति बड़ी और उनके मूल्यों को छोटा किया जा रहा है। वहीं डा भीमराव आंबेडकर अगर संवैधानिक मूल्यों के लिए सत्ता छोड़ने को तैयार रहते थे तो आज सत्ता के लिए संवैधानिक मूल्यों को तिलांजलि देने की तैयारी है।

विडंबना देखिए कि गांधी की विरासत की स्वाभाविक दावेदार कांग्रेस पार्टी रामवनगमन पथ निर्माण की बात तो करती है लेकिन वह उस गांधी के स्वाधीनता संग्राम और उनकी यात्राओं के पथ बनाने की बात नहीं करती जिसके कारण आज यह देश है और उनकी पार्टी भी है। दलितों को हक दिलाने वाले डा आंबेडकर की मूर्ति लगाने और उनकी जयजयकार करने की होड़ तो है लेकिन उनके व्दारा लिखित संविधान को बचाने की जद्दोजहद कहीं नहीं है। यह स्थिति ऐसा कहने पर विवश करती है कि अब इस देश में लोकतंत्र की आत्मा को राम ही बचाएंगे।


इंदौर के अखबार प्रजातंत्र से साभार