Home पड़ताल घुमंतू जनजातियां: इतिहास के पीड़ित और राजनीति के मसखरे

घुमंतू जनजातियां: इतिहास के पीड़ित और राजनीति के मसखरे

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भारत को आज़ाद हुए 72 वर्ष हो चुके हैं, किंतु कुछ समाज ऐसे भी हैं जो आज भी अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं और उनकी ये लड़ाई आज़ादी की लड़ाई से इस मायने में ज्यादा गंभीर और चुनौतीपूर्ण है कि गैरों से लड़ना तो आसान है किंतु अपनों से लड़ना महाभारत के जैसा है। ये समाज आज भी उसी जाल में फंसे हुए हैं जो अंग्रेजों ने 1871 में इनके लिए बुना था। ब्रिटिश सरकार ने उस समय एक कानून बनाया था ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’, इस कानून के अंतर्गत 191 आदिवासी और घूमंतु समाजों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया था।

 

इस कानून ने इन समाजों के पारम्परिक कार्यों को बैन कर दिया, उनके स्वतंत्र तरीके से कहीं भी आने-जाने पर रोक लगा दी, उन्हें पुलिस थाने में हाज़िरी लगानी पड़ती थी। उनके लिए ऐसे कैम्प बनाए गए जैसे जर्मनी में हिट्लर ने यहूदियों के लिए यातना गृह बनाये थे।

आखिर ये 191 समाज कौन है? ये काम क्या करते थे? अंग्रेजों ने इनको जन्मजात अपराधी क्यों बनाया ? आज़ादी के बाद इस क़ानून का क्या हुआ? विभिन्न सरकारों ने इन समाजों के उत्थान के लिए अब तक क्या किया है? इन समाजों के लिए आगे का रास्ता क्या हो?

ये लोग समाज को चलाने वाले ऊंचे दर्जे के लोग हैं, जो हमारी मौखिक इतिहास और ज्ञान की समृद्ध परंपरा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लेकर जाते, ऊंट, गधे और बैलों की सहायता से अरब से लेकर मुल्तान तक और भारत भर में व्यापार और परिवहन को चलाते, विभिन्न उपयोग की वस्तुएं बनाने, लोकतंत्र के मूल्यों से समाज को अवगत कराने और उन्हें मजबूत बनाने में रहे हैं।

इन घुमन्तू समाजों ने न केवल हमारी रोज़मर्रा की जरूरतों को पूरा किया है बल्कि समाज को एक सूत्र में बांधे रखा है। ये लोग तो बौनों के समय में गुलिवर थे। रेगिस्तान में पानी और मिट्टी के प्रबंधन से लेकर जड़ी- बूटियों का ज्ञान और परम्परागत तरीके की चिकित्सा पद्धति से विभिन्न रोगों का ईलाज किया। कला, मनोरंजन और समाज सुधार की अग्रिम पंक्ति के लोग रहे हैं, इनकी हमारे साथ बेहतरीन जुगलबन्दी हुआ करती थी। इन लोगों ने उस भूगोल और परिस्थितियों में इंसानी जीवन को रहने योग्य बनाया जहां रहने की कल्पना भी नहीं  की जा सकती थी।

इन समाजों में नट, भाट, बंजारा, सपेरा, कंजर, पेरना, सिंगीवाल, तेली, कोली, सांसी, छारा, छप्पर- बंद, घंटी चोर, ओड़, कालबेलिया, जोगी जैसे 191 समुदाय आते हैं। वैसे तो ये समाज पूरे भारत मे फैले हुए हैं जिन्हें अलग- अलग राज्यों में अलग नामों से जाना जाता है। किंतु राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य-प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रेदेश राज्य में इनकी बहुलता है। इन समाजों की जनसंख्या 10 से 11 करोड़ के बीच आंकी गई है।

ये लोग राजाओं की सेना में सिपाही थे, जो गुरिल्ला युद्ध प्रणाली से अंग्रेजी सेना पर हमला करके जंगलों में जाकर छिप जाते थे, इनको अस्त्र- सस्त्र बनाने का बेहतरीन ज्ञान था, जो सेनाओं के लिए हथियार तैयार करते थे। इनको रोकने के लिए अंग्रेजों ने 1829 में व्यापक स्तर पर जंगलों की कटाई शुरु कर दी। लेकिन इनके ऊपर रोक लगाने में वे नाकाम रहे।

इन समाजों ने अपने दैनिक जीवन के क्रियाकलापों के जरिये मध्यकालीन भारत मे पुरुष की सत्ता, जाति की सत्ता, धर्म की सत्ता और राजा की सत्ता को चुनोति दी और स्वतंत्रता एवं न्याय के मूल्य की स्थापना में योगदान दिया। अंग्रेजों को यह डर था की ये लोग गांवों में राष्ट्रवाद की भावना का प्रचार- प्रसार कर रहे हैं जो हमारे हित मे नही हैं अतः इसे रोकना होगा।

अंग्रेजों के शासन का आधार व्यापार था और उसे बढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने 1850 के दशक में रेलवे लाइन बिछाई और रेल सेवा सुरु कर दी किंतु उस समय भारत मे परिवहन और व्यापार का आधार यही समाज थे, जो दूर- दराज के गांवों से जुड़े हुए थे। ये जाहिर सी बात थी कि यदि रेल सेवा को सफल बनाना है, तो व्यापार और परिवहन के पारम्परिक तरीकों पर रोक लगानी होगी।

1857 की क्रांति में इन समाजों ने राजे- रजवाड़े की तरफ से और स्वतंत्र तरीके से बड़े स्तर पर हिस्सा लिया था, इससे अंग्रेज इन समाजों की कार्यशैली और लड़ाकू पद्ति से चिंतित थे। उन्होंने इनको रोकने हेतु 1871 में जन्मजात अपराधी अधिनियम बना दिया।

भारतीय इतिहास लिखने में भी इन समाजों को इग्नोर किया गया है, यदि कहीं इनका जिक्र मिलता भी है, तो उसे महज ऊंट और सारंगी में समेट दिया है। चारागाही जीवन और भोजन एकत्रीकरण के साथ ही जीवन निर्वाह के एक तीसरे तरीके को भी इतिहास में नजरंदाज किया गया है, वह है झूम कृषि।

इतिहास के पीड़ित इन समाजों को भारतीय राजनीति ने जोकर बना दिया। आज़ादी के बाद भारत सरकार ने 1952 में इन समाजों को जन्मजात अपराधी होने के कानून को तो समाप्त कर दिया। लेकिन एक अन्य कानून ‘अभयस्त अपराधी कानून’ बना दिया गया। मतलब पुरानी शराब को नई बोतल में उड़ेल दिया। अपराधी होने का तमका इनके माथे पर ही रहा।

नेहरू का मानना था कि इन समाजों का विकास उनके गुणों के अनुसार होना चाहिए, उनके जंगल, जमीन और परम्परा के अधिकारों को बचाकर रखना चाहिए, वहां सरकारी तंत्र अति प्रशासित नहीं  होना चाहिए और इन समाजों की प्रगति का मापदंड उनके चरित्र, उनकी जीवनशैली के बचाव से तय होना चाहिए न कि केवल उस खर्चे के आंकड़ो से।

लेकिन ये दुःख और  शर्म की बात है कि सभी सरकारों ने ठीक इन सिद्धांतों के विरुद्ध काम किया है। ये समाज किसी भी राजनीतिक दल या सरकार के एजेंडे का हिस्सा कभी नहीं रहे। सरकारों ने बिना इन समाजों को समझे इनके कार्यों पर रोक लगा दी।

हमारी सरकारों के पास इन समाजों की संकल्पना में ही दोष है, वो अधूरी, अस्पष्ट और टूटी-फूटी है। हमारे लिए घुमन्तू लोग महज खेल-तमाशे दिखाने वाले, ऊंट, सारंगी बजाने वाले हैं। इन समाजों के सहज और उपयोगी ज्ञान से सरकारों को कोई वास्ता नही है। उनके लिए महज ये आंकड़े हैं।

इन समाजों के पास सृजित ज्ञान की अथाह पूंजी है जो धीरे- धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रही है क्योंकि इनका ज्ञान समाज की जरूरत और प्रक्रिया से निकला है। किसी डिग्री या डिप्लोमा में हासिल नहीं किया। ये ज्ञान उनके जीवन का हिस्सा है, यदि उनका जीवन बचेगा तो ही ये ज्ञान बचेगा। लेकिन आज हमारी सरकारें बिना इन समाजों को समझे उनकी जीवनशैली पर ही कानून बनाकर रोक लगा रही हैं, तो फिर वो ज्ञान कैसे बचेगा?

जब सपेरा या कालबेलिया सांप ही नही पकड़ेगा तो उससे जुड़े जहर और जहर मारक जड़ी- बूटि, औषदियों का ज्ञान भी समाप्त हो जाएगा। सरकार ने सांप पकड़ने पर रोक लगा दी जबकि कालबेलिया 21 दिन में सांप को वापस जंगल मे छोड़ता है यदि किसी टोले में सांप मर जाए तो कालबेलिया पंचायत उसके ऊपर कठोर नियम लगाती है उसे जाति से बाहर तक निकाल दिया जाता है।

बंजारे गधे और ऊंटों के जरिए अरब देशों से अरबी कपड़े, मुल्तानी मिट्टी और गुजरात से नमक लाते थे। पहले उनके अरब जाने पर रोक लगी, फिर उनसे परिवहन और व्यापार छीना और 1995 में सरकार ने उनके नमक के व्यापार पर भी रोक लगा दी, किंतु हम ये भूल गए कि जब बंजारे अरब जाते थे तो उसी दौरान रास्ते मे बावड़ी, टांके से पानी का प्रबंधन भी करते थे। क्योंकि उनके पास सैकड़ों की संख्या में ऊंट, गधे और बैल होते थे। जब वे व्यापार करेंगे ही नही तो उनका ये ज्ञान भी समाप्त हो जाएगा।

सरकार ने कानून बनाकर इनके जंगल के अधिकारों को छीन लिया, उनके औषधियों, जड़ी- बूटियों के ज्ञान को छीन लिया। मेडिकल प्रक्टिसनर अधिनियम बनाया तो सिंगीवाल, सांसी, जोगी और कंजर के स्वास्थ्य के पारम्परिक ज्ञान की पद्धति को ठुकरा दिया। जबकि ये कंजर ही थे जिन्होंने क्युरिंग बॉईल की पद्ति को चलाया।

नट लोगों के रस्सी और बांस पर चलने पर रोक लगा दी, लेकिन सरकारें यह भूल गई कि जब नटनी गांव- गांव में जाकर ढपली की थाप पर रस्सी पर चलती थी तो वो महज करतब नहीं था बल्कि महिला मुक्ति की धुन थी। उसके करतब देखने के लिए दलित स्त्री भी होती और ब्राह्मण महिला भी होती थी। उसके साथ वहां वो फुश के घोड़े, हाथी और ऊंट बनाते थे जिससे वे भी आज समाप्ति की कगार पर हैं।

सार्वजनिक भूमि और गोचर भूमि पर या तो कब्जा हो गया या सरकारों ने उसे अन्य किसी रूप में उपयोग में ले लिया जिससे बागरी समाज के रेवड़( भेड़- बकरी) चराने पर रोक लग गई क्योंकि वहीं उनके डेरे पड़ते थे, उनके रेवड़ चरा करते हैं, जब सार्वजनिक भूमि बची नही हैं तो फिर उस मिट्टी के प्रबंधन का ज्ञान भी समाप्त हो रहा है।

बहरूपियों, भांड, और पारधी घुमन्तू समाज के लोगों को कभी बच्चा चोर गिरोह बताकर पीटा जाता है तो कभी इनको चोर- उचक्के कहकर रातों- रात इनकी बस्ती को जला दिया जाता है। घुमन्तू लोगों के प्रति हमारे समाज में घृणा का स्तर इतना ज्यादा है कि इनके लोगों के मरने पर शमशान भूमि भी नसीब नही होती। इनके पास किसी भी कानून का संरक्षण नही है, सभी सरकारों के लिए यह मनोरंजन के उपकरण मात्र हैं।

सरकार ने कलन्दर से भालु और  मदारी से बंदर छीन लिया, पेरना समाज के जोंक रखने पर रोक लग गई। जबकि दूसरी तरफ विभिन्न राज्य सरकारें उन्ही बंदरों को गोली मरवाती हैं। क्या ऊंट, घोड़े और गधे के लिए ये नियम लागू नही होता, क्या चिड़ियाघर में जीव नही रहते ? नट के करतब पर रोक लगा दी, जबकि डब्ल्यू. डब्ल्यू. एफ. और बॉक्सिंग को सरकार बढ़ावा देती है। क्या वहां सुरक्षा का मुद्दा नही रहता?

केंद्रीय सरकारों ने इनके उत्थान के लिए रैनके आयोग और इदाते आयोग बनाया यदि इन आयोगों की रिपोर्ट पढ़ेंगे तो कोई भी सामान्य इंसान सर पिट लेगा कि सरकार कैसे-कैसे आयोग बनाती हैं। इन आयोगों की हकीकत इनकी रिपोर्ट से जुड़े रिसर्च स्कॉलर बताते हैं कि रिपोर्ट को किस तरीके से लिखा गया। विभिन्न राज्य सरकारें घुमन्तू बोर्ड बनाती हैं, अपने लोगों को पदों पर बिठाती हैं, लेकिन उन बोर्ड को बजट का एक पैसा तक नहीं  देती।

ये हमारे सरकारों की असंवेदनशीलता को ही दिखाता है कि आज 2019 में भी ये समाज उसी अपराधी होने के तमके को लेकर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। इन समाजों के लिए लोकतंत्र, न्याय, गरिमा, समानता, संविधान जैसे आदर्श महज जुमले बनकर रह गए। यहां मानवाधिकार आयोग से लेकर न्यायपालिका है, सैंकड़ों की संख्या में दिन -रात चलने वाले टीवी चैनेल हैं लेकिन इन समाजों के लिए किसी को कोई वास्ता नही है।

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