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चुनाव से पहले के अंतिम बजट से क्‍या उम्‍मीदें हैं? एक फौरी आकलन

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पीयूष पन्त 

वित्त मंत्री अरुण जेटली मोदी सरकार के कार्यकाल का अंतिम और अपना पांचवां आम बजट पेश करने वाले हैं। ये 2019 में होने वाले चुनाव से पहले का अंतिम आम बजट है लिहाजा ये  कयास  लगाए जा रहे हैं कि चुनाव के मद्देनज़र आम आदमी, खासकर गरीबों और किसानों को राहत दी जाएगी और उन्हें केंद्र में रख कर नयी योजनाओं की घोषणा की जा सकती है। साथ ही नोटबंदी की मार से त्रस्त  हुए निम्न मध्यम वर्ग और छोटे व्यापारियों को राहत पहुँचाने की कोशिश की जा सकती है।

चुनावी वर्ष का बजट होने के नाते इस तरह की अपेक्षाएं लाजिमी हैं, हालांकि लोक लुभावन बजट देना मोदी सरकार की मजबूरी कभी नहीं रही है। चुनाव जीतने के लिए उसके पास सफलतापूर्वक आजमाया गया नुस्खा तो है ही। यानी अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करना, उन्हें देशद्रोही कहना, हिन्दू बनाम मुस्लिम का राग अलापना और अंत में प्रधानमंत्री मोदी का मंदिर-मंदिर मत्था टेकना।

फिर भी लोकतंत्र में आम आदमी को यह सन्देश देना सरकारों के लिए लाजिमी हो जाता है कि वे गरीबों के कल्याण के लिए प्रयासरत हैं। इसी मजबूरी के चलते मोदी सरकार गरीबों और किसानों को कुछ राहत दे सकती है। गुजरात चुनाव में ग्रामीण इलाकों में हुई फजीहत के चलते किसानों और कृषि मजदूरों को आर्थिक फ़ायदा पहुँचाने वाली नई ग्रामीण योजनाओं की घोषणा की जा सकती है। साथ ही वर्तमान में चालू  मनरेगा, ग्रामीण आवास योजना, सिंचाई योजना और फ़सल बीमा योजना जैसी योजनाओं और कार्यक्रमों को आबंटित की जाने वाली राशि में इजाफ़ा किया जा सकता है। चूंकि आगामी आम चुनाव में ग्रामीण भारत में व्याप्त असंतोष निर्णायक असर छोड़ सकता है इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि वित्त मंत्री के बजटीय भाषण का एक बड़ा हिस्सा कृषि अर्थव्यवस्था पर केंद्रित हो सकता है और कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने, उन्हें बाज़ार मुहैया कराने  सम्बन्धी योजनाओं व उनके मद में बड़ी राशि के आवंटन की घोषणा भी हो सकती है। साथ ही फसल के न्यूनतम मूल्य में इजाफा और अनाज के रख-रखाव सम्बन्धी सुविधाओं के बढ़ोत्तरी को लेकर भी घोषणाएं हो सकती हैं।

देखना ये होगा कि क्या ये बजट जीएसटी की मार झेल रहे छोटे और मझोले व्यापारियों को राहत पहुँचाने के लिए  कोई घोषणा करता है? उम्मीद तो कम लगती है क्योंकि मोदी सरकार पहले ही खुदरा में सौ फ़ीसदी विदेशी निवेश की घोषणा कर इन व्यापारियों के जले में नमक छिड़क चुकी है।

जीएसटी लागू होने के बाद अब अप्रत्यक्ष करों की दर में बढ़त-घटत का अनुमान लगाना व्यर्थ है। हाँ, आयात-निर्यात की स्थिति को देखते हुए कस्टम ड्यूटी के फेरबदल से इंकार नहीं किया जा सकता है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ की अवधारणा को फ़लीभूत करने के उद्देश्य से आयात होने वाली कुछ चीजों पर कस्टम ड्यूटी में राहत की संभावना देखी जा सकती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के धीरे-धीरे पटरी पर वापस आने को देखते हुए कुछ वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कस्टम ड्यूटी में छूट दी जा सकती है।

जहां तक आय कर की सीमा में छूट की बात है तो इसकी उम्मीद कम ही नज़र आती है। पिछले चार वर्षों से मोदी सरकार मध्यवर्ग की उम्मीदों पर पानी फेरती रही है और इस बजट में भी ऐसा ही हो सकता है। इसका कारण भी है। वित्तीय घाटे से परेशान मोदी सरकार नोटबंदी के अप्रत्यक्ष परिणाम स्वरुप बढे करदाता बेस को दुहने के लोभ से खुद को बचा नहीं सकती है। वहीं कॉरपोरेट के प्रति भक्त ये सरकार कॉरपोरेट कर की दर ३० फीसदी से घटा कर २५ फीसदी कर सकती है। हाँ, शेयर बाज़ार से होने वाली आमदनी को कर के दायरे में लाने की उम्मीद की जा सकती है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी ढांचागत निवेश और निर्माण क्षेत्र में पूंजीगत निवेश की ताकि नौकरियों का सर्जन हो सके और अर्थव्यवस्था को गति प्रदान का जा सके। बड़ी चुनौती वित्तीय घाटे को जीडीपी के 3.2 फीसद तक सीमित रखने की भी है लेकिन साथ ही चुनौती सरकारी पूंजी निवेश को बढ़ा कर विकास दर को गति देने की भी है।

देखना है कि वित्त मंत्री अपने बजट में इन सभी चुनौतियों का सामना कर पाते हैं या नहीं?


वरिष्‍ठ पत्रकार पीयूष पंत आर्थिक मामलों के जानकार हैं और लंबे समय तक वैकल्पिक आर्थिकी पर केंद्रित पत्रिका ‘लोक संवाद’ के संपादक रहे हैं। फिलहाल स्‍वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं और कई टीवी चैनलों पर पैनलिस्‍ट की भूमिका में हैं।     

2 COMMENTS

  1. U mesh chandola

    May be a small increase in agriculture allocations. Also Nominal 4 Manrega. After all our imperialist masters of WTO I found will decide or who knows make our budget. Without farmer’s suicide manufacturers cannot expect cheap labour. A simple Mujjafarnagar RIOTS can fetch you 73 seat out of 80in 2014 ( only 10 seats in 2004 and 2009). How many people bother about details? Saffronised media will say ” Historic budget for benefits of poor “

  2. U mesh chandola

    …. WTO, imf. Farmers will move to factory if agriculture is not sustainable.

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