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क्रिकेट में महज एक हार से उपजी राष्‍ट्रीय हताशा से बचने के हज़ार तरीके

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जब ‘क्रिकेट’ भारत के लोगों के मन-मस्तिष्क से लेकर ड्राइंग रूम तक,  बाजार की धड़कती हुई धड़कनों से लेकर सत्ता और विपक्ष के नेतृत्वकर्ताओं के ट्वीट तक आ पहुचा हो! ऐसे में क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों पर कलम चलाना किसी जोखिम से कम नही, खासकर जब अखबारों से लेकर टीवी चैनलों तक दूसरे खेलों की कोई आवाज नहीं, कोई हलचल नहीं और कोई डिस्कशन नहीं। साथ में कोई दर्शक नहीं, कोई हार का दुख मनाने वाला नहीं।

जब दो बार का विश्व विजेता भारत बारहवें विश्व कप के सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड की टीम से जूझ रहा था उसी समय भारत की जांबाज बेटी दुतीचंद स्वतंत्र भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम दर्ज करा रही थी, उस प्रतिस्पर्धा ‘एथलेटिक्स’ में जिसमें आज तक भारत का कोई भी खिलाड़ी पदक तो छोडि़ये कभी फाइनल के लिए क्वालिफाइंग (100 मीटर) भी ना कर सका हो। लेकिन दुर्भाग्य यह खबर न तो अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर जगह बना सकी और न ही क्रिकेट के मास्टरस्ट्रोक की तरह संवाद खड़ा कर सकी। न ही भारत की जनता में जश्न के पल पैदा कर सकी।

एक तरफ भारत के करोड़ों लोगों की नजर एक माह से इंतजार कर रही थी  तो दूसरी तरफ भारत की बेटियां इटली, पौलैंड और स्पेन में चल रही प्रतिस्पर्धाओं में अपनी काबिलियत का डंका बजा रही थीं।

खासकर दुतीचंद, हिमादास और विनेश फोगाट का ‘कुटनों एथलेटिक्स पौलैंड’, ‘वर्ल्ड विश्वविद्यालय खेल स्पर्धा’ और ‘इटली नेपल्स स्पेन ग्रां प्री कुश्ती’ में स्वर्ण पदक जीतकर जापान ओलंपिक (2020) के लिए उन उम्मीदों को जगाना, जिन पर अभी तक भारत के मीडिया की निगाह भी नहीं गई है।

जिस समाज में दूसरे खेलों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हो, क्या संभव है कि जब वैश्विक रिकॉर्ड तोड़ने का साहस रखने वाले  खिलाड़ी अखबारों की सुर्खियों से बाहर हों और लोगों की नजरों में नदारद तो क्या वे खिलाड़ी अपना शत प्रतिशत दे पाएंगे?

इसमें कोई दो राय नहीं कि क्रिकेट  ने भारतीय समाज को विश्व स्तर पर पहुंचाया, जांबाज सितारे दिए जो लोगों के लिए प्रेरणास्रोत भी बने। लेकिन क्या दुनिया में  पांच ट्रिलियन डॉलर की उड़ान का सपना देखती भारतीय अर्थव्यवस्था  के लिए  यह काफी है?

भारत के अंदर जब तक अखबारों से लेकर टीवी चैनलों पर क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों को स्पेस नहीं मिलेगा तब तक हम मात्र एक ही खेल से उम्मीद रखकर दूसरे खेलों के खिलाड़ियों में निराशा का भाव पैदा कर रहे होंगे।

हम उम्मीद कर सकते हैं कि अखबारों और टीवी चैनलों को चाहे बाजार मिले या नहीं, कम से कम हमारे देश के महान एथलेटिक्स, हाकी और फुटबॉल प्लेयरों के साथ दूसरे खेलों  के रिकार्ड्स  दिखाये जाएं ताकि  नौजवान नस्लों की दूसरे खेलों में भी रुकच पैदा हो सके। ताकि  सामान्य से पिछड़े हुए गांवों, कस्बों और छोटे शहरों के युवा  दो दो सौ क्रिकेट खिलाड़ियों के नाम  याद रखने की क्षमता  रखने के साथ  राष्ट्रीय खेल हाकी, फुटबाल और एथलेटिक्स में ‘धनराज पिल्ले,’ ‘सुनिल छेत्री’ और मिल्खा सिंह के बाद कोई और भी नाम याद रख सकें, रिकॉर्ड की तो बात ही छोड़ दीजिए।

अखबारों और टीवी चैनलों पर आरोप लगाने से इतर आजादी के बाद से लेकर आज तक की सरकारों का बजट देखिए। खासकर  नया भारत बनाने का संकल्प लेने वाली वर्तमान सरकार का बजट। क्या सरकार कुल बजट का एक प्रतिशत भी दूसरे खेलों पर खर्च कर पा रही है?

सरकार ने वाकई अगर नए भारत का संकल्प लिया है तो भारत के सात लाख गांवों में कम से कम दस बीघा की जमीन का एक टुकड़ा दिलाया जाय ताकि कल इस रखी गयी बुनियाद पर भारत की जमीं से भी भारत के महानतम खिलाड़ियों के साथ साथ वैश्विक स्तर के महानतम खिलाड़ी ‘माराडोना’, ‘पेले’, ‘जेडिन जिडान’, ‘उसैन बोल्ट’, ‘फेल्प्स’, ‘मोहम्मद अली’, ‘जार्ज फोरमैन’ जैसे  खिलाड़ी तैयार हो  सके।

जरूरी नहीं कि यह कदम सरकार ही उठाए। यह कदम  भारत के युवा मिलकर कर भी उठा सकते हैं जिससे भारत के गांवों की आत्मा ऊर्जावान बन सके। तब महज एक हार पर पूरा देश गम में नहीं डूबेगा क्योंकि तब हताशा निराशा से बचने के और भी कई रास्ते होंगे।


लेखक इलाहाबाद में सिविल सेवा की तैयारी कर रहे हैं

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