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पत्रकार विनोद वर्मा की गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट और कानूनी प्रावधानों की अवमानना है!

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अमित यादव

किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी से उसका अपमान होता है। यह उसकी आजादी को सीमित कर उसके माथे पर हमेशा के लिए एक कलंक छोड़ जाती है। कानून निर्माता और पुलिस, दोनों इस बात से वाकिफ हैं। इस मामले को लेकर कानून निर्माताओं और पुलिस के बीच खींचतान भी है। लेकिन ऐसा लगता है कि पुलिस ने इस मामले में अपना सबक नहीं सीखा।

उच्चतम न्यायालय की एक टिप्पणी (अरनेश कुमार बनाम बिहार सरकार, आपराधिक अपील संख्या 1277, जुलाई, 2014)

27 अक्टूबर को तड़के लगभग 03.30 बजे अचानक फोन की घंटी बजी तो मैं चौंक कर उठ गया। दूसरी तरफ एक पत्रकार मित्र थे। उन्होंने हड़बड़ी में सिर्फ इतना बताया कि वरिष्ठ पत्रकार विनोद वर्मा को छत्तीसगढ़ पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उनसे इंदिरापुरम थाने में पूछताछ की जा रही है और उनकी कानूनी मदद के लिये मुझे वहां पहुंचना होगा।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में इंदिरापुरम थाना मेरे निवास से तकरीबन 4 किलोमीटर दूर है। मैं मामले की पूरी जानकारी लिये बिना 15 मिनट  के अंदर वहां पहुंच गया। थाने में छत्तीसगढ़ पुलिस की विशेष शाखा के कुछ अधिकारी श्री वर्मा से किसी वीडियो क्लिपिंग के बारे में पूछताछ कर रहे थे। पूछताछ में शामिल एक इंस्पेक्टर ने जानकारी दी कि श्री वर्मा के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं 384 और 507 के तहत रायपुर के पिंडरी थाने में मामला दर्ज किया गया है।

वसूली से संबंधित धारा 384 में अधिकतम तीन साल कैद की सजा का प्रावधान है। धारा 507 अज्ञात संदेश के जरिये धमकाने से संबंधित है। इसके तहत ज्यादा-से-ज्यादा दो साल कैद की सजा दी जा सकती है। चूंकि इन दोनों धाराओं में कैद की सजा सात साल से कम है इसलिये मैंने इंस्पेक्टर से पूछा कि क्या उसने अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41 की कार्यवाही पूरी कर ली है जिसका उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने इंस्पेक्टर से पूछा कि श्री वर्मा को गिरफ्तार किया जायेगा या उन्हें सिर्फ पूछताछ के लिये लाया गया है। इस सवाल को भी उसने टाल दिया। वास्तव में हमें सुबह 08.00 बजे तक नहीं बताया गया कि श्री वर्मा को गिरफ्तार किया गया है।

आम तौर पर किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी का मेमो उसी जगह बनाया जाता है जहां उसे गिरफ्तार किया गया हो। गिरफ्तारी के दौरान बरामद सामान का मेमो भी वहीं तैयार किया जाता है। मगर इस मामले में ये सारी कार्यवाही थाने में बैठ कर पूरी की जा रही थी। जाहिर है कि श्री वर्मा की गिरफ्तारी जरूरी कानूनी कार्यवाही पूरी किये बिना ही की गयी। ऐसे में छत्तीसगढ़ पुलिस के इस दावे पर संदेह उठना स्वाभाविक है कि उसने श्री वर्मा के निवास से 500 वीडियो सीडी बरामद की। कम-से-कम इस बरामदगी का कोई निष्पक्ष गवाह तो मौजूद नहीं ही है।

अरनेश कुमार मामले में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी की रोशनी में यह सवाल उठता है कि क्या श्री वर्मा की गिरफ्तारी गलत नहीं थी? एक प्रतिष्ठित पत्रकार को रात में लगभग तीन बजे गिरफ्तार करने के क्रम में क्या छत्तीसगढ़ पुलिस ने उच्चतम न्यायालय की अवमानना नहीं की? उच्चतम न्यायालय के मुताबिक आरोप का गैरजमानती और संज्ञेय होना पुलिस अधिकारी को आरोपी की गिरफ्तारी का हक देता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ऐसे हर मामले में गिरफ्तारी उचित ही हो। गिरफ्तार करने का अधिकार होना एक बात है। मगर इस अधिकार के प्रयोग का न्यायोचित होना एकदम अलग बात है।

उच्चतम न्यायालय की उपरोक्त टिप्पणी से स्पष्ट है कि जुर्माने के साथ या इसके बिना सात साल अथवा इससे कम समय की सजा वाले मामलों में पुलिस अधिकारी अपने पास अधिकार होने के बावजूद किसी आरोपी को अपनी मनमर्जी से गिरफ्तार नहीं कर सकता। उसके पास यह मानने का ठोस आधार होना चाहिये कि आरोपी को अगर गिरफ्तार नहीं किया गया तो वह ऐसे और अपराध कर सकता है। उसे तथ्यों के आधार पर इस बात से संतुष्ट होना चाहिये कि यदि गिरफ्तारी नहीं की गयी तो आरोपी मामले में खोजबीन रोकने, सबूतों को मिटाने या गवाहों को धमकाने और प्रलोभन देने की कोशिश कर सकता है।

अरनेश कुमार मामले में उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी का मकसद नागरिकों को अनावश्यक गिरफ्तारी से बचाना है। भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी भी आरोपी को उस पर लगे इलजाम साबित होने से पहले निर्दोष ही माना जाता है। गिरफ्तारी से समाज में आरोपी के सम्मान को ठेस पहुंचती है और उसके निर्दोष साबित होने की स्थिति में इसकी भरपाई नहीं की जा सकती। इसलिये न्याय का तकाजा है कि किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी का फैसला करने की प्रक्रिया में अधिकतम सावधानी बरती जाये।

उच्चतम न्यायालय के मुताबिक पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी करने के अपने फैसले के आधार को लिखित रूप से दर्ज करना चाहिये। अगर अधिकारी को लगता है कि आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिये तो इसके आधार को भी वह दर्ज करे। ऐसी स्थिति में वह मामले की तहकीकात के लिये धारा 41 (क) के तहत नोटिस जारी कर सकता है। न्यायालय ने कहा कि यदि आरोपी ऐसे नोटिस का पालन करते हुए तहकीकात के लिए उपस्थित होता है तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाये।

अब जरा मौजूदा मामले पर गौर करें। श्री वर्मा ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन और अमर उजाला जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे एक जानेमाने पत्रकार हैं। रात के वक्त और सैंकड़ों फ्लैटों वाली हाउसिंग सोसायटी से गिरफ्तार किये जाने से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को निस्संदेह ठेस लगी है। क्या उन्हें गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी को लगा कि नोटिस मिलने पर वह जांच में सहयोग नहीं करते? क्या वह ऐसे व्यक्ति थे जो अदालत के बुलावे पर पेश नहीं होता? अगर हां तो क्या अधिकारी ने इस नतीजे तक पहुंचने के अपने आधार को लिखित तौर पर दर्ज किया है? सवाल यह भी है कि क्या ऐसे सबूतों के साथ छेड़छाड़ संभव था जो हजारों लोगों के मोबाइल फोनों में व्हाट्सऐप संदेश के रूप में मौजूद हैं?

यह सिर्फ विनोद वर्मा का मामला नहीं है। रोजाना कितने ही लोग पुलिस, प्रशासन और राजनीति के अन्याय की भेंट चढ़ जाते हैं। जब उच्चतम न्यायालय से महज 25 किलोमीटर की दूरी पर उसके निर्णयों की खुली अवहेलना होती है तो सोचिये कि दूरदराज के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में उसके आदेशों और अनुदेशों का क्या हाल होता होगा।

उच्चतम न्यायालय ने राज्यों से कहा था कि वे अपने पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तारी की जरूरत के बारे में संतुष्ट हुए बिना किसी को गिरफ्तार नहीं करने का निर्देश दें। लेकिन राज्यों ने न्यायालय के इस अनुदेश पर अमल करने की सिर्फ खानापूरी ही की है। ऐसा लगता है कि हमारे देश में पुलिस को नागरिकों की गरिमा से कुछ भी लेना-देना नहीं है। कम-से-कम श्री वर्मा को इंदिरापुरम थाने में पूछताछ के दौरान उनके वकीलों से नहीं मिलने दिये जाने, उन्हें नित्यकर्म तक से रोके जाने और पूछताछ के दौरान धमकाये और अपमानित किये जाने से तो यही लगता है। स्लिप्ड डिस्क के एक मरीज को गाजियाबाद से तकरीबन 1500 किलोमीटर दूर रायपुर तक सड़क मार्ग से ले जाया जाना यह साबित करता है कि देश में नागरिक अधिकारों का सफर अभी काफी लंबा और कठिन है।


लेखक अधिवक्‍ता हैं। इनसे amityadavad@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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