Home पड़ताल भारतीय राष्ट्रवाद की समस्याएँ और एक प्रधानमंत्री का ‘उपराष्ट्रवादी’ होना !

भारतीय राष्ट्रवाद की समस्याएँ और एक प्रधानमंत्री का ‘उपराष्ट्रवादी’ होना !

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रामशरण जोशी 

 

गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के  छठी  दफे सत्ता में आने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परोक्ष ‘ उपराष्टवाद’ को  भी जाता है. पांच बार मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने इसे ज़म  कर भुनाया; सूबाई स्तर  से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक ‘ गुजरात अस्मिता’, ‘विकास का गुजरात मॉडल ‘ जैसे नारों को प्रचंड  आवाज़ में गुंजित कर बृहत्तस्तरीय  राष्ट्रवाद या अखिल भारतीय राष्ट्रवाद (pan indian nationalism )पर स्थापित कर दिया।  भारतीय राष्ट्र राज्य की सत्ता कमान को अपनी मुट्ठियों में भींच लिया.  गुजरात विधानसभा चुनावों के अंतिम चरण में उन्होंने बड़ी सफाई के साथ कोंग्रेसी नेता मणिशंकर  अय्यर  के शब्द “ नीच आदमी” को ‘गुजरात का अपमान ‘  या  ‘ गुजरात के बेटे ‘ का अपमान के साथ जोड़ दिया. यहीं से हवा बदल गई  और  मतदाताओं की उपचेतना में उपराष्ट्रवाद जाग उठा.इसका परिणाम यह निकला कि  उपराष्ट्रवाद की बदौलत प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी को फिर से सत्ता दिलाने में सफल रहे. बेशक, दूसरे भी कारण रहे हैं. लेकिन, उपराष्ट्रवाद का अलख न जगाया होता तो भाजपा आज सत्ता में नहीं होती.

प्रधानमंत्री मोदी इसके सूत्रधार रहे हैं, यह निष्कर्ष गलत होगा.द्रविड़ मुनेत्र कजगम, अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कजगम ( डी. एम.के.;ए डी। एम। के),तेलगु देसम(टी.डी.पी.),शिव सेना ,असम गण संग्राम परिषद, तृणमूल कांग्रेस ( टीएमसी), अकाली दल,गोमान्तक  जैसी कई क्षेत्रीय  पार्टियाँ हैं जोकि विभिन्न रूपों में उप राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करती आ रही है. मोदीजी ने इस उप राष्ट्रवाद को कॉर्पोरेट पूँजी और हाईटेक के पंख ज़रूर लगाये हैं।

वास्तव में, कांग्रेस युग से ही उपराष्ट्रवाद की धारा  बहती चली आरही है. कभी यह सुप्त रहती है, कभी उग्र व आक्रमक हो जाती है लेकिन राष्ट्रवाद की मुख्यधारा में इसकी अन्तर्धारा  निहित ज़रूर रहती है.आज़ादी के बाद से इसने भाषा के चोले में  नव उभरते भारतीय राष्ट्रवाद पर अपने हमले शुरू कर दिए; भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ; नए राज्य  (दक्षिण के राज्य, पश्चिम के राज्य,उत्तर -पूर्व राज्य, हरियाणा,हिमाचल,पंजाब ) अस्तित्व में आये. भाषा का ही एक मात्र सवाल  नहीं था, सम्बंधित सूबों के आर्थिक पिछड़ेपन, सांस्कृतिक भिन्नताएं और अस्मिताएं भी इन हमलों में शामिल थे.इसके अलावा, इन क्षेत्रों के अपने अपने सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक गौरव भी थे. स्वतंत्रता आन्दोलन में इनकी विशेष भूमिकाएं भी रही हैं. चूंकि अंग्रेजों की ओपनिवेशिक दासता  देश का प्रमुख अंतर्विरोध थी  इसलिए उप राष्ट्रवाद के आक्रमण दबे रहे.

जब  स्वतंत्र भारत में प्रमुख अन्तर्विरोध पृष्ठभूमि में चला गया,तब  विभिन्न सूरतों में उप राष्ट्रवाद के हमले उभरने लगे. वैसे भारत में कई राष्ट्रीयताएँ मानी जाती हैं लेकिन हिन्दुत्ववादी विचारधारा के समर्थक इसे स्वीकार नहीं करते हैं. वे भारत को एक ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की माला में पिरोने के प्रबल पक्षधर रहे हैं. ऐसे लोगों के मत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही ‘ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ है जो अनादि काल से चला आ रहा है.वह अक्षय है.धर्म-संस्कृति इसके आधारभूत वाहक हैं.ज़ाहिर है, धर्म-संस्कृति के जितने भी प्रतीक,लक्षण,साहित्य,जीवन शैलियां,मिथक, पूजा-अर्चना पद्धतियां,देवी-देवता,चिंतनधाराएँ आदि हैं भौगोलिक फासलों के बावजूद, उनमें अन्तर्निहित साम्यताएँ एक विराट  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जनक हैं. आस्था और भावना, इसकी  प्राणवायु हैं.

1947 के बाद नए  अंतर्विरोधों की दस्तकें सुनाई देने लगी ,और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर  यथार्थवादी  उप राष्ट्रवाद के हमले होने लगे. क्षेत्रीय विषमतायें,आर्थिक असंतुलन,निर्धनता-बेरोज़गारी, राजनीतिक महत्वाकन्क्षाओं , राष्ट्रीय पूँजी में  उभरती क्षेत्रीय पूँजी की स्थिति जैसे सवालअंतर्विरोध के रूप में उभरने लगे. नेहरु-काल में ही द्रविड़ आन्दोलन तेजी से उभर रहा था. क्षेत्रीय भाषा तमिल ने  हिंदी, जो कि अखिल भारतीय राष्ट्रवाद का आरोपित प्रतिनिधि मानी जा रही थी, को ज़बर्दस्त सांस्कृतिक-राजनीतिक चुनौती दी. नतीजतन, अन्नादुराई के नेतृत्व में 1967 में पहली  डीएमके सरकार अस्तित्व में आई.तब से लेकर आज तक कांग्रेस सहित कोई  भी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियाँ डीएमके व एडीएमके को अपदस्थ नहीं कर सकी हैं. दूसरे शब्दों में, बृहतस्तरीय राष्ट्रवाद पर उप राष्ट्रवाद भारी पड़ रहा है.पिछले कुछ समय से हिन्दुत्व राष्ट्रवाद या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एकलौती प्रतिनिधि काफी हाथ-पैर ज़रूर मार रही है. दोनों दलों के नेताओं को घेरने की कोशिश कर रही है लेकिन हाथ मलना पड़ रहा है. तमिलनाडु में उपराष्ट्रवाद की धारा व्यापक व सुदृढ़ है. इसकी अपनी एक अलग पहचान-अस्मिता है. कभी हाशिये पर रही जातियों ने इस अपनी नव अर्जित क्षेत्रीय पूँजी -सत्ता से लैस कर दिया है. इसमें नयी ‘मिलीटेंसी पैदा कर दी है.

आठवें दशक के आरम्भ में तेलगु देसम के झंडे तले आंध्रा का उपराष्ट्रवाद उभरा दूसरी बार.राजनीतिक दृष्टि से यह दूसरी बार काफी आक्रमक था. इससे पहले भाषा को लेकर था.लेकिन तेलुगु फिल्मों के महानायक से राजनीति में आये एन.टी.रामाराव ने नए ढंग से तेलुगु देसम के  उपराष्ट्रवाद को जाग्रत किया और १९८३ में कांग्रेस को सत्ता से अपदस्थ किया. उनकी चुनाव प्रचार शैली को इस लेखक ने कवर किया था. वे प्रायः प्रत्येक सभा में तेलगु आंध्रा के अतीत गौरव को ज़मकर उछाला करते थे. सिनेमा हाल में उनके द्वारा अभिनीत पौराणिक फ़िल्में दिखाई जाती थीं. इसका ज़बरदस्त फायदा उनके दल को हुआ और आज तक हो रहा है. जिस प्रकार आज प्रधानमंत्री मोदी  स्वयं को  ‘गुजरात पुत्र’ या गुजरात का ‘ पर्याय’ चित्रित करते हैं ,उसी तर्ज़ में एन.टी.आर. पहले ही कर चुके हैं. उन्हें ‘तेलूगु बिड्डा’ पुकारा जाने लगा था. बाद में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरसिंह राव को भी इसी उपाधि से नवाज़ा गया.

ब्राहमणवादी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ़ द्रविड़ नेताओं का सामाजिक सुधार का आन्दोलन सबसे दीर्घकालीन रहा है. द्रविड़ राजनीतिक दृष्टि से इसने मुख्यधारा की राजनीति को अपनी तमिल सरहद पर रोके रखा है. तमिल उपराष्ट्रवाद के आधार पर ही करुणानिधि, एम.जी.आर., जयललिता जैसे नेता सत्ता की राजनीति कर सके. आज के सन्दर्भों में करूणानिधि की संतान और जयललिता के उत्तराधिकारी भी उसी विरासत को थामे हुए हैं.लेकिन दक्षिण राज्यों में केरल ज़रूर आज तक अपवाद बना हुआ है. कोई एक दल,नेता या धर्म मलयाली उप राष्ट्रवाद की भावना  को राजनीतिक स्तर पर भुना नहीं सका.याद रहे, इसी प्रदेश में देश की पहली  साम्यवादी सरकार सत्ता में आयी थी. ई.एम्.एस.नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में चुनावों के माध्यम से साम्यवादियों ने सरकार बनाई थी ,जिसे दो वर्ष बाद केंद्र की नेहरु-सरकार ने गिरा दिया था. बावजूद इसके, केरल का उप राष्ट्रवाद नहीं जगा. आज भी नहीं. मुख्यधारा के राष्ट्रवाद की राजनीति का वर्चस्व प्रदेश की स्थानीयता पर हावी है.हालांकि, भाजपा और संघ परिवार धर्म के माध्यम इस पर हावी होने के प्रयास ज़रूर कर रहे हैं.लेकिन,सफलता काफी दूर है उनसे.

हरियाणा में  भी जाटवाद की आक्रमक उपस्थिति इस अन्तर्विरोध का प्रतिनिधित्व करती है ; सर छोटूराम, चौधरी बंसीलाल,देवीलाल, ओम प्रकाश चौटाला,चरण  सिंह (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) जैसे नेताओं ने जाटवाद की भावना को जाग्रत करने की कोशिश की.सफल भी  हुए; हरियाणा-पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ‘ जाटलैंड ‘ से परिभाषित किया गया. एक प्रकार से जाटवाद के आवरण में यह भी एक प्रकार से  उप राष्ट्रवाद है. यदि यह नहीं हुआ होता तो पंजाब से अलग नहीं होता.पंजाब की बात करें. आज़ादी के पहले से ही अकाली एक स्वतन्त्र राष्ट्र की मांग करते रहे है;मास्टर तारासिंह से लेकर संत जरनैल सिंह (जून 1984 ) तक खालिस्तान की मांग की जाती रही है. भिंडरावाले के नेतृत्व में वर्षों तक मिलिटेंट खालिस्तान आन्दोलन चला भी है. आज भी विभिन्न नामों से यह आन्दोलन चल रहा है. कनाडा में इसके अच्छे -खासे समर्थक भी हैं.भिंडरावाले सिखों को हिन्दुओं से अलग एक ‘ स्वतंत्र क़ोम’ कहा करते थे.सारांश में, सिख अस्मिता आज़ भी अस्तित्वमान है.

उत्तर-पूर्व के क्षेत्र में उपराष्ट्रवाद का एक  इन्द्रधनुषी परिदृश्य मिलेगा; मेघालय,मणिपुर,मिजोराम,नागालैंड,सिक्किम,अरुणाचल जैसे प्रदेश के लोग स्वयं को मुख्यधारा के राष्ट्रवाद से  अलग-थलग मानते हैं; उत्तर भारत और उत्तर पूर्व भारत की जीवन शैलियाँ नितांत भिन्न हैं.यदि इन क्षेत्रों में भारतीय सेना की उपस्थिति नहीं रहे तो स्थितियां कोई भी रूप ले सकती हैं. आज भी इन क्षेत्रों में भूमिगत आन्दोलन मोजूद हैं.भारतीय सेना के साथ  अलगावादियों की झड़पें होती रहती हैं.असम भी इन घटनाओं से प्रभावित कम नहीं है.उल्फा जैसा भूमिगत संगठन काफी सक्रिय हैं.इसके आलावा बोडो लैंड सहित आदिवासियों के भी कई संगठन हैं जिनमें उप राष्ट्रवाद की जड़ें गहरे तक हैं.नागालैंड और मणिपुर के आदिवासियों के बीच आये दिन हिंसक झड़पें होती रहती हैं. इन घटनों को व्याख्यित करने की कौनसी कसौटियां होनी चाहिए, इस पर चिंतन ज़रूरी है. नव राष्ट्र राज्य के व्यापक दायरे के बावजूद इन अंतर्विरोधों को नज़रंदाज़  नहीं किया जा सकता. देखना यह चाहिए, इनका चरित्र ‘ मित्रतापूर्ण ‘ है या  ‘ शत्रुतापूर्ण’ ? मुख्यभूमि द्वारा सर्वस्वीकृत राष्ट्रवाद से अलग हट कर इनका भी कोई अस्तित्व है या नहीं, इस सवाल  पर विचार किया जाना चाहिए. यद्यपि,सैन्य बल के आधार पर इन क्षेत्रीय अंतर्विरोधों का शमन समय समय पर किया जाता है. लेकिन इससे इनका अस्तित्व व अस्मिता विलुप्त नहीं हो जाते हैं.

वास्तव में ,एक अखिल राष्ट्रीय स्तर के राष्ट्रवाद में विभिन्न उप राष्ट्रीयताओं की धाराएँ समाहित रहती हैं. कभी कोई धारा केंद्र में होती है,कभी कोई आ जाती है. किसी भी धारा  की स्थिति परिस्थितियों और उसकी राजनीतिक-आर्थिक हैसियत से निर्धारित होती है.आदिवासी समाज की धारा आज तक केंद्र में नहीं आ सकी है. हाशिये पर ही अटकी हुई है. राष्ट्रीय राष्ट्रवाद ने इन धाराओं को अपेक्षित तवज्जो नहीं दी है. रणनीति के तहत आदिवासी क्षेत्रों को कच्चे माल ( खनिज-वन ) के अकूत दोहन का खज़ाना बना रखा है.विधायिका व नौकरियों में आरक्षण के ज़रिए भारतीय राष्ट्रवाद, उपराष्ट्रवाद के उभरते अंतर्विरोधों को  ‘डीफ्यूज ‘ करता  है लेकिन, उनके नायकों व जीनियस को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार नहीं करता  है।  इसे आंतरिक उपनिवेशवाद भी कहा जा सकता है.

अखिल राष्ट्रीय राष्ट्रवाद यह भूल जाता है कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद की प्राम्भिक कसौटियां बदलती जा रही हैं. यह सोच  कि धर्म,संस्कृति,भाषा जैसे मध्ययुगीन कारक आधुनिक हाईटेक राष्ट्र के आधार स्तभ हैं, अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं. समान इस्लामी मज़हब होने के बावज़ूद, पाकिस्तान,अफगानिस्तान,इराक़ में विभिन्न उप राष्ट्रीयताएँ ( कुर्दिश, बलूच आदि ) अपनी आज़ाद अस्मिता के लिए संघर्ष कर रही  हैं. 1971 में पूर्वी पाकिस्तान  पश्चिमी पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र बाग्लादेश के रूप में एक नया राष्ट्र बना. हालांकि, दोनों का धर्म इस्लाम था, भाषा ज़रूर अलग थी. ईरान व इराक, दोनों ही देश शिया बहुल राष्ट्र हैं. फिर भी दोनों राष्ट्रों के बीच मुठभेड़ें होती रही हैं.ऐसा क्यों है ?

ईसाई देशों में भी उपराष्ट्रवाद की समस्याएं हैं. कनाडा में  फ्रेच भाषी और अंग्रेजी भाषी क्षेत्रों के बीच आज भी  तनाव हैं.दो-तीन वर्ष पहले  फ्रेंच भाषी लोअर  कनाडा ( कूबेक,मोंट्रेल आदि ) अंग्रेजी भाषी अप्पर कनाडा ( ओंटोरियो,टोरेन्टो,ओट्टावा ) से अलग होना चाहता था. इसके साथ साथ कनाडा के मूल निवासियों की राष्ट्रीयताओं का सवाल अलग से है. पहले उन्हें  ‘रेड इंडियन ‘ कहा जाता था. अब ‘फर्स्ट नेशन‘ के रूप में इन नेटिवों या सामान्य भाषा में आदिवासियों को मान्यता मिली है.लेकिन, इनकी उप राष्ट्रीयताओं की समस्या यथावत है.

हाल ही में स्पेन भी इसी समस्या का सामना कर चुका है. केटलोनिआ की अलगाववादी पार्टी मुख्य स्पेन से अलग होना चाहती है. इसी मुद्दे पर मतसंग्रह तक हो चुका है.श्रीलंका में सिहलियों और तमिलों के बीच दशकों तक हिंसक टकराव हुए हैं.एक राष्ट्र के बावजूद जाफना के तमिल भाषी लोग खुद को एक अलग ‘ राष्ट्र ‘ मानते हैं. सारांश में, एक राष्ट्र के निर्माण के लिए अब नए आधारों पर विचार ज़रूरी है. उप राष्ट्रीयताओं के अपने अपने ‘आइकॉन ‘ होते हैं.जहाँ  तथाकथित मुख्यधारा के  नायक -नायिका या  आइकॉन  को मान्यता दी जाति है,उतनी ही मान्यता के हक़दार हाशिये की उप राष्ट्रीयताओं के  नायक-नायिका भी हैं. राष्ट्रीय नेतृत्व को इस सच्चाई को समझना होगा वरना दोनों के बीच टकराव बने रहेंगे.

भारत में सीमान्त जन ( दलित,आदिवासी,अल्पसंख्यक ) आज भी स्वयं को अखिल भारतीय राष्ट्रवाद ( pan indian nationalism) के साथ एकाकार नहीं कर सके हैं.इन वर्गों और राष्ट्रवाद के बीच अलगाव बना हुआ है.इस वर्ष महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी 1818 को  पेशवा बाजी  राव II ( ब्राह्मण शासक ) पर महार सैनिकों ( दलित ) की विजय के दो सौ वर्ष पूरे होने पर उत्सव मनाया जा रहा है .गुजरात के बडगाम से हाल ही में निर्वाचित विधायक व  दलितों के उभरते युवा  आइकॉन जिग्नेश मेवानी को भी इस उत्सव को संबोधित करने के लिया बुलाया गया.साथ ही बस्तर की आदिवासी आइकॉन सोनी सोरी और जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय के छात्र नेता उमर खालिद को भी निमंत्रित किया गया.उप राष्ट्रीयता का एक नया समीकरण दिखाई दे रहा है.इस उत्सव के संयोजकों के विचार में यह समीकरण  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ,भाजपा,शिव सेना,अभिनव भारत,सनातन संस्था और श्री राम सेना जैसे  संगठनों के रूप में उभरते  ‘नव पेशवाओं ‘ को एक दफे फिर से पराजित करेगा.

यह समीकरण अपने प्रोजेक्ट में कितना सफल रहता है,यह तो भविष्य ही तय करेगा. लेकिन, फिलहाल इतना साफ़  है कि भारतीय समाज के इन वर्गों के लिए अखिल भारतीय राष्ट्रवाद  आजभी ‘ पराया ‘ है. दोनों के बीच एकरसता अनुपस्थित है.ये आज भी सामाजिक-सास्कृतिक आज़ादी के लिए संघर्षरत हैं. डॉ. अम्बेडकर राजनीतिक आज़ादी के साथ साथ सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक आज़ादी भी चाहते थे.दरअसल,देश के निचले व उपेक्षित वर्गों तक  राष्ट्रीय राष्ट्रवाद की धारा सही ढंग से  नहीं पहुँच सकी है. विचार व प्रभाव के स्तरों पर इसे सवर्णों का राष्ट्रवाद माना जाता है. क्योंकि जितने भी राष्ट्रीय आइकॉन हैं उनमें लगभग शतप्रतिशत ऊंची जातियों (राजा राममोहन राव,मंगल पांडे,बाल गंगाधर तिलक,गोखले, विवेकानंद,गाँधी,नेहरु,सुभाष,टेगोर, चक्रवर्ती राजगोपाला चारी, सुब्रमण्यम भारती, रामप्रसाद बिस्मिल चन्द्र शेखर आज़ाद,महर्षि अरविन्द आदि )  के व्यक्ति शामिल  हैं.यहाँ तक कि  पौराणिक साहित्य भी वर्चस्ववादी वर्गों की संस्कृति का ही प्रतिनिधित्व करता है. संघ परवार इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आधार के रूप में देखता है.हिन्दुत्ववादी शक्तियों को कैसा राष्ट्रवाद चाहिए, इसका विषद विश्लेषण गुरूजी के रूप में विख्यात  एम. एस. .गोलवलकर की  विवादस्पद पुस्तक  “ बंच ऑफ़ थॉट्स “ में दिया गया है. प्रतिरोध की धारा प्रबल होने के कारण  आज बाबा साहब को  राष्ट्रीय आइकॉन के रूप में ज़रूर स्वीकार किया जाने लगा है.

एक यथार्थ यह भी है कि राष्ट्रीय या क्षेत्रीय नेतृत्व अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए दोनों प्रकार की राष्ट्रीयताओं के निरंकुश दोहन में संकोच नहीं करते हैं.जब भी नेताओं का  राजनीतिक अस्तित्व संकटग्रस्त होता है राष्ट्रीय या उप् राष्ट्रीयता के साथ खुद को जोड़ देते हैं और घोषणा करने लगते हैं कि उनका अपमान नहीं है वरन उनके क्षेत्र की जनता का अपमान है.मिसाल के लिए, 2015 के बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने नीतीश कुमार व लालू यादव पर व्यंग्य कसा था. उन्होंने तुरंत ही बिहारकी  जनता के  ‘ डीएनए ‘ से  प्रधानमंत्री के शब्दों को जोड़ दिया. आनन-फानन में बिहार के लोग अपना ब्लड प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजने लगे.1983 में रामाराव ने भी यही किया. अपने राजनीतिक अस्तित्व को तेलगू गौरव के साथ जोड़ दिया. मराठा अस्मिता के साथ शरद पवार का राजनीतिक अस्तित्व जुड़ा हुआ है.शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना भी यही कर रही है. मुम्बई में उत्तर भारतीयों के विरुद्ध आन्दोलन मराठा अस्मिता के आधार पर चलाया जाता है.1972-73 में जब ‘दलित पैंथर ‘ आन्दोलन जोड़ पकड़ रहा था तब उसको निस्तेज करने के लिए कांग्रेस ने शिव सेना को खड़ा किया. मराठावाद को हवा दी.आज यह भस्मासुर बन गया है.

ओड़िसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की कहानी भी इससे भिन्न नहीं है. उनके पिता बीजू पटनायक का भी यही स्थान प्रदेश की राजनीति में रहा है.1975  की इमरजेंसी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी ने भी राष्ट्रीय राष्टवाद के स्तर पर यही कार्य किया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने इंदिरा जी को  “ इंडिया इज  इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया “ घोषित कर दिया.इमरजेंसी के कारण इंदिरा जी काफी विवादास्पद बन चुकी थी. उनकी छवि तेजी से धूमिल होने लगी थी. उनका राजनीतिक अस्तित्व संकटों से घिरने लगा था. इसलिए  उनके अस्तित्व रक्षा के लिए ऐसे नारे उछालने पड़े. जनता की उपचेतना में  यह बात बैठानी पड़ी कि इंदिरा जी का कोई विकल्प नहीं है. उनसे ही भारत है. यदि वे नहीं रहेंगी तो भारत मिट जायेगा. इसलिए मोदी जी ने ऐसा करके कोई अपवाद नहीं किया, बल्कि विगत में आजमाए फार्मूलों को अपनी पूरी आक्रमकता के साथ नए ढंग से आजमाया है. वे सफल भी रहे. उन्होंने हाई टेक का भरपूर प्रयोग किया है. यह सुविधा उनके पूर्ववर्तियों को उपलब्ध नहीं थी. कॉर्पोरेट पूँजी भी इसे पंख लगा देती है. अम्बानी-अडानी जैसों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.राजस्थान में वसुंधरा के लोग फिल्म रानी पद्मावती के विरोध के माध्यम से ‘राजपूतावाद’ को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं.किसी ज़माने में कुम्भाराम  आर्य जाटवाद को जगा चुके थे.

कर्णाटक में 2018 में चुनाव होने वाले हैं. इस राज्य में ‘लिंगयात ‘ और कन्नड़ भाषा प्रमुख मुद्दे के रूप में उभर रहे हैं. कांग्रेस और भाजपा इन मुद्दों को अपने अपने ढंग से भुना रही है. इस राज्य का लिंगायत समुदाय  लिंगयात को हिन्दू धर्म से एक अलग धर्म का दर्ज़ा देने की मांग करता आ  कर रहा है.राज्य की जनसंख्या में इस मत के माननेवाले १७% हैं. दोनों राष्ट्रीय दलों को इस समुदाय के वोट चाहिए.यह समुदाय आर्थिक दृष्टि से भी समृद्ध है.राजनीति व सांस्कृतिक क्षेत्रों में इस समुदाय की खासी पैठ है.इसीलिए लिगायतों की मांग पर विचार के लिए एक सात सदस्यों का पैनल भी गठित किया गया है.राज्य में एक समुदाय वीराशैवास का भी महत्त्व यही  है. यह समुदाय भी लिंगयात के समान ही  आर्थिक-राजनीतिक दृष्टी से शक्तिशाली है.दोनों में वर्चस्व को लेकर तीव्र मतभेद हैं. लेकिन, सार यह है कि भारतीय राष्ट्रवाद के व्यापक दायरे में इनका माकूल समाधान होना शेष है.

एक सच यह भी है कि  पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं में यह ‘परिघटना ‘ अधिक सफल रहती है क्योंकि सामंती संस्कार और अर्द्ध  विकसित लोकतान्त्रिक चेतना व व्यवहार उग्र रहते हैं. सामान्यतः अंधविश्वास,भक्ति ,आस्था और भावुकता जनता को घेरे रहते हैं. मध्य युगीन मिथकों के ज़रिए  नेता स्वयं को जनता की चेतना के सारथी बन बैठते हैं और धर्म+राष्ट्रवाद+उप राष्ट्रवाद का घोल उसे पिलाते रहते हैं.निश्चित ही, भारत में जाति व्यवस्था भी इसमें घुली रहती है. सुविधानुसार नेता वर्ग इसका इस्तेमाल करता रहता है. इसी के बल पर ही वह आइकॉन  बन बैठता है.

राष्ट्रवाद के बड़े दायरे में उप राष्ट्रवाद की धाराओं से जहाँ लाभ होता है वहीँ इसके प्रतिकूल परिणाम भी सामने आते हैं. उप राष्ट्रवाद के आइकॉन  ‘ लार्जर  देन  लाइफ ‘ बन बैठते हैं. मुख्यधारा का राष्ट्रवाद लघु -बेबस दिखाई देने लगता है. उस पर अंकुश नहीं लगा पाता। ‘ गुजरात मॉडल ‘ इसकी ताज़ा मिसाल है. इस मॉडल को देश की  विविधता -विषमता से  बड़ा प्रोजेक्ट किया जा रहा है. इसके सूत्रधार को देशवासियों का  ‘मसीहा’ के रूप में पेश किया जा रहा है जबकि विकास का यह मॉडल लगभग पिट चुका है. इसके विपरीत पंचवर्षीय योजनाओं को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य  में रखा गया था. अतः मोदी जी का यह मॉडल, राज्य स्तरीय नेता की प्रचंड राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की चरम अभिव्यक्ति है  !

 

लेखक रामशरण जोशी की गिनती देश के शीर्ष पत्रकारों में होती है। वे केंद्रीय हिंदी संस्‍थान के अध्‍यक्ष भी रहे। पत्रकारिता के शिक्षक व टिप्‍पणीकार।

 



   

 

1 COMMENT

  1. Kashmir, North Eastern states…. India forcibly annexed them to Union. Example MANIPUR. A constitutional monarch was directly negotiating with British. Unlike other states Congress was not mediating here. A bourgeois democracy can do do like this only. Dictatorship of 1%. In 1917 socialist revolution Russian state made all states free. Later they voluntarily joined and USSR of 16 states formed. Stalin gave states right to separate when ever they feel. This was what Dictatorship of Proletariat did. Dictatorship of 99% is really “Democracy at its best”

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