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इस चुनाव में जातिवाद खत्‍म हो जाने का दावा करने वालों के लिए कुछ सवाल

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  1. चुनाव का परिणाम आने से एक दिन पहले मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल की26 वर्षीय रेजिडेंट डॉक्टर पायल तड़वी ने सीनियर डॉक्टर्स की प्रताड़ना से परेशान होकर 22 मई को फांसी लगाकर जान दे दी.
  2. चुनाव के दौरान ही राजस्थान के नापासर में एक दलित दूल्हे की पिटाई की गई. मेघवाल समाज का आरोप है कि गांव के दबंग लोगों ने दूल्हे की पिटाई इसलिए की क्योंकि वह घोड़ी पर सवार होकर अपनी बारात ले जा रहा था.
  3. एक घटना उत्तराखंड की है.27 साल का दलित युवक जितेन्द्र अपने रिश्तेदार की शादी में शामिल होने टिहरी गढ़वाल जिले के नैनबाग तहसील के श्रीकोट गांव में गया था. नैनबाग टिहरी के जितेंद्र दास को सवर्णों के साथ खाना खाना इतना महंगा पड़ गया कि उसे जात-पात के भेदभाव के चलते इतनी बेरहमी से मारा गया कि अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई.

देश के तीन सूबों की ये वो घटनाएं हैं जो चुनाव के दौरान घटीं. ये तो वो घटनाएं हैं जो मीडिया की वजह से चर्चा में आईं. ये घटनाएं चीख-चीख कर कह रही हैं कि तथाकथित सभ्य समाज में अभी कितनी गंदी मानसिकता के लोग हैं.

इसके बावजूद कुछ लोग लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद दावा कर रहे हैं कि जातिवाद खत्म हो गया या खत्म हो रहा है. क्या यह पूरा सच है?

क्या सच में जनता ने जातिवाद को नकार दिया है? क्या देश में जाति के नाम पर अब किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा? क्या अब सामाजिक समरसता का भाव सबके मन में जागृत हो गया है? या फिर ये सब सिर्फ दिल्ली वाले दरबारी पत्रकारों के मन की उपज भर है?

दरअसल, यह चुनावी आंकड़ों में उलझा अर्धसत्य है.

दिल्ली में मीडिया के कई एंकर भी जोर-जोर से हल्ला मचा रहे हैं कि जनता नें जातिवाद का खात्मा कर दिया है. सवाल ये है कि क्या मायावती, लालू यादव, अखिलेश यादव और उपेन्द्र कुशवाहा के हार जाने भर से ही जातिवाद ख़त्म हो जाता है? क्या राजनीतिक गुणा-गणित और समीकरणों पर जाति का प्रभाव समाप्त होना ही जातिवाद का खात्मा है? इन जेबी पत्रकारों को डॉ. पायल तडवी जैसी होनहारों के साथ हो रही घटनाएं क्यों नहीं दिखाई देती हैं?

कई बार तो ये मीडिया ही घोर जातिवादी नजर आता है। नरेन्द्र मोदी की जीत के बाद एक प्रतिष्ठित हिंदी चैनल की वह महिला एंकर भी ‘जातिवाद’ पर प्रहार करते हुए दिखी जिसे साल भर पहले तक अपने ब्राह्मण होने पर गर्व था! पता नहीं उसका मन परिवर्तित हो गया है या वह पूर्वाग्रह के नाते ‘सामाजिक न्याय’ के लिए आवाज बुलंद करने वाले नेताओं की हार से खुश होकर ऐसा कर रही थीं.

जातिवाद से जुड़े जो अहम सवाल हैं, जैसे इसके जन्मदाता कौन लोग हैं? यह कहां से, कब और कैसे जन्मा? अक्सर जातिवाद से प्रभावित होने या उत्पीडन झेलने वाले लोग कौन है? जाति के नाम पर उत्पीड़न करने या मन में घृणा का भाव रखने वाले लोग कौन हैं? वे कौन लोग है जिन्हें उपेक्षित तबके के सम्मानित जीवन से तकलीफ होती है, जिन्हें दलितों, पिछड़ों के डॉक्टर, इंजीनियर बनने या परीक्षा में टॉप करने से भी दुख होता है. इसके पीछे उनकी मानसिकता क्या है?

ऐसे सवालों पर चर्चा से मीडिया अक्सर दूर ही रहता है. जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव की खबरों को एक लाइन में सिमटा देने वाला मीडिया नरेन्द्र मोदी और बीजेपी की जीत पर गदगद है और प्रचार कर रहा है कि भारत जाति की बीमारी पर जीत हासिल करने में कामयाब हो गया है!

नरेंद्र मोदी की जीत और सपा, बसपा, राजद, रालोसपा, इनेलो जैसे दलों की हार को जातिवाद का खात्मा बताने वालों को शायद यह पता ही नहीं है कि असल में जातिवाद है क्या। गूगल के इस जमाने में उन्हें जातिवाद की परिभाषा ढूंढ़ने में बहुत दिक्कत तो नहीं होनी चाहिए. परिभाषा जानने के बाद उन्हें कुछ सवालों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

क्या अब दलितों को मंदिरों में आसानी से प्रवेश करने दिया जाएगा? उनके मंदिरों में घुसने से अब मंदिर की ‘पवित्रता’ पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा या पुजारी को मंदिर धोने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी?

किसी दलित के साथ खाना खाने या फिर उसके घोड़ी पर चढ़ कर बारात ले जाने से किसी के जातीय दंभ और तथाकथित स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचेगी? ऑनर किलिंग जैसी घटनाएं बंद हो जाएंगी? सार्वजानिक तालाबों, नदियों और नलों से पानी पी लेने या नहा लेने पर किसी दलित को पीटा नहीं जाएगा? कुछ लोगों के मन के अन्दर गहरे तक पैठ बनाई हुई जन्मजात श्रेष्ठता की भावना अब टूट जाएगी? इसके बाद जब नरेन्द्र मोदी फिर से वाराणसी के डोमराजा या अबतक सामाजिक उपेक्षा झेल रहे उनके जैसे किसी व्यक्ति को अपना प्रस्तावक बनाने जाएंगे तो फिर उन्हें यह सुनने को मिलेगा कि ‘आपकी जीत के साथ ही हमारे साथ हो रहे भेदभाव का खात्मा हो गया?’

क्‍या वे बोलेंगे कि ‘हमें मंदिरों में प्रवेश करने दिया जाता है और शादी ब्याह में भी आमंत्रित किया जाता है? हमारे साथ बैठने, खाना खाने से किसी के दंभ या स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुंचती?’

इन सवालों पर बारीकी से चिंतन और विश्लेषण करने पर आपको संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाएगा. आप इस नतीजे पर पहुचेंगे कि इस चुनाव में जाति से बनने या बिगड़ने वाले समीकरण ध्वस्त हुए हैं. कुछ दलों का वोट बैंक भी खिसका है लेकिन जातिवाद का जहर समाज पर अc भी उतना ही प्रभावी है जितना पहले था! राजनीति में जातिवाद का रहना या समाप्त होना उतनी बड़ी बात नहीं है जितना उसका समाज से समाप्त होना ज़रूरी है.

ऐसा दरअसल नरेंद्र मोदी को फिर से सत्ता के शिखर पर पहुंचाने की भाजपा और संघ की सोची समझी रणनीति थी. भारत को जातिवादमुक्त करने की भ्रामक बातें फैलाई गयीं. यह ठीक वैसा ही था जैसा पिछले चुनावों में बीजेपी ने भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने की बात कही थी.

बीजेपी नें जातिवाद के खात्मे का भ्रामक प्रचार किया और समाज में वर्षों से उपेक्षा झेल रहे वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाने या शासन-सत्ता में भागीदारी दिलाने के एजेंडे पर काम कर रहे मायावती, अखिलेश यादव, उपेंद्र कुशवाहा, तेजस्वी यादव और शरद पवार जैसे नेताओं को कमजोर करने में बहुत हद तक सफल हो गई. हमें यह समझना होगा कि देश को जातिवादमुक्त करने के नाम पर भाजपा ने बड़ी चालाकी से सपा, बसपा, राजद, एनसीपी और रालोसपा जैसे दलों के वोटर्स (जो जातिवाद का दंश झेलते हैं) का ध्रुवीकरण करने में सफलता प्राप्त कर ली.

इसके परिणाम क्या होंगे ये भी हमें और आपको समझ लेना चाहिए. संघ के आरक्षणमुक्त भारत के एजेंडे को लागू करने की कोशिश में लगी भाजपा की राहें अब आसान हो गयी हैं क्योंकि इसके बीच रुकावट बनने वाले लगभग सभी दल और नेता चुनाव हार गए हैं.

पिछले दिनों कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने का मामला हो, 13 पॉइंट रोस्टर का मामला हो, न्यायपालिका में दलितों-पिछड़ों को प्रतिनिधित्व देने का मामला हो, सवर्णों को दिए जाने वाले आरक्षण का मामला हो, हर बार उपेन्द्र कुशवाहा, धर्मेन्द्र यादव और राजद के नेताओं ने शोषित-वंचित तबकों के हक़ में अपनी आवाज़ बुलंद की हैं.

इसे हम विडम्बना ही कहेंगे कि वे जिनके हितों की रक्षा, शासन-सत्ता में भागीदारी और मान-सम्मान के लिए आवाज उठा रहे थे उन्होंने ही उन्हें ‘जातिवादी’ समझकर नकार दिया.

इसमें बड़ा हाथ मीडिया का भी है. मीडिया ने जातिवाद के खिलाफ लड़ने वाले नेताओं पर ही जातिवादी होने का ‘ठप्पा’  लगा दिया और जातिवाद शुरू करने, उसे आगे बढ़ाने वालों को क्लीन चिट दे दिया.

पूर्वांचल की कुछ सीटों पर बीजेपी के टिकट पर जीत दर्ज करने वाले नेताओं की जाति देखकर बात समझ में आ सकती है. गोरखपुर से रविकिशन शुक्ल, देवरिया से रमापति राम त्रिपाठी, कुशीनगर से विजय दुबे, बस्ती से हरीश दिवेदी- ये सभी नेता ब्राह्मण जाति से आते हैं और किसी को यहां बीजेपी का जातिवाद नज़र नहीं आता. मीडिया भी इन पर जातिवादी होने का ठप्पा ठोकने से डरता है. आप अंदाजा लगाइए कि पूर्वांचल के ये जिले जो आपस में सटे हुए हैं, इन पर चार यादव, चार जाटव, चार कुर्मी, मौर्य, बिन्द, लोहार, राजभर या फिर निषाद जीत कर आते तो कैसी चर्चा हो रही होती?

खैर, आखिर में ये कि धर्मेन्द्र यादव, उपेन्द्र कुशवाहा जैसे नेताओं और राजद-बसपा जैसी पार्टियों की हार से जातिवाद खत्म हो जाता हो, सामाजिक समरसता बढ़ती हो, डॉ. पायल तड़वी और रोहित वेमुला जैसे होनहारों के साथ उत्पीड़न की घटनाएं बन्द हो जाती हों तो एक नहीं हर बार उनका हार जाना ही बेहतर है.


लेखक राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (युवा) के राष्ट्रीय सचिव हैं  

 

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