Home पड़ताल वर्णव्यवस्था के पक्षधर आरएसएस की ‘समरसता’ केवल ढोंग है !

वर्णव्यवस्था के पक्षधर आरएसएस की ‘समरसता’ केवल ढोंग है !

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पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है इस सिलसिले की दसवीं कड़ी- संपादक


आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म–10

 

कँवल भारती 

 

सच और मिथक

 

प्रश्नोत्तरी का अंतिम प्रश्न—

‘संघ द्वारा समाज में समरसता लाने की कोई योजना है?’

          आरएसएस इसका जवाब इन शब्दों में देता है—

‘सामाजिक विषमता का एक प्रकट स्वरूप अस्पृश्यता अपने समाज का अत्यंत विकृत स्वरुप है, दुर्भाग्यपूर्ण है, कष्टदायक है. यह समस्या सैकड़ों वर्षों से समाजव्याप्त तथा देशव्याप्त है. वर्तमान में इस समस्या से समाज मुक्त हो, यह भाव बढ़ रहा है. स्व. श्री बालासाहेब देवरस जी ने पुणे की वसंत व्याख्यानमाला तथा नागपुर में इस विषय पर अपने विचार स्पष्ट रूप से रखे हैं. वे कहते हैं, ‘It must go, stock and barrel.’ अस्पृश्यता पूर्ण रूप से समाप्त होनी चाहिए, इस विषय में किसी के मन में संदेह न रहे. अमरीका में गुलामी समाप्त करने वाले अब्राहम लिंकन ने कहा था, ‘If slavery is not wrong, nothing is wrong.’ हमें भी ऐसा ही कहना चाहिए कि ‘If untouchability is not wrong, nothing is wrong in the world.’

इस जवाब से क्या समझा जाए? क्या यह समझा जाए कि आरएसएस सामाजिक विषमता को दूर करने के प्रति गंभीर है? लेकिन ऐसा समझना गलत होगा, क्योंकि वह पेड़ की शाखाओं को काटने की बात कहता है, उसे जड़ से उखाड़ कर फेंकने की बात नहीं करता है. अब्राहम लिंकन ईमानदार व्यक्ति थे, जो उन्होंने अपने देश में गुलामी की प्रथा को मिटाने का गंभीर प्रयास किया था, इसीलिए वह कह सकते थे—‘ Slavery is wrong.’ किन्तु यही बात अस्पृश्यता के लिए नहीं कही जा सकती, क्योंकि भारत में जातिप्रथा को मिटाए वगैर अस्पृश्यता को नहीं मिटाया जा सकता. जातिप्रथा को मिटाने का गम्भीर प्रयास डा. आंबेडकर ने किया था, लेकिन उनका विरोध हुआ था. और उस देशव्यापी विरोध में महात्मा गाँधी समेत तमाम हिन्दू नेता शामिल थे. अगर हिन्दू नेता दलितों के प्रति गंभीर होते, तो वर्णव्यवस्था और जातिप्रथा का खंडन करते, पर उन्होंने उसका बचाव किया था. महात्मा गाँधी ने तो यहाँ तक कहा था कि वर्णव्यवस्था हिन्दूधर्म का प्राण है, अगर उसे मिटा दिया, तो  हिन्दूधर्म ही मिट जायेगा. हालाँकि, गाँधी जी ने बिलकुल सही कहा था. एक हिन्दू आस्तिक-नास्तिक कुछ भी हो सकता है, पर अगर वह जाति में विश्वास नहीं करता है, तो हिन्दू नहीं हो सकता. यही हिन्दू की परिभाषा है. इसलिए दयानन्द सहित किसी भी हिन्दू धर्मगुरु और सुधारक ने वर्णव्यवस्था का खंडन नहीं किया है, किन्तु, जब 1920 और 1930 के दशकों में ईसाई मिशनरियों के जन-आंदोलनों में दस लाख दलित ईसाई बन गए  और कम्युनल अवार्ड में भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न उलझा, तो हिन्दू सिंहासन डोल गया. उसी वक्त गांधी जी और हिन्दू नेताओं को एहसास हुआ कि कोई अछूत समस्या भी भारत में है. तभी उन्हें लगा कि इन सात लाख अछूतों को अगर गले नहीं  लगाया गया, तो ईसाई और मुसलमान उन्हें गले लगाने को तैयार बैठे हैं, और ऐसा होने पर आज़ादी ही नहीं, हिन्दूराष्ट्र भी खतरे में पड़ जायेगा. यही कारण था कि उन्होंने छूतछात खत्म करने का अभियान चलाया. लेकिन जातिप्रथा का उन्मूलन फिर भी उनके एजेंडे में नहीं था. आर्यसमाज ने भी शुद्धि आन्दोलन चलाया, जो दलितों के साथ सबसे क्रूर मजाक था. शुद्धि आन्दोलन के स्वामी श्रद्धानंद जैसे नेताओं ने सवर्णों को नहीं, बल्कि दलितों को अशुद्ध समझा, और उनकी शुद्धि के लिए यज्ञ अनुष्ठान के हास्यास्पद ढकोसले किए थे. इस पर श्री सन्तराम बी.ए. ने अपनी किताब ‘हमारा समाज’ में  एक बहुत ही मजेदार वाकया लिखा है, जो इस प्रकार है—

‘जिस वर्ष मौलाना मुहम्मद अली और शौकत अली की माता का देहांत हुआ, उसी वर्ष की बात है. श्री भाई परमानन्द जी मौलाना मुहम्मद अली के पास संवेदना प्रकट करने गए. उस समय बातचीत में मौलाना  मुहम्मद अली ने श्री भाई जी से कहा कि आप लोग व्यर्थ ही शुद्धि और अछूतोद्धार का रोड़ा अटका कर इस्लाम की प्रगति को रोकना चाहते हैं. इसमें आपको कभी सफलता नहीं मिल सकती. भाई जी ने पूछा, क्यों? मौलाना ने उत्तर दिया, देखिए, यह भंगिन जा रही है. मैं इसे मुसलमान बनाकर आज ही बेगम मुहम्मद अली बना सकता हूँ. क्या आप में या मालवीय जी में यह साहस है? मैं किसी भी हिन्दू को मुसलमान बनाकर आज ही अपनी लड़की दे सकता हूँ. क्या कोई हिन्दू नेता ऐसा कर सकता है? मैं आज शुद्ध होता हूँ, क्या कोई मेरी स्थिति का हिन्दू नेता मेरे लड़के को लड़की देगा? यदि नहीं, तो फिर आप शुद्धि और अछूतोद्धार का ढोंग रच कर इस्लाम के मार्ग में रोड़ा क्यों अटका रहे हो?’ [हमारा समाज, 1948, पृष्ठ 178]

मौलाना मुहम्मद अली का कहना गलत नहीं था, वह आज भी प्रासंगिक है. अगर अस्पृश्यता मिटानी है, तो फिर ढंग से मिटाओ. उसके लिए ईमानदारी से काम करो. रोटी का ही नहीं, बेटी का सम्बन्ध भी बनाओ. अन्तरजातीय भोज से ज्यादा अन्तरजातीय विवाहों के कार्यकर्म चलाओ. अगर आरएसएस सचमुच हिन्दू पहचान चाहता है, तो वह अलग-अलग जातियों की पहचान से नहीं बन सकती. भारतीय मुसलमानों में भी जातियां हैं, पर जब कोई पूछता है कि तुम कौन हो, तो वह अपनी पहचान मुसलमान कहकर बताता है, न कि खान, पठान और अंसारी कहकर. लेकिन क्या हिन्दुओं में ऐसा है. पूछने पर क्या कोई अपने को हिन्दू बताता है? कोई नहीं बताता. जिससे भी पूछोगे, वह अपनी जाति ही बतायेगा. अगर वह सवर्ण है, तो बड़े गर्व से कहेगा, मैं ब्राह्मण हूँ, अग्रवाल हूँ, राजपूत हूँ, खत्री हूँ, जाट हूँ, आदि.. लेकिन अगर वह दलित वर्ग से है, तो अपनी पहचान बताते हुए हिचकिचायेगा. अगर कोई मुझ जैसा गर्व से कह भी देगा कि मैं चमार हूँ, या भंगी हूँ, तो पूछने वाले के चेतन मन में जड़ जमाये बैठी हुई जो नफरत है, वह तुरंत ही उसके चेहरे पर उभर कर आ जाएगी, और संवाद वहीं रुक जायेगा. जब हिन्दू नाम से कोई पहचान ही नहीं है, तो जाति के आधार पर कौन सा हिन्दू राष्ट्र बनाओगे? हिन्दुओं को समझना होगा कि आरएसएस का हिन्दू राष्ट्र एक दंगा कराने वाले उन्माद का नाम है, वह एक छल है. क्योंकि हिन्दू राष्ट्र  हिन्दुओं के जातिविहीन हुए बिना कभी आकार नहीं ले सकता. क्या आरएसएस इस दिशा में कोई काम कर रहा है?

असल में, आरएसएस की चिंता वही है, जो शुद्धि आन्दोलन के नेताओं की थी. अगर दलित समुदाय आरएसएस के हाथ से निकल गया, तो पूरे भारत में उसका हिन्दू साम्राज्य कैसे कायम होगा, जो उसका लक्ष्य है? इसलिए वह केवल अस्पृश्यता को खत्म करने की बात करता है. जबकि, वह अच्छी तरह जानता है कि अस्पृश्यता की जड़ वर्णव्यवस्था में है, जिसे खत्म किये बिना अस्पृश्यता को खत्म नहीं किया जा सकता. पर, वह उसे समाप्त करने की बात नहीं करता है, और न  जन्मन: जातिप्रथा के खिलाफ अभियान चलाता है. अगर बालासाहेब देवरस अब्राहम लिंकन की तरह गंभीर होते, तो वह यह कहते कि ‘Caste system is wrong.’ लेकिन उन्होंने  Caste System को नहीं, Untouchability को Wrong बताया. यह एक गलत सोच है. क्योंकि अस्पृश्यता, जब तक जातिप्रथा जीवित है, नहीं मिट सकती. जातिप्रथा वर्णव्यवस्था के गर्भ से उत्पन्न हुई है, इसलिए अगर कुछ गलत है, तो वह वर्णव्यवस्था और जातिप्रथा है. जब तक इन दोनों में हिन्दुओं का विश्वास बना रहेगा, तब तक अस्पृश्यता भी बनी रहेगी, इसलिए, आरएसएस का समरसता कार्यक्रम एक बेहतर ढोंग के सिवा कुछ नहीं है.

आरएसएस ने अपने उपर्युक्त प्रश्न के जवाब में अपने कुछ समरसता-कार्यक्रमों का भी जिक्र किया है. उनको भी देखे जाने की जरूरत है, जो हमें यह बतायेगा कि क्या वह वर्णव्यवस्था और जातिप्रथा को एक खराब प्रथा के रूप में स्वीकार करता है या नहीं? वह लिखता है—

‘1934 में वर्धा में चल रहे एक शिविर में महात्मा गाँधी जी का आगमन  हुआ था. स्वयंसेवकों से पूछताछ करते हुए सबका परिचय हुआ. उन्होंने अनुभव किया कि यहाँ तो बिना किसी भेदभाव के स्वयंसेवक रह रहे हैं. सबका खानपान एक साथ हो रहा है. किसी भी स्वयंसेवक के मन में न संकोच है, न किसी प्रकार का भाव. डा. हेडगेवार जी के साथ हुए वार्तालाप में महात्मा गाँधी जी ने संघ की इस प्रकार की सहजता की सराहना की.’ [प्रश्नोत्तरी, पृष्ठ 12]

यहाँ आरएसएस ने संघ में स्वयंसेवकों के भेदभाव-रहित खानपान को बताया है. लेकिन सवाल संघ में भेदभाव का नहीं है, समाज में भेदभाव का है. क्या हिन्दू समाज जातीय भेदभाव से मुक्त है? अवश्य ही संघ में जातीय भेदभाव नहीं होगा, और होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि फिर दलित जाति का कोई भी व्यक्ति संघ में रहेगा ही नहीं. लेकिन विचारणीय सवाल यह है कि उसके पास जातिप्रथा के उन्मूलन का क्या कार्यक्रम है? क्या जाति-उन्मूलन की जैसी योजना  बुद्ध, कबीर, जोतिबा फुले और डा. आंबेडकर के पास थी, वैसी या उससे बेहतर कोई योजना संघ के पास है? अगर कोई बेहतर योजना उसके पास है, तो वह स्पष्ट करे. लेकिन उसने अभी तक तो ऐसी कोई योजना सार्वजनिक नहीं की है. जाहिर है कि उसके पास ऐसी कोई योजना नहीं है.

आरएसएस ने एक और घटना का वर्णन इस तरह किया है—

‘1969 में कर्नाटक प्रांत का विश्व हिन्दू परिषद का प्रांतीय सम्मेलन उडुपी में संपन्न हुआ था. पू. श्री गुरूजी गोलवलकर के मागदर्शन में इस सम्मेलन की योजना बनी थी. अनेक सन्त और मठाधिपति इस सम्मेलन में उपस्थित थे. यह पहला अवसर था, जब सभी उपस्थित महापुरुषों ने एक स्वर से प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि ‘अस्पृश्यता कलंक है तथा इसे किसी भी धर्मग्रन्थ का समर्थन नहीं है. मम दीक्षा—हिन्दूरक्षा. मम मन्त्र—समानता. हिन्दव: सोदरा: सर्वे. न हिन्दू पतितो भवेत्.’ इस प्रकार की घोषणा करते हुए समाज को समरसता हेतु मागदर्शन किया. इसके पश्चात् अनेक सन्तों ने तो संकल्प लेते हुए पिछड़ी बस्तियों में जाकर अपने को पिछड़ा मानने वाले बंधुओं में सम्मान का भाव जगाना प्रारम्भ किया, जो अत्यंत प्रेरणादायी अनुकरणीय सिद्ध हुआ.’ [वही]

आइए, देखते हैं कि यह दलितों के लिए कितना प्रेरणादायी अनुकरणीय है? यह कहना सही है कि अस्पृश्यता कलंक है, लेकिन किसका कलंक? जाहिर है कि हिंदुत्व का कलंक. लेकिन आरएसएस यही कहना नहीं चाहता कि अस्पृश्यता हिंदुत्व का कलंक है. इसलिए उसने कहा कि अस्पृश्यता को किसी भी धर्म ग्रन्थ का समर्थन प्राप्त नहीं है. यह सबसे बड़ा झूठ है, जो आरएसएस ने बोला है. यह झूठ उसने इसलिए बोला है, क्योंकि उसे हिंदुत्व को निष्कलंक बताना है, जो वह नहीं है. यह सौ चूहे खाकर बिल्ली के हज को जाने वाली कहाबत है. एक उदाहरण तो अभी ताज़ा ही है. भाजपा के एक पदाधिकारी दयाशंकर सिंह ने मायावती को वेश्या कहा था, जब हंगामा हुआ, तो भाजपा ने कहा, पार्टी उसका समर्थन नहीं करती, और उसे पार्टी से निकाल दिया. बाद में क्या हुआ? दयाशंकर सिंह की पत्नी श्वेता सिंह को पार्टी में शामिल कराया गया, और पार्टी ने उसे विधानसभा के चुनावों में मायावती के खिलाफ आक्रामक बनाकर उतारा.  इसके बाद दयाशंकर सिंह को भी पार्टी में वापिस ले लिया गया. यह दोगलापन क्यों? दलित का अपमान भी करो. यह भी कहो कि उसे हमारा समर्थन नहीं है, और बाद में उसका परोक्ष समर्थन भी कर दो. माना यह सब भाजपा ने किया, पर भाजपा की नियंत्रक शक्ति तो आरएसएस है. उसने इस दलित अस्मिता के हनन को कैसे स्वीकृति दे दी? लेकिन मुख्य प्रश्न अब भी बाकी है, और वह यह है कि दयाशंकर सिंह के दिमाग में यह विचार कहाँ से आया कि दलित स्त्री को वेश्या कहा जा सकता है? क्या यह विचार दलित के प्रति हिन्दुओं का सनातन संस्कार नहीं है? अगर है, तो फिर यह संस्कार क्या धर्मग्रन्थ के समर्थन के बिना अपने आप पैदा हो गया?

[धर्म ग्रन्थों के विधान अगली क़िस्त में]

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