Home पड़ताल अल्पसंख्यकों के हक़ की बात ‘सांप्रदायिकता’ और बहुसंख्यक सर्वसत्तावाद ‘राष्ट्रवाद’ कैसे ?

अल्पसंख्यकों के हक़ की बात ‘सांप्रदायिकता’ और बहुसंख्यक सर्वसत्तावाद ‘राष्ट्रवाद’ कैसे ?

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आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म–6

पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है इस सिलसिले की छठीं कड़ी- संपादक

 

सच और मिथक

कँवल भारती

 

आरएसएस के राष्ट्र जागरण अभियान की दूसरी पुस्तिका का नाम ‘अथातो तत्व जिज्ञासा : प्रश्नोत्तरी’ है. इसमें नौ प्रश्न हैं, जो अक्सर आरएसएस के संबंध में उठाए जाते हैं. इन्हीं प्रश्नों के उत्तर इस पुस्तिका में दिए गए हैं.  आइए इन सवालों और उनके जवाबों पर एक नजर डालते हैं. पहला सवाल है-

1.

क्या हिंदू राष्ट्र का विचार साम्प्रदायिक और संविधान विरोधी है ?

इसके जवाब में आरएसएस कहता है—

‘हिंदू राष्ट्र एक आधारभूत सिद्धांत है. यह हमारे लिए दृढ निष्ठा और आस्था दोनों का विषय है. स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, लोकमान्य तिलक, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, महाकवि सुब्रह्मण्य भारती जैसे मनीषियों ने इस राष्ट्र की हिंदू राष्ट्र के रूप में उद्घोषणा की है. पश्चिम जगत से आयीं प्रबुद्ध प्रतिभाएं डा. ऐनी बेसेंट, भगनी  निवेदिता और श्री माँ [पांडिचेरी] ने भी इसे हिंदू राष्ट्र घोषित किया है. महात्मा गाँधी ने असंदिग्ध शब्दों में लिखा है—हिन्दुत्व ही हमारी राष्ट्रीयता का आधार था.’

आरएसएस का यह जवाब अत्यन्त मूर्खतापूर्ण और अतार्किक है. उसका यह तर्क कितना हास्यास्पद है कि चूँकि कुछ हिंदू मनीषियों ने माना है, इसलिए हिंदू राष्ट्र का विचार सही मान लिया जाए. सवाल है कि ये हिंदू मनीषी कौन हैं? ये सभी मनीषी हिन्दुत्ववादी हैं. एक पक्षीय विचार के इन मनीषियों का मत पूरे राष्ट्र का मत कैसे हो सकता है ? आरएसएस ने महात्मा गाँधी का विचार रखा, पर महात्मा ज्योतिबाफूले का विचार क्यों नहीं रखा, जिन्होंने हिन्दुत्व को ब्राह्मणवाद  का नाम दिया था. उसने स्वामी विवेकानंद का विचार रखा, पर स्वामी धर्म तीर्थ के विचार क्यों नहीं रखे, जिन्होंने हिन्दुत्व को दलितों के प्रति क्रूर कहा है?  उसने लोकमान्य तिलक का विचार दिया है, जिहोने दलित जातियों की शिक्षा का विरोध किया था, पर बाबासाहेब डा. आंबेडकर का विचार क्यों नहीं दिया, जिन्होंने हिन्दुत्व के दर्शन को असभ्य दर्शन कहा था?

कहना न होगा कि आरएसएस ने सच का जवाब मिथक के रूप में दिया है.  इसी सवाल के जवाब में आगे उसने जजों के फैसले को भी आधार बनाया है.  वह कहता है—

‘भारत की सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 11 दिसम्बर 1995 को अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में घोषित किया कि हिन्दुत्व शब्द का कोई संकीर्ण अर्थ नहीं है.  सर्वोच्च न्यायालय में मनोहर जोशी बनाम नितिन भाऊ पाटिल के मुकदमे में न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा, न्यायमूर्ति एन. पी. सिंह तथा न्यायमूर्ति के. वेंकटस्वामी की संविधान पीठ ने सुनवाई के बाद अपने सर्वसम्मत निर्णय में घोषित किया कि हिन्दुत्व या हिन्दूवाद जैसे शब्दों का प्रयोग न तो  साम्प्रदायिक है, और न इस आधार पर वोट मांगना भ्रष्ट तरीका ही कहा जा सकता है.’ [AIR 1996 S. C. 196[1996] ISCC] [प्रश्नोत्तरी, पृ. 3-4]

इस संविधान खंडपीठ ने अपने निर्णय में हिन्दू विचारक डा. राधाकृष्णन की किताब ‘इंडियन फिलोसोफी’ को  मुख्य साक्ष्य बनाया है. डा. राधाकृष्णन ने जातिप्रथा का समर्थन किया है, और उसे बेहतर समाज के निर्माण का आधार बताया है. [देखिए, भारतीय दर्शन, प्रथम खंड, पृष्ठ 91] भारतीय न्यायपालिका की हिन्दू मानसिकता का यह हाल तब है, जब भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. पर अगर सचमुच भारत हिन्दू राष्ट्र हो गया,  तो न्यायपालिका का चरित्र कैसा होगा,  यह आसानी से समझा जा सकता है.  तब हिन्दू राष्ट्र में अगर कोई दलित अपनी मानहानि का मुकदमा दायर करेगा, तो हिन्दू जज पहली सुनवाई में ही उसे यह कहकर खारिज कर देगा  कि दलित का कोई मान नहीं होता है.

इस तरह हम देख सकते हैं कि आरएसएस का कोई भी तर्क यह साबित नहीं करता है कि हिन्दू राष्ट्र का विचार साम्प्रदायिक और संविधान-विरोधी नहीं  है.  हिन्दुत्व के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय की जिस संविधान पीठ के फैसले को वह परम साक्ष्य मानता है, कायदे से वह फैसला भी  एक पक्षीय है, क्योंकि उसमें हिन्दुत्व के पक्ष को सुना गया है, दूसरे पक्ष के विचारों का अध्ययन ही नहीं किया गया है.

वास्तविकता यह है कि आरएसएस ने कुछ हिन्दू मनीषियों और हिंदू जजों के विचारों की आड़ में हिन्दू राष्ट्र के साम्प्रदायिक और संविधान-विरोधी एजेंडे को न्यायोचित ठहराने का असफल प्रयास किया  है. क्या सचमुच हिन्दू राष्ट्र का विचार साम्प्रदायिक और संविधान-विरोधी नहीं है? आइए, देखते हैं.

सवाल है कि साम्प्रदायिकता का मतलब क्या है? आरएसएस ने इसकी व्याख्या  नहीं की है. पर इसे जाने बिना कि साम्प्रदायिकता क्या है, हम आगे नहीं बढ़ सकते. आज साम्प्रदायिकता का शब्द सुनते ही जो तत्काल अर्थ समझ में आता है. वह या तो हिन्दू मुस्लिम फसाद होता है, या फिर धार्मिक कट्टरवाद. बुद्धिजीवी वर्ग इसे दो राष्ट्रों के सिद्धांत में समझने की कोशिश करते हैं. गलत या सही, इन्हीं अर्थों में हमारे देश का बुद्धिजीवी वर्ग साम्प्रदायिकता के प्रश्न को समझ रहा है. लेकिन यह साम्प्रदायिकता का अर्थ नहीं है. साम्प्रदायिक समस्या की जड़ में न मंदिर है, और न मस्जिद, क्योंकि यह हिन्दू-मुस्लिम का सवाल ही नहीं है. यह हिन्दू-सिख का सवाल भी है, हिन्दू-ईसाई का सवाल भी है और हिन्दू-दलित का सवाल भी है. लेकिन ध्यान रहे, यह धर्मनिरपेक्षता का सवाल नहीं है. धर्मनिरपेक्षता का अर्थ लोकतंत्र में सिर्फ इतना है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा. इसलिए धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत धार्मिक कट्टरवाद पर कोई अंकुश नहीं लगाता है. यह एक विचारणीय प्रश्न है. इससे अधिक से अधिक धार्मिक दंगे कराए जा सकते हैं.

फिर साम्प्रदायिकता क्या है? इसे साम्प्रदायिता से पीड़ित वर्ग ही बेहतर ढंग से बता सकता है. इसलिए इसकी सबसे अच्छी परिभाषा डा. आंबेडकर ने की है. उनके अनुसार अल्पसंख्यकों पर शासन करने के दैवी अधिकार का नाम साम्प्रदायिकता है. उन्होंने 15 मार्च 1947 को संविधान सभा को दिए अपने ज्ञापन में, जो ‘States and Minorities’ नाम से उनकी रचनाओं में शामिल है, लिखा है—

‘Unfortunately for the minorities in India, Indian Nationalism has devleloped a new doctrine which may be called the Divine Right of the Majority to rule the minorities according to the wishes of the majority. Any claim for the sharing of power by the minority is called communalism while the monopolizing of the whole power by the majority is called Nationalism.’ [Dr. Babasaheb Ambedkar : Writtings and Speeches, vol. 1, p. 427]

अर्थात– ‘भारत के अल्पसंख्यकों का यह दुर्भाग्य है कि यहाँ राष्ट्रवाद ने एक नया सिद्धांत विकसित कर लिया है, जिसे बहुसंख्यकों का अल्पसंख्यकों पर शासन करने का दैवी अधिकार कहा जाता है. इसलिए, अल्पसंख्यकों द्वारा सत्ता में भागीदारी की मांग को साम्प्रदायिकता या जातिवाद का नाम दे दिया जाता है, जबकि बहुसंख्यकों द्वारा सर्वसत्ता पर एकाधिकार स्थापित करने को राष्ट्रवाद की संज्ञा प्रदान की जाती है.’

इस दृष्टि से क्या आरएसएस एक साम्प्रदायिक संगठन नहीं है, जो सर्वसत्ता पर अपने एकाधिकार को राष्ट्रवाद कहता है? क्या  इस अर्थ में भी वह साम्प्रदायिक संगठन नहीं है, जो दलितों और अल्पसंख्यकों  पर शासन करना अपना दैवी अधिकार समझता है? क्या यह साम्प्रदायिकता नहीं है कि उसके नियंत्रण में चलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता में मुस्लिम भागीदारी को खत्म करने के मकसद से गुजरात और उत्तरप्रदेश ही नहीं, बल्कि केन्द्र में भी किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था? क्या यह साम्प्रदायिकता नहीं है कि आरएसएस दलित और पिछड़ी जातियों के आरक्षण का विरोध करता है, और उसे समाप्त करने का हर संभव प्रयास करता है? इन सारे सवालों का जवाब हाँ में है. और इस आधार पर आरएसएस का हिन्दू राष्ट्र न केवल सांप्रदायिक है, बल्कि संविधान विरोधी भी है, क्योंकि भारत का संविधान भारत को हिंदू या इस्लामिक, किसी भी धर्म का राष्ट्र बनाने या घोषित करने की मान्यता नहीं देता है.

2.

आरएसएस ने दूसरा प्रश्न महात्मा गाँधी की हत्या से सम्बन्धित प्रश्न को लिया है. उसने  अपनी सफाई में इस आरोप का खंडन किया है कि गाँधी जी की हत्या संघ के कारण हुई थी. इस प्रश्न पर चर्चा करना मेरे कार्य का विषय नहीं है, इसलिए मैं इसे अप्रासंगिक समझकर छोड़ रहा हूँ. उसकी तीसरी सफाई को लेते हैं, जो यह प्रश्न है—

अपने समाज में ऊँचनीच, छूत-अछूत, मतान्धता, मतांतरण आदि सामाजिक अन्याय का कारण हिन्दू धर्म है?

आरएसएस इस आरोप का खंडन करते हुए कहता है—

‘हिन्दू धर्म का तत्वज्ञान ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ यह चिंतन किसी को अन्याय की अनुमति देगा? हिन्दू तत्वज्ञान में प्रतीक रूप श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों ही अन्याय और अधर्म से लदे हैं. इतिहास काल में साधु-संतों ने सामाजिक विषमता मिटने का महान कार्य किया है, उन सबकी प्रेरणा हिन्दू धर्म है. जब मूल पंथ में कुछ विकृतियाँ आयीं, तब उनका विरोध करने वाले, सुधर करने वाले भगवन बुद्ध, भगवान महावीर, गुरु नानक, महात्मा बसवेश्वर जैसे महात्माओं की प्रेरणा भी यही थी. आज के तथाकथित धर्मनिष्ठों में सामाजिक भाव न होना ही इसका मुख्य कारण है.’

‘इस समस्या का हल क्या है? प्रत्येक धार्मिक आचार-विचार की कसौटी है मानव हित. यही निश्चय करेगा कि वह पालन योग्य है या नहीं. धर्म के नाम पर हो रहे दुराचार को रोकना और धर्म का सच्चा रूप समझाना  चाहिए. सबसे अधिक आवश्यक  है—स्वयं चरित्रवान, समाजनिष्ठ बनें, धर्म का दुरुपयोग न करें. प्रखर हिन्दुत्व ही समाज को अन्याय और विषमता से मुक्त करेगा और संघ इसी कार्य में लगा है.’ [प्रश्नोत्तरी, पृ. 7]

क्या आरएसएस के इस कथन से यह साबित हो जाता है कि ऊँचनीच, छूत-अछूत, मतान्धता, मतांतरण और सामाजिक अन्याय का कारण हिन्दू धर्म नहीं है? उसने अपनी सफाई में इनमें से एक भी शब्द का उल्लेख तक नहीं किया है. उसने केवल यह बताने की कोशिश की है कि हिन्दू धर्म का तत्वज्ञान सर्वे भवन्तु सुखिनः है, और वह किसी को अन्याय करने ही नहीं देगा? अगर हिन्दू धर्म का तत्वज्ञान सर्वे भवन्तु सुखिनः है, और उसके रहते समाज में कोई अन्याय नहीं हुआ, तो बुद्ध, कबीर, नानक को पैदा ही नहीं होना चाहिए था? उन्होंने फिर किस धार्मिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई? अगर हिन्दू धर्म का तत्वज्ञान सर्वे भवन्तु सुखिनः होता, तो  डा, आंबेडकर  हिन्दू धर्म को असमानता, दासता और अन्याय का धर्म कहकर क्यों छोड़ते ? क्यों वह मनुस्मृति को जलाते,  जो हिन्दू धर्म का पवित्र कानून माना जाता है? क्या उसमें ऊँचनीच, छूत-अछूत, मतान्धता, मतांतरण और सामाजिक अन्याय नहीं है? जिस वर्णव्यवस्था को आरएसएस हिन्दुत्व का मूल आधार मानता है, क्या वह असमानता और सामाजिक अन्याय पर आधारित नहीं है? क्या  इस बात से इंकार किया जा सकता है कि सती जैसी क्रूर प्रथा, जिसमें विधवा स्त्री को जिन्दा जला दिया जाता है,  हिन्दू धर्म का अंग है? कई साल,पहले जब दिवराला में रूपकुंवर को सती  किया गया था, तो हिन्दू धर्म के ‘पावन गुरुओं’ ने उसे धर्मविहित बताया था? क्या सावरकर ने ब्राह्मणों को यह आश्वासन नहीं दिया था कि वह दलितों के लिए मंदिर-प्रवेश बिल का समर्थन नहीं करेंगे? [देखिए, सावरकर : मिथक और सच, शम्सुल इस्लाम, पृ. 94]

अगर आरएसएस हिन्दू धर्म में ऊँचनीच और छूत-अछूत को नकारता है, और उसे इतिहास काल यानी, मध्यकाल की विकृति मानता है, तो वह मिथक गढ़ रहा है, जिसका कोई सिरपैर नहीं है.

[आगे जारी..]

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‘हिंदुत्व’ ब्राह्मणों के स्वर्ग और शूद्रों के नर्क का नाम है !