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RSS की नज़र में सब कुछ ब्रह्म है तो मुस्लिम और ईसाई ब्रह्म क्यों नहीं ?

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पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर , उसके ही प्रकाशनों के आधार पर, एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है इस सिलसिले की  उन्नीसवीं कड़ी- संपादक


आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म–19

कँवल भारती  

 

हिन्दू संस्कृति और पर्यावरण

 

आरएसएस के राष्ट्र जागरण अभियान की पांचवी पुस्तिका का नाम ‘हिन्दू संस्कृति और पर्यावरण’ है, जिसमें उसने पर्यावरण पर चिंता व्यक्त की है. वास्तव में हमारे देश का पर्यावरण बहुत बिगड़ा हुआ है, नदियाँ दूषित हैं, हवा दूषित है, दिल्ली जैसे महानगरों में भी वायुमंडल में इतना प्रदूषण है कि व्यक्ति क्या, बच्चे तक मुंह पर मास्क लगाकर घर से बाहर निकलते देखे गए हैं. पीने का पानी तक दूषित है, जिसकी वजह से आरओ और फिल्टर जैसे उपकरणों का बाजार विकसित हुआ. ऐसा क्यों हुआ? इसके उत्तर में आरएसएस कहता है कि इसका उदगम पश्चिमी सभ्यता में है. उसके अनुसार, ‘आज की व्यवस्था और उसका चरित्र, वर्तमान सोच और विकास का माडल सभी पाश्चात्य हैं.’ [पृष्ठ 2]

यह वैसा ही जवाब है, जैसा अक्सर आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी के नेता देश में व्याप्त गरीबी के लिए कहते हैं कि यह कांग्रेस की पैदा की हुई है. यद्यपि यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि पश्चिम ने हमें बिजली दी, और बिजली से अनंत सुविधाओं का विस्तार हुआ. हीटर, चिमनी, वाशिंग मशीन, ओवन, गीजर, एसी, कूलर, पंखे घरों में लगे. डीजल-पेट्रोल आया, उससे सड़कों पर गाड़ियाँ दौड़ीं, आकाश में विमान उड़े, समुद्र में जहाज चले, रेलगाड़ियों का जाल बिछा, उद्योगों और गगनचुंबी इमारतों के लिए जंगल साफ़ किए गए, इससे तरह-तरह का कचरा वजूद में आया, जो गंदे नालों के साथ नदियों में गिरा, और पूरा पर्यावरण विषाक्त हो गया.  लेकिन ऐसा कोई देश नहीं है, जो इन सुविधाओं का उपयोग नहीं कर रहा है. वहां भी समस्याएं हैं, पर वे इसे धर्म और संस्कृति से नहीं जोड़ते हैं. आरएसएस को दूषित वातावरण के पीछे सिर्फ पाश्चात्य का माडल दिखाई देता है, जबकि इसका मुख्य कारण बेतरतीब विकास है. क्या अमेरिका ने भारत से कहा है कि वह कारपोरेट घरानों के भूदोहन के लिए जंगल साफ़ कराए, और उसके लिए आदिवासियों को वहां से उजाड़े ? जब जंगल का सफाया होगा, तो क्या प्रकृति का संतुलन नहीं बिगड़ेगा ? क्या प्रकृति का संतुलन बिगड़ने से पर्यावरण पर असर नहीं पड़ेगा?

आरएसएस की इस बात से कोई भी असहमत नहीं होगा कि ‘विकास का परिणाम असहनीय बनता जा रहा है. प्रदूषण और अन्य समस्याओं ने पर्यावरण को असंतुलित करने के दरवाजे खोल दिए हैं. जहर घुलता जा रहा है. मानवीय जीवन आत्मघात की ओर बढ़ रहा है.’ [पृष्ठ 3] लेकिन जब वह इस पर्यावरण में भी अतीत का राग अलापता है, तो लाजमी तौर पर उसकी सोच पर सवाल खड़े होते हैं. वह कहता है, ‘यदि पाश्चात्य जीवन-दर्शन प्रकृति से तादात्म्य नहीं रखता और जीवन-पद्धति को आघात पहुंचाने के लिए दोषी है, तो क्या पूर्वी दर्शन विकास के माडल का आधार बन सकता है?’ वह कहता है, ‘इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक है.’ [वही]

किन्तु, उसका सकारात्मक उत्तर बचकाने कुतर्कों से भरा हुआ है. वह कहता है, ‘पूर्वी दर्शन में विश्व जीवमान और समग्र है.’ [वही] तब क्या पश्चिम के दर्शन में विश्व जीवमान और समग्र नहीं है ? वहां क्या जीव अधूरा है ?

वह आगे कहता है, ‘मानव शरीर तपस्या का माध्यम है. मायाजाल से मुक्ति जीवन का अंतिम लक्ष्य है.’ [पृष्ठ 4] बताओ भला, इस मायाजाल से पर्यावरण का क्या सम्बन्ध है? अगर सब मायाजाल ही है, तो फिर प्रदूषण भी मायाजाल ही हुआ. फिर काहे की हाय-तौबा? लेकिन इस ‘हाय-तौबा’ के पीछे भी आरएसएस का कोई मकसद जरूर होना चाहिए. इस मकसद को जानने के लिए पहले उसके इस विचार को देख लें, जिसे वह ‘सही’ ज्ञान कहता है—

‘सत्य के साक्षात्कार के कारण भारतीय दार्शनिकों को प्रत्येक वस्तु का समग्र ज्ञान रहा है. उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि विश्व की बुनियाद भौतिक वस्तु है. उन्होंने हमेशा यही कहा कि भौतिक विश्व माया है. विश्व का आधार वस्तु नहीं, ब्रह्म है.अपने लगातार रूपांतरण में ब्रह्म ही विश्व का रूप धारण करता है. ये सभी रूप अस्थाई और मायारूप हैं. हम अपनी इन्द्रियों की सीमाओं के कारण विविध रूप देखते हैं. विश्व नाना रूपों में दिखाई देता है, यही ब्रह्म की विशेषता है, जैसे किसी रस्सी को देखकर सांप का भ्रम होता है. वस्तुत: प्रत्येक चीज ब्रह्म है.’ [पृष्ठ]

जब प्रत्येक चीज ब्रह्म है, फिर मुसलमान और ईसाई भी ब्रह्म क्यों नहीं है? फिर वह उनको अपना दुश्मन क्यों कहता है? क्या आरएसएस स्वयं दृष्टि-भ्रम का शिकार नहीं है ? जैसे रस्सी को देखकर सांप का भ्रम होता है, वैसे ही क्या ब्रह्म को देखकर आरएसएस को भी हिन्दू-मुसलमान का भ्रम नहीं होता है? जब ब्रह्म ही विश्व का रूप धारण करता है, तो क्या मन्दिर, क्या मस्जिद, क्या चर्च, क्या दलित, क्या मुसलमान, क्या नदी, क्या पहाड़—सब ब्रह्म के ही रूप हैं. जब भौतिक विश्व माया है, तो किससे नफरत कर रहे हो, और क्यों कर रहे हो? जब जलवायु-प्रदूषण की भी चिंता क्यों कर रहे हो? ब्रह्म ही दूषित हो रहा है, और ब्रह्म ही उससे पीड़ित हो रहा है. जब विश्व का आधार वस्तु है ही नहीं, तो क्यों चिंतित हो रहे हो? लेकिन सच यह है कि आरएसएस जिस ‘ब्रह्म सत्य और जगत मिथ्या’ को ‘सही’ ज्ञान कह रहा है, वह सामंतवाद और ब्राह्मणवाद का सबसे घृणित और क्रूर प्रपंच है, जिसका निर्माण सेवक श्रेणी के लोगों का खून चूसने के लिए किया गया था, ताकि गरीब, शोषित और वंचित श्रेणी के लोगों को मायावाद की घुट्टी पिलाकर आसानी से गहरी नींद सुलाया जा सके,और ब्राह्मण-सामंत उनका बेख़ौफ़ शोषण करते रहें.

इस मायावाद पर राहुल सांकृत्यायन ने जबर्दस्त चुटकी ली है—

‘जगत भी माया है. माँ भी माया, बाप भी माया, पत्नी भी माया, पति भी माया, उपकार भी माया, अपकार भी माया, गरीब की काम से पिसती भूख से तिलमिलाती अंतड़ियाँ भी माया, निकम्मे शरीर की फूली तोंद और ऐंठी मूंछें भी माया, कोड़ों से लहुलुहान तड़पता दास भी माया और बेकसूर पर कोड़े चलाने वाला जालिम मालिक भी माया, चोर भी माया, साहू भी माया,….धर्म भी माया, अधर्म भी माया, बंधन भी माया, मुक्ति भी माया. …यह है शंकर का मायावाद, जो समाज की हर विषमता, हर अत्याचार को अक्षुण्ण, अछूता रखने के लिए जबर्दस्त हथियार है.’ [दर्शन-दिग्दर्शन, [पृष्ठ 636]

इस दर्शन के बारे में आरएसएस ने सबसे बड़ा झूठ यह बोला है कि ‘सत्य के साक्षात्कार के कारण भारतीय दार्शनिकों को प्रत्येक वस्तु का समग्र ज्ञान रहा है.’ यानी वे सर्वज्ञ थे. सबसे पहली बात तो यह कि वह ‘भारतीय दार्शनिकों’ की आड़ में वैदिक ब्राह्मणों की बात कर रहा है. भारतीय दार्शनिकों में अवैदिक धारा के दार्शनिक भी थे, जैसे आजीवक, लोकायत और बौद्ध, जो ब्राह्मण दार्शिनकों के उल्ट ‘जगत सत्य और ब्रह्म मिथ्या’ मानते थे. इस दृष्टि से वे ज्यादा लौकिक और यथार्थवादी थे. वे जलवायु की चिंता करने वाले दार्शनिक थे, जो ब्राह्मणों के यज्ञ-अनुष्ठानों और पशु-बलियों का विरोध करते थे, जिनकी वजह से वायुमंडल प्रदूषित और संक्रमित होता था. आरएसएस इन भारतीय दार्शनिकों को भी ब्रह्मवादियों में शामिल करके और उन्हें सर्वज्ञ बताकर दार्शनिक भ्रष्टाचार कर रहा है. दूसरे, यह भी महाझूठ है कि  ब्रह्मवादी दार्शनिक प्रत्येक वस्तु का समग्र ज्ञान रखते थे. उन सर्वज्ञों को अपनी मृत्यु के समय तक का ज्ञान नहीं था. जिन्हें यह तक मालूम नहीं था कि वर्षा कैसे होती है, अग्नि कैसे पैदा होती है, और जल कैसे बनता  है, वे काहे के सर्वज्ञ थे?

आरएसएस कहता है कि ब्रह्म सत्य के ‘सही’ ज्ञान के बल पर ही पर्यावरण को संतुलित किया जा सकता है. इसके लिए उसके पास यह समाधान है—

‘इसका समाधान और अधिक उत्पादन बढ़ाना नहीं, अपितु उपभोग की लालसा पर लगाम लगाना है. इसके लिए मस्तिष्क को नियंत्रित करना होगा. ऐसा न करने पर लालसाएं बढ़ती जाएंगी. इससे व्यक्ति और समाज का क्षरण होगा. पर्यावरण पर प्रतिकूल दबाव बढ़ेगा. मस्तिष्क पर नियन्त्रण से लालसाएं घटेंगी. आन्तरिक विकास होगा. परोक्ष में पर्यावरण विकास और संतुलन बढ़ेगा. लालसाएं कम होने से उपभोग नियंत्रित होगा. उपभोग की गति से संसाधनों के पुनर्जनन की गति तेज होगी. संसाधनों का संरक्षण होने से प्रकृति का चक्र बिना रोकटोक के घूमेगा. जैव विविधता बनी रहेगी और प्रदूषण नहीं होगा.’ [वही]

देखा कितना अच्छा समाधान है! बांसुरी न रहे, इसलिए बांस को ही खत्म कर देना चाहिए. जब बांस ही नहीं रहेगा, तो बांसुरी कहाँ से बजेगी?  उस भौतिक विकास को खत्म करने के लिए, जो पश्चिम का है, व्यक्ति की लालसाओं को ही खत्म कर दो. क्या ही अच्छा हो, अगर आरएसएस लालसाओं को मारने के लिए मस्तिष्क को नियंत्रित करने का यह समाधान टाटा, विरला, अम्बानी और अदानी को समझाता, जो अनियंत्रित मस्तिष्क से उद्योगों का जाल पर जाल बिछाए जा रहे हैं, और भारी शोषण के बल पर भारी मुनाफा कमाए जा रहे हैं. काश यह फलसफा वह अपनी सरकारों को समझाए, जो कारपोरेट को बसाने के लिए आदिवासियों को उनके इलाकों से उजाड़ रही हैं. और क्या ही अच्छा होगा, वह इस फलसफा को अपने दिमाग में भी भरता, जो असंवैधानिक हिन्दू राष्ट्र की लालसा को पूरा करने का असम्भव प्रयास करता जा रहा है.

इस ‘ब्रह्मसत्य और जगतमिथ्या’ के मिथ्या दर्शन पर, जिसके उद्भावक आदिशंकराचार्य थे, कुछ और भी चर्चा हो सकती है. नदियों में गणेश और दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन, गंगा घाट पर मोक्ष के लिए जाकर मरना, गंगा में शवों को बहाना, दशहरे पर पुतलों का जलाना, विशाल यज्ञों का संपन्न कराना, जैसे तेलंगाना के प्रथम मुख्यमंत्री ने विशाल यज्ञ कराकर पूरे वायु मंडल को धूंआ-धूंआ कर दिया था, होली में विशाल वन-संपदा में आग लगाना, और कुम्भ-महाकुम्भ कराना—ये सब भारत में ध्वनि, धूम्र और कचरा प्रदूषण फैलाने के सबसे बड़े स्रोत हैं, जिन्हें इसी ब्रह्म सत्य धर्म का आधार प्राप्त है. ये इस मिथ्या जगत में क्यों बने हुए हैं? जब सारा वस्तु-जगत मिथ्या है, और प्रत्येक वस्तु ब्रह्म है, तो फिर सत्य क्या है? प्रदूषण भी ब्रह्म और प्रदूषण फ़ैलाने वाला भी ब्रह्म, क्योंकि हर चीज ब्रह्म है. तब क्या यह माना जाए कि ब्रह्म ही भारत में पर्यावरण-प्रदूषण का मुख्य कारण है. आरएसएस के फलसफे से तो यही लगता है. आरएसएस धार्मिक आधार पर होने वाले भयानक प्रदूषण को रोक नहीं सकता, क्योंकि वह ब्रह्म के खिलाफ जा नहीं सकता, इसलिए, उसने तय किया कि लालसाओं के बांस को ही खत्म करो, जिससे प्रदूषण की बांसुरी बन रही है.

आँखों के अंधे और नाम नयनसुख, यह कहाबत आरएसएस पर पूरी तरह चरितार्थ होती है. देखिए, वह क्या कहता है—

‘जहाँ पाश्चात्य दर्शन ने जीवन में भौतिकवादी प्रवृत्ति का अनुसरण किया, वहीं हिन्दू दर्शन ने बौद्धिकवाद को जीवन की शैली बनाया. यह दर्शन ऐसे बाह्य विकास को महत्व देता है, जहाँ आनन्द  लालसाओं में नहीं है. जहाँ व्यक्ति जीवन का परिष्कार करता है, वहाँ उपभोग पर लगाम लगती है. यहीं से पर्यावरण के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवस्था का विकास होता है. रंगों वाली शब्दावली में कहा जाए, तो ‘भगवा चिन्तन’ (त्यागमय चिन्तन) का परिणाम होता है ‘हरित जीवन’ (पर्यावरण मैत्रीपूर्ण जीवन). प्रकृति का श्रृंगार भोग से नहीं, त्याग से संस्कारित होता है. भोग की प्रवृत्ति से शोषण होता है. भोग से जहाँ परिग्रह का विस्तार होता है, वहीं त्याग से अपरिग्रह की सृष्टि होती है. भोग से हिंसा और त्याग से शांति बढ़ती है. परिग्रह से विषमता जन्म लेती है, वहीं अपरिग्रह से विषमता की खाई पटती है. भोग से प्रकृति का प्रदूषण बढ़ता है, तो त्याग से प्रकृति का संरक्षण होता है.’[पृष्ठ 5]

यह भगवा चिन्तन, जिसे आरएसएस त्यागमय चिन्तन कहता है, वस्तुतः ब्रह्मचर्य और इन्द्रियों के दमन का चिन्तन है. यहाँ राहुल सांकृत्यायन का यह मत दृष्टव्य है—

‘शताब्दियों से धर्म, सदाचार के नाम पर मानव की अपनी सभी प्राकृतिक भूखों, विशेषकर यौन सुखों के तृप्त करने में बाधा-पर-बाधा पहुंचाई जाती रही. ब्रह्मचर्य और इन्द्रिय-निग्रह के यशोगान, दिखावा तथा कीर्ति-प्रलोभन द्वारा भारी जनसंख्या को इस तरह के अप्राकृतिक जीवन को अपनाने के लिए मजबूर किया जा रहा था. इसी का नतीजा था, यह तन्त्र-मार्ग, जिसने मद्य, मांस, मत्स्य, मैथुन, मुद्रा—इन पांच मकारों को मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय बतलाना शुरू किया. लोग बाहरी सदाचार के डर से इधर आने से हिचकिचाते थे, इसलिए उसने डबल (दोहरे) सदाचार का प्रचार किया. एक दूसरे से बिलकुल उलटे इस डबल सदाचार के युग में यदि शंकराचार्य जैसे डबल-दर्शन-सिद्धान्ती पैदा हों, तो कोई आश्चर्य नहीं.’ [दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 629]

यह सच में ही डबल-दर्शन-सिद्धांत है. दो शब्दों—भौतिकवाद और बौद्धिकवाद का घालमेल देखिए. आरएसएस भौतिकवाद को पाश्चात्य दर्शन और बौद्धिकवाद को हिन्दूदर्शन कहता है. भौतिकवाद में ‘भो’ शब्द के कारण वह उसका अर्थ भोगवाद के रूप में करता है, जो उसके बौद्धिक दिवालियेपन को दर्शाता है. भोगवाद का भौतिकवाद से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है. भौतिकवाद का अर्थ है, जो कार्य-कारण-नियम को मानता है. इसलिए यह ईश्वर, परलोक, ब्रह्म, स्वर्ग, नर्क आवगमन आदि कल्पना से गढ़े गए ज्ञान का खंडन करता है. कल्पना का ज्ञान सत्य का साक्षात्कार नहीं है. प्रत्यक्ष ज्ञान ही सत्य का साक्षात्कार है, जिसमें यह सारा वस्तु जगत आता है, अमीरी, गरीबी, जीवन-संघर्ष, और वे सारी चीजें आती हैं, जिन्हें कल्पनावादी ब्रह्मवादी माया कहते हैं. दूसरे शब्दों में भौतिकवाद का प्रतिरूप ही ब्रह्मवाद है, जो समस्त भौतिक जगत को माया कहता है. फिर इस माया में प्रकृति और पर्यावरण सत्य कैसे हो गया? यह भी उल्लेखनीय है कि भौतिकवाद पाश्चात्य दर्शन नहीं है. वह भारत का ही अवैदिक दर्शन है, जो चार्वाकों और अजित केश कम्बल, मक्खली गोशाल, पूर्ण कश्यप आदि आजीवकों का दर्शन रहा है. आरएसएस भौतिकवाद को पाश्चात्य दर्शन कहकर इसलिए विरोध करता है, क्योंकि वह आगे चलकर मार्क्स के वैज्ञानिक भौतिकवाद से मिल जाता है, जो उसके सम्पूर्ण मायावाद की खाट खड़ी कर देता है. यह वह विज्ञान है, जिसकी रौशनी में सारे मूढ़ विश्वास छू-मन्तर हो जाते हैं.

अब जरा यह भी देख लिया जाए कि जिस बौद्धिकवाद को वह हिन्दू दर्शन कह रहा है, वह क्या है? दर्शन की भाषा में बौद्धिकवाद का अर्थ है ईश्वरवाद. राहुल जी ने इसकी तीन श्रेणियां बताई हैं—बुद्धिवाद, रहस्यवाद और शब्दवाद. इसमें अक्षपाद का न्यायशास्त्र बुद्धिवादी है, पतंजली का योग रहस्यवादी है और वेदांत का ब्रह्मज्ञान शब्दवादी है. इन्हीं तीन दर्शनों का नाम बौद्धिकवाद है. आरएसएस के सबसे काम का दर्शन शब्दवाद है, जो शब्द को प्रमाण मानता है, यानी, वेद-शास्त्रों को, जिन्हें वह हिन्दू आस्था से जोड़कर बड़ी आसानी से देश का साम्प्रदायिक वातावरण खराब कर सकता है. इस बौद्धिकवाद का सम्बन्ध बुद्धि, तर्क और विज्ञान से बिल्कुल नहीं है, बल्कि इसका सम्बन्ध ब्राह्मण ऋषियों और ब्रह्मवादियों की उस बुद्धि से है, जिसने गरीबों को अपने दुखों को भुलाने के लिए लोक को झुठलाने और परलोक को स्वीकारने का दर्शन खड़ा किया. राजाओं-महाराजाओं के धन से खड़ा किया गया यह दर्शन जनसाधारण को त्याग, संतोष और अपरिग्रह की शिक्षा देकर धनिकों के धन की सुरक्षा का कवच तैयार करता है. सामंतों, सेठों और ब्राह्मणों का भोगेश्वर्य सुरक्षित रहे, इसलिए यह बौद्धिकवाद जनता को यह समझाता है कि जीवन क्षणभंगुर है, और भोग से प्रकृति का प्रदूषण होता है. इस लोक में त्याग करोगे, तो परलोक में ऐश्वर्य भोगोगे. इसलिए आरएसएस कहता है कि बौद्धिकवाद ‘वैभव के स्तर पर मानव को उस अदृश्य सत्ता से साक्षात्कार कराता है.’ [वही] भला, जो सत्ता अदृश्य है, उसका साक्षात्कार कैसे हो सकता है? यह प्रश्न किसी भी हिन्दू संत या आरएसएस के नेता से पूछ लीजिए, वह आपको ऐसे-ऐसे तर्क देगा कि आपकी  बुद्धि चकरा जाएगी. यही तो हिन्दू बौद्धिकवाद है. उपनिषदों में यही बुद्धिवाद भरा पड़ा है. ब्रह्म क्या है? इसी एक प्रश्न का उत्तर देने के लिए सारी उपनिषदों ने ईरान-तुरान की लम्बी खेंची है. पर नतीजा कुछ नहीं निकला है. कोई उपनिषद यह नहीं बता सकी कि ब्रह्म इस चीज का नाम है. लेकिन आरएसएस बड़े गर्व से कहता है, ‘ईशावास्य उपनिषद की प्रथम पंक्ति सात्विक चिन्तन और हरीतिमा के जीवन को सार्थक करती है कि धरा पर प्रत्येक वस्तु ब्रह्ममय है. इसलिए मिल-जुलकर  उपभोग करो.’ [पृष्ठ 6] क्या महान बौद्धिक है ! प्रत्येक वस्तु ब्रह्म है, और ब्रह्म ही ब्रह्म का उपभोग करे!!

उपनिषद के बाद आरएसएस गीता के ज्ञान पर आता है. वह गीता के श्लोक 3/12 का अर्थ करते हुए भी यही राग अलापता है कि ‘ऐन्द्रिक उपभोग को नियंत्रित करो.’ [वही] पर आगे इसी गीता के आधार पर वह कहता है, ‘भोग की स्वीकृति स्वयं कृष्ण गीता में देते हैं— ‘जहाँ भोग धर्म की अवमानना नहीं करता, वह दिव्य है.’ [पृष्ठ 9] लेकिन यह धर्म क्या है, जिसकी अवमानना न की जाये?  यही तो हिन्दू बौद्धिकवाद में रहस्य  है.

पुस्तिका के अंत में फिर अंग्रेजों को कोसा गया है—

‘अंग्रेज शासकों ने हमारा बुद्धिभ्रम कर दिया. उन्होंने हमें इस भ्रम का शिकार बना दिया कि हमारे यहाँ सही कुछ नहीं है. हमें श्वेत लोगों का अनुकरण करना चाहिए. यही सभ्य होने का तरीका है. …हम भूल गए हैं कि हमारा दर्शन अलग है, हमारा चिन्तन अलग है, हमारा आचार अलग है.’ [पृष्ठ 11]

अगर दलितों की निगाह से देख जाए, तो हिन्दू वास्तव में सभ्य नहीं थे. जो हिन्दू अपनी विधवा औरतों को जिन्दा जलाकर मारते थे, वे किधर से सभ्य थे?  जो हिन्दू बारह साल की बच्चियों के साथ विवाह को स्वीकृति देते थे, वे किधर से सभ्य थे? जो हिन्दू करोड़ों लोगो को अछूत बनाकर उन्हें समस्त मानवीय अधिकारों से वंचित रखते थे, वे किधर से सभ्य थे? जो हिन्दू अपनी आधी आबादी को अशिक्षित बनाकर रखते थे, वे किधर से सभ्य थे? जिन हिन्दुओं ने वर्णव्यवस्था बनाकर श्रमिकों का भी विभाजन कर दिया था, वे किधर से सभ्य थे? अगर अंग्रेजों ने ऐसे हिन्दुओं को मानवता का पाठ पढ़ाकर सभ्य बना दिया, तो इसके लिए उन्हें अंग्रेजों का कृतज्ञ होना चाहिए. आरएसएस का यह कहना सच है कि ’हमारा, यानी हिन्दुओं का दर्शन अलग है, चिन्तन अलग है और आचार भी भिन्न है.’ इसे दलितों से ज्यादा भला कौन जान सकता है, जिन्होंने इस अलग दर्शन, अलग चिन्तन और अलग आचार के आघात को अपने जिस्मों पर झेला है?

अंत में पुस्तिका कहती है—

‘हिंदुत्व में हर व्याधि का समाधान दे सकने वाली शक्ति और क्षमता है. परन्तु इसके लिए पहले हम हिन्दुओं को उस जीवन-दर्शन के अनुसार जीना होगा. दुनिया का पथ-प्रदर्शन करना अतीत में भी पावन कर्तव्य रहा है. और हर परिस्थिति में हमें वही कार्य करना है, ताकि निकट भविष्य में विश्व-पर्यावरण का संकट टाला जा सके. हमें इस धर्म-कार्य के लिए सुसज्जित होना है.’ [पृष्ठ 12]

अगर हिंदुत्व में हर व्याधि को दूर करने की क्षमता है, तो वह इन्सेफेलाइटिस की बीमारी को क्यों दूर नहीं कर सका, जिसकी वजह से गत दिनों गोरखपुर में सैकड़ों बच्चों की अकाल मौतें हुई हैं? जिस हिंदुत्व को अपनी व्याधि का पता नहीं है, वह विश्व-पर्यावरण का संकट खत्म करने का सपना दिखा रहा है. अगर हिन्दू अतीत के वेद, गीता और उपनिषदों के जीवन-दर्शन के अनुसार चलेंगे, तो वे फिर से मानवता के लिए असभ्य ही बनेंगे, सभ्य नहीं.