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आरएसएस चाहे दस ‘पुत्रों’ को जन्म देने वाली आदर्श हिंदू बहू !

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पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर , उसके ही प्रकाशनों के आधार पर, एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है इस सिलसिले की अठारहवीं कड़ी- संपादक


आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म–18

कँवल भारती  

 

 

आदर्श हिन्दू घर (3)

 

नई बहू का आदर्श क्या हो? इस सम्बन्ध में आरएसएस ऋग्वेद के दसवें मंडल के सूक्त-85 के मन्त्र-46 को आधार बनाकर कहता है, जिसका अर्थ है—‘हे पुत्री, श्वसुरों की दृष्टि में तुम महारानी बनो, सास की दृष्टि में महारानी बनो, ननद की दृष्टि में महारानी बनो, और देवरों की दृष्टि में महारानी बनो. हमारा यही आशीर्वाद है, यही शुभ कामना है, और यही हमारी शिक्षा और यही हमारा उपदेश है.’ [आ.हि.घ., पृष्ठ 10]

ऋग्वेद में इसके पहले के मन्त्रों में और भी बहुत कुछ कहा गया है, पर मन्त्र 45 को देखना जरूरी है. वह कहता है—‘हे इंद्र, तुम इस वधू को शोभन-पुत्रों वाली एवं सौभाग्यशालिनी बनाओ. तुम इसमें मुझे दस पुत्रों को दो एवं मेरे पति को ग्यारहवां करो.’

इस मन्त्र की व्याख्या करने की जरूरत नहीं है. अर्थ स्पष्ट है, स्त्री के लिए सारी शिक्षा, सारा आशीर्वाद और सारा उपदेश यही है कि वह अधिक से अधिक पुत्र पैदा करे. मन्त्र 45 में दस पुत्रों की कामना की गई है, और ग्यारहवां पुत्र उसकी सास अपने लिए भी मांगती है. यदि एक हिन्दू वधू दस-ग्यारह पुत्र पैदा करती है, तो वह आदर्श हिन्दू बहू है. यहाँ यह मान लिया गया है कि स्त्री केवल पुत्र जनने में ही आदर्श है, अगर वह पुत्रियों को जन्म देती है, तो क्या तब भी वह आदर्श होगी, इस पर उसने कोई मत व्यक्त नहीं किया है. बहरहाल, आरएसएस छोटे परिवारों की निंदा करते हुए जिस विशाल परिवार का समर्थन करता है, उसका मूल आधार ऋग्वेद है.

इस आदर्श हिन्दू घर में क्या स्त्री का भी कोई अस्तित्व है? तो, जवाब है नहीं है.  आदर्श हिन्दू स्त्री अपने लिए, अपने ढंग से और अपनी ख़ुशी के लिए नहीं जी सकती. देखिए, आरएसएस के ये विचार–

          ‘हिन्दुओं में प्रत्येक व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास के लिए सोलह संस्कारों की योजना है. उनमें विवाह तेरहवां संस्कार है. ये तेरह संस्कार माता के घर में होने के पश्चात् बहू का परिवार बदलता है. फिर भी परिवार के हित को, व्यक्ति-जीवन में प्रमुख स्थान देने के भारतीय संस्कार के कारण नए परिवार में वह बहू ऐसे घुलमिल जाती है, जैसे दूध में शक्कर. अपने जन्मकुल से उत्तम संस्कारों का वह पतिकुल में ऐसा सुंदर विनियोग कर देती है कि पतिकुल की श्रेष्ठता और अधिक देदीप्यमान हो उठे. अपनी वैयक्तिक पहचान बनाए रखने के लिए वह संघर्षशील नहीं रहती. जैसे निसर्ग उत्तमोत्तम नवनिर्माण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है, उसी प्रकार की श्रेष्ठ शक्ति के रूप में यह नवीन बहू अपने को तैयार करती है, और नए परिवार को अपने गुण और योजनाओं से सरस बना देती है.’ [वही]

          इसमें संदेह नहीं कि भारत में हिन्दू स्त्री की यही नियति है. पर अफ़सोस इस बात का है कि आरएसएस इसे हिन्दू स्त्री के लिए आदर्श मानता है, जबकि यह आदर्श स्त्री की निजता का हनन करता है. नई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों के साथ स्त्री अपनी भूमिका भी बदल रही है. वह स्वतंत्र हुई है, और अपने लिए भी एक स्थान समाज में बना रही है. विवाह भले ही उसके लिए तेरहवां संस्कार हो, पर अनिवार्य नहीं है. अब हिन्दू स्त्रियां इस संस्कार-बंधन से भी मुक्त होकर बेहतर जीवन जी रही हैं. वे राजनीतिक भूमिका भी अच्छी तरह निभा रही हैं. लेकिन आरएसएस हिन्दू स्त्री की इस तरह की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करता है, जिसमें वह अपना भी अस्तित्व कायम रखती है, और दूध में शक्कर की तरह उसे खत्म नहीं करती है, बल्कि अपने होने को महसूस कराती है. किन्तु यदि आरएसएस के आदर्श हिन्दू घर के विचार को अमल में लाया गया, तो हिन्दू स्त्री ऋग्वेद की दस-ग्यारह पुत्र पैदा करने वाली बहू यानी वस्तु बनकर ही रह जाएगी. और स्वतंत्रता नाम की कोई चिड़िया उसके जीवन-प्रांगण में कभी फुदकेगी ही नहीं. मनु ने भी ऐसी ही स्त्री को आदर्श कहा है, जिसमें वह कभी स्वतंत्र न रहे. पति के सिवा न उसका स्वर्ग है और न  कोई अस्तित्व. [मनुस्मृति, 5/148-155]

          आरएसएस का आदर्श हिन्दू परिवार वह है, जो परिवार के पारम्परिक व्यवसाय को अपनाता है. उसी में अत्यल्प आयु में भी अप्रतिम प्रतिभा प्रकट होती है. देखिए उसके ये ‘आप्त वचन’—

          ‘पारिवारिक व्यवसाय : भारत की सामाजिक अर्थव्यवस्था की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण विषय है. बाल्यावस्था में ही पारम्परिक व्यवसाय में पारिवारिक वातावरण के अंतर्गत शिक्षित-दीक्षित होने से परिवार के बालकों को व्यवसाय की शैक्षणिक प्रणाली सीखने में समय का अपव्यय नहीं करना पड़ता. आज के युवक अपनी आयु का कितना भाग किसी उपाधि को प्राप्त करने में व्यतीत करते हैं और उसके पश्चात् आजीविका के साधनों का अन्वेषण होता है. बाद में भी शक्ति-सामर्थ्य का समुचित उपयोग न होने के कारण और अनुचित बड़ी-बड़ी अपेक्षाओं को संजोने और उनके भंग होने से उत्पन्न निराशा के परिणामस्वरूप जीवन की नीरसता आदि कई अवांछनीय परिणामों से भारतीय परिवार-व्यवस्था अपने सदस्यों को बचा लेती है. यही नहीं, कई बार पारिवारिक व्यवसाय व्यवस्था से अत्यल्प अप्रतिम प्रतिभा प्रकट हो जाती है.’ [वही, पृष्ठ 11-12]

          आरएसएस के ये उदगार वर्णव्यवस्था के समर्थन में हैं. समय के चक्र को यह ब्राह्मणवादी संगठन हजारों साल पीछे ले जाने का सपना देख रहा है, जो अब उसके बश में नहीं हैं. पर उसके दिमागी फितूर का कौन इलाज करे, जो पुश्तैनी पेशों से जीविका चलाने के ब्राह्मणवादी ढांचे को खड़ा करने की बीमारी से ग्रस्त है? शारीरिक बीमारी का इलाज तो है, काउंसिलिंग से मानसिक रोग भी ठीक हो जाते हैं, और कृत्रिम अंगों से विकलांगों को भी चलाने का इलाज मौजूद है, परन्तु  आरएसएस जिस ‘अतीत’ नामक बीमारी से ग्रस्त है, वह लाइलाज है.  उसने उसके मन और दिमाग दोनों को विकलांग बना दिया है. ऐसे विकलांग को कौन चला सकता है?

          वह कहता है, पुश्तैनी काम को सीखने में समय का अपव्यय नहीं होता. यानी, अगर कोई चमार, भंगी, बागवान, अहीर, कुम्हार आदि जातियों के युवक अपने पुश्तैनी काम को न करके डाक्टर, इंजीनियर या वकील बनने के लिए उच्च शिक्षा की डिग्री प्राप्त करता है, तो वह समय का अपव्यय करता है, क्योंकि आरएसएस के अनुसार जरूरी नहीं है कि वह अपने उद्देश्य में सफल हो ही जाए. इसलिए वह कहता है कि ‘शक्ति-सामर्थ्य का समुचित उपयोग न होने के कारण और अनुचित बड़ी-बड़ी अपेक्षाओं को संजोने और उनके भंग होने से उत्पन्न निराशा’ उसके जीवन को नीरस बना देती है. जरा ‘शक्ति-सामर्थ्य’, ‘अनुचित बड़ी-बड़ी अपेक्षाओं’ और ‘अत्यल्प आयु में अप्रतिम प्रतिभा’ शब्दों पर गौर कीजिए. ये शब्द सीधे-सीधे दलितों को कह रहे हैं कि अपनी औकात से बढ़कर बड़े-बड़े गलत सपने मत देखो, और अपने पारिवारिक व्यवसाय में ही अप्रतिम प्रतिभा प्रकट करो.

          इस विचार को पढ़कर अब मुझे सचमुच लग रहा है कि आरएसएस पागलों का संगठन है. क्योंकि इसे यही नहीं मालूम है कि दुनिया में महानतम आविष्कार पारिवारिक पेशों को त्यागकर बड़ी-बड़ी अपेक्षाओं को संजोने वाले लोगों ने ही किए हैं. पर आरएसएस को तो भारत की उस प्राचीन वर्णव्यवस्था का पुनरुद्धार करना है, जिसका अस्तित्व खत्म हो चुका है और  जो सिर्फ सनातनी ब्राह्मणों के मस्तिष्क के कबाड़ख़ाने में बचा हुआ है, जैसे लुप्त हो चुके डायनासोर का ढांचा कुछ अजायबघरों में बचा हुआ है. आज की पूंजीवादी वर्णव्यवस्था में क्या कुम्हारों, लुहारों, जूता और फर्नीचर निर्माताओं के लिए उन्नति करने का कोई अवसर बचा है?  क्या आरएसएस को नहीं पता है कि हिन्दू पूंजीवाद ने हिन्दुओं के सारे कुटीर धंधे चौपट कर दिए हैं?  आज की वर्णव्यवस्था में नेता की संतान नेता बन रही है, क्योंकि वही उनका पुश्तैनी पेशा बन गया है, डाक्टर की संतान डाक्टर बन रही है, क्योंकि अब वही उनका पुश्तैनी पेशा बन गया है, बिजनेसमैन की संतान बिजनेसमैन बन रही है, क्योंकि अब वही उनका पुश्तैनी पेशा बन गया है, नौकरशाह की संतान नौकरशाह बन रही है, क्योंकि अब वही उनका पुश्तैनी पेशा बन गया है.

          असल में आरएसएस का उद्देश्य सिर्फ दलितों  को दलित बनाए रखने का है. अगर किसी दलित का पारम्परिक व्यवसाय गंदा और घृणित है, तो आरएसएस चाहता है कि वह उसे छोड़कर किसी साफ-सुथरे व्यवसाय की अनुचित अपेक्षा न करे, और उसी गंदगी में अपनी अप्रतिम प्रतिभा का विकास करे. क्या दिलचस्प है कि आरएसएस अपने पारम्परिक व्यवसाय के मूर्खतापूर्ण सिद्धांत को दलित वर्गों पर तो थोपना चाहता है, परन्तु द्विजों पर नहीं; उनको वह चाहता है कि वे सारे संसाधनों और राजसत्ता पर कब्जा करें, जो वे कर भी रहे हैं.

          अंत में अब यह आरएसएस का यह विचार भी देखिए–

‘भारतीयों का आदर्श है शिव परिवार, जिसमें हैं शिवजी, पार्वतीजी, उसके दो पुत्र— कार्तिकेयजी और गणेशजी. सबकी शक्ति एक प्रवाह के रूप में समाज-सेवा में लग गई.’ [वही, पृष्ठ 13]

          जब दो पुत्रों वाला छोटा परिवार आदर्श है, तो इसी पुस्तिका के आरंभ में वह बड़े परिवारों का समर्थ करते हुए परिवार नियोजन योजना का उपहास क्यों उड़ाता है? यह विरोधाभास क्यों?

[आगे ‘हिन्दू संस्कृति और पर्यावरण’ पर]  

 

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