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आरएसएस का प्राचीन आदर्श परिवार ग़रीबों को ज़िन्दा मारने का षड्यन्त्र है !

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पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर , उसके ही प्रकाशनों के  आधार पर एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है इस सिलसिले की  सोलहवीं कड़ी- संपादक


आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म–16

कँवल भारती  

 

आदर्श हिन्दू घर

 

 आरएसएस के राष्ट्र जागरण की चौथी पुस्तिका का नाम ‘आदर्श हिन्दू घर’ है. इसकी शुरुआत उन पंक्तियों से होती है—

‘इंग्लैंड में मकर संक्रांति के पर्व पर आयोजित हिन्दू स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमन्त्री मार्गरेट थेचर ने हिन्दू संयुक्त परिवार एवं पारिवारिक जीवन-मूल्यों की भूरिभूरि प्रशंसा करते हुए, विवाह-विच्छेद एवं टूटते परिवारों के कारण इंग्लैंड के सामाजिक जीवन में जो चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं, उनके समाधान हेतु हिन्दुओं से ब्रिटिश समाज को इन जीवन-मूल्यों के प्रशिक्षण की आवश्यकता प्रतिपादित की.’ (आदर्श हिन्दू घर, पृष्ठ 2)

इस प्रसंग का कोई सन्दर्भ-प्रमाण  नहीं दिया गया है. यद्यपि ऐसे गपोड़े गढ़ने में आरएसएस के लेखकों की सानी नहीं है, फिर भी अगर यह मान लिया जाय कि ऐसा हुआ होगा, तो आरएसएस के हिन्दू स्वयंसेवक संघ ने इंग्लैंड की प्रधानमन्त्री मार्गरेट थेचर के कहने पर ब्रिटिश समाज को क्या शिक्षा दी होगी? जाहिर है कि उसने तलाकरहित विवाह की शिक्षा दी होगी. वैसे, यह पूरा प्रसंग भारत की उस प्राचीन आदर्श विवाह पद्धति को ही सही सिद्ध करने के लिए गढ़ा गया है, जो अटूट, अविच्छिन्न, दैवीय  और पितृसत्तात्मक है।

लेकिन आरएसएस का आदर्श हिन्दू घर वह है, जो इसके साथ-साथ संयुक्त और वृहद परिवार वाला है. वह भारत में बढ़ते वृद्धाश्रमों और विवाह-विच्छेदों से  चिंतित है. वह इसका कारण अंग्रेजों की सत्ता को बताता है. वह लिखता है—

‘वृद्धाश्रमों की कल्पना भारतीयों ने पश्चिम से ली है. भारत पर विदेशियों के आक्रमण गत ढाई हजार वर्षों से चलते आये हैं. किन्तु अंग्रेजों के पहले के किसी विदेशी आक्रमणकारी के प्रभाव से भारतीय परिवार का व्यवहार इतना प्रभावित नहीं हुआ था, जितना अंग्रेजों के आक्रमण से हुआ. केवल वृद्धाश्रमों की संख्या में ही नहीं, अपितु विवाह-विच्छेदों की संख्या में भी अधिकाधिक गति से वृद्धि हो रही है. परिवार के सदस्यों में स्वार्थ के अधिकार के झगड़े बढ़ते जा रहे हैं. राम-भरत जैसा भारतीयों का आपस में भाईचारे का व्यवहार देशभर में घटता जा रहा है. प्रेम, सौहार्द का स्थान ईर्ष्या और कटुता ले रही है. पाश्चात्यों की संस्कृति भौतिकता-प्रधान और व्यक्तिकेन्द्रित है, उससे भारतीयों का व्यवहार प्रभावित होने से पारिवारिक व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है. हिन्दू परिवार विषयक इस लेख में हम आज के पाश्चात्यों से प्रभावित तथा पहले के हिन्दू परिवारों का विचार करेंगे.’

(वही)

पाश्चात्य संस्कृति को दोष देने से पहले आरएसएस को अपने यहाँ की महाभारत-संस्कृति में भी झांककर देख लेना चाहिए था. अगर रामचरितमानस में  राम-भरत का भाईचारा आदर्श है, तो महाभारत में भाई-भाई के बीच स्वार्थ और ईर्ष्या का भाव क्या है? अगर रामायण में हिन्दू संस्कृति है, तो क्या महाभारत में हिन्दू संस्कृति नहीं है ? महाभारत के धर्मराज के बारे में क्या ख्याल है, जो जुए में अपना सबकुछ, यानि अपनी स्त्री को भी हारकर नंगा हो जाता है? ऐसे ही राजा नल हैं. वह भी जुए में राजपाट हार कर जंगलों में भटकते हैं, और रात में अपनी सोई हुई पत्नी को अधनंगा छोड़कर भाग जाते हैं? और युधिष्ठर, जिसने अपनी पत्नी को ही जुए में दांव पर लगा दिया था, क्या यह सब हिन्दू संस्कृति के लिए आदर्श हो सकता है? अगर तब हिन्दू संस्कृति में विवाह-विच्छेद का अधिकार होता, तो क्या धर्मराज, नल और युधिष्ठर की पत्नियाँ तलाक लेकर अपना जीवन सुखमय नहीं बना सकती थीं ? वे ऐसे भोगविलासी और व्यक्ति-केन्द्रित पुरुषों को पतियों के रूप में बोझ की तरह क्यों ढोतीं ? महाभारत में जो अत्याचार द्रोपदी पर किया गया, क्या वह पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से किया गया था ? क्या जुआ, शराब और व्यभिचार के दृष्टांत प्राचीन  हिन्दू संस्कृति में पश्चिम से आए थे ? अतीत-मुग्ध आरएसएस चाहे जो कहे, पर सच यह है कि आज स्त्री अधिकारयुक्त है, जो पहले नहीं थी.

अब रहा वृद्धाश्रमों का प्रश्न, जिसे आरएसएस अंग्रेजों की देन बताता है. वह कहता है कि अंग्रेजों के आने के बाद ही भारत में वृद्धाश्रमों की संख्या में वृद्धि हुई. ठीक है, इससे पहले भारत में वृद्धाश्रम नहीं थे, परिवार ही वृद्धों की देखभाल करते थे. लेकिन यहाँ यह बता दिया जाए कि आरएसएस के इस कथन के पीछे उसकी घोर असम्वेदनशीलता है. भारत के परिवार आज भी अपने वृद्ध माँ-बाप और दादा-दादी की पूरी सेवा करते हैं. उन्हें सड़कों पर बेसहारा नहीं छोड़ देते हैं. जो औलादें अपने वृद्ध मातापिता की सेवा नहीं करती हैं, और बेसहारा छोड़ देती हैं, समाज उनकी निंदा करता है. लेकिन जो वृद्ध नि:संतान होते हैं, अथवा उनकी संतानें उनके समय में ही मर जाती हैं, और उनके पास जीने और रहने का सहारा खत्म हो जाता है, तो ऐसे असहाय वृद्धों के लिए राज्य का क्या दायित्व बनता है ? वह उन्हें ऐसे ही मर जाने दे, या उनको आश्रम में रखकर उनके भरण-पोषण की व्यवस्था करे ?

अगर सरकारें और कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं निराश्रित वृद्धों की देखभाल के लिए वृद्धाश्रमों का निर्माण करके समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करती हैं, तो भले ही यह दायित्वबोध अंग्रेजों ने दिया हो, क्या यह गलत कर्म है? क्या यह एक उपेक्षित मानवता की सेवा का काम नहीं है, जिसकी अवधारणा प्राचीन हिन्दू परिवारों में नहीं थी? पश्चिम-विरोध में वृद्धाश्रमों के प्रति आरएसएस का रवैया उसकी घोर असम्वेदना को दर्शाता है. अगर प्राचीन भारत में, जैसा कि आरएसएस मानता है, वृद्धों को अपना परिवार छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने की परिस्थिति नहीं आई थी, तो इसका यह मतलब नहीं है कि निराश्रित वृद्ध भी सुख से रहते होंगे. वे वृद्धाश्रमों के न होने के कारण और राज्य की कल्याणकारी भूमिका के अभाव में गंगा में जलसमाधि लेकर मरने के लिए चले जाते रहे होंगे, या अन्य किसी विधि से प्राण त्याग देते रहे होंगे, अथवा सड़कों पर भीख मानकर गुजारा करते रहे होंगे

वर्तमान भारतीय परिवारों के सम्बन्ध में आरएसएस कहता है–

‘आजकल भारत में परिवार शब्द आते ही सर्वसाधारण भारतीय के मनश्चक्षु के सामने जो चित्र खड़ा होता है, वह है सरकार के परिवार नियोजन विभाग द्वारा प्रकाशित किए गए भित्तिपत्रक का. उसमें एक पति-पत्नी और उनके एक कुमार और एक कुमारी दर्शायी गई है. परिवार नियोजन विभाग के ही चालीस वर्ष पहले के विज्ञापन में दो के बदले तीन बच्चे दिखाए जाते थे. ये दोनों चित्र जिसके स्मरण में हैं, ऐसे एक सयाने व्यक्ति ने अपनी ही आयु के एक दूसरे व्यक्ति से पूछा, ‘और चालीस वर्ष पश्चात इस विभाग के विज्ञापन में क्या केवल एक ही बच्चे का चित्र दिखाया जायेगा?’ दूसरे ने जवाब दिया, ‘एक बच्चे को भी दिखाने की जरूरत नहीं रहेगी.’ भारत में विवाह-विच्छेदों की संख्या में होने वाली वृद्धि की गति को देखते हुए उस व्यक्ति की टिप्पणी सार्थक लगती है.’ (वही)

इससे स्पष्ट समझा जा सकता है कि आरएसएस न परिवार नियोजन के पक्ष में है, और न तलाक के. वह बड़ा परिवार चाहता है, जिसमें ढेर सारे बच्चे हों. शायद इसीलिए भारतीय जनता पार्टी की सरकारों  में परिवार नियोजन विभाग बंद हो जाता है. इससे समझा जा सकता है कि आरएसएस और हिन्दू धर्मगुरुओं ने डा. आंबेडकर के हिन्दू कोड बिल का विरोध क्यों किया था, और क्यों उन्होंने देश भर में डा. आंबेडकर के पुतले जलाए थे. वजह, डा. आंबेडकर ने विवाह-विच्छेद का प्राविधान लाकर प्राचीन हिन्दू परम्परा को ध्वस्त करने का काम किया था. इसी वजह से वह कांग्रेस को भी माफ़ नहीं करती है, क्योंकि उसी ने संसद में हिन्दू कोड बिल को पास करवाया था, जो बाद में कानून बना था. हालाँकि परिवार नियोजन का सबसे अधिक विरोध मुसलमानों ने किया था. पर हिन्दू जनसंख्या कम न हो जाए, इस दृष्टि से आरएसएस भी उसके पक्ष में नहीं था.

प्राचीन हिन्दू परिवारों के बारे में आरएसएस सगर्व घोषणा करता है—

‘पचास-सौ वर्षों पहले के भारतीय की कल्पना, फिर वह गरीब हो या धनवान, पढ़ा-लिखा हो, या अनपढ़, देहाती हो या नगरवासी, ‘हम दो हमारे दो’ तक सीमित नहीं थी. उसकी परिवार की कल्पना में परदादा-परदादी, परनाना-परनानी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, भाई-भाभी, बहन-बहनोई, ननद-ननदोई, साला-सलहज, साली-साढू आदि सभी रिश्तेदार आते थे. इतनी विशाल संख्या वाले परिवारों से युक्त भारतीयों का समाज-जीवन गत हजारों वर्षों से सतत चलता आया है. अत: यह मानना होगा कि भारतीय समाज में ऐसे विशाल परिवार इतने दीर्घकाल तक बनाए रखने के लिए आवश्यक भौतिक सुख-संपत्ति के साधनों की योग्य व्यवस्था उपलब्ध थी. परिवार सुखी व समृद्ध थे और मन शांतियुक्त और संतृप्तिपूर्ण थे. इस वस्तुस्थिति के कारण गत कुछ वर्षों से अनेक पाश्चात्य विद्वान भारतीय परिवार व्यवस्था का अध्ययन कर भारतीयों के मन:संतोष और शांतिपूर्ण दीर्घ समाज-जीवन का रहस्य जानने का प्रयत्न कर रहे हैं.’ (वही, पृष्ठ 2-3)

अच्छा होता, अगर आरएसएस उन दो-चार पाश्चात्य विद्वानों के नामों का भी उल्लेख करता, जिन्होंने भारतीय परिवार व्यवस्था का अध्ययन कर भारतीयों के मन:संतोष और शांतिपूर्ण दीर्घ समाज-जीवन का रहस्य जानने का प्रयत्न किया है. इंटरनेट के इस युग में उन पाश्चात्य विद्वानों के शोध-कार्यों को खोजकर हम भी यह यह जान लेते कि उन्होंने क्या रहस्य ज्ञात किया है? पर अगर पश्चिम के ये विद्वान अस्तित्व में होते तो आरएसएस जरूर उनका गर्व के साथ उल्लेख करता.  लेकिन अफ़सोस, कि हकीकत में  जिन विदेशी विद्वानों ने भारतीय परिवारों के समाज-जीवन का अध्ययन किया है, उन्होंने उनकी जिहालत, अशिक्षा, गरीबी, धर्मभीरुता, छुआछूत, गन्दगी, महामारी, अकाल, भुखमरी और भाग्य भरोसे जीने के अंधविश्वासों का ही जिक्र किया है.

परदादा-परदादी, परनाना-परनानी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, भाई-भाभी, बहन-बहनोई, ननद-ननदोई, साला-सलहज, साली-साढू वाले विशाल प्राचीन परिवारों पर गर्व करने से पहले 1928 में प्रकाशित कैथरीन मेयो की किताब ‘मदर इंडिया’ को भी अगर आरएसएस के लोगों ने पढ़ लिया होता, तो उन्हें पता चल जाता कि सौ-दो सौ वर्प पहले इन विशाल भारतीय परिवारों की क्या दुर्दशा थी? तब बारह-चौदह साल की बच्चियों को माँ बनाने की परम्परा थी, और बाल मृत्यु-दर भयावह स्थिति में थी. होंगे भौतिक सुख-संपत्ति के साधनों से संपन्न मुट्ठीभर ब्राह्मणों, जमीदारों और साहूकारों के परिवार, पर विशाल भारतीय परिवारों को दो जून की रोटी भी ठीक से मयस्सर नहीं थी. अगर आरएसएस जिहालत के दौर के विशाल भारतीय परिवारों को आदर्श परिवार मानता है, तो यह अतीत को सुख और वर्तमान को दुःख कहने वाला संसार का पहला जाहिल संगठन है, जिसने लोगों को अतीत की ले जाने के लिए जानबूझकर जिहालत ओढ़ी हुई है. वह इसी जिहालत को आदर्श मनवाने के लिए गपोड़े गढ़ता है.

अपनी जिहालत को सही सिद्ध करने के लिए आरएसएस छोटे परिवारों का मजाक उड़ाता है—

‘हम दो हमारे दो वाले विज्ञापन के साथ-साथ और लिखा रहता है, ‘छोटा परिवार—सुखी परिवार.’ इस सुख से आर्थिक सुख की कल्पना प्रमुख होती है. प्रचार किया जाता है कि परिवार छोटा होने से परिवार के भरण-पोषण के लिए व्यय कम लगेगा और उससे परिवार को सुख मिलेगा. किन्तु क्या यह बात सही है? अमेरिका में अनाज का मूल्य कम न हो, इसलिए अनाज जलाया जाता है. इतनी भौतिक समृद्धि होने पर भी वहां के व्यक्ति संतोष और मन:शांति से वंचित क्यों हैं? ऐसे समय में विश्व का ध्यान हिन्दू परिवार व्यवस्था की ओर जा रहा है. अत: हिन्दू परिवार व्यवस्था के संदर्भ में जिज्ञासा होना स्वाभाविक है.’ (वही, पृष्ठ 3)

क्या दिलचस्प है ! बात भारत की करेंगे, और उदाहरण अमेरिका का देंगे. किसी समय आर्य समाज के उपदेशक स्वामी भी अपने प्रवचनों में चार-छह गपोड़े विदेशों के जरूर सुनाते थे. शायद यह आज भी हो. यह गपोड़े जब सामने बैठे श्रोता सुनते थे, तो बहुत खुश होते थे  कि अच्छा, अमरीका में ऐसा होता है ! तब तो हम बड़े अच्छे हैं ! इत्यादि. पर वे नहीं जानते थे कि उन गपोड़ों में कुछ भी सच्चाई नहीं होती थी. आरएसएस के प्रवक्ता भी यही करते हैं. उसने अमेरिका का उदाहरण तो दे दिया कि वहां अनाज जलाया जाता है, पर यह नहीं बताया कि स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान की सबसे आधुनिक खोजें अमेरिका और अन्य देशों में ही हुई हैं. रेबीज का टीका तक पश्चिम (फ्रांस) में खोजा गया, जिसका सबसे ज्यादा उपयोग भारत करता है. क्या भारत में हर वर्ष अनाज नहीं सड़ता है? उसे क्यों सड़ने दिया जाता है? उसे गरीबों को निशुल्क क्यों नहीं बांटा जाता? महामारी रोक नहीं पा रहे हैं. असमय ही बच्चों की मौतें हो रही हैं, लेकिन परिवार बड़ा चाहिए. जिस भारत के शासक गरीबों को और गरीब बनाने के किए नई-नई रिसर्च कराते हों, जिस भारत में जनता में नये-नये अन्धविश्वास पैदा करने के तरीके ईजाद किये जा रहे हों, वहाँ आरएसएस का प्राचीन आदर्श परिवार क्या गरीबों को जिन्दा मारने का षड्यन्त्र नहीं है?

(आगे हिन्दू परिवार व्यवस्था की जिज्ञासा और उसके बहिरंग पर चर्चा…)

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