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RSS को ना देश की आज़ादी से मतलब था, ना दलितों की आज़ादी से !

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पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है इस सिलसिले की  पंद्रहवीं कड़ी- संपादक


आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म–15

कँवल भारती  

 


राष्ट्रीय आन्दोलन और संघ

 

आरएसएस के राष्ट्र जागरण अभियान की तीसरी पुस्तिका का नाम ‘राष्ट्रीय आन्दोलन और संघ’ है. जैसा कि नाम से ही ध्वनित होता है, आरएसएस ने इस पुस्तिका  में राष्ट्रीय आन्दोलन यानी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका को रेखांकित करने का काम किया है.

स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लिखने वालों की यह आम धारणा है कि आरएसएस के किसी भी व्यक्ति ने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग नहीं लिया था. उसके किसी भी सदस्य का रिकार्ड न जेल जाने के बारे में मिलता है, और न फांसी खाने के बारे में. इसलिए आरएसएस ने इस धारणा के विरुद्ध इस पुस्तिका में अपनी सफाई दी है. वह ‘स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका’ शीर्षक के अंतर्गत अपनी सफाई इन शब्दों में व्यक्त करता है—

‘संघ संस्थापक डा. केशव बलिराम हेडगेवार जन्मजात देशभक्त और प्रथम श्रेणी के क्रांतिकारी थे. वे युगांतर और अनुशीलन समिति जैसे प्रमुख विप्लवी संगठनों में डा. पांडुरंग खानखोजे, श्री अरविन्द, वारीन्द्र घोष, त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती आदि के सहयोगी रहे. रासबिहारी बोस और शचीन्द्र सान्याल द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध के समय 1915 में सम्पूर्ण भारत की सैनिक छावनियों में क्रान्ति की योजना में वे मध्यभारत के प्रमुख थे. कांग्रेस उस समय स्वतंत्रता आन्दोलन का मंच था. उसमें भी उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई. 1921 और 1930 के सत्याग्रहों में भाग लेकर कारावास का दंड पाया.’ [राष्ट्रीय आन्दोलन और संघ, मेरठ प्रान्त, पृष्ठ 2]

वह आगे और भी कहता है—

‘संघ का वातावरण देशभक्तिपूर्ण था. 1926-27 में जब संघ नागपुर और आसपास तक पहुंचा था, तभी प्रसिद्ध क्रांतिकारी राजगुरु नागपुर की भोंसले वेदशाला में पढ़ते समय स्वयंसेवक बने. इसी समय भगतसिंह ने भी नागपुर में डाक्टर जी [हेडगेवार] से भेंट की थी. दिसम्बर 1928 में ये क्रांतिकारी पुलिस उपकप्तान सांडर्स का वध करके, लाला लाजपतराय की हत्या का बदला लेकर, लाहौर से सुरक्षित आ गये थे. डा. हेडगेवार ने राजगुरु को उमरेड में भैयाजी दाणी [जो बाद में संघ के अ. भा. सरकार्यवाह रहे] के फार्महाउस पर छिपने की व्यवस्था की थी.

‘1928 में साइमन कमीशन के भारत आने पर पूरे देश में उसका बहिष्कार हुआ. नागपुर में हड़ताल और प्रदर्शन करने में संघ के स्वयंसेवक अग्रिम पंक्ति में थे.’ [वही]

इस स्पष्टीकरण में हमारे काम का पैरा सिर्फ तीसरा है, जिसमें आरएसएस साइमन कमीशन के बहिष्कार में भाग लेता है, और इस काम को स्वतंत्रता संग्राम में अपने योगदान से जोड़ता है. इस पैरे में उसने अपनी स्वतंत्रता की अवधारणा को भी स्पष्ट कर दिया है. जिस तरह राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं के पास स्वतन्त्रता की कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं थी, उसी तरह आरएसएस के नेताओं के पास भी नहीं थी. वे सिर्फ इसके लिए लड़ रहे थे कि अंग्रेज चले जाएँ, और देश आज़ाद हो जाए. पर आज़ाद देश का शासन कैसा होगा? वह लोकतंत्र होगा या राजतन्त्र होगा ? राजे-रजवाड़े खत्म होंगे या बने रहेंगे? जनता को आज़ादी मिलेगी या नहीं मिलेगी? इन प्रश्नों पर किसी की राय स्पष्ट नहीं थी. आरएसएस के पास केवल हिन्दू राज की योजना थी. लेकिन साइमन कमीशन के बहिष्कार ने यह साफ़ कर दिया था कि कांग्रेस के नेताओं के साथ-साथ आरएसएस के नेता भी दलित वर्गों को राजनैतिक अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे. वे दलितों के मुद्दे पर कांग्रेस के ही साथ थे.

डा. आंबेडकर के अनुसार, कांग्रेस ने 1923 में यह प्रस्ताव पास किया था कि अछूतों की समस्या को हिन्दू महासभा अपने हाथ में लेकर हिन्दू समाज से इस कलंक को मिटाने के लिए जी तोड़ प्रयत्न करे. डा. आंबेडकर ने लिखा है, ‘अछूतों की समस्या का समाधान करने में सबसे अधिक अयोग्य अगर कोई संस्था है, तो वह हिन्दू महासभा ही है. इसका लक्ष्य एवं उद्देश्य केवल हिन्दू धर्म एवं हिन्दू संस्कृति की रक्षा करना है. यह लड़ाकू हिन्दू संगठन है. यह समाज सुधार संस्था नहीं है. यह पूर्णतया राजनैतिक संस्था है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय राजनीति में मुसलमानों के प्रभाव को समाप्त करना है.’  किन्तु कांग्रेस के प्रस्ताव के बावजूद हिन्दू महासभा ने अछूतों की समस्या का कार्य अपने हाथों में नहीं लिया, क्योंकि उसकी इसमें कोई रूचि नहीं थी.’ (बाबासाहेब डा. सम्पूर्ण वाङमय, खंड 16, पृष्ठ 25)

जो बात हिन्दू महासभा पर लागू होती है, आज यही बात आरएसएस पर भी लागू होती है. आरम्भ में हेडगेवार भी कांग्रेस में ही थे. बाद में कांग्रेस से उनके मतभेद हो गये थे. इस पुस्तिका में भी डा. हेडगेवार के सिवा, संघ के किसी अन्य प्रमुख जैसे गोलवलकर आदि के स्वतन्त्रता सेनानी होने का जिक्र तक नहीं है. हेडगेवार के स्वतंत्रता सेनानी होने के बारे में भी न जनता कुछ जानती है, और न राष्ट्रीय आन्दोलन का इतिहास उनके नाम से परिचित है. गोलवरकर तो, खैर, उस आन्दोलन को ही हिन्दूराष्ट्रवाद के विकास में बाधा मानते थे, इसलिए वह तो उसमें भाग ले ही नहीं सकते थे. अत: झूठ गढ़ने से यह ज्यादा बेहतर होता कि आरएसएस इस सच को स्वीकार करता कि वह राष्ट्रीय आन्दोलन से सहमत नहीं था, क्योंकि उसका उससे पृथक हिन्दूराष्ट्र का आन्दोलन था.

इसीलिए, स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में आरएसएस के सक्रिय होने के प्रमाण भी नहीं मिलते हैं. अलबत्ता उस दौर में हिन्दू महासभा हिन्दूराष्ट्र का राग जरूर अलाप रही थी. आरएसएस ने इस पुस्तिका में स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भागीदारी के प्रमाण में जिस तरह की घटनाओं का जिक्र किया है, उनका स्वतंत्रता संगाम से बहुत ज्यादा सम्बन्ध भी नहीं है, जैसे- महापुरुषों का समर्थन, शाखाओं पर स्वतंत्रता दिवस, संघ में  सरकारी कर्मचारियों के भाग लेने पर प्रतिबन्ध, भारत विभाजन और संघ, विभाजन काल में हिन्दुओं की रक्षा, दिल्ली की रक्षा,  कांग्रेसियों की रक्षा, नेहरु की सभा की रक्षा, दरबार साहब की रक्षा, जम्मू-कश्मीर का भारत  में विलय, हैदराबाद के विलय में योगदान, गोवा मुक्ति अभियान, दादरा नगर हवेली की मुक्ति, आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा, 1977 में इंदिरा गाँधी के विरुद्ध लोकतान्त्रिक शक्तियों को एकजुट करना, इत्यादि.

इस सम्बन्ध में शम्सुल इस्लाम ने अपनी पुस्तक ‘भारत में अलगाववाद और धर्म’ में ठीक ही लिखा है कि ‘आज़ादी के आन्दोलन में अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ संघ की हिस्सेदारी के मुद्दे पर गंभीर चर्चा तभी शुरू हुई, जब भारत में प्रधानमन्त्री के पद पर एक पुराने ‘स्वयंसेवक’ अटलबिहारी वाजपेयी 1990 के उत्तरार्द्ध में आसीन हुए. दरअसल, संघ के दस्तावेजों की गहन छानबीन के बाद भी यह बात निकलकर नहीं आती कि इसने कभी स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा लिया था.’ (पृष्ठ 155) उनके अनुसार, उस समय तक आरएसएस के अभिलेखागार में दो छोटी पुस्तिकाएँ ही इस विषय उपलब्ध थीं. एक का शीर्षक था ‘आरएसएस : ए स्टूज ऑफ ब्रिटिश’ जिसमें 20 पृष्ठ थे, और दूसरी का शीर्षक था ‘राष्ट्रीय आन्दोलन और संघ’ जिसमें कुल 18 पृष्ठ थे. दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही पुस्तिकाओं में दो तिहाई स्थान स्वतंत्रता के बाद की घटनाओं को दिया गया है, और जहाँ तक अंग्रेजी राज का सवाल है, उसके बारे में बेहद अस्पष्ट और बिना किसी सबूतों के आज़ादी के आन्दोलन में शिरकत के कुछ दावे किए गए हैं. (पृष्ठ 74) संभवता यह दूसरी पुस्तिका ही मेरे पास है, जिसमें 16 पृष्ठ हैं. 18 से 16 होना आज की कम्प्यूटर तकनीक में मुश्किल काम नहीं है. बाकी सारी बातें सही हैं. उसमें किसी भी घटना का कोई प्रमाण नहीं दिया गया है.

इस पुस्तिका में लिखा है कि ‘1921 और 1930 में डा. हेडगेवार ने कांग्रेस के सत्याग्रह में भाग लिया था और कारावास का दंड पाया था.’ किन्तु, 1925 में वह आरएसएस का निर्माण कर चुके थे और हिन्दूराष्ट्रवाद उनका एजेंडा बन चुका था. अत: 1930 में उनके सत्याग्रह में भाग लेकर जेल जाने की सम्भावना कम ही बनती है. लेकिन 1921 में वह कांग्रेस के साथ थे, और डा. शम्सुल इस्लाम के अनुसार, गाँधी जी के खिलाफत आन्दोलन के पक्ष में हेडगेवार के भाषण देने के कारण उन्हें एक साल की सश्रम कारावास की सजा हुई थी. (पृष्ठ 158)

डा. शम्सुल इस्लाम ने लिखा है कि ‘हेडगेवार ऐसे युवकों को पसंद नहीं करते थे, जो अंग्रेज सरकार के खिलाफ आज़ादी के आन्दोलन की ओर आकर्षित होते थे. उनका यह मानना था कि अपरिपक्वता की वजह से ही युवक राष्ट्रीय आन्दोलन में कूदे हुए हैं.’ (पृष्ठ 165, पिंगले, स्मृतिकण, पृष्ठ 117) उनके अनुसार गोलवलकर भी ईमानदारी से स्वीकार करते थे कि संघ अंग्रेजों की राजसत्ता का विरोध नहीं करता है. (पृष्ठ 166, और श्रीगुरुजी समग्र दर्शन, खंड 4, पृष्ठ 2)

इससे राष्ट्रीय आन्दोलन में आरएसएस की भूमिका स्पष्ट हो जाती है.

पुस्तिका के अंतिम पृष्ठ पर आपातकाल में संघ की भूमिका (आंकड़ों) में इस प्रकार दी गई है—

सत्याग्रह कर जेल गए                    1,63,900        80%  स्वयंसेवक

पुलिस द्वारा बंदी बनाये गये अन्य        44,965       35,310 स्वयंसेवक

मीसा बंदी                                       23,015       18,383 स्वयंसेवक

जीवन बलिदान                                    107              63 स्वयंसेवक

पुलिस यातनाओं के शिकार                9,500       अधिकांश स्वयंसेवक

लेकिन इन आंकड़ों का स्रोत क्या है? यह इस पुस्तिका में नदारद है.

लेकिन दलित चिंतन इस मत का है कि किसी भी संगठन का मूल्याङ्कन इस बिना पर नहीं किया जाना चाहिए कि उसने राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया है अथवा नहीं? किसी भी संगठन के मूल्याङ्कन का आधार उसकी विचारधारा और सिद्धांत होने चाहिए. यही मूल्याङ्कन का सही मानदंड है.

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