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दलितों के बौद्ध बनने पर RSS के सीने पर साँप क्यों लोटता है ?

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पाठकों को बताते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है कि अपनी सामाजिक और न्याय-दृष्टि के लिए मशहूर चिंतक कँवल भारती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्रियाकलापों पर एक विस्तृत समीक्षा लिख रहे हैं जो मीडिया विजिल में हफ़्तावार प्रकाशित हो रही है। प्रस्तुत है इस सिलसिले की  तेरहवीं कड़ी- संपादक


आरएसएस और राष्ट्रजागरण का छद्म–13

कँवल भारती 


4.

बुद्ध और आरएसएस

 

डा. विवेक आर्य आगे लिखते हैं—

‘ईसाई मिशनरी भली प्रकार जानते हैं कि गोरक्षा एक ऐसा विषय है, जिससे हर भारतीय एक मत है. …हर भारतीय गोरक्षा के लिए अपने आपको बलिदान तक करने को तैयार रहता है. उसकी इसी भावना को मिटाने के लिए वेद मन्त्रों के भ्रामक अर्थ किए गए. वेदों में मनुष्य से लेकर हर प्राणिमात्र को मित्र के रूप में देखने का सन्देश मिलता है. इस महान सन्देश के विपरीत वेदों में पशुबलि, मांसाहार आदि जबरदस्ती शोध के नाम पर प्रचारित किए गए.’ [पृष्ठ 28]

मैं यहाँ महापंडित राहुल सांकृत्यायन का मत रखना चाहता हूँ, जो संस्कृत के साथ-साथ अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे. उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘ऋग्वेदिक आर्य’ [1956] में लिखा है— ‘ऋग्वेदिक आर्य कृषि भी करते थे, लेकिन उनका सबसे बड़ा धन गौ-अश्व, अज-अवि था; इसलिए उनमें शायद ही कोई ऐसा हो, जो मांस न खाता था. बड़े-बड़े ऋषियों के लिए भी आतिथ्य करने के वास्ते मांस अत्यावश्यक चीज थी. पीछे के धर्मसूत्रकारों ने तो कहा—‘नामांसो मधुपर्को भवति’—बिना मांस के मधुपर्क नहीं हो सकता.’ [अध्याय 4, पृष्ठ 21] राहुल जी की शिक्षा ईसाई मिशन में नहीं हुई थी, बल्कि ब्राह्मण पाठशाला में ही उन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया था. वे संस्कृत के अनेक ग्रंथों के अनुवादक थे, और एक सनातनी मठ के स्वामी भी रहे थे.

ऋग्वेद की ये साक्षियां [ऋचाएं] भी ध्यान देने योग्य हैं—

  • सुदास के लिए इंद्र ने मनुष्यों में बकवादी, बहु-सन्तानी शत्रुओं को मारा. [वशिष्ठ 7/18]
  • हे इंद्र, ब्राह्मणों से द्वेष रखने वाले, मांसभक्षक राक्षसों के प्रति ऐसा व्यवहार करो, कि एक भी राक्षस जीवित न रहे. [7/104/2-3]
  • हे इंद्र, उत्साही नास्तिकों को वश में करो. नास्तिक तुम्हारी स्तुति करने वालों का अहित करता है. उसे अपने वज्र से मारो. [7/18-18]
  • हे इंद्र, हमारे चारों ओर यज्ञकर्म से शून्य, किसी को न मानने वाले, वेद-विरोधी दस्यु रहते हैं, जो मनुष्यों जैसा व्यवहार नहीं करते हैं. उनको मारो. [10/22/8]

ये साक्षियां यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि डा. आर्य के दोनों आरोप निराधार हैं. ऋग्वेद में आर्यों के मांसाहार का प्रमाण भी है, और भिन्न मत के लोगों, खासकर नास्तिकों को मारने का भी. बकवादी और अधिक संतान पैदा करने वाले भी उनके दुश्मन हैं, जैसे आज इस श्रेणी में आरएसएस की नजर में मुसलमान हैं. क्या अद्भुत संयोग है कि ब्राह्मणों का वर्चस्व कायम करने के किये उनके विरोधी राक्षसों का वध ऋग्वेदिक काल में इंद्र करते हैं और त्रेता काल में श्रीराम करते हैं. फिर भी दावा यह किया जाता है कि वेदों में प्राणिमात्र के लिए मित्रता का भाव है.

डा. विवेक आर्य आगे लिखते हैं—

’1200 वर्षों में इस्लामिक आक्रान्तों के समक्ष धर्म-परिवर्तन हिन्दू समाज में उतना नहीं हुआ, जितना बौद्धमत में हुआ. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा तक फैला बुद्धमत तेजी से लोप होकर इस्लाम में परिवर्तित हो गया. जबकि इस्लाम की चोट से बुद्धमत भारत भूमि से भी लोप हुआ, मगर हिन्दूधर्म [ने] बलिदान देकर, अपमान सहकर किसी प्रकार से अपने आप को सुरक्षित रखा. ईसाई मिशनरी ने इस इतिहास से यह निष्कर्ष निकाला कि दलितों को पहले बुद्ध बनाया जाए, और फिर ईसाई बनाना उनके लिए सरल होगा. इसी कड़ी में डा. अम्बेडकर द्वारा बुद्धधर्म ग्रहण करना ईसाईयों के लिए वरदान सिद्ध हुआ. डा. अम्बेडकर के नाम के प्रभाव से दलितों को बौद्ध बनाने का कार्य आज ईसाई करते हैं.’

डा. विवेक आर्य के इस अज्ञान पर तरस तो आता है, पर यह अज्ञान उनका नहीं है. वह तो सिर्फ आरएसएस के स्कूल के एक विद्यार्थी मात्र हैं.  अज्ञान पर अज्ञान खड़ा करके अज्ञानियों के लिए अज्ञान का जो इतिहास आरएसएस ने बनाया है, विवेक आर्य जैसे लोग सिर्फ उसकी जुगाली करते हैं. इसलिए वह पौराणिक श्रीराम को महत्व देते हैं, और ऐतिहासिक बुद्ध को नकारते हैं. कारण, आरएसएस मिथकों और किंवदन्तियों को अपना इतिहास मानता है,  जो हास्यास्पद होने के साथ-साथ खतरनाक भी है.

विवेक आर्य ने तीन बातों पर जोर दिया है—

  1. इस्लाम की चोट से बुद्ध का धर्म भारत से लोप हुआ.
  2. हिन्दूधर्म ने बलिदान देकर, अपमान सहकर किसी प्रकार से अपने को सुरक्षित रखा. और,
  3. डा. अम्बेडकर द्वारा बुद्धधर्म ग्रहण करना ईसाईयों के लिए वरदान सिद्ध हुआ.

आइए, देखते हैं कि इन दोनों बातों में कितनी सच्चाई है? इसमें संदेह नहीं  कि भारत में बौद्धधर्म का पतन मुसलमानों के हमलों  के कारण हुआ. इस्लाम बुतशिकन के रूप में आया था. इसलिए उसने हर जगह बुतों को तोडा. बुतशिकन ही उसका मिशन था.  किन्तु इस दृष्टि से इस्लाम ने सिर्फ बौद्धधर्म पर ही नहीं, हिन्दू धर्म पर भी हमला किया था. उसने बुद्धमन्दिरों के साथ-साथ हिन्दूमन्दिरों को भी जमीदोज किया था. पर बौद्धधर्म चूँकि नास्तिक भी था, और किसी आसमानी किताब को नहीं मानता था, इसलिए मुसलमानों के निशाने पर वह सबसे ज्यादा था. इसी वजह से हिन्दूधर्म तो जीवित रहा, पर बौद्धधर्म नष्ट हो गया. लेकिन हिन्दूधर्म के जीवित रहने का यही एक कारण नहीं था, बल्कि उसका बड़ा कारण यह था कि ब्राह्मण शासकों ने हिन्दू धर्म को संरक्षण दिया था. उन्होंने बौद्ध गृहस्थों पर इतने अत्याचार  किए थे कि अत्याचारों से बचने के लिए वे बौद्धधर्म छोड़कर मुसलमान बन गए थे. इस तरह भारत में एक बड़ी आबादी ने आत्मरक्षा के लिए ही इस्लाम में धर्मान्तरण किया था. [देखिए, [Dr. Babasaheb Ambedakr : Writtings and Speeches, Vol. 3, pages 229-238]

185  ईसा पूर्व में पुष्यमित्र की ब्राह्मण-क्रान्ति बौद्धधर्म के विरुद्ध ही हुई थी. इसी काल में ब्राह्मण-संहिता–मनुस्मृति का निर्माण हुआ था. पुष्यमित्र ने बौद्ध मठों को गिरवाया, और बड़े पैमाने पर बौद्धों का कत्लेआम कराया था. मनुस्मृति में इस ब्राह्मणक्रान्ति का पूरा वर्णन मिलता है. इसलिए बौद्धधर्म पर हमला सिर्फ मुसलमानों ने ही नहीं किया था, बल्कि उनसे पहले ब्राह्मण सत्ता भी उस पर हमले कर चुकी थी. सिन्ध [712 ई,] और पंजाब [880 ई.] में  क्रमशः शूद्र और बुद्धिस्ट राजवंश थे, जिन्हें ब्राह्मणों ने नष्ट करके वहां ब्राह्मण राज कायम किया था. मध्य भारत में राजपूतों का राज रहा, जो ब्राह्मणवाद के पोषक थे. बंगाल में पाल और सेन राजवंश थे, जो क्रमशः क्षत्रिय और ब्राह्मण थे. दक्षिण में चारों राजवंश—चालुक्य, चोल, सिलहरा और गंगा, [1000- 1200 ई.] भी ब्राह्मणवादी थे. उत्तर भारत में हूण राजा [528 ई.] मिहिरकुल, जिसका राज्य वर्तमान स्यालकोट में था, बौद्धों के खून का प्यासा था. उसने पूरी क्रूरता से बौद्धस्तूपों और मठों को नष्ट किया था. दूसरा राजा पूर्वी भारत में शशांक था, जो शैव था, और बौद्धधर्म से घृणा करता था. उसने बोधगया के बोधिवृक्ष को उखाड़ कर जलवा दिया था. उसके अत्याचारों से बचने के लिए बौद्धभिक्षु भागकर नेपाल की पहाड़ियों में चले गए थे. सम्पूर्ण  भारत में राज करने वाले सभी राजा-महाराजा ब्राह्मणवाद में आस्था रखने वाले थे. मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध इन्हीं राजाओं ने ब्राह्मणों को पूरा संरक्षण दिया था. यही नहीं, हिन्दू राजाओं और ब्राह्मणों ने अपने धर्म को सुरक्षित रखने के लिए मुस्लिम शासकों से संधि के साथ-साथ समर्पण भी किया था.  किन्तु मुस्लिम आक्रमण से बचने के लिए बौद्धधर्म को ऐसा कोई संरक्षण नहीं मिला, परिणामत: वह नष्ट हो गया. [वही]

श्री संतराम बी. ए. ने लिखा है कि ‘जब तक भारत में बौद्धधर्म का प्रचार रहा, यह देश स्वतंत्र और सबल बना रहा. तब भी विदेशी आक्रमणकारियों के लिए यह देश उसी तरह खुला पड़ा था, जैसा कि आज है. परन्तु यह इतना बलवान था कि किसी को भी इसकी ओर आँख उठाकर देखने का साहस न होता था. कोई 1200 वर्ष तक भारत स्वाधीन और अखंड बना रहा.’ [हमारा समाज, पृष्ठ 221]

अब रहा यह सवाल कि हिन्दू धर्म क्यों जीवित रहा? निस्संदेह वह जीवित रहा है, पर महत्वपूर्ण यह है कि वह किस तरह जीवित रहा है? क्या वह बलिदान देकर जीवित रहा है? या अपमान सहकर? वह इन दोनों तरह से जीवित नहीं रहा है, बल्कि वह ताकतवर के सामने समर्पण करके और परिवर्तन को कुचलकर जीवित रहा है. उसके जीने का मुख्य मन्त्र है, हिन्दू व्यवस्था को हर कीमत पर बनाए रखने का संकल्प. इसलिए जिस क्रान्ति ने भी हिन्दू व्यवस्था में थोड़ा सा भी परिवर्तन लाने की कोशिश की, ब्राह्मणों ने उसे दबाने के लिए अपना सारा जोर लगा दिया. यही नहीं, जब भी दलित जातियां हिन्दू व्यवस्था के खिलाफ खड़ी हुईं, तो हिन्दुओं ने उनको कुचलने के लिए किसी भी हद से गुजरने से गुरेज नहीं किया. वे हिन्दू भी, जो आम तौर से अहिंसक होते हैं, दलितों के विरुद्ध हिंसा करने में संकोच नहीं करते. उन्होंने आजीवकों की क्रांति को कुचला, चार्वाकों को खत्म किया, बुद्ध की क्रान्ति को प्रतिक्रान्ति में बदला, कबीर-रैदास की निर्गुणधारा के खिलाफ सगुणवाद की धारा चलाई, और अब संविधान के धर्मनिरपेक्षता  आधारित लोकतंत्र के खिलाफ हिंदुत्व का राष्ट्र कायम करने के लिए वे सारी हदें पार कर रहे हैं. मध्यकाल में मुसलमान उनसे ताकतवर थे, सो उनके साथ उन्होंने समझौता और समर्पण करके अपनी धर्म-व्यवस्था को बचाया. इसी संधि और समर्पण के बल पर मुसलमानों ने आठ सौ साल तक भारत पर राज किया. लेकिन अंग्रेजों ने क़ानून के सामने सबको बराबर करके हिन्दू-मुसलमान दोनों समुदायों के उच्च वर्गों को भड़का दिया, जब सुधारों के द्वारा अंग्रेज सरकार ने सबको शिक्षा का अधिकार दिया, जिससे दलित वर्गों को भी पढने का अवसर मिला, और छुआछूत निवारण का कानून बनाया, तो देश भर के ब्राह्मण, सामंत और उच्च वर्गों ने विद्रोह कर  दिया. 1857 के गदर की पृष्ठभूमि यही थी. अगर मुसलमान शासकों की तरह अंग्रेज भी ब्राह्मणों की धर्मव्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं करते, तो वे भी एक हजार साल तक भारत पर राज करते. अंग्रेज चले गए और हिन्दू धर्म बच गया. हिन्दूधर्म के बचने का यही सत्य है.

डा. आंबेडकर ने ठीक ही सवाल उठाया था, जो आज भी आरएसएस से पूछा जाना चाहिए कि हिन्दू धर्म और हिन्दू सभ्यता, जो इतनी प्राचीन और श्रेष्ठ है कि अब तक बनी हुई है, तो इस सभ्यता का योगदान क्या है? इस सभ्यता के गुण क्या हैं? अगर यह किसी भी तरह जीवित रही है, तो किस विशेषता के साथ जीवित रही है? क्या यह सामाजिक विरासत के रूप में एक बोझ है या लाभ है? वर्गों और व्यक्तियों के विकास में इसका क्या योगदान रहा है? इस सभ्यता ने उन आदिम जनजातियों को क्या दिया है, जो इसकी परिधि में रह रही हैं?  इस सभ्यता ने उन लाखों जरायम पेशा जातियों को क्या दिया है, जो इसके बीच में रह रही हैं? इस सभ्यता ने उन करोड़ों दलितों को क्या दिया, जो न केवल उसके बीच रह रहे हैं, बल्कि उन्हें इसे सहन भी करना पड़ रहा है? इस सभ्यता ने उनको क्या दिया है, जो वे इस पर गर्व करें? [वही, Vol. 5, Civilization or Felony, p. 136, 138]

डा. विवेक आर्य का तीसरा झूठ यह है कि डा. अम्बेडकर द्वारा बुद्धधर्म ग्रहण करना ईसाईयों के लिए वरदान सिद्ध हुआ. इसे वह इन शब्दों में व्यक्त करते हैं—

‘डा. आंबेडकर के नाम के प्रभाव से दलितों को बुद्ध बनाने का कार्य आज ईसाई करते हैं. इस कार्य को सरल बनाने के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों में महात्मा बुद्ध और बुद्ध मत पर अनेक पीठ स्थापित किए गए. यह दिखाने का प्रयास किया गया कि भारत का गौरवशाली इतिहास महात्मा बुद्ध से आरंभ होता है. उससे पहले भारतीय जंगली, असभ्य और बर्बर थे. पतंजलि योग के स्थान पर बुद्धिस्ट ध्यान अर्थात विपश्यना को प्रचलित किया गया. कुल मिलाकर ईसाई मिशनरियों का यह प्रयास दलितों को महात्मा बुद्ध के खूंटे से बाँधने का था.’ [द.आ.प., पृष्ठ 29]

इसमें बुद्धधर्म को दलितों का खूंटा कहा गया  है. आरएसएस से इससे परे सोचने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती.  खूंटे का मतलब है गुलामी. जैसे जानवरों को  खूंटे से बाँधा जाता है, वैसे ही आरएसएस भी दलितों को जानवर ही समझता है, जो उन्हें हिंदुत्व के खूंटे से बांधकर रखना चाहता है. लेकिन वह यह क्यों नहीं बताता कि हिंदुत्व के खूंटे ने दलितों को क्या गौरव दिया है? ब्राह्मणों ने सदियों से दलितों को हिन्दूधर्म के खूंटे से ही बाँध कर जानवरों की तरह रखा है, और हमेशा उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया है. अब अगर वे बौद्ध बन रहे हैं, तो जाहिर है कि वे हिन्दू वाड़े में जानवरों की तरह बंधकर नहीं रहना चाहते. तब आरएसएस के सीने पर सांप क्यों लोट रहा है? क्या बौद्धधर्म भारतीय धर्म नहीं है? क्या भारत बुद्ध का देश नहीं है? वे क्या  किसी मुस्लिम देश से आए थे? आरएसएस समझता है कि दुनिया  में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, वह हिंदुत्व ही है. यह उसकी झूठी और हास्यास्पद कल्पना है कि हिन्दुओं से श्रेष्ठ कोई नहीं है और हिन्दू धर्म-दर्शन ही दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म-दर्शन है. इसी झूठी अहमन्यता में वह विपश्यना को वे ऐसे देख रहे हैं, जैसे वह ध्यान की पद्धति न होकर कोई इस्लामिक जिहाद हो, जिसने आरएसएस की बिल्डिंग को चारों ओर से घेर लिया है. अपने को श्रेष्ठ समझने की यह झूठी अहमन्यता उतनी ही खतरनाक है,  जितनी उस मुस्लिम हमलावर की यह झूठी अहमन्यता थी कि कुरआन के सिवा सब बेकार है, और उसने इसी बिना पर नालंदा विश्वविद्यालय को जलाकर ख़ाक  कर दिया था.

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