Home पड़ताल CAA, NRC और NPR की जनमानस में भूमिका और सत्ता की मंशा

CAA, NRC और NPR की जनमानस में भूमिका और सत्ता की मंशा

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देश के गृहमंत्री ने कहा – पहले नागरिकता संशोधन कानून आएगा और फिर राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर। वोटर आई कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस,राशन कार्ड या पासपोर्ट आदि, किसी नागरिक की नागरिकता के पहचान के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। उन्होंने यह भी कहा है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को पूरे देश में लागू किया जाएगा। इन मुद्दों को लेकर देशव्यापी रोष देखा गया। संघर्ष और प्रतिरोध अभी भी जारी है। जन आक्रोश को देखते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) की चर्चा न तो कैबिनेट बैठक में हुई और न ही सरकार ने संसद में चर्चा के लिए प्रस्तावित किया है। लेकिन इसी बीच सरकारी एजेंसियों ने राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर (NPR) बनाने का काम शुरू कर दिया। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि नागरिकता संशोधन कानून,राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तथा राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर में क्या संबंध है? इनको लेकर नागरिक समाज में गुस्सा और आक्रोश क्यों है?

पहली बात तो यही कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री में कोई एक झूठ बोल रहा है और नागरिक समाज को चिंतित होने के लिए यह काफी है। दूसरा, असम प्रदेश में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) बनाने का अनुभव खासा कड़वा और अमानवीय साबित हुआ है। इसके तहत अचानक से 19 लाख लोग अपनी नागरिक पहचान खो चुके हैं। इनमें लगभग 12 लाख से ज्यादा वे लोग हैं जिन्हें हिन्दू समाज में विभिन्न जातियों के रूप में बनाए रखने की कोशिश की जाती रही हैं। बहुतायत दलित,आदिवासी,पिछड़े तथा सामान्य वर्ग के गरीब लोग हैं। केवल 4 लाख से कुछ ज्यादा लोग मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी जिस अन्य को टारगेट कर यह खेल शुरू हुआ वह अपने परिणाम में उल्टा असर किया।

नागरिक संशोधन कानून (CAA) क्या है ?

कहा जा रहा है कि इसके तहत तीन देशों अफगानिस्तान,पाकिस्तान और बँगलादेश देश के प्रताड़ित धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को भारतीय नागरिकता देने में सहूलियत होगी। नागरिकता देने में मौजूद कानून काफी समय लेता है। यह तर्क बेबुनियाद है और संविधान की मूल आत्मा अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है। दरअसल अभी तक किसी भी अन्य मुल्क के नागरिक को भारतीय नागरिकता देने की अपनी प्रक्रिया थी। एक निश्चित अवधि के बाद व्यक्ति भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करता था और प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे भारतीय नागरिकता दे दी जाती थी। लेकिन मौजूदा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) धर्म को आधार बनाकर लाया गया है। अर्थात उक्त तीन देश से आए हुए गैर मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय मसलन हिन्दू,सिख,ईसाई,जैन,पारसी और बौद्ध आदि तो भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और धर्म के आधार पर भेद-भाव करने वाला प्रावधान है। इससे पड़ोसी मुल्कों से रिश्ते पर भी असर पड़ सकता है तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के बीच भी हमारी साख गिर सकती है।

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) तथा राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर (NPR) का निहितार्थ…

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) के तहत भारतीय नागरिक की पहचान के लिए सिर्फ और सिर्फ पूर्वजों के नाम जमीन-जायदाद के कागज़ात होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई पहचान पत्र भारतीय नागरिकता को साबित नहीं कर सकते। यह वह प्रमुख बिंदु है जिसने भारतीय जन-मानस को झकझोरा है।

8 नवंबर 2016 की रात अचानक नोटबंदी का ऐलान हुआ। 1000 और 500 के नोट मिनटों में कूड़े के ढेर में बदल गए। इसी तर्ज पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर ( NRC) के तहत अचानक से भारतीय नागरिकों की नागरिकता संदिग्ध हो जाती है। ख़त्म हो जाती है। जो अभी तक भारतीय नागरिक के तौर पर जाने जाते थे , वे अब भारतीय नागरिक नहीं रहे। उनके आधार-कार्ड,वोटर-कार्ड,राशन-कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि झटके में अपना मूल्य खो बैठते हैं। जमीन-जायदाद के कागजात जुटाना,संभालना और सुबूत के बतौर पेश करना निहायत जरूरी हो जाता है।

यह मसला नागरिकों के मान-अपमान से भी जुड़ जाता है। अपने ही नागरिकों से नागरिकता सिद्ध करने के लिए जमीन के कागज़ात पेश करवाना अपने ही नागरिकों को भयभीत तथा अपमानित करना भी है। भारतीय दफ्तरशाही की कार्यप्रणाली से हम सब वाकिफ़ हैं। बाबू से लेकर साहब तक पैसों का खुल्लमखुल्ला खेल होगा। नोटबंदी भी इसका प्रमाण है। लोगबाग अपने काम-धंधे छोड़कर दफ्तरों के चक्कर लगाएँगे। इसके बावजूद यदि फिर भी किसी का नाम रजिस्टर में शामिल नहीं होगा तो उसके पास ट्रैब्यूनल में जाकर अपील करने का अवसर होगा। वकील कीजिए। उसकी फीस दीजिए। कोर्ट-कचहरी भाग-दौड़ कीजिए और नागरिकता साबित कीजिए। अर्थात जो पैसा व्यक्ति को अन्य काम पर खर्च करना था वह अब नागरिकता के लिए खर्च करेगा। इसके बावजूद नाम की स्पेलिंग में त्रुटि से लेकर अन्य परेशानियों से कोई इनकार नहीं कर सकता। यह बात उस पर लागू होती है जिसके पास जगह-जमीन है।

आदिवासी, दलित, महिला आदि की हालात

यहाँ गौरतलब यह है कि भारत जातियों का देश है। यहाँ जातियाँ रहती हैं। आधी आबादी अर्थात महिलाओं की भी जातियाँ होती हैं। दलित समुदाय के बहुत से उपजातियों के पास तो अपना शारीरिक श्रम के अलावा और कोई पूँजी है ही नहीं। लाखों की सँख्या में घुमन्तु जातियाँ निवास करती हैं। खानाबदोश जीवन जीते हैं। आज यहाँ तो कल वहाँ। आदिवासी समुदाय का तो जल-जंगल-जमीन ही उसकी पहचान है। 2006 के वन कानून में भी संशोधन कर उन्हें बेदखल कर दिया गया। उनके पास कोई कागजात नहीं है। ऐसे लोगों का क्या होगा ? महिलाओं का क्या होगा ? भूलना नहीं चाहिए कि भारत एक पितृसत्तात्मक समाज भी है। अपवादों को यदि छोड़ दिया जाय तो जमीन-जायदाद प्रायः पुरुषों के नाम पर ही होते हैं। ऐसे में महिलाओं को अपनी नागरिकता सिद्ध करने में पुरूषों से अधिक कठिनाई का सामना करना होगा। खासकर गरीब और बहुजन महिलाओं को। सवाल है कि वर्तमान हालात की तस्वीर कैसी होगी ? क्या उन्हें नागरिकता मिलेगी या उन्हें डिटेंशन सेंटर भेजा जाएगा?

यह मान भी लिया जाए कि उन्हें भारतीय नागरिकता दे दी जाएगी जैसा कि दावा किया जा रहा है। पर सवाल है कि कैसे ? क्या यह कहा जाएगा कि यदि आपको नागरिकता लेनी है तो बांग्लादेश,पाकिस्तान या अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यक हिन्दू का अनिवार्य ‘कॉलम’ भरना होगा। और फिर उनकी सामाजिक स्थिति क्या होगी ? क्या वर्णाश्रम अर्थात भारत की जातिगत ढाँचे में उन्हें ऊपरी क्रम में जगह मिलेगी या निचली क्रम में ? दूसरे, यह भी संभव है कि उन्हें डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाए। आखिर असम की स्थिति हमारे सामने है। सवाल है कि डिटेंशन सेंटर में उनकी स्थिति क्या होगी ? क्या हिटलर की माफ़िक जहरीले गैस छोड़कर उन्हें मार दिया जाएगा ? या गुलामों के माफ़िक उनसे श्रम करवाया जाएगा ? स्थिति जो भी हो, यह अमानवीय ही नहीं अपितु वास्तविक नागरिक के हक-हुक़ूक़ पर प्राणघातक हमला है। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस बीच राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर (NPR) बनाने का काम शुरू हो गया है। घर-घर जाकर डाटा इक्कट्ठा किया जा रहा है। निश्चित तौर पर ‘राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर’ का यह डाटा ‘राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC)’ की नींव बनेगा।

मोदी सरकार के इन फैसलों के निहितार्थ…..

दरअसल पिछले छह साल से चल रही वर्तमान मोदी सरकार हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। नोटबंदी ने 94% असंगठित क्षेत्र के कारोबार को चौपट कर दिया है। जीएसटी ने लघु और मझोले किस्म के व्यापार को मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया। कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों के लिए खज़ाना खोल दिया गया है। सरकारी निगम औने-पौने कीमत पर या तो बेचे जा रहे हैं या बंद किए जा रहे हैं। सरकारी उद्यम को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। रोजगार,शिक्षा और स्वास्थ्य के सवालों पर सरकार घिरी हुई है। विद्यार्थियों के फीस में बेतहाशा वृद्धि हुई है। महंगाई काबू से बाहर है। किसान आत्महत्याएँ करने पर मजबूर हैं। शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार के बजट में लगातार कटौती की जा रही है। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर,राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर तथा डिटेंशन सेंटर के लिए बजट आबंटित किए जा रहे हैं। टैक्सपेयर के पैसे को शिक्षा और रोजगार पर खर्च न कर डिटेंशन सेंटर के निर्माण के लिए आबंटित किया जा रहा है।

ऐसे में इन ज्वलंत मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ‘अन्य (others)’ का निर्माण सरकार और सत्ता का आजमाया हुआ नुख्सा है। ‘अन्य’ के रूप में अल्पसंख्यक मुसलमान सबसे आसान चारा है। यही फासीवाद का उद्गम भी है। आवाम को यह भरोसा दिलाया जाता है कि आपकी समस्या के लिए सरकार या सत्ता जिम्मेदार नहीं है अपितु यह ‘अन्य’ जिम्मेदार है। फिर आम जनमानस वास्तविक मुद्दों से भटककर भावनात्मक मुद्दों के रौ में बह जाता है। इस तरह सत्ता-संरचना अपना बचाव करने में असफल कोशिश करता है।

प्रतिरोध,संघर्ष और विरोध की संभावना

आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर विफल सरकार को घेरने का काम विपक्षी पार्टियों का दायित्व है। पर वर्तमान दौर में विपक्ष अपने अंतर्विरोधों के कारण या तो मरणासन्न है या फिर समर्पण की मुद्रा में है। ऐसी स्थिति में देश के नामचीन विश्वविद्यालयों के ज्ञानवान और ऊर्जावान युवाओं ने विपक्ष की भूमिका सँभाली है। कॉलेज और विश्वविद्यालय के परिसरों से लेकर सड़क तक अपने रचनात्मक प्रतिरोध और नारों से समाज को आशान्वित किया है। नागरिक समाज के आम जन से लेकर बुद्धिजीवियों तक ने युवाओं के इस आंदोलन को दिशा देने का काम कर रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन और समाज को जीवंत बनाए रखने की उम्मीद जगाई है। वे मुखर रूप से आंदोलनों का नेतृत्व कर रही हैं। जामिया,जेएनयू , दिल्ली विश्विद्यालय और बीएचयू जैसे विश्वविद्यालयों ने सरकार और सत्ता की चूलें हिलाई हैं। पिछले तीन वर्षों में कम से कम तीन बड़े आंदोलन के साक्षी विश्वविद्यालय और आम समाज रहा है। एससी-एसटी के खात्मे के विरोध में 2 अप्रैल 2018 का भारत बंद। रोस्टर/आरक्षण को लागू करने के लिए 5 मार्च 2019 का भारत बंद। और तीसरा, नागरिकता संशोधन कानून,राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तथा राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर (NPR) के विरोध में नवंबर-दिसंबर 2019 से शुरू हुआ आंदोलन।

यह सिर्फ हिदू-मुसलमान का नहीं है बल्कि सभी अमनपसंद और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगों मामला है। जम्हूरियत बचाने का मामला है। संविधान बचाने का मामला है। समावेशी समाज के स्वप्न देखने का मामला है। और सबसे बढ़कर मनुष्य को मनुष्य के तौर पर सम्मान देने और सम्मान पाने का सवाल है।


डॉ. देव कुमार राजधानी कॉलेज, (डीयू ) में सहायक प्रोफेसर हैं. 

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