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समझिए, उच्च शिक्षा में रोस्टर का खेल! यूँ ही नहीं सुलग रहा है गुस्सा!

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देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में अचानक नियुक्तियों के विज्ञापन निकलने लगे हैं। आरोप लग रहा है कि ऐसा  एस.सी./एस.टी और ओबीसी के आरक्षण को बेमानी बनाने के लिए किया जा रहा है। दरअसल, पिछले दिनों यूजीसी ने एक नोटिफिकेशन निकालकर संस्थान की जगह विभाग को आरक्षण के लिए इकाई मानने का निर्देश दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि तीन पद तक कोई आरक्षण संभव ही नहीं रहा। चार पद होने पर एक ओबीसी, सात पद निकलने पर एक एस.सी और 14 पद पर एक एस.टी को आरक्षण मिलेगा। हक़ीक़त यह है कि विभागों में एक साथ दो-तीन पद से ज़्यादा शायद ही निकलते हों। हाल में जिस तरह शिक्षकों के पद विज्ञापित हो रहे हैं, उससे इस आरोप में दम लग रहा है। इस पूरे दुश्चक्र को समझने के लिए पढ़िए  लक्ष्मण यादव  का यह लेख- संपादक 

 

उच्च शिक्षा का चरित्र मूलतः जातिवादी है। इसे कई स्तरों पर समावेशी व सामाजिक न्याय परक होना था, जो कभी हुई ही नहीं. देश के वंचितों-शोषितों की बहुसंख्यक आबादी अव्वल तो उच्च शिक्षा तक कभी पहुँच ही नहीं पाई। अव्वल तो ये कि इंदिरा साहनी केस, सब्बरवाल केस, वी. नागराज केस जैसे न्यायिक संघर्षों की एक लम्बी लड़ाई के बाद उच्च शिक्षा जैसे सत्ता-प्रतिष्ठानों में आरक्षण लागू होने में ही पाँच दशक बीत गए. आज़ादी के पचास साल तक इन शिक्षण संस्थानों पर जन्मजात मेरिटधारी सवर्ण जातियों का ही कब्जा रहा. आरक्षण की ज़रूरत ऐसे ही अमानवीय और अन्यायप्रिय लोगों के कारण पड़ी। तब 1997 में SC-ST आरक्षण और 2007 में जाकर OBC आरक्षण उच्च शिक्षा में लागू किया गया। तब से दो स्तर पर साज़िशें हुईं- पहला ये कि उच्च शिक्षा में निजीकरण किया जाने लगा और दूसरा ये कि स्थाई नियुक्तियों की प्रक्रिया में कमोबेश विराम सा लगा दिया गया।

सामाजिक प्रतिनिधित्व में 1931 की जाति-जनगणना के आंकड़ों की बुनियाद पर SC 15%, ST 7.5%, OBC 52% आबादी का विभाजन कुछ इस प्रकार है, जो आज कम से कम 85% आबादी को कवर करता है. अब इनके उच्च शिक्षा में हिस्सेदारी का आज 2018 का आंकड़ा कमोबेश कुछ इस प्रकार हैं कि

15% आबादी वाले SC 7%
7.5% आबादी वाले ST 2.12%
54% आबादी वाले OBC 5%
15% आबादी वाले सवर्ण 85%

आरक्षण लागू होने के बाद पदों के क्रम-विभाजन को ही ‘रोस्टर’ कहा गया. अब पहली बार रोस्टर ऐसा बना, जिससे कुछ सीटें 85% आबादी वाले आरक्षित वर्ग को मिलीं. इसका वितरण को समझें. माना कि कुल पदों की संख्या 100 है. अब रोस्टर का विभाजन इस प्रकार होगा-

ST का आरक्षण 7.5% है. 100/7.5=13.33 यानी हर 14वाँ पद ST को आरक्षित होगा.
SC का आरक्षण 15% है. 100/15=6.66 यानी हर 7वाँ पद SC को आरक्षित होगा.
OBC का आरक्षण 27% है. 100/27=3.70 यानी हर चौथा पद OBC को आरक्षित होगा.

ताज़ा मामला ‘असंवैधानिक’ विभागवार रोस्टर प्रणाली के लागू किये जाने का है. प्रावधान यह रहा कि विश्वविद्यालय/कॉलेज को एक इकाई मानकर पदों के सृजित होने की तिथि के बढ़ते क्रम से रोस्टर को फिक्स्स किया जाएगा. लेकिन बीएचयू के एक शोधछात्र की पहल पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकल बेंच ने एक फैसला सुनाया कि विश्वविद्यालय/कॉलेज वार रोस्टर प्रणाली लागू होगी, जिसे 13 प्वाइंट रोस्टर भी कहा जाता है.

इस आरक्षित क्रम-विभाजन के बाद रोस्टर क्रम और पदों के आरक्षण की रोस्टर सूची इस प्रकार होगी-
1 – UR
2 – UR
3 – UR
4 – OBC
5 – UR
6 – UR
7 – SC
8 – OBC
9 – UR
10 – UR
11 – UR
12 – OBC
13 – UR
14 – ST
15 – SC

 

जिन विभागों में 15 से अधिक पद होंगे, या विश्वविद्यालय अथवा कॉलेज को एक इकाई मानते, तो वहाँ यही क्रम-रोस्टर 200 की संख्या तक चलता है. यानी 200 के क्रम में पदों की सृजित तिथि से क्रमवार आरक्षित पद फिक्स्ड होते जाते और कमोबेश 50% आरक्षण लागू हो जाता. यहाँ यह याद दिलाते चलें, कि 1997 के पहले तक ये पूरा रोस्टर सैद्धांतिक व व्यावहारिक दोनों तौर पर UR हुआ करता था, जबकि उच्च शिक्षा में वाया साक्षात्कार इसे सवर्णों के लिए आरक्षित मानकर लगभग सभी पदों पर सवर्ण अभ्यर्थी की ही नियुक्ति की जाती रही. एकाध अपवादों को छोड़कर. यानी सवर्णों को 100% आरक्षण.

आइये! अब ये समझें कि कैसे ताज़ा विभागवार (13 प्वाइंट) रोस्टर आरक्षण विरोधी और असंवैधानिक है-

1. विभागवार रोस्टर का पहला खेल समझते हैं. इस विभाजन को अब दो स्तरों से समझें. मसलन किसी नए कॉलेज या विभाग में यदि कुल 3 पद ही होंगे, तो तीनों पद रोस्टर में UR होंगे. यही है पहला और सबसे ख़तरनाक खेल, जिसमें विभागवार रोस्टर बनाने से हमेशा के लिए ये आसानी हो जाएगी कि हर विभाग में 3 या 3 से कम पदों को विज्ञापित किया जाएगा और आरक्षित पदों का क्रम कभी आ ही नहीं सकेगा. अब जिन विश्वविद्यालयों में नए विज्ञापन आ रहे हैं, वे सब इसी विभागवार रोस्टर से आ रहे हैं. जहाँ आरक्षित पद कभी आ ही नहीं सकेंगे. यदि कॉलेज/विश्वविद्यालय को एक इकाई माना जाता, तो यह खेल कभी नहीं संभव होता. क्योंकि तब यह 200 तक चलता और कुल मिलाकर आरक्षण पूरा होता.

2. विभागवार रोस्टर का दूसरा खेल समझते हैं. यदि किसी विभाग में कुल 15 पद स्वीकृत होंगे, तब जाकर वितरण कुछ इस प्रकार होगा- 1 ST, 2 SC, 3 OBC, 9 UR. अब यहाँ भी आरक्षण का कुल प्रतिशत हुआ 15 में 6 पद आरक्षित यानी 40% आरक्षण. इस लिहाज़ से कभी संवैधानिक आरक्षण तो लागू ही नहीं हो सकेगा. यदि कॉलेज/विश्वविद्यालय को एक इकाई माना जाता तो आरक्षण कमोबेश 50% तक मिल तो जाता.

3. विभागवार रोस्टर का तीसरा और सबसे खतरनाक खेल देखिये. माना कि एक पुराने हिंदी विभाग में कुल 11 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 8 पदों पर आरक्षण लागू होने का पहले ही नियुक्तियाँ हो चुकी हैं, तो ये सभी सवर्ण यहाँ पढ़ा रहे हैं. अब आरक्षण लागू किया गया, तो इन आठ में से चौथा और आठवाँ पद OBC को और सातवाँ पद SC को जाएगा, जिसपर पहले से कोई सवर्ण पढ़ा रहे हैं. अब नियमतः ये तीनों पद ‘शार्टफ़ॉल’ में जाएगा और आगामी विज्ञप्ति में नव-सृजित नवें, दसवें ग्यारहवें तीनों पद इस ‘शार्टफ़ॉल’ को पूरा करेंगे. लेकिन देश के हर विश्वविद्यालय में मनुवादियों ने शार्टफ़ॉल को लागू ही नहीं किया, और नियम बना दिया कि चौथे, सातवें और आठवें पदों पर काम करने वाले सवर्ण जब सेवानिवृत्त होंगे, तब जाकर इनपर आरक्षित वर्ग के कोटे की नियुक्ति होगी. यानी ‘शार्टफ़ॉल’ लागू ही नहीं किया गया, जिससे आरक्षण कभी पूरा होगा ही नहीं और सीधे हज़ारों आरक्षित पदों पर सवर्णों का ही कब्ज़ा होगा.

4. अंतिम साज़िश ये कि यदि किसी विश्वविद्यालय/कॉलेज में अगर 1997 के बाद से SC-ST की और 2007 के बाद से OBC की कोई नियुक्ति नहीं हुई है और पहली बार 2018 में अगर विज्ञापन आयेगा, तो इस बीच के पदों में जो ‘बैकलाग’ होगा, उन्हें पहले भरा जाएगा. लेकिन जब रोस्टर ही विभागवार बनेगा, तो न तो ‘शार्टफ़ॉल’ लागू होगा और न ‘बैकलाग’. यानी आज की तिथि में ही आरक्षण मिलेगा, जो कभी 49.5% भी पूरा नहीं हो पाएगा.

5. ध्यान रहे कि उच्च शिक्षा में UR कैटेगरी को हमेशा सामान्य माना गया, यानी साक्षात्कार के ज़रिये होने वाली नियुक्तियों में कभी गैर-सवर्ण की नियुक्ति अपवाद ही रही. आसान भाषा में समझें तो 15% सवर्णों के लिए 50.5% आरक्षण. 1931 की जाति-जनगणना और 1980 के मंडल कमीशन के सैम्पल सर्वे से OBC की जनसंख्या 52% है, लेकिन इन्हें आरक्षण 27% ही मिला है. ऐसे में पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्त्व तो कभी पूरा हो ही नहीं सकेगा. ऐसे ही PwD, अल्पसंख्यक और महिलाओं की स्थिति तो और भी भयावह होगी.

यह है उच्च शिक्षा का मूल चरित्र. इसकी एक एक परत और उघाड़ते चलेंगे तो और भी बदबू मिलेगी, और भी सडांध दिखेगी. अब मनुवादी सरकार ने न्यायालयों के सहारे विभागवार रोस्टर लागू करके बची खुची सम्भावनाओं को हमेशा के लिए दफ़न कर दिया है।

 

 

विश्वविद्यालयों में कुलपति पद का हाल

 

 

 

(लक्ष्मण यादव सक्रिय सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। युवाओं के रोज़गार और आरक्षण के साथ खिलवाड़ किए जाने के मुद्दे पर चल रहे आंदोलन के चर्चित चेहरे। )