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एक तानाशाह के नाम का पुरस्‍कार लेकर मेहनत से कमाई विश्‍वसनीयता को क्‍यों गंवाना, रवीश?

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जनवादी अधिकार कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह नेगी का यह लेख 2008 में इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में छपा था। इसका हिंदी तर्जुमा उसी साल समयांतर में प्रकाशित हुआ। यह लेख विस्‍तार से रेमन मैग्‍सेसे पुरस्‍कार के पीछे की राजनीति और मैग्‍सेसे के राजनीतिक सफ़र पर प्रकाश डालता है। नेगी सवाल उठाते हैं कि क्या कोई अगस्तो पिनोशे या इदी अमीन की स्मृति में स्थापित पुरस्कार लेगा? अगर नहीं, तो इन्‍हीं तानाशाहों की जमात में शामिल रेमन मैग्‍सेसे के नाम पर बना पुरस्‍कार लेकर कोई क्‍यों अपनी विश्‍सनीयता को गंवाए? (संपादक)


इंटरनेट पर जो कुछ चित्र उपलब्ध हैं, उनमें अपने दृढ़ और खुरदुरे चेहरे के साथ वह असामान्य रूप से आकर्षक नजर आते हैं। लेकिन अनगिनत पुराने और नये शासक आकर्षक थे और हैं। ”एंड स्टिल दे स्माइल्ड एंड स्टिल द हॉरर ग्रू” (जितना ही वह मुस्कराए, आतंक बढ़ता गया)। 31 अगस्त, 1907 में पैदा हुए वह फिलिपीन्स के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे। रेमन मैग्‍सेसे का नाम उस प्रसिद्ध पुरस्कार से जुड़ा है जो सिर्फ मधुर लय पैदा करता है पर कोई तस्वीर नहीं बनने देता।

मैग्‍सेसे ऐसे समय में पैदा हुए थे जबकि देश पूरी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका की जकड़ में था। अमेरिकियों के खिलाफ हुए कई बड़े विद्रोहों को उनके जन्म से चार वर्ष पहले 1903 तक दबाया जा चुका था लेकिन उसके बाद कम से कम अगले छह वर्ष तक संघर्ष किसी न किसी रूप में जारी रहा। 1901 में अमेरिकी सेना ने फिलिपीन्सवासियों का अंधाधुंध संहार किया। लुजान के दक्षिण में सामार में जनरल जेकब हर्ड स्मिथ ने आदेश दिया कि ”दस वर्ष से ऊपर की हर चीज को” मार दिया जाए। वह उस द्वीप को ‘‘सन्नाटे का मरुस्थल” बना देना चाहते थे।

मैग्‍सेसे भाग्यशाली थे कि वह बंदूक की गोली का अन्य देशवासियों की तरह से शिकार नहीं हुए। ट्राई टेन नाम की यातायात कंपनी में मेकैनिक के पद से शुरू कर वह इसके मैनेजर के पद तक पहुंचे। सन 1941 में वह अमेरिकी सेना में भर्ती हुए और उन्होंने जापानियों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्व किया। 1945 में उन्हें अपने जन्म स्थान ज़ेमबालेस प्रांत का सैनिक गवर्नर नियुक्त किया गया। जब जुलाई 1946 में फिलिपीन्स को अमेरिकियों ने जापानियों को खदेड़ने के बाद आजादी प्रदान की, उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और फिलिपीन्स की कांग्रेस में ज़ेमबालेस के प्रतिनिधि निर्वाचित हुए। उसी वर्ष वह लिबरल पार्टी में शामिल हो गए।

सन 1949 में गुरिल्ला समूह हुकबालहाप ने, जो कि हुक नाम से भी जाना जाता है और जिसकी स्थापना लुई तारुक ने 1930 के दशक में किसानों के असंतोष को अभिव्यक्त करने के लिए और बाद में जापानियों से लड़ने के लिए की थी, तय किया कि वे अपनी सरकार की स्थापना के लिए बड़े संघर्ष की शुरूआत करेंगे। परिणाम स्वरूप संघर्ष बढ़ गया और उसी अनुपात में हुक के विद्रोह को दबाने की कार्यवाहियों में भी तेजी आई। उनकी संख्या कम से कम 15 हजार और उनके सक्रिय समर्थकों की संख्या ढाई लाख मानी जाती थी। इस बीच उसी वर्ष नवंबर में एलपीडियो क्वीरिनो राष्ट्रपति का चुनाव जबर्दस्त घपला कर के जीत गए। इस के बारे में कहा जाता था कि वह ‘‘पेड़-पौधे, चिड़िया और बंदरों के मतों” से जीते। सितंबर, 1950 में क्विरीनो ने  बिगड़ती हुई स्थिति को देखते हुए रेमन मैग्‍सेसे को राष्ट्रीय सुरक्षा का सचिव नियुक्त किया। पद संभालने के बाद, जो तब तक पहले से ही ‘अमेरिकियों के जबर्दस्त प्रशंसक” माने जाने लगे थे, मैग्‍सेसे अमेरिका गए और हुक विद्रोहियों से लड़ने के लिए सैनिक मदद हासिल की। उन्होंने हुकों के खिलाफ अपनी सभी लड़ाइयां संयुक्त अमेरिकी सेना सलाहकार समूह (जेयूएसएमएजी) में अमेरिकी वायुसेना और स्थल सेना सलाहकार एडवर्ड लेंड्सडेल के साथ एक ही मकान में रहते हुए जीतीं। दोनों ने मिल कर विद्रोह के स्वरों का गला घोंटा।

अप्रैल, 1951 में टाइम पत्रिका ने रिपोर्ट छापी कि, ”अपने मुख्यालय में मैग्‍सेसे मेज़ पर इतनी जोर से घूंसा मारते थे कि राखदानी उछल कर नीचे जा गिरती थी और फिर वह दहाड़ते हुए आदेश देते थे”। पत्रिका ने उसे उद्धृत करते हुए आगे लिखा, ‘‘मनीला के चारों ओर और आदमी लगाओ। मैं चाहता हूं कि हर संदेहास्पद व्यक्ति की तलाशी ली जाए और हर संदेहास्पद मकान पर छापा मारा जाए… हुकों को कनदाबा के दलदलीय इलाकों से जला कर बाहर निकाला जाए। देश में आठ हजार हुक हैं। इस हिसाब से हमारी हर प्लाटून के हिस्से में पांच हुक आते हैं। आइये इस सप्ताह को हम संहार का सप्ताह बनाएं।”

वह सप्ताह संहार का सप्ताह ही साबित हुआ क्योंकि उस एक सप्ताह में उनकी सेनाओं ने चालाकी और निर्ममता दोनों के सहारे तीन सौ विद्रोही मारे। मैग्‍सेसे के फिलिपीन्स के सुरक्षा सचिव बन जाने के बाद से सेना ने दावा किया कि उसने 1363 विद्रोही मारे, 487 पकड़े और तीन हजार विद्रोहियों को समर्पण करने को मजबूर किया। निश्चय ही इससे ज्यादा ही लोग मारे गए होंगे, पकड़े गए होंगे और समर्पण करने के लिए मजबूर किए गए होंगे। रेमन मैग्‍सेसे एवार्ड फाउंडेशन (आरएमएएफ) की वेबसाइट पर लिखा हुआ हैः ”दुनिया समृद्ध और बेहतर हुई है क्योंकि रेमन मैग्‍सेसे पैदा हुए थे।” कैसे? कहा नहीं जा सकता।

नवंबर, 1953 में वह राष्ट्रपति बने और तब तक इस पद पर रहे जब तक कि वह असमय ही 17 मार्च, 1957 को चेबू के मानुगेल पर्वत पर हुई हवाई दुर्घटना में मारे नहीं गए।

377 वर्ष पुराने स्पेनिश औपनिवेशिक शासन से 200 विद्रोहों के बाद मुक्त हुए फिलिपीन्सवासियों ने 1898 में पाया कि पेरिस में हुई एक संधि के कारण, जिसके तहत स्पेनिश-अमेरिकी युद्ध खत्म हुआ, वे अमेरिकियों की पकड़ में आ गए हैं। हावर्ड ज़िन ने अपनी पुस्तक ”ए पिपुल्स हिस्ट्री आफ यूनाइटेड स्टेट्स” में अमेरिकी राष्ट्रपति विलियम मेक्किनले के उस अजीबोगरीब तर्क का उल्लेख किया है जिसके तहत उन्होंने फिलिपीन्स पर कब्जा करने को सही ठहराया है। राष्ट्रपति ने मंत्रियों के एक समूह से कहा, ”हम उन्हें स्पेन को वापस नहीं दे सकते – वह कायरतापूर्ण और असम्मानजनक होगा। हम उन्हें फ्रांस या जर्मनी को भी नहीं सौंप सकते जो कि व्यापार में हमारे प्रतिद्वंद्वी हैं- वह खराब धंधा होगा और विश्वसनीयता को खत्म करेगा। हम उन्हें उनके भाग्य पर भी नहीं छोड़ सकते- वे स्वशासन के योग्य नहीं हैं- वहां जल्दी ही अराजकता और कुशासन फैलेगा जो कि स्पेन से भी बुरा होगा। हमारे लिए वहां कोई रास्ता नहीं बचा है सिवाय सब कुछ ले लेने के और फिलिपीन्सवासियों को शिक्षित करने, ऊपर उठाने, सभ्य बनाने और ईसाई बनाने के…।”

अमेरिका द्वारा फिलिपीन्स पर आक्रमण के संदर्भ में रुडयार्ड किपलिंग की कविता ‘व्हाइट मैन्स बर्डन’ (श्वेतों का उत्तरदायित्व) गैर-पश्चिमी दुनिया के प्रति कृपावान दृष्टिकोण को दिखलाती है। यही वह दृष्टिकोण है जिससे पश्चिम आज तक नहीं उबर पाया है और यह अन्य संस्कृतियों से ऐसे व्यवहार करता है कि उन्हें सभ्य बनाना है। विद्रोही से सांसद बने बयान मुना दल के सेतूर सी ओकांपो ने अमेरिकी आक्रमण की नृशंसता का वर्णन करते हुए कहा है, ”मई, 1901 में ही अमेरिकी जनरल बेल के हिसाब से लुजानों में छह लाख फिलिपीन्सवासी हताहत हो चुके थे जिनमें से संभवतः 15 से 20 हजार तक ही सैनिक थे। यह सिर्फ दो वर्षों के संघर्षों के बाद और लुजानो और विसाया में व्यवस्थित तरीके से ”तुष्टिकरण के कंपेन” से पहले की स्थिति थी। पूरी की पूरी आबादी को तथाकथित ‘‘संरक्षण क्षेत्रों” में हांक कर ले जाया गया और इससे लाखों लोग भूख, असुरक्षा और बीमारियों से मर गए। 1903 से 1913 के बीच संभवतः एक लाख मुस्लिम मिंदानाओ में प्रतिरोध संघर्षों में मारे गए।”

कहा जाता है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद फिलिपींस की 10 से 15 प्रतिशत आबादी के संहार के लिए जिम्मेदार था, जिसका दूसरे शब्दों में यह अर्थ होता है कि 10 लाख से अधिक मौतें हुईं थीं। उस समय फिलिपींस की जनसंख्या अस्सी लाख के करीब थी। उस समय स्वतंत्राता की घोषणा का अर्थ संभवतः फिलिपीन्स में औपनिवेशिक शासन का अंत होता, लेकिन इसने सत्ता पर अमेरिकी कब्जे के कारण नवसाम्राज्यवाद की शुरूआत की। कई द्विपक्षीय समझौतों- जो कि दबाव में थोपी गई शर्तों का दूसरा नाम है- के तहत अमेरिका ने फिलिपीन्स में अपनी हस्तक्षेपकारी नीति को जारी रखा है। 1947 के सैनिक अड्डों की संधि और 1951 की आपसी सुरक्षा संधि ने फिलिपीन्स को अमेरिका का पिट्ठू राज्य बना दिया है। ऐसी जगह जहां वह अपने सैनिकों को रख सकते हैं और जहां से अपने आणविक हथियारों को जब चाहे चला सकते हैं। जनरल रिलेशंस प्रापर्टी एक्ट (1946), बेल ट्रेड एक्ट (1946), पैरिटी एमेंडमेंट (1947) और लॉरेल-लेंगले संधि (1954) जैसी संधियों और कानूनों ने देश की अर्थव्यवस्था और राजतंत्र पर अमेरिकी पकड़ को और मजबूत कर दिया। अमेरिकियों को फिलिपींसवासियों के बराबर के आर्थिक अधिकार प्रदान कर और व्यापार तथा निवेश संबंधों को अपने पक्ष में कर ये कानून अमेरिकी सरकार और एकाधिकारी पूंजी के हितों की रक्षा करते हैं व उन्हें गहरा करते हैं।

”लोकतांत्रिक” तरीकों से चुने गए शासकों एलपीडिओ क्वीरिनो से लेकर रेमन मैग्‍सेसे, कार्लोस पी ग्रेसिए, फर्डिनांद ई मार्कोस, ग्लोरिया मेकापगाल एरोया, सभी अमेरिका की कठपुतलियां रहे जो अपने कभी के औपनिवेशिक शासकों के हित में काम करते रहे। उन्होंने अपने ही देशवासियों के खिलाफ युद्ध चलाए- 1930 के दशक के किसान विद्रोहों के खिलाफ, हूकबालाहाप और हूकबोंग मापागपालाया नग बायान (एचएमबी) 1940 और 1950 में, न्यू पीपुल्स आर्मी (एनपीए) के विरुद्ध 1960 के दशक से तथा मोरो जनता के खिलाफ 1970 के दशक से।

यह मात्र संयोग नहीं है कि रॉकफैलर जैसे भीमकाय अमेरिकी औद्योगिक संस्थान ने उसकी मृत्यु के तत्काल बाद मेसासे के नाम पर एक पुरस्कार की स्थापना की और उसके लिए पैसा दिया। इसका कारण यह है कि अमेरिकी सरकार और उद्योग के देश में अपने हित हैं। रेमन मैग्‍सेसे अमेरिकी संरक्षण में ही फूले-फले थे और बदले में उन्होंने अमेरिकियों को अद्भुत तरीके से लाभान्वित किया था। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि उनके नाम पर पुरस्कार स्थापित कर अमेरिकी उन्हें अमर ही नहीं कर देना चाहते थे बल्कि उनकी तरह की राजनीति को वैधानिकता भी प्रदान करना चाहते थे।

पुरस्कार की स्थापना प्रत्यक्ष तौर पर ”सरकार में निष्ठा, जनता की साहसिक सेवा और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की सीमा में  व्यावहारिक आदर्शवाद के उनके उदाहरण को बनाए रखने के लिए” की गई थी।

अगर ”सरकार में निष्ठा” का अर्थ  दमनकारी शासक वर्ग और औपनिवेशिक देश के हितों को साधना; या अगर ”जनता की साहसिक सेवा” का मतलब विरोधी स्वरों का बर्बर दमन भी हो सकता है; या अगर ”व्यावहारिक आदर्शवाद” के विचार को खींच कर चुनाव की धांधली तक ले जाया जा सकता है तो बेहतर है चुप ही रहा जाए। एशिया के नोबेल पुरस्कार के रूप में प्रचारित इस पुरस्कार को शुरू में पांच श्रेणियों के तहत दिया जाना था। वे थीं- सरकारी सेवा; जन सेवा; सामुदायिक नेतृत्व; पत्रकारिता, साहित्य और रचनात्मक संप्रेषण कलाएं; तथा शांति और अंतर्राष्ट्रीय भ्रातृत्व। सन 2000 में इसमें एक और अमेरिकी विशालकाय कंपनी फोर्ड के अनुदान से एक छठी श्रेणी जोड़ी गई जो कि उभरते नेतृत्व के लिए प्रदान की जाती है। 1957 में इसके जन्म से लेकर इस वर्ष (प्रकाशन वर्ष 2008) तक एशिया के 268 लोगों और संस्थाओं को ये पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

सबसे ज्यादा पुरस्कार भारतीयों को मिले हैं। कुल 45 भारतीयों को सभी श्रेणियों के ये पुरस्कार  1958 में विनोबा भावे से शुरू हो कर पी. साईनाथ को 2007 और प्रकाश तथा मंदाकिनी आम्‍टे को 2008 में मिले हैं। जिस सहजता से इन पुरस्कारों को आम जनता की नजर में वैधानिकता और सम्मान मिलने दिया गया है वह परेशान करने वाला है। जब संदीप पांडे (भारत से)  ने 2002 में (वह भी काफी समझाने-बुझाने के बाद) पुरस्कार लेने से मना किया तो वह भी इसलिए था कि पुरस्कार की राशि फोर्ड फाउंडेशन ने प्रदान की थी।

यह इस तरह के कई सवाल उठाता है कि क्या रॉकफैलर का पैसा फोर्ड के पैसे से ज्यादा पवित्र है? उस आदमी का क्या होगा जिसके नाम पर यह पुरस्कार दिया जाता है और जिसके आदर्शों को यह अमर करना चाहता है? क्या पुरस्कार पाने वाले पुरस्कार लेकर उसकी दमनकारी और ‘कंप्राडोर’ प्रकृति की राजनीति को सही नहीं ठहरा रहे हैं? क्या फिलिपींस की एक के बाद एक सरकार की अपनी जनता के प्रति अपनायी जाने वाली नीतियों पर सवाल नहीं किया जाना चाहिए? आप इन और इस तरह के कई सवालों की अनदेखी अपनी मेहनत से कमाई विश्वसनीयता की कीमत पर कर सकते हैं।

हिटलर, स्टालिन, पोल पोत, इदी अमीन, पिनोशे, सद्दाम हुसैन, थेन शू और न जाने कौन-कौन से नाम आज भी लोगों को विचलित कर देते हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरणों को आज कौन अपनाना चाहेगा? वे खराब उदाहरण हैं। रेमन मैग्‍सेसे उन्हीं में से एक है। उदाहरणस्वरूप, क्या कोई अगस्तो पिनोशे या इदी अमीन की स्मृति में स्थापित पुरस्कार लेगा?


साभारः इकनॉमिक एंड पोलिटिकल वीकली, 2008: हिंदी अनुवाद– समयांतर, नवंबर 2008

3 COMMENTS

  1. उमेश चंदोला

    शानदार लेख ।
    लेकिन आखिरी में सारा गुड़ गोबर कर दिया नेगी जी । स्टालिन को जानते भी हो या नहीं ? जरा अमेरिकी पत्रकार अन्ना लुई स्ट्रॉन्ग की स्टालिन युग भी पढ़े । या ये जानकारियां दी ही इसलिए थीं कि अंत में हिटलर के साथ महान स्टालिन को रगड़ा जाए। अमेरिकन एनजीओ इंटेलेक्चुअल स्कीम के तहत ।
    अन्ना ने इस पुस्तक में एक अध्याय लिखा है –महा पागलपन । इसमें उसी अवधि की आलोचना है जब स्टालिन के काल में क्रूर दमन चक्र चला। मजदूर राज के गद्दार होने का शक काफी था । हालाकि कई बार विदेशी पत्रकारों के सामने अदालती केस चले । कम्युनिस्ट पार्टी के कई कार्यकर्ताओं को अनुचित ढंग से , गलतफहमी में मारा ग या । लेकिन पूरी किताब पढ़ के स्टालिन वाकई बहुत महान लगते हैं। सच यार । खुद अन्ना जेल में डाली गई थी ।
    लेकिन बस इतना ही । अन्ना कहती हैं उन की गलतियां उनकी महानता के कामों की तुलना में बहुत छोटी है। जरा देखिए तो सही फासीवादी हिटलर से पूरी दुनिया की रक्षा करना ,चीन की मदद करना और 13 देशों में समाजवाद 102 देशों में आजादी लाना क्या सोवियत समाजवाद के बिना संभव हो पाता ? और भारत ?
    1930 में मेरठ विद्रोह में तीन अंग्रेजों समेत 30 लोग जेल में बंद थे अंग्रेजों ने ₹90 लाख उस पर खर्च किए थे ताकि पता लग सके इस विद्रोह की योजना कैसे बनी ।यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद का तख्ता पलटने का षड्यंत्र था । इसके खिलाफ नाटक बनाकर पूरे ब्रिटेन में प्रचार हुआ 2 बार भारत जेल में बंद कॉमरेड उस्मानी को वहां से खड़ा किया गया और उन्हें ब्रिटेन के मजदूरों के एक लाख के करीब वोट भी मिले । नाटक के माध्यम से ब्रिटेन समेत पूरी दुनिया ने भारतीय जनता के पर किए जा रहे जुल्मों को जाना। आजादी के बाद दबे कुचले नंगे भूखे भारत को तमाम पब्लिक सेक्टर खड़ा करने में और सस्ती दरों के ब्याज में पूंजी उपलब्ध कराने में रूस के योगदान भला कौन भूल सकता है ।
    इतने बड़े महादेश का राष्ट्रपति स्टालिन और तीन कमरों में रहता था । एक में उसकी लड़की रहती थी ।खुद खाना बनाता था उसकी पत्नी एक फैक्ट्री में काम करती थी । ऐसा आदमी और क्रूर हत्यारा । कौन से नेताओं से उनकी तुलना कर रहे हैं ?
    उमेश चंदोला

    • रूमी वारसी

      डॉ उमेश चंदोला जी का शानदार लेख इससे पहले जितने भी लोगो को मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजा गया तब क्यो नही इस पुरस्कार के पीछे के तर्क पूर्ण लेख उजागर हुए ज़ाहिर है कि रवीश कुमार को मिले इस पुरस्कार से सरकार के तथाकथित अंध समर्थक विचलित है

  2. उमेश चन्दोला जी स्पष्ट कर चुके इस लेख को लेकर। पर रूमी वारसी जी के कमेंट के बाद यहीं कुछ कहना चाहिए। मीडिया विजिल की अपनी जगह है, रवीश या ndtv की अपनी।
    लेख का शीर्षक ही साफ़ कर देता है कि यह पुरस्कार के पुरुस्कार जैसी बात है। कभी-कभी सरकारी पुरुस्कारों की राजनीति पर बात होती है इसी तरह।
    पर जैसा रवीश कह रहे थे, उन्हें अपना काम करते जाना है।

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