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बजट के शोर में दब गया राजस्थान उपचुनाव नतीजा बीजेपी के लिए दीवार पर लिखी इबारत है!

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अनिल कुमार यादव 

मोदी सरकार का आखिरी बजट पेश हो रहा था. गडकरी और अडवानी के बीच वाली सीट से अरुण जेटली मटमैले रंग के कुरते के ऊपर काले रंग की नेहरू जैकेट पहनकर बज़ट पेश कर रहे थे. रिटायर्ड और नौकरीपेशा लोग अपने टीवी पर नज़र जमाये हुए थे, उनके सामने टेबल पर पूरे साल के वेतन का हिसाब-किताब था. फोन पर रिटर्न फ़ाइल करने के पहले का गुणा-भाग समझा और समझाया जा रहा था. टीवी चैनलों पर जोड़ मची हुई थी कि इस बजट को कैसे अलंकृत किया जाये. कोई इसे पहला किसान बजट तो कोई इसे गरीबों का बजट करार दे रहा था. देश के ज्यादातर अर्थशास्त्रीय संस्थानों के विश्लेषक, राजनीति विश्लेषक बनकर आने वाले आम चुनाव में भाजपा की जीत तक का दावा कर रहे थे. दूसरी ओर लुटियन जोन से महज 187 किलोमीटर की दूरी पर अलवर लोकसभा समेत देश की तीन लोकसभा सीट और दो विधानसभा सीट से 39,37732 मतदाता एक जनादेश की घोषणा कर रहे थे, जो भाजपा के खिलाफ है.

राजस्थान की तीन सीटों – दो लोकसभा और एक विधानसभा पर उपचुनाव सम्पन्न हो गया है. परिणाम भी आ गए हैं. अजमेर लोकसभा सीट पर पहली लोकसभा से लेकर पांचवीं लोकसभा तक कांग्रेस का वर्चस्व बना रहा. 1977 में जनता पार्टी के श्रीकरण शारदा ने कांग्रेसी बीएन भार्गव को पटकनी दी थी. अजमेर में यह कांग्रेस की पहली हार थी. इसके बाद नौवी लोकसभा के चुनाव में राम के नाम पर कांग्रेस भाजपा से चुनाव हारी और भाजपा नेता रासा सिंह रावत लगातार तीन बार अजमेर से सांसद हुए और बारहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रभा ठाकुर चुनाव जीतीं पर जीत स्थायी साबित नही हो सकी. रावत ने फिर वापसी की और फिर लगतार दो बार सांसद चुने गए. 2009 में सचिन पायलट कांग्रेस से विजयी हुए लेकिन मोदी लहर में भाजपा फिर से वापसी कर ली. कुल मिलाकर यह सीट जितनी कांग्रेस की थी उतनी ही भाजपा की हो गयी थी. अब जब भाजपा केंद्र और राज्य दोनों जगह शासन में है तो कांग्रेस की इस सीट पर जीत उसके लिए एक बड़ी राजनीतिक संभावना को दर्शा रही है. उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रघु शर्मा ने 84,414 मतों से भाजपा उम्मीदवार राम स्वरूप लम्बा को हरा दिया.

अलवर लोकसभा सीट पर कांग्रेस को बहुत जल्दी ही चुनैतियां मिलने लगी थीं. तीसरी ही लोकसभा में निर्दल प्रत्याशी के तौर पर काशीराम गुप्ता चुनाव जीत गए थे. चौथी और पांचवीं लोकसभा में कांग्रेस फिर से वापसी की लेकिन सतहत्तर की जनता पार्टी की लहर में फिर चुनाव हार गयी और रामजी लाल यादव सांसद बने. अगले चुनाव में कांग्रेस यादव प्रत्याशी के सहारे फिर से वापसी कर ली और रामसिंह यादव लगातार दो बार संसद चुने गए. नौवीं लोकसभा में जनता दल से रामजी लाल यादव दोबारा सांसद चुने गए. भाजपा की पहली जीत 1991 में हुई  इसके बाद 1999 और फिर 2014 की लोक सभा महंत चांदनाथ सांसद चुने गए इसके अलावा और सारे चुनावों में कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा. यानि यह सीट अजमेर की अपेक्षा कांग्रेस की परम्परागत सीट रही है. उपचुनाव में डॉ कर्ण सिंह यादव ने भाजपा के जसवंत सिंह यादव को 196,496 रिकार्ड मतों से हारा दिया है. रोचक तथ्य यह है कि इस सीट पर 15 हजार से अधिक लोगों ने नोटा भी दबाया.

राजस्थान की एक विधानसभा सीट मंडलगढ़ पर भी उपचुनाव हुआ, वहां पर भी भाजपा प्रत्याशी की करारी हार का सामना करना पड़ा है. कांग्रेस प्रत्याशी विवेक धाकड़ ने भाजपा के शक्ति हांडा को 12976 मतों से पराजित किया. राजस्थान की तीनों सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार बड़े अंतर से चुनाव हारे हैं.

बंगाल के नुआपाड़ा विधानसभा और उलुबेरिया लोकसभा चुनाव में भाजपा को जीत तो नहीं मिली परन्तु सीपीएम को पीछे छोड़ते हुए दूसरे नम्बर की पार्टी बनने में वह सफल रही. यह दोनों सीट टीएमसी ने बड़े अंतर से जीती हैं.


लेखक लखनऊ के गिरि इंस्टिट्यूट में शोधार्थी हैं 

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